भारत में धर्मनिरपेक्षता पर निबंध |Essay on Secularism in India

भारत में धर्मनिरपेक्षता पर निबंध

भारत में धर्मनिरपेक्षता पर निबंध  या भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति(India’s Secular Culture)

धर्मनिरपेक्षता न सिर्फ भारतीय संविधान का मूल तत्व है, बल्कि सदियों से भारत में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति भी विद्यमान रही है, जिसने सदैव ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा को बल प्रदान किया। यही कारण है कि भारत में धर्मनिरपेक्ष समाज की स्थापना संभव हो सकी। भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के निर्माण में परिवर्तनों और नवाचारों का विशेष योगदान रहा। आज के भारतीय समाज की यह विशिष्टता है कि इसमें धर्म के आधार पर भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को जानने से पूर्व यह जान लेना आवश्यक होगा कि धर्मनिरपेक्षता है क्या? वस्तुतः धर्मनिरपेक्षताएक ऐसी विचारधारा है, जो सभी धर्मों को एक समान स्वीकार करती है। यह भी कह सकते हैं कि यह विचारधारा धर्म को राजनीति से अलग करती है। धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के तहत राज्य धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता।

जब संस्कृति का धर्म निरपेक्षीकरण हो जाता है, तो इसे आधुनिकीकरण से जोड़कर देखते हैं। इसमें व्यक्ति अपने सामाजिक व्यवहार में सभी धर्मों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए सार्वजनिकमानक स्थापित करता है। जो राज्य धर्मनिरपेक्ष होता है, उसकी यह खूबी होती है कि वह न तो धार्मिक होता है और न ही अधार्मिकअथवा धर्मविरोधी। ऐसा राज्य धार्मिक रूढ़ियों से पूर्णतः विमुक्त रहते हुए धार्मिक संदर्भो में पूर्ण तटस्थता बरतता है।

“भारत में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की जड़ें कितनी पुरानी और गहरी हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि प्राचीन भारत के हर्ष, अशोक, बिम्बिसार, कनिष्कऔर चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय जैसे शीर्ष सम्राटों ने राजधर्म की तो घोषणा की, किंतु किसी को इसे अंगीकार करने को बाध्य नहीं किया। यानी राज्य का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप तब भी अस्तित्व में था।”

भारत एक सहिष्णु देश है और सभी को समाहित करने की इसकी संस्कृति रही है। बाहर से काफिले आए, यहां आकर बसे और फिर यहीं के होकर रह गये। तभी तो कहा गया है कि काफिले बसते गये, हिन्दोस्तां बनता गया। तमाम आने वाले भारत आए तो आक्रमणकारियों के रूप में, किन्तु यहां आकर यहां की संस्कृति में ऐसा रच-बस गये कि वे यहीं के होकर रह गये और भारतीय कहलाने लगे। इसी से हमारी धर्मनिरपेक्ष व मिली-जुली संस्कृति का सूत्रपात हुआ। बाहर से आने वालों ने जहां भारतीय संस्कृति को अंगीकार किया, वहीं उन्होंने भारतीय संस्कृति पर अपनी संस्कृति की भी छाप छोड़ी, जिससे एक मिली-जुली संस्कृति का विकास हुआ। यहां आनेवालों ने जहां भारतीय संस्कृति की खूबियों को आत्मसात किया, वहीं उनकी संस्कृति की खूबियों को अंगीकार करने से हम भी नहीं चूके। इस प्रकार हमारी संस्कृति परिष्कृत और परिमार्जित भी हुई और इसी मेल-जोल से भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति विकसित व समृद्ध हुई।मध्यकाल से लेकर अंग्रेजों के आगमन तक भारतीय संस्कृति परिवर्तनों और नवाचारों से गुजरी और धर्मनिरपेक्षता इसके प्राण तत्व बन गये। हमने सभी धर्मों के प्रति सहिष्णुता की उदार परम्परा को बनाये रखा और ‘सर्वधर्म समभाव’ के दर्शन को प्रतिपादित किया।

भारत में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की जड़ें कितनी पुरानी और गहरी हैं, इसका पता इस बात से चलता है कि प्राचीन भारत के हर्ष, अशोक, बिम्बिसार, कनिष्क और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय जैसे शीर्ष सम्राटों ने राजधर्म की तो घोषणा की, किंतु किसी को इसे अंगीकार करने को बाध्य नहीं किया। यानी राज्य का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप तब भी अस्तित्व में था। तब भी सम्राट राजधर्म के अतिरिक्त सभी धर्मों को सम्मान और प्रश्रय देते थे।

