विज्ञान और धर्म पर निबंध |Essay on Science and Religion in Hindi

विज्ञान और धर्म पर निबंध

विज्ञान, धर्म और समाज (Science, Religion and Society) 

द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्तिम चरण में नागासाकी एवं हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराने से जो भीषण विध्वंस हुआ था, उससे चिंतित एवं दुःखी होकर प्रसिद्ध सापेक्षता सिद्धान्त के आविष्कारक वैज्ञानिक डॉ. अलबर्ट आइन्सटीन ने अत्यन्त वेदना भरे शब्दों में कहा था “मैं यदि जानता कि मेरे सापेक्षिता सूत्र (Theory of Relativity) का दुरुपयोग इस प्रकार किया जाएगा, तो मैं कभी भी इस दिशा में इतना श्रम और समय न लगाता.” इसके साथ ही उन्होंने विश्व के समस्त देशों से अपील की थी कि मानवता के कल्याण के नाम पर परमाणु शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में ही करें और विध्वंसात्मक कार्यों से इसे दूर रखें. परमाणु शक्ति के ध्वंसात्मक रूप के कारण आज विश्व के सभी देश निरस्त्रीकरण की चर्चाएँ करते हुए देखे जाते हैं. दुनिया के कर्णधार कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि वे परमाणु आयुधों को प्रतिबंधित कर दें.

विज्ञान और समाज 

विज्ञान ने मानव-जीवन को सुख-सुविधा के अनेकानेक साधन प्रदान किए हैं, परन्तु दूसरी ओर इसने मानव-जीवन को संत्रास-संकुल एवं तनावग्रस्त बना दिया है. विज्ञान द्वारा प्रदत्त भौतिक समृद्धि मानव के मन में अधिकाधिक समृद्ध होने का भाव जगाकर उसके जीवन में सन्तोष तत्त्व का अपहरण कर लेती है. नशे की दवाइयाँ खाकर, नींद की गोलियों का सेवन करके, शराब पीकर, तरह-तरह के इंजेक्शन लगाकर जड़ता-विजड़ित जीवन के अनुभवों को, उनकी संवेदनाओं को भूलने का प्रयत्न करता है. एक वाक्य में वह अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग गम गलत करने में व्यतीत करता है. भौतिकवादी जीवन की ऊब का एक पक्ष यह भी है कि मानव-मन ने हिप्पीवाद, बीटल्स-बीटनेक्स वाद, हरे राम हरे कृष्ण सदृश आन्दोलनों का प्रवर्तन किया है. हम स्वयं देख सकते हैं कि अमरीका जैसे समृद्धिशाली एवं धनाढ्य देश के समृद्ध परिवारों के शतसहस्र युवक-युवतियाँ भारत के धार्मिक स्थलों में शांति की खोज में भटकते फिरते हैं, 

विज्ञान की वस्तुवादी विश्लेषण प्रधान दृष्टि ने जीवन दर्शन को अतिशय यथार्थवादिता प्रदान की है, जो जग्नवाद की संधि का स्पर्श करती है. इसके फलस्वरूप मानव अपने को विविध सन्दर्भो में देखने लगा है. नव मानववाद (Academic Humanism) तथा लघु मानववाद सदृश अवधारणाएँ स्थापित की गई हैं. नव मानववाद का प्रवर्तन अमरीका में इरविंग बैबिट और पाल ई ब्यूर द्वारा किया गया था और यह काफी समय तक प्रभावशाली रहा. नव मानववाद की मान्यताएँ प्रायः रहस्यपूर्ण एवं अनिश्चित हैं. वे प्राकृतिक विज्ञान को अस्वीकार करती हैं और एक प्रकार से आचारपरक निरपेक्षवाद (Ethical Absolutism) को प्रश्रय प्रदान करती हैं. यह नव मानवतावाद वस्तुतः एक ऐसी रहस्यपूर्ण वस्तु है, जिसका नामकरण अभी तक नहीं हो पाया है तथा वह उस कल्याण की बात करता है, जिसका स्वरूप अभी तक निर्धारित नहीं किया जा सका है. हमारे विचार से नवमानववाद का सम्बन्ध मानवता के साथ कम और वाग्विलास से अधिक है. 

