सत्यं शिवं सुन्दरम् पर निबंध – Essay on Satyam Shivam Sundaram

सत्यं शिवं सुन्दरम् पर निबंध - Essay on Satyam Shivam Sundaram

सत्यं शिवं सुन्दरम् पर निबंध – Essay on Satyam Shivam Sundaram

सत्यं-शिवं-सुन्दरम् (Satyam-Shivam-Sundaram) 

भारतवर्ष की यह शास्त्रीय प्रणाली रही है कि पहले सूत्र का निर्माण होता है, उसके पश्चात् उसकी व्याख्या की जाती है. ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ भी हिन्दी-साहित्य के लिए इसी प्रकार का एक सूत्र है जो अनायास ही हिन्दी-साहित्य में प्रवेश कर गया है. आज यह ‘सत्यं शिवं-सुन्दरम् साहित्य के आदर्श और उद्देश्य के सूत्र-रूप में व्यवहृत हो रहा है. बंकिम के ‘वन्दे मातरम्’ की तरह उसकी व्यापकता बराबर बढ़ती जा रही है और इस बढ़ती हुई व्यापकता के प्रवाह में हमने कभी यह जानने का प्रयत्न ही नहीं किया कि कौन इस सूत्र का जन्मदाता है और इसका प्रारम्भिक इतिहास क्या रहा है? कारण भी स्पष्ट है कि जब हम एक वस्तु के परिचय में अत्यधिक आ जाते हैं, तो उसके प्राचीन इतिहास को जानने की उत्सुकता प्रायः समाप्त-सी हो जाया करती है. अधिकांशतः यह उत्सुकता प्रत्येक नवीन के प्रति ही जाग्रत रहती है.

शिव की अवधारणा 

भक्ति के ज्ञान, कर्म, उपासना-ये तीन तत्व हैं. इन तीनों का विभाजन नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक और एक दूसरे के अंग बने हुए हैं. इनके समन्वित रूप में पूर्णता है. इसलिए हमारे कलाकार सत्यं शिवं सुन्दरम् तथा ज्ञान, कर्म, उपासना की विभाजक रेखाओं को मिटाने में प्रयत्नशील रहे हैं. यही वास्तविक समन्वय है, जो भारतीय संस्कृति का है, भारतीय धर्म और दर्शन का प्राण है. इसलिए हमारे यहाँ के संस्कृत के दृश्य काव्य और श्रव्य काव्य सुखान्त है. कारण, हमारे यहाँ मृत्यु का अर्थ है-उस अव्यक्त सत्य से व्यक्त हए जीव का अन्त में अपनी व्यक्तावस्था त्याग उसी अव्यक्त सत्य से जा मिलना. मृत्यु हमारे लिए इसीलिए ‘शिव’ है. भारतीय कला इसी शिव को प्राप्त करने का प्रयत्न सदैव से करती है और करती रहती है. फिर मृत्यु में दुःख कहाँ? उसमें तो कल्याण है. जीव इस संसार में व्यक्त होकर अनेक यातनाएँ सहता है, किन्तु मृत्यु उस पर दया करके उसे उन यातनाओं से मुक्त कर देती है. मृत्यु का यही कल्याण है; यही उसका ‘शिव’ रूप है और यही वास्तविकता तथा चिरकालिक सत्य है, किन्तु जहाँ यह ‘शिव’ नहीं रहता, वहाँ चिरकाल तक ‘सत्य’ भी नहीं रहता. 

फिर जो सत्य शिव है-उसे आनन्दमय होना ही चाहिए और आनन्द कोई अन्य वस्तु नहीं, सौन्दर्य का फल है अथवा सौन्दर्य की प्रभावात्मक अनुभूति ही आनन्द है. इस प्रकार सत्यं और सुन्दरम् को शिवं में समन्वित करना ही धर्म का, दर्शन का, साधना का, लोक व्यवहार का, श्रेष्ठतम और आदर्शतम रूप है. जैसा कि हम ऊपर कह आये हैं, कला भी इसी श्रेणी में आती है. वह भी इन्हीं सत्यं और सुन्दरम् को शिवं में समन्वित करने का सतत् और श्रेष्ठतम प्रयत्न करती है और ऐसा करने में सफल भी होती है. वस्तुतः यही कला का लक्ष्य है. 