“भारत की धर्म निरपेक्ष संस्कृति न सिर्फ श्लाघनीय है, बल्कि हमें संकीर्ण व विग्रह पैदा करने वाले विचारों से ऊपर भी उठाती है। इस संस्कृति ने भारतीय समाज को समरसता प्रदान की है।”

भारत के जननायक व राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी में धर्म और ईश्वर के प्रति अडिग आस्था थी, अटूट विश्वास था। हम यह कह सकते हैं कि बापू कट्टर धर्मपंथी थे, किंतु अन्य धर्मों के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा थी। उनके विचार किसी धर्म विशेष पर आधारित न होकर नैतिकता और आध्यत्मिकता के पोषक थे, जिनसे भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति को प्रोत्साहन मिला और भारत में गंगा-जमुनी तहज़ीब को विकसित करने में उनकी भूमिका केन्द्रीय रही। भारत के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू भी भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के प्रशंसक, अनुयायी व पैरोकार थे। इसीलिए उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा की पैरोकारी करते हुए कहाथा- “धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ है- धर्म और आत्मा की स्वतंत्रता। जिनका कोई धर्म नहीं, उनके लिए भी स्वतंत्रता का अभिप्राय है- सब धर्मों के लिए स्वतंत्रता। इसका अर्थ है- सामाजिक और राजनीतिक समानता।”

चूंकि भारत में प्राचीनकाल से धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की एक समृद्ध परम्परा रही अतएव इसकी श्रीवृद्धि करते हुए हमारे संविधान निर्माताओं ने इसे वैधानिकता के दायरे में लाने के लिए भारतीय संविधान को धर्मनिरपेक्ष स्वरूप प्रदान किया। धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशिष्टता है। सच तो यह है कि भारतीय संविधान की बनियाद ही इसी पर रखी गई है। हमारा संविधान भारत को एक सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक गणतंत्र घोषित करता है। भारतीय संविधान की आत्मा को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने के लिए इसमें धर्मनिरपेक्ष शब्द 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया। वस्तुतः, भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पहले से ही निहित थी। यह संविधान के भाग-3 में मौलिक अधिकारों में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28) प्रदान किए जाने से स्पष्ट है। इसमें धर्म की स्वतंत्रता के अतिरिक्त धार्मिक कार्यों के प्रचार तथा धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई है।

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि भारत सरकार धर्म के मामले में तटस्थ रहेगी। उसका अपना कोई धार्मिक पंथ नहीं होगा तथा देश में सभी नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक उपासना का अधिकार होगा। भारत सरकार न तो किसी धार्मिक पंथ का पक्ष लेगी और न ही किसी धार्मिक पंथ का विरोध करेगी। भारत का संविधान किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है। धर्म निरपेक्ष राज्य धर्म के
आधार पर भेदभाव न कर प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक नागरिक के रूप में व्यवहार करता है।

किसी भी कल्याणकारी राज्य से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह धार्मिक मामलों में पूर्ण तटस्थ रहेगा। अतः धर्म निरपेक्षता को ‘सर्वधर्म समभाव’ के रूप में देखा जाता है, जहां राज्य की नजर में सभी पंथ बराबर होंगे। धर्म निरपेक्षता का अर्थ अधार्मिक या धर्म विरोधी होना नहीं, बल्कि सभी धर्मों को समान स्वतंत्रता प्रदान करना है। उच्चतम न्यायालय ने धर्म निरपेक्षता को संविधान की बुनियादी विशेषता बतलाया है।

हमारा संविधान लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए संविधान सभा में श्री हरि विष्णु कामथ ने कहा था कि एक धर्म निरपेक्ष राज्य न तो ईश्वर रहित राज्य है, न ही वह अधर्मी राज्य है – और न ही धर्म विरोधी राज्य। भारत में धर्म निरपेक्ष होने का यह अर्थनहीं है कि इसमें ईश्वर का अस्तित्व नहीं माना जाता। भारतीय संविधान में ईश्वर के अस्तित्व को मान्यता दी गई है और हम पद्भार | ग्रहण करते समय ईश्वर के नाम पर शपथ ले सकते हैं।

भारत की धर्म निरपेक्ष संस्कृति न सिर्फ श्लाघनीय है, बल्कि | हमें संकीर्ण व विग्रह पैदा करने वाले विचारों से ऊपर भी उठाती है।
इस संस्कृति ने भारतीय समाज को समरसता प्रदान की है। हमें प्यार व मिठास के रंगों से रंगा है। एक अनूठा वैविध्य भी प्रदान किया है, जिसने हमारी संस्कृति को नीरस होने से बचाया है। वस्तुतः, भारतीय संस्कृति तो उस माला जैसी है, जिसमें अनेक रंग और खुशबुओं के फूल पिरोए गये हैं। हमें इसे अक्षुण्ण बनाए रखना होगा।

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