उन्नीसवीं सदी के चतुर्थ चरण में मानव को समस्त विश्व प्रपंच का केन्द्र मानकर कई नवीन जीवन-दर्शनों का प्रतिपादन किया गया था. इनमें डार्विन का भौतिक विकास, कार्ल मार्क्स का द्वन्द्वात्मक भौतिक विकासवाद प्रमुख हैं. जड़वादी ये जीवन दर्शन मानव की पाशविक वृत्तियों पर विशेष बल देते हैं. चैतन्य मानव एक प्रकार की घुटन का अनुभव करता है. फलतः नवीन वैज्ञानिक आध्यात्मिक विकासवाद का जन्म हुआ है. जिसके अनुसार मानव केवल भौतिक प्रयोजनों के संघात के अतिरिक्त भी और कुछ है. और उसका यह और कुछ ही उसका सब कुछ है इस चिन्तन पद्धति को आगे बढ़ाते हुए आध्यात्मिक विकासवाद ने मानव के ब्रह्मत्व या ईश्वरत्व (Divinehood of man) का प्रतिपादन किया.. 

डेनमार्क के किर्केगार्ड के अस्तित्ववादी जीवन-दर्शन को बीसवीं शताब्दी में जीन पॉल सात्र ने पुनर्जीवित किया. उसकी चिन्तन पद्धति ने हीनता से पूर्ण लघु मानव की परिकल्पना की और जूते का तल्ला, रिरियाता पिल्ला आदि शब्दावलियों द्वारा मानव की विवशता एवं मानव-जीवन की निस्सारता की अभिव्यक्ति की गई. उसकी प्रतिक्रियास्वरूप यह विचारधारा प्रस्तुत की गई कि हो सकता है विश्व परिप्रेक्ष्य में मानव लघु हो, परन्तु उसमें महानता के बीज छिपे हुए रहते हैं और वह बहुत कुछ कर सकता है. विश्व की नाप-जोख तथाकथित लघु मानव की ही उपलब्धियाँ हैं. सारांश यह है कि आधुनिक विज्ञान का विश्लेषणात्मक चिन्तन अपने अतिवाद की सीमाओं पर पहुँच कर स्वयं अपने चिन्तक को संदेह की दृष्टि से देखने लगा है. 

इससे पूर्व 16वीं शताब्दी में सर आइजक न्यूटन गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ प्रिन्सिपिया में यह संकेत कर चुके थे कि पदार्थ के कणों में कोई चेतन शक्ति होनी चाहिए जिसके कारण वे परस्पर आकर्षित होते हैं. स्पष्ट उद्भावना के अभाव में वह आकर्षण शब्द का प्रयोग नहीं कर सके थे. उन्होंने गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) शब्द का प्रयोग करके सन्तोष कर लिया था.

विज्ञान का अभिशाप 

मानव जीवन क्या है, उसका उद्देश्य क्या है, मानव के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है आदि प्रश्नों के सन्दर्भ में विज्ञान मौन दिखाई देता है. वैज्ञानिक मानव आज बड़े बड़े आविष्कार करके प्रकृति को वशीभूत करने में किसी अंश तक सफल हो गया है, अन्य ग्रहों पर अपना साम्राज्य स्थापित करने में वह सफल हो गया है, उपग्रहों का सफल प्रेषण एवं संचालन करने में वह अवश्य चमत्कारपूर्ण सफलता उपलब्ध कर चुका है, लेकिन अपनी अन्तःप्रकृति पर विजय प्राप्त करने में वह पूर्णतः असफल सिद्ध हुआ है. उसकी दशा एक ऐसे चालक की हो गई है, जिसके वाहन के ब्रेक फेल हो गए हैं तथा चालक सहित वाहन चाहे जिस क्षण दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है. 

वैज्ञानिक उपलब्धियों ने मानव को दम्भी और स्वार्थी बना दिया है. वह यहाँ तक रहता, तो गनीमत रहती, परन्तु वह तो मानव सभ्यता एवं मानव संस्कृति के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है. अपनी अपरिमित सामर्थ्य द्वारा विज्ञान ने मानव को विपुल पाशविक शक्तियाँ प्रदान कर दी हैं, परन्तु मानव के भीतर स्थित दानव अथवा शैतान को निष्कासित करने में वह पूर्णतः असफल रहा है. वैज्ञानिक मानव की स्थिति उस अविवेकी व्यक्ति की तरह हो गई है, जो उसी डाल को काटने के लिए उद्यत है जिस पर वह बैठा हुआ है. 