तीनों तत्त्वों का ऐक्य 

यदि सत्यं, शिवं और सुन्दरम् का समन्वित रूप अधिक संक्षिप्त और स्पष्ट रूप से रखने का प्रयत्न करें, तो इस प्रकार कह सकते हैं कि कर्त्तव्य-पथ में आकर सत्य ही बन जाता है और कल्याण से समन्वित होकर यही सत्य सुन्दर हो जाता है. सौन्दर्य सत्य का परिमार्जित रूप है. वह सत्य को ग्राह्य बना देता है. अतः इन तीनों का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है. इन तीनों के अनन्य सम्बन्ध को पन्त ने बड़े ही कलात्मक और स्पष्ट ढंग से व्यक्त किया है 

“वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप

हृदय में बनता प्रणय अपार

लोचनों में लावण्य अनूप 

लोक-सेवा में शिव आविकार ।”

वास्तव में विचार क्षेत्र में देशी विदेशी का प्रश्न ही नहीं उठता. इस क्षेत्र में सब एक ही धरातल पर आ ठहरते हैं. उसमें विश्वात्मकता रहती है. इसलिए तो अंग्रेजी कवि कीट्स ने भी सत्य और सुन्दर को एक माना है, और जब सत्य और सौन्दर्य अभिन्न हैं, तो शिव भी उनसे भिन्न नहीं हो सकता 

“Beauty is truth, truth is beauty

That all ye know on earth 

And all ye need to know.”

अर्थात-“सौन्दर्य सत्य है और सत्य सौन्दर्य है, यही संसार में मनुष्य जानता है और यही जानने की उसे आवश्यकता है.”

‘सत्य’ की अवधारणा 

किन्तु सत्य का स्वरूप क्या है? यह प्रश्न अत्यन्त स्वाभाविक है. दर्शन में सत्य का अर्थ-उस आनन्द स्वरूप अव्यक्त सत्ता से है, जिससे जीव अभिव्यक्त होकर अनेक सांसारिक यातनाओं में पड़कर अनेक दुःख भोगता है और लौटकर उसी अव्यक्त सत्ता में अपने को अव्यक्त बना देता है, यह संसार स्वप्नवत् है, असत्य है, किन्तु ऐसा तभी हो सकता है जब जीव इन सभी सांसारिक रूपों और व्यापारों के समक्ष अपनी पृथक् सत्ता की धारणा को भूलकर विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है. आत्मा की यही मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है. यही ज्ञान-दशा-सत्य दशा है. उस समय उसे केवल उस एक सत्य सत्ता के अतिरिक्त और कुछ भी भाषित नहीं होता. साहित्य का सत्य भी इससे भिन्न नहीं है. “जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस-दशा कहलाती है. इस रस-दशा में आने के पश्चात् ही मनुष्य अपनी पृथक् सत्ता भूलकर अपने हृदय को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाता है. इस भूमि पर पहुँचे हुए मनुष्य को कुछ काल तक अपनी सत्ता को लोक-सत्ता में लीन कर देना होता है. उस अवस्था को भावयोग भी कहते  हैं” (आचार्य शुक्ल)

शुक्लजी ने इसे कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष कहा है और वास्तव में यह है भी. इस अवस्था में मनुष्य के भाव-जगत् पर पड़े सभ्यता के अनेक आवरण हटकर उसका मूल गोचर रूप प्रत्यक्ष हो जाता है. शुक्लजी के शब्दों में ऐसी अवस्था में वह जगत् को उसी ब्रह्म से उत्पन्न उसी का एक अंश अनुभव करता है. “जगत् के साथ उसका पूर्ण तादात्म्य हो जाता है. उसकी अलग भाव सत्ता नहीं रह जाती. उसका हृदय विश्व हृदय हो जाता.” यही सत्य का स्वरूप है.

‘शिव’ की अवधारणा 

“विश्वात्मा में लोकमंगल का जो तत्व है, वही शिव है-अर्थात् लोकमंगल ही शिव है. ऊपर बताई गई सामान्य भाव-भूमि पर पहुँचने पर शिवत्व ही प्रारम्भ हो जाता है. उस समय मनुष्य को उसकी अपनी अश्रुधारा का, उसके हास-विलास में जगत् के आनन्द नृत्य का, उसके गर्जन-तर्जन का आभास मिलता है.” यही उसका कर्तव्य है. ऊपर हम बता चुके हैं कि कर्तव्य-पथ में आकर सत्य ही शिव बन जाता है. यह सब अनुभव कर चुकने के पश्चात् वह अपने को लोक सेवा के मार्ग पर गतिमान कर देता है. यही शिव है. पंत ने प्रज्ञा के सत्य स्वरूप को ही तो लोक सेवा में आ जाने पर अविकार शिव कहा है. 

