विज्ञान और धर्म पर निबंध |विज्ञान और धर्म : एक ही सिक्के के दो पहलू अथवा विज्ञान और धर्म के अंतःसंबंध |Essay on Science and Religion in Hindi!

विज्ञान और धर्म पर निबंध

विज्ञान और धर्म : एक ही सिक्के के दो पहलू अथवा विज्ञान और धर्म के अंतःसंबंध अथवा धर्म या विज्ञान में सामाजिक उन्नति का मुख्य प्रेरक कौन? विज्ञान और धर्म पर निबंध | Essay on Science and Religion in Hindi

विज्ञान और धर्म को लेकर आमतौर पर यह धारणा जनमानस में देखने को मिलती है कि ये दोनों परस्पर अन्तर्विरोधी शब्द हैं, जिनके बीच किसी भी प्रकार का तालमेल संभव नहीं है। यानी विज्ञान का क्षेत्र अलग है और धर्म का अलग। विज्ञान और धर्म के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं है कि इन दोनों को साथ लेकर चला जा सके। सतही चिंतन और अल्प सोच वाले आम जनमानस की यह धारणा हो सकती है कि विज्ञान और धर्म एक सरिता के दो ऐसे किनारे हैं, जिनका मेल संभव नहीं है, मगर यदि चिंतन-मनन की अतल गहराइयों में जाकर देखें, तो हम पाएंगे कि विज्ञान और धर्म में न सिर्फ गहरा संबंध ही है, बल्कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे ही हैं। इस तरह से देखा जाए तो विज्ञान और धर्म में एक अनूठा तालमेल है। विज्ञान हमें धर्म से जुड़े सच को वैज्ञानिक व्याख्या के माध्यम से समझाता है, तो धर्म उन कारणों की व्याख्या करता है, जो वैज्ञानिक तथ्यों में छिपे होते हैं। दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के गूढ़-गंभीर तत्वों को सारगर्भित ढंग से रेखांकित करते हैं। 

सच तो यह है कि धर्म में छिपे महत्त्वपूर्ण अवयव ही विज्ञान को उनका सच जानने के लिए प्रेरित करते हैं। धर्म, वैज्ञानिक खोजों के लिए प्रेरक का काम करता है, यह कहना असंगत न होगा। इस बात को अनेक महान वैज्ञानिक स्वीकार भी कर चुके हैं। इसके अलावा धार्मिक चेतना व धार्मिक सिद्धांतों को लेकर विश्व के वैज्ञानिक विशेष दिलचस्पी भी दिखा रहे हैं। यहां तक कि उन पश्चिमी देशों में, जहां भौतिकता आच्छादित रही, अब विज्ञान और धर्म के अंतःसंबंधों पर चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं। अलबर्ट आईस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक भी धर्म से प्रभावित थे तथा विज्ञान और धर्म के अन्तःसंबंधों को स्वीकार करते थे। खुद उन्होंने कहा था कि वैज्ञानिक खोजों के पीछे सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति ब्रह्माण्डीय धार्मिक अनुभव है। इससे यही ध्वनित होता है कि ब्रह्म सत्ता के आगे न सिर्फ वैज्ञानिक भी नतमस्तक हुए, बल्कि विज्ञान से जुड़े अनसंधानों और खोज के लिए उन्होंने धार्मिक चेतना को प्रेरणाप्रद भी बताया। 

“ब्रूनो ने विज्ञान और धर्म के संबंधों की बड़ी सटीक व्याख्या की है। वह कहते हैं-“मैं सच्चा धार्मिक हूं। इसीलिए मैं सच्चा वैज्ञानिक हूं। धर्म हो या विज्ञान दोनों सत्य के अनुसंधान पर जोर देते हैं। इसमें कहीं कोई विरोध नहीं है।” 