वर्तमान युग विज्ञान का युग है. वह हमारे जीवन के प्रत्येक पक्ष में व्याप्त है और समग्र कार्यविधि का संचालक बन गया है. मानव समाज की प्रगति वैज्ञानिक उन्नति के साथ पूर्णतः सम्बद्ध हो गई है. विज्ञान ने यद्यपि हमारे जीवन के सन्दर्भ में पग-पग पर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है, तथापि उसका अशिव पक्ष भी कम प्रभावकारी नहीं है. शांति में वह देवदूत है अथवा फरिश्ता है तथा युद्ध में वह दैत्य या शैतान है. मानव कल्याण की सम्भावनाओं के साथ विज्ञान ने भयावह आशंकाएँ भी उत्पन्न कर दी हैं.

धर्म और समाज 

कण-कण में जीवन की व्याप्ति विज्ञान की परिकल्पना है. विश्व के कण कण में एक ही जीवन के स्पन्दन का अनुभव करते हुए उसके प्रति आत्मीयता की अनुभूति करना धर्म का लक्षण है. अखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म की व्यक्त प्रवृत्ति का सरस आभास प्राप्त करके पुलकित होना धर्म भावना का सुखद परिणाम है. ब्रह्माण्ड की नापजोख करते हुए गर्व का अनुभव करना वैज्ञानिक की साधना है. दिशागत भ्रम का निवारण विज्ञान का क्षेत्र है. कालगत भ्रम तथा पृथकत्व के भ्रम का निवारण करके एकत्व अथवा अभेद भाव की अनुभूति धार्मिक की साधना है, इस सन्दर्भ में यह निवेदन करना अप्रासंगिक नहीं होगा कि वैज्ञानिक आध्यात्मिक विचारधारा ने डॉ. अलबर्ट आइन्सटीन के सापेक्षिता सिद्धान्त (Theory of Relativity) को जन्म दिया जिसके अनुसार पदार्थ और परिवर्तनशील हैं. वे एक ही तत्व के दो भिन्न रूप हैं. उनमें मौलिक अन्तर न होकर घनत्व का स्तर भेद मात्र है. 

अमरीका के प्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स बेयर्ड ने अपने अनुसंधानों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “इतिहास से उन्होंने चार शिक्षाएँ ग्रहण की हैं. प्रथम, परमात्मा जिन्हें नष्ट करना चाहता है, उनकी बुद्धि को पहले ही हरण कर लेता है; द्वितीय, भगवान की चक्की धीरे अवश्य चलती है, परन्तु पीसती बहुत महीन है। तृतीय, मधुमक्खी जिस फूल से रस लेती है, उसी के बीजारोपण में सहायक भी होती है; चतुर्थ, जब अंधेरा गहरा हो जाता है, तो प्रकाश की कल्पना अच्छी तरह की जा सकती है.” हम स्पष्टतया देख सकते हैं कि बुद्धि विवेक सम्पन्न आधुनिक विचारक एकदम धार्मिक मान्यताओं के निकट आ गये हैं. विश्व कल्याण की कामना के प्रति प्रतिश्रुत मानव धर्म में भावना में विज्ञान के पर्यवसान को हितकर प्रक्रिया के रूप में देखने लगा है. 