हमारे यहाँ शिवजी के रूप में इस ‘शिव’ की सम्पूर्ण विशेषताएँ आ जाती हैं. शिवजी में कुरूप (नरमुण्ड माल आदि), अमंगल (सर्प, विष आदि) है, किन्तु इन सबके ऊपर अमृतमय चन्द्रमा और सम्पूर्ण कर्द, कलुष धो देने वाली पावन गंगा है. इस प्रकार वह वर्तमान कुरूप और अमंगलकारी भूली-भटकी आत्माओं को धारण तो अवश्य करते हैं, किन्तु सबसे ऊपर अमृतमय चन्द्र और कलुष निकन्दनि गंगा को ही प्रभुत्व दिया है-उन्हीं को सबके ऊपर मस्तक पर स्थापित किया है. इसी प्रभुत्व ने सम्पूर्ण कुरूपों और अमंगलों को सुन्दर और मंगलमय बना दिया है. यही शिवत्व है. इतना भयानक विषधारी शिव इसीलिए तो शिव है. 

राम धनुष-बाण लेकर पीड़क रावण पर गहरा आघात करते हैं, क्रोध का प्रदर्शन भी करते हैं और उसका, उसके कटक तथा वंश सहित संहार भी करते हैं; फिर भी राम शिवकारी हैं. क्यों? इसलिए कि उनमें उनके इन सभी अशोभनीय कार्यों को अधिकृत करने वाली उनकी परजन-हितकारी भावना है. गीता में भी श्रीकृष्ण ने यही कहा है और गोस्वामी तुलसीदास ने भी इन पंक्तियों में यही कहा है 

“जब जब होय धरम की हानि ।

बाढहिं अधम असुर अभिमानी ॥

तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा । 

हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥”

यही कार्य कलाकार का है. वह मानव के गन्दे पाताल को भूली-भटकी आत्माओं को, संसार के सौन्दर्य की खोज में, आँख की ओट नहीं कर देता. प्रत्युत् प्रत्येक वस्तु उसकी कला का आधार बन सकती है, किन्तु उसका अन्तिम स्पर्श कुरूपता को सौन्दर्य में और अमंगल को मंगल में बदल देता है.

‘सुन्दरम्’ की अवधारणा 

अब हमें सौन्दर्य के रूप को भी देख लेना चाहिए. प्रज्ञा का सत्य स्वरूप जब हृदय में स्थान पाता है, तो प्रणय के रूप में परिणत हो जाता है और वही नेत्रों में जाकर अनूप लावण्य बन जाता है. यह अनूप लावण्य ही सौन्दर्य का पर्यायवाची है. कीट्स ने इसी को तो ‘Beauty is truth, truth is beauty’ कहा है. शुक्लजी के शब्दों में “हमारी अन्तःसत्ता की यही तदाकार परिणति सौन्दर्य की अनुभूति है. सौन्दर्य की जो वस्तु अपने लक्ष्य या कार्य के अनुकूल हो, वही सुन्दर है-इसीलिए तो “सुधा सराहिए अमरता, गरल सराइये मीचु” कहा गया है. सौन्दर्य की श्रेणियाँ नहीं की जा सकती और न वह किसी व्यक्ति विशेष का कोई विशेष अनुभव मात्र ही है, क्योंकि सौन्दर्य एक वस्तु है-अखण्ड और अभिन्न है और अनुभव करने वाले अनेक हैं. सभी अपने-अपने अनुसार अनुभव करते हैं. हाँ, इतनी बात अवश्य है कि सौन्दर्य विषय है और विषयी अनुभवकर्ता है, किन्तु उसकी महिमा कभी किसी एक के कारण उसी प्रकार नहीं घट सकती जैसे 

“सीतलता अरु सुगन्धि की महिमा घटी न मूरु, 

पीनस वारी ज्यों तजै सोरा जानि कपूर ।”