वस्तुतः जो लोग विज्ञान और धर्म को विपरीत अर्थों में लेकर इनके अन्तः संबंधों को नकारते हैं, वे धर्म को लेकर भ्रांतियों के शिकार हैं। इन्हें धर्म का मर्म ही नहीं मालूम और न ही वे इसको लेकर चिंतन की अतल गहराइयों में जाते हैं। धर्म की व्यापकता से वे परिचित ही नहीं हैं, अतएव इसको लेकर उनका दृष्टिकोण कदाचित संकीर्ण है। वे अंधविश्वास को धर्म से जोड़ने की भूल करते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। धर्म तो बहुत व्यापक है। तभी तो कहा गया है कि ‘धारयतीति धर्मः।’ जो व्यक्ति के, समाज के धारण करने योग्य है वहीं धर्म है। 

भारतीय जीवन दर्शन में धर्म को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। वास्तव में धर्म किसी भी वस्तु का वह मूल तत्व है, जिसके आधार पर उस वस्तु की यथार्थता को समझा जा सकता है, फिर चाहे वह विज्ञान ही क्यों न हो। धर्म को बड़े ही सटीक व सहज ढंग से सर जेम्स फ्रेजर ने परिभाषित किया है। वह कहते हैं—“धर्म मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की संतुष्टि या आराधना को समझता हूं, जिनके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि वे प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखलाती है और नियंत्रित करती हैं।” इस तरह देखा जाए तो धर्म का स्वरूप कल्याणकारी है और इस कल्याण का एक माध्यम विज्ञान भी है। 

यह कहना गलत न होगा कि धर्म किसी न किसी प्रकार की अति मानवीय (Superhuman) या अलौकिक (Supermatural) या समाजोपरि (Super Social) शक्ति पर विश्वास है जिसका आधार श्रद्धा, भक्ति और पवित्रता की धारणा है और जिसकी अभिव्यक्ति प्रार्थना, पूजा या आराधाना है। जाहिर है. धर्म के इसी मर्म को जानने की दिशा में विज्ञान भी सतत् प्रयत्नशील है। धर्म के विशिष्ट तत्वों और मान्यताओं की जानकारी संकलित करने में ही तो जुटा है विज्ञान। यानी यह कहने में असंगत कुछ भी न होगा कि विज्ञान सिर्फ धर्म के पीछे-पीछे चल रहा है, बल्कि कहीं न कहीं धर्म के अति मानवीय (Superhuman) व अलौकिक (Supernatural) स्वरूप को स्वीकार भी कर रहा है। 

सच तो यह है कि धर्म के अभाव में विज्ञान अधूरा है। धर्म और विज्ञान के मध्य समन्वय और सामंजस्य के समीकरण बन रहे हैं। विज्ञान धर्म से जुड़ी मान्यताओं का वैज्ञानिक विश्लेषण कर रहा है। धर्म से उसे अनुसंधानों, खोजों की प्रेरणा और दृष्टि मिल रही है। यही कारण है कि विज्ञान धीरे-धीरे धर्म पर केन्द्रित होता जा रहा है। यांत्रिक और आध्यात्मिक तत्वों के बीच सामंजस्य के प्रयास श्लाघनीय हैं। इस बाबत स्व. कवि दिनकर जी की यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है। वह कहते हैं— “विज्ञान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा है, अभिनव चिंतन का भी गहराई की दिशा में उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है और ऐसा लगता है कि सचमुच ही हम उस बिन्दु के पास पहुंचते जा रहे हैं, जहां द्रव्य को समझने के लिए हमें आत्मा की आवश्यकता पड़ेगी, जहां यांत्रिक और आध्यात्मिक तत्वों के बीच हमें सामंजस्य लाना पड़ेगा।”