साहित्य में भी हमको विज्ञान के दार्शनिक धार्मिक रूप का समावेश दिखाई देता है. कवि जयशंकर प्रसाद ने अपने महाकाव्य कामायनी में यह प्रतिपादित किया है कि मानव बौद्धिकता (इड़ा) के प्रति आकर्षित होकर देवताओं (प्रकृति के तत्वों) का कोपभाजन बनता है. उसके जीवन में जब संश्लेषण बुद्धि (श्रद्धा) का प्रादुर्भाव होता है, तब वह समरसता, अखण्ड आनंद की भूमिका में पहुँचकर आनंद अथवा परम विश्राम की अनुभूति प्राप्त करता है. कवि ‘दिनकर’ ने भी अपने ग्रंथ उर्वशी के अन्तर्गत उर्वशी और पुरुरवा की प्रेमकथा द्वारा प्रतिपादित किया है कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल स्पर्श, यही प्रेम की महिमा है. उर्वशी चक्षु, रसनाघ्राण, त्वक् तथा स्रोत कामनाओं की प्रतीक है. पुरुरवा रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द से मिलने वाले सुखों से उद्धेलित पुरुष का प्रतीक है. उर्वशी नारी का संधान पुरुरवा पुरुषत्व पाता है, जब शरीर की धारा इसे उछालते-उछालते समुद्र में फेंक देती है और दैहिक चेतना से परे वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पंद हो जाता है. ऐन्द्रिक जगत् से निकलकर अतीन्द्रिय जगत् में आँख खोलने की उमंग का प्रतीक पुरुरवा है. सूफी कवियों द्वारा लिखित प्रेम-काव्यों में बहुत कुछ यही संदेश दिया गया था. इश्के-मजाजी से जब आशिक इश्के हकीकी की दुनिया में पहुँचता है, तब वह खुदा के साथ, अपने माशूक के साथ एकताभाव की अनुभूति करता है. विज्ञान की सार्थकता यह है कि वह धर्म-बुद्धि द्वारा शासित हो, धर्म की सार्थकता तब है, जब वह जैव धरातल पर आकर हमारे आचरण का रूप धारण कर ले. ___भौतिक सुखों की अत्यधिक समृद्धि से अभिशप्त मानव के पास अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के उपाय के सन्दर्भ में एक ही उपाय दिखाई देता है—आध्यात्मिकता से पोषित धर्म का प्रचार. तभी मनुष्य सांसारिक सुखों से विरत होकर सन्तोष और संयम को अपने जीवन का दीपस्तम्भ बना सकेगा. विश्व के धर्म-प्रचारकों, संतों और महात्माओं ने इसी भौतिकवादी स्वरूप की परिकल्पना के परिप्रेक्ष्य में विश्व के प्राणों में धर्म और अध्यात्म की प्रतिष्ठा की थी. उनका मत था कि मनुष्य चिर सुख और शाश्वत अध्यात्मवादी मूल तत्वों के अनुसरण द्वारा ही सुख का जीवन व्यतीत कर सकता है. उन्होंने जीव मात्र के कल्याण के लिए आत्म-सुख की साधना का समर्थन किया था.

विज्ञान, धर्म और समाज 

विज्ञान की अतिशयता समाज में इजारेदारी को रावणों और कंसों के रूप में जन्म देती है. विज्ञान जन्य विकृतियों का निवारण ही समाज का कल्याण अथवा विकृतिग्रसित मानव का उद्धार है. भारत के आर्ष ग्रन्थों में इस प्रक्रिया को अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना कहा गया है. 

जब-जब मानव अज्ञानान्धकार में भटका है, तब-तब उसने प्रकाश की परिकल्पना की है और धर्म-भावना ने उसका मार्ग-दर्शन किया है. जब-जब धर्म ने समाज की गतिशीलता को बाधित किया है, तब-तब विज्ञान ने जीवन और जगत के नवीन आयामों का उद्घाटन करके मानव के मन में नवीन जिज्ञासाओं की उद्भावना की है. 

गतिहीन और रूढ़िग्रस्त होकर धर्म निष्क्रियता और ह्रास का कारण बन जाता है. विज्ञान की अतिशयता मनुष्य को अहंकारी और उच्छंखल बना देती है. दोनों की उत्पत्ति समाज से होती है, दोनों समाज के कल्याण का दम भरते हैं और दोनों संसार की प्रगति एवं उसके कल्याण का लक्ष्य लेकर चलते हैं. 