वास्तविक सौन्दर्य वह है, जो एक-सा रहे, फिर भी दर्शकों के लिए उसमें नित्य नवीनता का प्रस्फुटन हो. संस्कृत के आचार्यों ने यही तो कहा है 

“क्षणे क्षणे यन्नवतमुपैति । 

सदैव रूपं रमणीयताया ॥” 

बिहारी की नायिका का ऐसा ही तो सौन्दर्य था, जिसमें प्रतिपल नवीनता रहती थी 

“लिखन बैठ जाकी छवी, गहि-गहि गरब गरूर 

भए न लेते जगत के चतुर चितेरे कूर ॥”

आनन्द की अवस्थाएँ 

मानव मन की तीन अवस्थाओं-सत् चित्त और आनन्द में से कला आनन्द को अधिक मानती और जानती है. इस आनन्द की अभिव्यक्ति की दो अवस्थाएँ हैं-

(1) साधनावस्था, और

(2) सिद्धावस्था. 

साधनावस्था-इस प्रथमावस्था में अमंगल और अन्धकार में पड़े हुए जीवों के प्रति सहानुभूति रहती है और वह उनके प्रकाशमय भविष्य को उनके समीप ला देता है. वे अन्धकार पर विजय पाने के लिए प्रकाश की चेष्टाओं के गीत गाते हैं. इसी से डण्टन ने इसे शक्ति काव्य (Peotry of Energy) कहा है. वे मानवीय उपासना के तीनों क्षेत्रों-ज्ञान, कर्म और उपासना में सौन्दर्य दर्शन करते हैं. उनकी तीव्र दृष्टि उनके असुन्दर के अन्दर छिपे प्रच्छन्न सौन्दर्य को बहुत दूर से ही देख लेती है. उनके सभी अशिव चित्र शिव की सृष्टि करते हैं. गोर्की ने यही तो कहा है-“वास्तव में हमारे कवि संघर्ष और प्रतिद्वन्द्वी तत्वों के भीतर से सौन्दर्य के बीज तत्व तक पहुँचते हैं. इसका आधार-सूत्र है-मानव पर विश्वास करो.” इसी प्रकार हिन्दु कला की जड़ में भी ‘सर्वात्मनः परमात्मनः’ और ‘बहुजन हिताय’ जैसी भावनाएँ कार्य करती हैं. दूसरे शब्दों में, अधर्म पर धर्म की जय, अन्धकार पर प्रकाश की जय, अशिव पर शिव की जय ही सौन्दर्य का मूलरूप है. 

सिद्धावस्था-यह लोकमंगल की दूसरी अवस्था है. इसी को उपभोग पक्ष भी कहते हैं. यहाँ केवल सौन्दर्य का ही साम्राज्य रहता है और वह भी साधनावस्था की तरह प्रच्छन्न नहीं, बिल्कुल स्पष्ट. उसमें साधना द्वारा सम्पूर्ण अमंगल और अशिव रूपों को नष्ट करके सिद्ध रूप में मंगल और सुन्दर रूप का उपभोग किया जाता है. तुलसी यदि साधनावस्था के कवि थे, तो सूर सिद्धावस्था के. राम यदि साधनावस्था के नायक थे, तो कृष्ण विशेष रूप से सिद्धावस्था के. सौन्दर्य का प्रतीक नारी को माना गया है. न्यूमैन ने कहा है-“यदि तुम्हारी आत्मा उच्च धर्मराज्य की पवित्र सीमा में प्रवेश करना चाहती है, तो उसे नारी रूप में जाना पड़ेगा. मानव-समाज में पुरूषाकार का तुम्हें कितना ही गर्व क्यों न हो, उस राज्य में जाने के लिए नारी के रूप के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं.” 

