विज्ञान और समाज पर निबंध | Essay on Science and Society

विज्ञान और समाज पर निबंध

विज्ञान और समाज पर निबंध | Essay on Science and Society in Hindi 

विज्ञान और समाज का संबंध अन्योन्याश्रित है। प्रायः लोग यह धारणा बना लेते हैं कि विज्ञान का संबंध सिर्फ वैज्ञानिकों से है या उनसे जो विषय के रूप में विज्ञान का अध्ययन करते हैं। ऐसा सोचना संगत नहीं है। यह धारणा विज्ञान को एक दायरे में सीमित करती है, जबकि विज्ञान को हम किसी दायरे में बांध नहीं सकते हैं। इसका फलक व्यापक है। विज्ञान के संबंध में यह सोच भी भ्रामक है कि विज्ञान के तहत भौतिकी और गणित जैसे विषयों की समस्याओं का हल ढूंढ़ा जाता है। विज्ञान से न सिर्फ समूचा समाज आच्छादित है, अपितु समाज के प्रत्येक व्यक्ति से इसका प्रत्यक्ष संबंध है। सच तो यह है कि विज्ञान समाज के लाभ के लिए समाज में सीखने की एक सनातन प्रक्रिया है। विज्ञान समाज के लाभ के लिए समाज में ही पुष्पित-पल्लवित होता है तथा समाज को उन्नत व प्रगतिशील बनाता है। यही कारण है कि विज्ञान को समाज से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता है। विज्ञान समाज एवं संस्कृति दोनों को प्रभावित करता है। 

वस्तुतः विज्ञान समाज से अलग नहीं है, अपितु यह एक सामाजिक घटनाक्रम है। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि विज्ञान का भी अपना अलग समाजशास्त्र होता है। विज्ञान एक सामाजिक रूप से अंतःस्थापित गतिविधि है। इसके विकास में समाज का दृष्टिकोण एवं अंतर्ज्ञान सहायक सिद्ध होता है। यह कहना असंगत न होगा कि विज्ञान समाज को संवारता है, तो समाज विज्ञान को। दोनों अभिन्न रूप से गुंफित हैं। इन्हें विलग नहीं किया जा सकता है। जिस समाज में वैज्ञानिक सोच का अभाव होता है, वह समाज उन्नतशील नहीं बन पाता। कहने का आशय यह है कि विज्ञान को हमें एक सामाजिक कर्त्तव्य के रूप में देखना चाहिए। 

“विज्ञान से न सिर्फ समूचा समाज आच्छादित है, अपितु समाज के प्रत्येक व्यक्ति से इसका प्रत्यक्ष संबंध है। सच तो यह है कि विज्ञान समाज के लाभ के लिए समाज में सीखने की एक सनातन प्रक्रिया है |

 ‘ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी’ में दी गई विज्ञान की परिभाषा से भी यह ध्वनित होता है कि विज्ञान से समाज आच्छादित और दोनों का आपस में गहरा संबंध है। इस परिभाषा में यह रेखांकित किया गया है कि विज्ञान खास तौर पर मानव व्यवहार एवं समाज के पहलुओं के साथ जुड़े विषय विशेषों के संबंध में ज्ञान को व्यवस्थित करने की एक प्रणाली है। यानी मानव और समाज दोनों इसमें शामिल हैं। विज्ञान का उद्भव कहीं अपत्र नहीं हुआ। इसका उदभव समाज में ही हुआ, समाज से परे नहीं। समाज से उद्गत विज्ञान से ही उद्योग और भौतिक पर्यावरण का उद्भव हुआ, साथ ही मानवीय समस्याओं का भी, जिनसे समाज ने समायोजन भी किया। 

हम अक्सर विज्ञान को एक अलग विषय के रूप में निरूपित कर इसे एक सीमा रेखा में कैद करने की भूल करते हैं। यह उचित नहीं है। विज्ञान का फलक एक विषय से आगे बहुत ही विस्तृत एवं विस्तारित है। वस्तुतः अध्ययन एवं व्यवहार की प्रत्येक शाखा विज्ञान को जन्म देती है। विज्ञान तो लकीर से हट कर सोचने की एक जिज्ञासा है तथा जिज्ञासा के साथ कुछ भी किया जाना ही विज्ञान का आधारभूत नियम है। जिज्ञासा एवं जरूरत से विज्ञान की विकास यात्रा शुरू होती है। यह जिज्ञासा और जरूरत समाज में प्राचीनकाल से विद्यमान रही है और इसी के चलते प्राचीन पानव द्वारा अनेक खोजें और आविष्कार किए गए। यथा-अग्नि, शिकार के उपक पहिया, हल आदि। जिज्ञासाओं और जरूरतों के साथ यह सिलसिल आगे बढ़ता चला गया। जरा सोचिए, आइंस्टीन यदि जिज्ञासु प्रवृत्ति का न होता, तो क्या वह सामाजोपयोगी इतने सारे आविष्कार कर पाता? इससे साबित होता है कि विज्ञान एक विषय मात्र नहीं है, बल्कि जिज्ञासा के साथ कुछ भी किया जाना विज्ञान के दायरे में आता है |