धर्म मानव का अन्तर्मुखी, आत्मिक विकास करके जन-कल्याण की भावना को जाग्रत करता है. विज्ञान मानव के बहिर्मुखी अथवा भौतिक विकास के नए-नए उपक्रम एवं साधनों का विधान करता है,धर्म और विज्ञान दोनों की सार्थकता है, परन्तु दोनों में विकृतियों का समावेश भी हो जाता है. कर्म की भीरुता समाज में रूढ़िवादिता को जन्म देती है और उसको गतिहीन बना देती है. विज्ञान की संघात्मक शक्तियाँ मानव जीवन को सीमित और एकांगी बना देती है, परन्तु यह निर्विवाद है कि सामाजिक उपयोग की दृष्टि से विज्ञान और धर्म दोनों प्रासंगिक हैं. विज्ञान और धर्म दोनों मानव समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान करते आए हैं. विज्ञान एवं धर्म के मध्य बाह्य रूप से चाहे जितना अन्तर दिखाई देता हो, परन्तु आन्तरिक गहराइयों में दोनों में समानता पाई जाती है. एक भौतिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध करने मानव को सुख प्रदान करना चाहता है, दूसरा आन्तरिक सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त करता है, वस्तुस्थिति यह है कि धर्म रूढ़िग्रस्त हो गया है और विज्ञान विनाशकारी हाथों में कैद हो गया है. फलस्वरूप मानव का सांस्कृतिक विकास बाधित हो गया है. 

विज्ञान और धर्म दोनों समाज के क्रोड़ में जन्मते हैं और पल्लवित होते हैं. विज्ञान नवीन उपलब्धियों द्वारा समाज का ज्ञानवर्धन करता है. धर्म समाज का अन्तर्मुखी विकास करके उसके कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है. विज्ञान और धर्म का समन्वित रूप ही मानव को संश्लिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करता है और उसके सम्पूर्ण विकास का मार्ग प्रशस्त करता है. जब कभी विज्ञान और धर्म के मध्य समन्वय रुक जाता है और उनके मध्य सन्तुलन बिगड़ जाता है, तभी समाज में विशृंखता एवं मानव-जीवन में बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. अतः मानव समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है कि विज्ञान और धर्म के मध्य पूर्ण सामंजस्य स्थापित हो. धर्म और विज्ञान की गंगा यमुना के संगम पर ही विश्व भावना रूपी सरस्वती के दर्शन लभ्य होते हैं. 

विज्ञान ने मानव की जिगीषा को सन्तुष्ट किया है और यथार्थ से उसका परिचय कराया है. धर्म ने मानव को औचित्यानौचित्य का विवेक प्रदान किया है. इनके मध्य खिंचाव की छाया में सामाजिक स्वास्थ्य का क्षरण होने लगता है. 

धर्म ने मानव को यह बताया है कि वह क्या है, इस जगत् में वह क्यों आया है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है, तथा उसका भविष्य एक ऐसी वस्तु के समान है जिसके विकास की कोई सीमा नहीं है. ओ. डब्ल्यू होम्स (O.W. Holmes) नामक विद्वान ने ठीक ही कहा है कि “विज्ञान को ज्ञान सब कहते हैं. वे यह क्यों भूल जाते हैं कि धर्म का अर्थ अज्ञान नहीं है.” (“Science in other words knowledge, is not the enemy of Religion, for if so, then religion would mean ignorance.”) 

आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञान का अधिकतम उपयोग सामाजिक कल्याण के लिए किया जाये. पूज्य बापू, पं. नेहरू आदि पूरे बल के साथ यही कहते थे कि विज्ञान के समस्त आविष्कार एवं शोध कार्य समाज के कल्याणार्थ प्रयुक्त होने चाहिए. जेनेवा में आयोजित शांति के लिए परमाणु (Atom for Peace) संगोष्ठी में भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. एच. जे. भाभा ने भी यही कहा था कि “परमाणु का रास्ता मानव सेवा की दिशा में मोड़ दिया जाना चाहिए.” हमारा निश्चित मत है कि भारत में सामाजिक कल्याण का समस्त कार्यक्रम इसी संदेश के परिप्रेक्ष्य में निर्धारित एवं कार्यान्वित किया जाना चाहिए. इस मार्ग पर चलकर भारत की गरीबी मिटाने की दिशा में सही कदम उठाया जाना चाहिए. 

भारत के निर्माण के प्रति रुचि रखने वाले मनीषियों को इस ओर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए. परमाणु आयुधों द्वारा उत्पन्न त्रासदी में मानव समाज अस्तित्व के प्रति सशंक बना हुआ है.

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