सुन्दर सत्य : कला का पर्याय

हम पहले ही कह आए हैं कि कला सौन्दर्य का पक्ष अधिक ग्रहण करती है. इसलिए सुन्दर सत्य ही कला है. वास्तविक रूप में जीवन के दो प्रकार की उपयोगिता की आवश्यकता है-(1) स्थूल रूप में (भोजन, वस्त्र आदि की), (2) सूक्ष्म रूप में (आनन्द). या यों कहें कि शरीर को स्वस्थ और गतिमान रखने के लिए जिस प्रकार भोजन-वस्त्र की आवश्यकता होती है उसी प्रकार अनेक सूक्ष्म भावनाओं के भण्डार इस हृदय को गतिमान और स्वस्थ रखने के लिए सत्यमय सौन्दर्य की आवश्यकता होती है. व्यक्ति जिस प्रकार बुद्धि और शरीर द्वारा अपना शारीरिक भोजन प्राप्त करता है उसी प्रकार भावनाओं द्वारा वह इस सुन्दर सत्य का, जिसे कला कहते हैं, निर्माण करता है. दूसरे शब्दों में, मनुष्य स्वयं ही अपना प्रकाशन अपनी सृष्टि तथा अपना रूपान्तर है केवल अपने अर्थ से, यहाँ तात्पर्य मानव से है. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वह अव्यक्त ब्रह्म स्वयं को ही आनन्दित करने के लिए अपने में से ही “एकोऽहं बहूस्याम्” का विचार कर अनेक रूपों में व्यक्त हो जाता है. यह उसका आत्म प्रकाशन व्यर्थ नहीं, आत्म संतोष के लिए होता है. तभी तो कलाकार अपने को व्यक्त करने हेतु कितना बेचैन रहता है. इसका चित्रण भी माखनलाल चतुर्वेदी ने खूब समझा और समझाया है 

“लेखक में ऐसी स्फूर्ति होनी चाहिए जो उसके निर्माण को आत्मवेदना की मूर्ति का स्वरूप दे सके. वह लेखन कला का चतर कलाकार है जो अपने आत्म-मनन और आत्म चिन्तन को कलम के घाट उतारने के लिए अपनी रोटियाँ बेचकर रात के लैम्प में अपनी 

आँखों और उँगलियों द्वारा मस्तिष्क के घुमाव और हृदय की धड़कन से प्रभावित रक्त चढ़ा देने के लिए बाजार में तेल खरीदता नजर आता है. इसीलिए शुद्ध कला की उत्पत्ति स्वान्तः सुखाय होती है.” 

कुछ लोगों का कहना है कि सुन्दरम् में सत्य की हत्या भी हो जाया करती है, किन्तु यह उनका मिथ्या भ्रम है. सुन्दरम् किसी की भी हत्या नहीं करता, वह तो सर्वत्र आनन्द प्रदाता ही बना रहता है; या यों कहें कि वह सत्य को और भी अधिक आकर्षक और आनन्दित रूप में प्रस्तुत करता है. गोस्वामी तुलसीदास के अग्रलिखित उद्धरण को लेकर वे अपने मत की पुष्टि करते हैं 

“कहा कहूँ छवि आज की, भले बने हो नाथ । 

तुलसी मस्तक जब नवै, धनुष-बाण लेउ हाथ ॥”

इसमें सत्य की हत्या नहीं हुई वरन् तुलसी ने कृष्ण को भी अपने इष्टदेव राम के रूप में देखकर अपनी अनन्य भक्ति की सत्यता को और भी अधिक सुन्दर रूप में रखने का प्रयत्न किया है. उन्होंने ‘सत्यं’ को भी सुन्दरम् के रूप में देखना अपना ध्येय माना है. इसमें वह सत्य की अवहेलना नहीं करते वरन् उसे ‘सुन्दरम्’ का पुट देकर और अधिक ग्राह्य रूप में प्रस्तुत करते हैं. इसमें सत्य की कुछ काट-छाँट अवश्य हो जाया करती है, किन्तु उसके आदर्श की पूर्ति होती है इसलिए सत्य इसे अपना और अधिक गौरव ही समझता है. यदि किसी पत्थर को काट-छाँट कर कोई कारीगर उसमें सुन्दर पच्चीकारी करके उसे और भी अधिक सुन्दर बना देता है, तो उस पत्थर की सत्यता नष्ट नहीं होती. हाँ, यह अधिक सुन्दर होकर अपनी ग्राह्यता अवश्य बढ़ा जाता है. 