मानव समाज का कोई भी घटक विज्ञान से अछता नहीं है। अब हम अर्थव्यवस्था को ही लें, तो पाते हैं कि इससे विज्ञान का निकट का रिश्ता है। देश के उच्च सकल घरेलू उत्पाद उसी विज्ञान की देन होते हैं, जिसका यह अनुकरण करता है। उच्च सकल घरेलू उत्पाद वस्तुओं एवं सेवाओं के अधिक उत्पादन पर निर्भर करता है, जो अंततः समाज में निर्मित की जाने वाली क्षमताओं, युवकों, कृषकों और श्रमिकों आदि के बीच वैज्ञानिक कुशलताओं के विकास, उच्च उत्पादकता वाले बीजों की किस्मों के द्वारा कृषि के क्षेत्र में किए गए नवाचारों, सूखा प्रतिरोधी एवं बाढ़ प्रतिरोधी फसलों, जैविक कृषि, सिंचाई के नवीन और कुशल तरीकों, अनाज के वैज्ञानिक भंडारण, बेहतर परिवाहन तथा ऐसी ही अन्य अनेक बातों पर निर्भर करते हैं। 

विज्ञान का संबंध राजनीति से भी है, यह स्वयं प्राचीन राजनीति विज्ञानी प्लेटो रेखांकित कर चुके हैं। आदर्श राज्य के अपने सिद्धात में प्लेटो ने कहा है कि एक आदर्श राज्य को किसी ऐसे दर्शनशास्त्री राजा के द्वारा शासित किया जाना चाहिए जो सर्वाधिक बुद्धिमान हो, तर्क के सर्वोच्च तर्क को रखने वाला हो तथा अपने दृष्टिकोण में वह 

वैज्ञानिक हा। प्लेटो ने ही सर्वप्रथम पश्चिमी अकादमी–’द अकादमी’ की शुरुआत की थी। यह अकादमी समाज एवं राजनीति के प्रति समर्पित थी, तथापि प्लेटो ने इसके द्वार पर स्पष्ट रूप से यह उल्लेख करवाया था कि ऐसे लोग, जिन्हें गणित का ज्ञान नहीं है, को अकादमी में प्रवेश करने की आवश्यकता नहीं है। इसका कारण साधारण-सा था-छात्रों के मध्य विचार में तार्किकता तथा विज्ञान की भावना एवं जिज्ञासा को बढ़ावा देना। अपने स्वामी प्लेटो के समान ही अरस्तू ने शिक्षा के अपने सिद्धांत में उन बच्चों के लिए गणित एवं उच्चतर गणित पर अधिक जोर दिया, जिनसे भविष्य का राजा बनने की अपेक्षा थी। 

“हम साक्षर तो हुए, किंतु वैज्ञानिक नहीं हो सके। आज सही अर्थों में राष्ट्र निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि हम साक्षर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पैदा करें।” 

हमें समाज में विज्ञान के महत्व को समझते हुए वैज्ञानिक सोच को वरीयता देनी चाहिए। यह विडंबनीय है कि समकालीन भारतीय समाज में प्रायः हर स्तर पर वैज्ञानिक सोच का अभाव है, जबकि पश्चिम के समाज ने वैज्ञानिक सोच को विकसित कर अपने समाज को अधिक विविधतापूर्ण एवं समृद्ध बनाया है, श्रेष्ठ वैज्ञानिक दिए हैं और वैज्ञानिक प्रगति के कारण विश्व मंच पर मजबूत पहचान बनाई है। वर्ष 1947 में भारत की साक्षरता दर मात्र 15 प्रतिशत थी, जा कि वर्ष 2011 में बढ़कर 74.0 प्रतिशत हो गई। कहने का आशय यह कि हम साक्षर तो हुए, किंतु वैज्ञानिक नहीं हो सके। आज सही अर्थों में राष्ट्र निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि हम साक्षर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पैदा करें। इसके लिए समकालीन भारतीय समाज में वैज्ञानिक सोच का विकास आवश्यक है, क्योंकि विज्ञान हमसे तार्किक एवं विचारपूर्ण होने की अपेक्षा करता हा 

विज्ञान और समाज अभिन्न रूप से जुड़े हैं। समाज के प्रायः सभी घटक विज्ञान से आच्छादित हैं। विज्ञान हमारे समाज और दैनिक जीवन में रच-बस गया है। जीवन के हर पहलू पर विज्ञान का कब्जा है। समाज और विज्ञान साथ-साथ रहे हैं। कुछ दुष्प्रभावों को यदि छोड़ दें तो विज्ञान ने समाज और मानव कल्याण में अग्रणी भूमिका निभाई है। इसने मानव जीवन को जहाँ सरस और सरल बनाया है, वहीं सुविधाओं की अनेकानेक सौगातें भी दी हैं। ऐसे में समकालीन भारतीय समाज का यह दायित्व बनता है कि वह समाज में वैज्ञानिक सोच के अधिकाधिक विकास पर बल दे। इसके लिए पुरातन विश्वासों, रूढ़ियों एवं अवैज्ञानिक मान्यताओं से बचते हुए, जीवन को तार्किक और विचारपूर्ण बनाते हुए साक्षरता की तरफ नहीं, अपितु वैज्ञानिकता की ओर सधे हुए कदमों से बढ़ने का समय आ चुका है। यही विज्ञान के विकास और समाज के कल्याण का मार्ग है। 

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