विज्ञान और धर्म के अन्तःसंबंधों को समझने के लिए हमें वैदिक युग की ओर लौटना होगा। प्रसंगवश यह आवश्यक भी है। वेदों की रचना वैदिक काल में हुई, जिनमें मनस्वियों, ऋषियों-मुनियों के ज्ञान और अनुभवों को समाहित किया गया। उनके अनुसंधान जनित अनुभव और ज्ञान इनमें शामिल हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद ज्ञान और विज्ञान से भरे पड़े हैं। हमें इनके बारे में पर्याप्त जानकारी न होने के कारण ही हम विज्ञान को धर्म से अलग कर देखते हैं, जबकि अथर्ववेद में विज्ञान के बारे में व्यापक सामग्री है और इसमें उन वैज्ञानिक सिद्धांतों के बारे में बताया गया है, जिन पर आज के वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं। 

वस्तुतः वैदिक काल में धर्म की तरह विज्ञान का भी स्वरूप लोक कल्याणकारी था तथा मानव समाज की रक्षा के लिए ऋषि-मुनि विज्ञान से जुड़े आविष्कार करते थे। सूर्य की ऊर्जा से चलने वाले जिस वायुयान को आज के वैज्ञानिक अभी हाल में ईजाद कर पाए, उसे ऋषि भारद्वाज ने उस समय तैयार किया था और इसे ‘अंशुमाली’ नाम दिया था। स्पष्ट है कि विज्ञान और धर्म एक ही सिक्के के दो पहलू रहे और साथ-साथ इनका क्रमिक विकास भी हुआ। विज्ञान और धर्म दोनों ही सामाजिक उन्नति के प्रमुख प्रेरक हैं। 

यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि प्राचीनकाल से भारतीय समाज धर्मपरायण रहा। पश्चिमी देशों की तरह हमने भौतिकता को प्रधानता नहीं दी, बल्कि धर्म के लोक कल्याणकारी स्वरूप को प्रबल रखा। यही कारण है कि हमने धर्म के आवरण के तहत वैज्ञानिक पहलें कीं और इन्हें मानव कल्याण से जोड़ा। धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पर्याय रहे। आश्रमों-गुरुकुलों में सिर्फ धार्मिक चिंतन ही नहीं होता था, बल्कि विज्ञान की दिशा में अनुसंधान होते थे और वैज्ञानिक आविष्कारों के जरिए जनकल्याण किया जाता था। चूंकि धर्म की पकड़ शुरू से मजबूत रही, अतएव धार्मिक पक्ष प्रबलता से सामने रहा और उससे जड़ा विज्ञान उतनी प्रबलता से सामने नहीं आया। सच तो यह है कि वैदिक काल में विज्ञान आज से बहुत आगे था। वह धार्मिक और वैज्ञानिक उन्नति के उत्कर्ष का काल था। तब विज्ञान और धर्म में अटूट संबंध था और कमोबेश दोनों का स्वरूप भी एक ही था और दोनों में एक ही भावना निहित थी। यह थी- सामाजिक हित व उन्नति की। तब जगत और जीवन का आधार धर्म था और विज्ञान के साथ इसका सह-अस्तित्व था। 

“विज्ञान और धर्म में न सिर्फ गहरा संबंध ही है, बल्कि ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे ही हैं।” 

कालान्तर में हम इन व्यवस्थाओं को कायम न रख सके, जो वैदिक युग में हमारे उत्कर्ष की द्योतक थीं। धार्मिक मान्यताओं का भी क्षरण हुआ। विज्ञान के जिस सर्वोच्च शिखर पर वैदिक सभ्यता पहुंच गई थी, उसका पराभव हुआ। जन कल्याण और मानव कल्याण के भावों का भी विलोपन हुआ। जहां पहले आत्म प्रचार से सर्वथा दूर रहकर ऋषि-मुनि आत्मिक उद्धार और विकास में रत रहते थे, वहीं बदलते परिवेश के साथ भौतिकता ने पांव पसारने शुरू कर दिए। धर्म से विद्रूपताएं जुड़ने लगी और इसके सही अर्थ से दूर रह कर हम भ्रांतियों का शिकार होने लगे। हम धर्म को आडंबर समझने की भूल कर बैठे। इसी परिप्रेक्ष्य में यह भावना भी बलवती होती गई कि विज्ञान और धर्म में परस्पर संबंध हो ही नहीं सकता। दोनों विपरीत हैं। इस तरह की विचारधारा के लिए वह भटकाव जिम्मेदार है, जो धर्म के सही अर्थ को न समझ पाने के कारण पैदा हुआ। 