कला : विभिन्न दृष्टिकोण 

साथ ही यह भी लोगों का भ्रम है कि कला जीवन के लिए है; अर्थात् समाज-सुधार के लिए है. शुद्ध रूप में न तो कला केवल कला के लिए है और न जीवन के लिए ही. टॉलस्टाय, लेनिन, महात्मा गांधी, रबीन्द्रनाथ आदि ऐसे महानुभाव हैं जो कला को उपयोगिता की कसौटी पर कसते हैं. टॉलस्टाय का कहना है-“Art is the means of union among men joining them in the same feeling.” (कला समभाव के प्रचार द्वारा विश्व को एक करने का साधन है) महात्मा गांधी का कहना है कि-“कला से जीवन का महत्व है. जीवन में वास्तविक पूर्णता प्राप्त करना ही कला है. यदि कला जीवन को सुमार्ग पर न ला सके, तो वह कला क्या हुई.” इस सम्बन्ध में रोमा रोला का कथन बड़े महत्व का है-“कलाकार स्रष्टा है. वह सृष्टि के बीज बिखेरता चलता है. उसका काम सिर्फ बोना है. फल का विचार करना या विचार का बीज उगाना न तो उसके लिए सम्भव है और न उसका काम ही.” वस्तुतः कला उस खिलते हुए फूल के समान है जो स्रष्टा द्वारा खिला दिया गया है, किन्तु उससे लोगों को क्या चाहिए, यह चाहने वालों की इच्छा पर छोड़ दिया गया है. कोई उसकी सुगन्धि को पसन्द करता है, तो कोई उसके सौन्दर्य को. कोई उसका वैज्ञानिक विश्लेषण करना चाहता है, तो कोई उसके गुणों पर मुग्ध है. कला उसी प्रकार अपने में पूर्ण है. अलग-अलग लोग उसे अलग-अलग दृष्टियों से देखते हैं. 

इस सम्बन्ध में चित्रकार रैफेल का कहना है कि-“सत्य की खोज में जब लोग मन्दिर में गए, तो पुजारियों ने उन्हें पीने के लिए एक प्रकार की मदिरा दी. वह मदिरा किसी को मीठी किसी को कड़वी तथा किसी को तीखी लगी. मदिरा वही थी, किन्तु उसका स्वाद भिन्न-भिन्न था. इस प्रकार कला की किसी भी वस्तु का मूल्य आँकने में मतभेद पाया जाता है.”

कलाकार और सृजन-सुख 

वस्तुतः यह विवाद व्यर्थ का है. कला की सृष्टि करने वाला कलाकार ही तो होता है और वह समाज का प्राणी होता है. उसकी आवश्यकता समाज की आवश्यकता है और समाज की आवश्यकता उसकी आवश्यकता है, अतः उसके दो प्रकार के रूप हुए-(1) सामाजिक और (2) व्यक्तिगत. और उसकी सृष्टि ने भी दोनों प्रकार की आवश्यकताओं को पूर्ण किया है. इस प्रकार कला में विरोध कहाँ है? वह स्वान्तः सुखाय ही होती है. किन्तु जैसा कि हम पहले कह आये हैं, कला मनुष्य को मानव मात्र की उस भाव-भूमि पर ले जाती है जहाँ वह अपनी पृथक सत्ता को भूलकर मनुष्यता की उच्च भाव-भूमि पर जा ठहरता है, फिर उसका अपना और पराया कहाँ? फिर कला में भावों का चित्रण और अनुभूति की अभिव्यक्ति ही तो होती है. भाव मूलतः मनुष्य मात्र को क्या, प्राणिमात्र के तथा सम्पूर्ण प्रकृति के एक ही होते हैं. यदि फिर वह ‘व्यक्ति सुखाय’ होगी, तो उसे ‘सर्व सुखाय’ भी होना चाहिए. तुलसी की रामायण भी तो ‘स्वान्तः सुखाय’ लिखी गई थी, किन्तु क्या वह सबको आनन्द नहीं देती? 

फिर ‘कला कला के लिए है’ अथवा ‘जीवन के लिए?” यह प्रश्न वहीं समाप्त हो जाता है जहाँ यह समझ लिया जाता है कि कलाकार समष्टि से अलग नहीं है. कारण, दोनों के जीवन का उद्देश्य है-‘उस परम लक्ष्य की खोज.’ कला भी उसी की खोज करती है. किस प्रकार करती है? वह आनन्द स्वरूप है और कला का अन्तिम लक्ष्य भी ‘आनन्द’ ही है. अतः जहाँ कला का अन्तिम लक्ष्य आनन्द है वहाँ ही उसका अन्तिम लक्ष्य उस ‘परम आनन्द’ की प्राप्ति भी हो जाती है. अतः यह प्रश्न निर्विवाद है. 

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