द्वितीय श्रेणी की रेलयात्रा पर निबंध-Essay on Second Class Rail Travel

द्वितीय श्रेणी की रेलयात्रा पर निबंध

द्वितीय श्रेणी की रेलयात्रा पर निबंध-Essay on Second Class Rail Travel

आज का युग विज्ञान का युग है। आज यात्रा के अनेक साधनों का विकास हो चुका है। आधुनिक युग में रेलगाड़ी एक ऐसी सवारी है, जो द्रुत गति से चलने के साथ-साथ आरामदेह और मनोरंजक भी है। इसमें एक साथ हजारों यात्री हजारों मील की यात्रा कर सकते हैं। सर्वसाधारण के लिए यह एक सर्वोत्तम साधन है, जिससे अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचा जा सकता है। एक बार मेरी भी इच्छा रेलगाड़ी से यात्रा करने की हुई। मेरी यह यात्रा रेलगाड़ी की द्वितीय श्रेणी की यात्रा थी, जो मिश्रित अनुभव वाली रही। 

हम लोगों ने पिताजी से पटना का चिड़िया घर देखने के लिए आग्रह किया। पिताजी मान गए और रविवार को हम लोग नियत समय पर जहानाबाद रेलवे स्टेशन पहुंच गए। वहां सबसे पहले हम लोगों ने टिकट लेने की बात सोची। टिकट-खिड़की के नजदीक काफी भीड़ दिखाई पड़ी। टिकट लेने की होड़ में सभी लोग एक दूसरे से धक्का-मुक्की कर रहे थे। टिकट-खिड़की पर यह लिखा था-कृपया, पंक्तिबद्ध होकर टिकट लें। लेकिन कोई भी व्यक्ति पंक्ति में नहीं था। भीड़ देखकर मेरा उत्साह ठंडा पड़ने लगा। 

तभी रेलवे के एक सिपाही ने डंडे का भय दिखाकर सबको पंक्तिबद्ध कराया। यहां यह अनुभव हुआ कि नियम का पालन करवाने हेतु वयस्क व्यक्तियों के लिए भी बच्चों की भांति डंडे की आवश्यकता होती है। मैंने एक चालाकी की। पिताजी से रुपये लेकर काउंटर पर खड़ी एक अधेड़ महिला को दे दिए और कहा कि कृपया, हम लोगों के टिकट भी आप ले लें। इस प्रकार एक अत्यंत दुरूह कार्य बड़ी आसानी से संपन्न हो गया। 

अब हम लोग प्लेटफार्म पर पहुंच गए। गाड़ी का सिग्नल हुआ। उद्घोषणा हुई कि गाड़ी प्लेटफार्म नं.-2 पर आ रही है। हम लोग सावधान हो गए। गाड़ी आई और प्लेटफार्म पर रुकी। रेलगाड़ी में काफी भीड़ थी। उतरने वाले उतर भी नहीं पाए थे कि चढ़ने वाले ठेलम-ठेल करने लगे। किसी प्रकार इस भीड़ में हम लोग भी गाड़ी में प्रवेश कर गए। तत्पश्चात बैठे हुए यात्रियों से अनुरोध करके हम लोगों ने भी बैठने की जगह बना ली। कुछ देर बाद गार्ड ने हरी झंडी दिखाई। गाड़ी की सीटी बजी और धीरे-धीरे चलने लगी। 

अब डिब्बे के अंदर मैंने चारों ओर नजर घुमाई। मुझे लगा कि यह डिब्बा अपने-आपमें एक संसार है। यात्रियों में बहुत से लोग अच्छे पहनावे में और कई लोग साधारण पहनावे में थे, लेकिन अनेक लोगों की स्थिति फटेहाल थी। यात्रियों की वेशभूषा यह भी बता रही थी कि इनमें कोई हिंदू है, कोई मुसलमान है, तो कोई सिक्ख है। यात्रियों के बीच हो रहे वार्तालाप से यह स्पष्ट हो रहा था कि इसमें अनेक विद्यार्थी, व्यापारी और नेता भी हैं। 

मैं खिड़की से सटा बैठा था। गाड़ी की दिशा में ही मेरा रुख था। गाड़ी भागती थी, लेकिन लगता था कि सभी पड़े-पौधे साथ-साथ भाग रहे हैं। खेतों की हरियाली तथा फसलों के प्रकार देख-देखकर मन आनंदित हो रहा था। जब गाड़ी स्टेशन पर खड़ी होती थी, तब चढ़ने-उतरने वालों का दृश्य देखने योग्य होता था। खोमचे वाले अपने सामानों को तरह-तरह की आवाज में चिल्लाकर बेच रहे थे। कुछ वेंडर डिब्बे के अंदर आ गए थे, जो साथ-साथ चल रहे थे। यात्रियों को रास्ते से हटाने के लिए वे जिस भाषा का प्रयोग कर रहे थे, उससे लगता था कि यात्रियों की मान-मर्यादा की उन्हें तनिक भी परवाह नहीं है। 

यात्रा के दौरान मैंने देखा कि द्वितीय श्रेणी में अधिकतर अनपढ़ और निम्न आय वाले लोग सफर कर रहे थे। इस यात्रा में पता चला कि नासमझ और सामान्य ज्ञान से शून्य लोगों की भारत में कमी नहीं है। रेल की सुविधाओं का लोग लाभ उठाते हैं, इसलिए यात्रा करने से उन्हें परहेज नहीं है। टिकट लेकर कोई भी आदमी यात्रा करने के लिए अधिकृत है। मगर रेलगाड़ी के द्वितीय श्रेणी में यात्रा करने से आज के भारत की असली तस्वीर रेल के डिब्बे के अंदर ही दिख जाती है। आदमी कितना स्वार्थी है, इसका प्रमाण भी हमें मिल जाता है। लोग कितने अभद्र हो गए हैं-इसका पता भी स्पष्टतः चल जाता है।

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