सृष्टि के अनसुलझे रहस्यों, मानव के अस्तित्व और ब्रह्माण्डीय गतिविधियों के बारे में विज्ञान जानकारियां जुटाने में लगा है। इस प्रकार वह उस अलौकिक शक्ति से प्रभावित हो रहा है, जिसे धर्म में प्रधान स्थान दिया गया है। हमारे यहां यह धारणा है कि प्रभु एक है, जो कि सर्वशक्तिमान है। हम सब उसी का अंश हैं। यह एक गूढ़ धार्मिक-आध्यात्मिक सच है, जिसे उद्घाटित करने का प्रयास विज्ञान कर रहा है। वहीं धर्म अपने तरीके से विज्ञान के सिद्धांतों के बारे में विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 

यह जो प्रकृति है, वह वैज्ञानिक नियमों के अनुरूप ही काम करती है। इसी को सृष्टि कहते हैं। इस सृष्टि को बनाने वाला ही सृष्टिकर्ता है, जिसे धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अति मानवीय (Super Human) या अलौकिक (Super Natural) शक्ति के रूप में हम पूजते हैं। जरा सोचिए इस अलौकिक शक्ति से बड़ा वैज्ञानिक और कौन हो सकता है। विज्ञान आज सही अर्थों में इस महान वैज्ञानिक के पीछे चल कर उसकी वैज्ञानिकता का पता लगाने में लगा है। हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हमारी नदियां पूजनीय हैं, वृक्ष पूज्य हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं। विज्ञान ने भी नदियों को जीवन रेखा माना है तथा वृक्षों को मानव अस्तित्व के लिए जरूरी बताया है। पर्यावरण संतुलन के लिए वैज्ञानिक इनके अस्तित्व की रक्षा की वकालत कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि हम पशु-पक्षियों को पूजते हैं, तो इसके पीछे वैज्ञानिक ध्येय जैव विविधता को समृद्ध रखने का है। 

वस्तुतः इस भौतिक मंडल के ऊपर चेतना का उच्चतर मंडल भी काम करता है। वैज्ञानिक यंत्रों के जरिए भौतिक मंडल में सक्रिय रह कर अनुसंधान करते हैं। जबकि धर्म में आस्था रखने वाले चेतना के उच्चतर मंडलों में सक्रिय रहकर खोज करते हैं। जो चीजें कभी कभी चमत्कार के रूप में सामने आती हैं, वे वस्तुतः चेतना के उच्चतर नियमों से संचालित होती हैं, जिन्हें आम आदमी समझ नहीं पाता है। जिनमें आत्मा और विचारों की शक्ति होती है, वे इन उच्दार नियमों को समझते हैं। अब वैज्ञानिक भी चेतना के इन उच्चतर नियमों को स्वीकार करने लगे हैं। इस प्रकार धर्म और विज्ञान में परस्पर संबंध प्रगाढ़ हो रहा है। 

वैदिक काल में धर्म के साथ-साथ विज्ञान का भी कल्याणकारी स्वरूप था। योग, आयुर्वेद, भौतिकी, रसायन आदि विज्ञान की शाखाओं के जरिए समाज का कल्याण ही तो होता था। जैसे-जैसे भौतिकता ने पैर पसारने शुरू किए विज्ञान का विध्वंसक रूप सामने आने लगा। हम इस पर लगाम नहीं लगा सके, इसीलिए इसे धर्म से विपरीत मानने की भूल कर बैठे, जबकि धर्म और विज्ञान में प्रगाढ़ संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। धर्म एक शाश्वत सत्य है, सारे जगत का आधार है, वहीं विज्ञान इस जगत की व्याख्या करने का काम करता है। 

जो लोग धर्म और विज्ञान को विपरीत अर्थों में लेने की भूल करते हैं, उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि हमारे धर्म-ग्रंथ विज्ञान की महिमा से भरे पड़े हैं। यहां तक कि इनमें विज्ञान की उपासना का संदेश तक दिया गया है। उपनिषद में यहां तक कहा गया है कि विज्ञान, ध्यान से अधिक श्रेष्ठ है। विज्ञान द्वारा ही मनुष्य ऋग्वेद को जानता है, यजुर्वेद, सामवेद और चतुर्थ अथर्ववेद, पंचम वेद अन्न रस तथा इहलोक, परलोक आदि को विज्ञान द्वारा ही जाना जाता है। इसलिए तुम विज्ञान की उपासना करो। इससे यह ध्वनित होता है कि धर्म और विज्ञान का न सिर्फ गहरा संबंध है, बल्कि विज्ञान को धर्म में विशेष महत्त्व भी दिया गया है। 

यहां उपनिषद का यह श्लोक प्रासंगिक है, जिसमें विज्ञान की श्रेष्ठता की व्याख्या की गई है- 

विज्ञानं यज्ञं तनुते

कर्माणि तनुतेऽपि च

विज्ञानं देवाः सर्वे 

बह्म ज्येष्ठमुपासते

विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेत

तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति

शरीरे पाप्मनों हित्वा

सर्वान्कामान्समश्नुत इति। 

अर्थात् यज्ञों और कर्मों में वृद्धि करने वाला विज्ञान ही है। सभी देवगण विज्ञान की श्रेष्ठ ब्रह्म रूप में उपासना करते हैं, जो विज्ञान को ब्रह्म स्वरूप में जानते हैं, उसी प्रकार के चिंतन में रत रहते हैं, वे इसी शरीर से पापों से मुक्त होकर संपूर्ण कामनाओं की सिद्धि प्राप्त करते हैं। विज्ञान सृजन का नाम है। सृजन की धर्म में विशेष अहमियत है। सृष्टि और सृजन जिस प्रकार आपस में जुड़े हैं, ठीक उसी तरह का जुड़ाव धर्म और विज्ञान में है। दोनों सत्य की ही तो खोज में लगे हैं। दोनों का स्वरूप भी लोक कल्याणकारी है। दोनों के समन्वय से मानवता विकसित और लाभान्वित होती है। 

बूनो ने विज्ञान और धर्म के संबंधों की बड़ी सटीक व्याख्या की है। वह कहते हैं- “मैं सच्चा धार्मिक हूं। इसीलिए मैं सच्चा वैज्ञानिक हूं। धर्म हो या विज्ञान दोनों सत्य के अनुसंधान पर जोर देते हैं। इसमें कहीं कोई विरोध नहीं है।” 

यकीनन सत्य को खोजने की जो ललक विज्ञान और धर्म में है, वही इसकी एकरूपता है। विज्ञान और धर्म के समन्वय व सामंजस्य से ही विश्व का कल्याण संभव है। धर्म को विज्ञान से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। दोनों एक ही सिक्के के पहलू हैं। हां, ये अलग बात है कि हम धर्म के सही स्वरूप को समझें। धार्मिक चेतना को जागृत रखें। धर्म का सही विश्लेषण करना सीखें। धर्म में छिपी उस वैज्ञानिक श्रेष्ठता पर ध्यान दें, जो हमारे धर्म ग्रंथों में बताई गई है। धर्म ने विज्ञान के पथ पर आगे बढ़ने का जो संदेश दिया है, उसका अनुसरण करें। धर्मान्धता से बच कर धर्म के सही अवयवों की पहचान करें और विज्ञान को साथ लेकर उसकी पड़ताल करें, तो निश्चय ही धर्म के मर्म को विज्ञान के आलोक में जान समझ सकेंगे। सारतः यह कहा जा सकता है कि धर्म और विज्ञान दोनों ही सामाजिक उन्नति के प्रमुख प्रेरक हैं। 

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