समाजोत्थान में पुलिस की भूमिका पर निबंध| Essay on role of police in sociology

समाजोत्थान में पुलिस की भूमिक,

समाजोत्थान में पुलिस की भूमिका पर निबंध| Essay on role of police in sociology

देश की अनेक प्रमुख संस्थाएं समाजोत्थान में किस प्रकार अपना योगदान कर सकती हैं. इस बहस के साथ ही “सामाजिक निवेश” (Social Investment) जैसे शब्द आजकल सुर्खियों में हैं. तब ऐसे में पुलिस की भूमिका पर भी विचार-विमर्श लाजिमी है. पुलिस जीवन के हर क्षेत्र में तथा समाज के प्रत्येक चौराहे पर देखी जाती है. पुलिस का थाना वह जगह है. जहाँ परेशान आदमी अपनी परेशानी को दूर करने की आशा लेकर जाता है. 

पुलिस-प्रशासन किसी भी लोकतांत्रिक देश का प्रमुख अंग होता है. अपने कार्यों से पुलिस किसी देश में अत्यधिक सम्मानित है तो कहीं यह घृणा की पात्र भी है. हमारे देश में समाजोत्थान में पुलिस की क्या भूमिका है और होनी चाहिए, इसकी चर्चा से पूर्व पुलिस की हमारे समाज में क्या स्थिति है? इसका सर्वप्रथम आकलन करें, तो ज्यादा समीचीन होगा. 

अब तक हमारे देश की जनता के मन में पुलिस की कैसी छवि अंकित हुई है, इसे सहजता से जाना जा सकता है. स्पष्ट शब्दों में यह कहा जाए तो यह सर्वविदित है और काफी अच्छी नहीं है. कुछ उदाहरणों को छोड़कर, अधिकांश मामलों में पुलिस की भूमिका सदैव संदेह और विवाद के घेरे में रही है. हमारे देश में वर्तमान में लगभग अठारह लाख पुलिसकर्मी है तथा सरकार इन पर सालाना छः हजार करोड़ रुपए खर्च करती है. इतनी बड़ी संख्या तथा उस पर इतनी बड़ी राशि के खर्च के बावजूद हमारे देश में पुलिस के कार्यों के सांगोपांग अध्ययन के पश्चात् इतनी निराशाजनक तस्वीर उभरती है. जो उत्साह वर्धक नहीं है. 

पुलिस यदि अपने गैर-जिम्मेदाराना रवैये का त्याग करे तो निश्चित रूप से यह समाजोत्थान में क्रान्तिकारी भूमिका अदा कर सकती है. शादी-विवाह, उत्सव, अधिवेशन, मेले-तमाशे, पूजा घर, झगड़े-टंटे, चोरी-डकैती आदि प्रत्येक स्थान एवं अवसर पर पुलिस के आदमी हमारी सहायता करते हुए देखे जा सकते हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज भी पुलिसतंत्र में ईमानदार कर्मठ नैतिकता और मानवीय मूल्यों को समझने वाले पुलिसकर्मी मौजूद हैं. ऐसे पुलिसकर्मियों के कुछ नाम भी गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने अपने कार्यों से जनता के हृदय में अपना स्थान बनाया है और आशा की कुछ किरणों को अभी भी बचाए रखने में सफलता प्राप्त की है. ऐसे नामों में प्रथम महिला आई. पी. एस. अधिकारी डॉ. किरण बेदी, पंजाब में आतंकवाद का सफाया करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले श्री के.पी एस. गिल के नाम उल्लेखनीय है. कुछ समय पूर्व तक दिल्ली के तिहाड़ जेल में पदस्थापित डॉ. किरण बेदी ने जेल के अन्दर ऐसे आमूल-चूल परिवर्तन किए, जो अन्य पुलिसकर्मियों के लिए आदर्श हैं. उन्होंने कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार करने पर बल दिया. उनकी दिनचर्या को दुरुस्त करते हुए अनेक सुधार किए, जिनमें कैदियों का समय पर उठना, ध्यान करना, पढ़ाई-लिखाई करना, सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेना, खेलकूद में भाग लेना एवं स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण प्राप्त करना जैसे कार्य शामिल हैं. इन सभी बदलावों को उन्होंने जिस कुशलता से किया है. उसे देखकर देश और विदेशों में उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है. जेल के कैदी भी हमारे समाज के ही अंग हैं और उनके उत्थान हेतु किया गया कार्य समाजोत्थान के दायरे में ही आता है. ऐसे और भी पुलिसकर्मी हैं जो समाज की भलाई हेतु योजना बनाते हैं और क्रियान्वित करने का प्रयास करते हैं, परन्तु दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव तथा अपने ही सहकर्मियों का असहयोगात्मक रवैया, उनके मंसूबों पर पानी फेर देता है. 

हमारे देश में अधिकांश जनता गाँवों में निवास करती है और दुर्भाग्य से अनेक प्रयासों के बावजूद अभी भी काफी बड़ी संख्या में लोग अशिक्षित हैं. आए दिन छोटी-छोटी बातों को लेकर वे आपस में उलझ जाते हैं और एक-दूसरे का अहित कर बैठते हैं. तत्पश्चात् कोर्ट-कचहरी के चक्कर में अपने पसीने की कमाई को होम कर कंगाली का जीवन बिताने को विवश हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में पुलिस की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. अशिक्षित ग्रामीणों को कानूनी पेचीदगियों में उलझाकर पैसे ऐंठने के बदले यदि उन्हें सही जानकारी प्रदान कर, उनके झगड़े उसी स्तर पर सुलझा देने का कार्य यदि पुलिस करे, तो लाखों घर बरबाद होने से बच सकते हैं. यदि पुलिसकर्मी पूरी दृढ़ता, ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ जनता के सहयोग से कार्य करें, तो समाज में विद्यमान अपराधियों पर अंकुश लगाना काफी आसान होगा, जिससे कि आम नागरिक सुख-चैन से रह सकेंगे. आम जनता को उनके अधिकारों और कर्तव्यों की जानकारी प्रदान करना, अनेक नियम-कानूनों के बारे में बतलाना, समाज और देश के प्रति दायित्वों के बारे में बताना, अनेक क्षेत्रों में जनता को प्रत्यक्ष या परोक्ष शोषण से मुक्ति दिलाने जैसे कार्य भी पुलिस बखूबी निभा सकती है, जोकि समाजोत्थान में काफी सहायक साबित हो सकता है. 

वर्तमान में पुलिस के सामने अनेक कठिनाइयाँ भी हैं जो उन्हें कुशलतापूर्वक कार्य नहीं करने देतीं. धन, हथियार, वाहन एवं सूचनाओं के आदान-प्रदान की नई तकनीक के अभाव की बातें समय-समय पर कही जाती रही हैं, ऊपर से राजनेताओं का दबाव भी उन्हें अपना कार्य नहीं करने देता. इस सम्बन्ध में सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए. अनेक अधिकारीगण पुलिस-व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता भी महसूस करते हैं. जिससे कि पुलिस बिना किसी दबाव के चुस्ती-फुर्ती के साथ स्वतंत्र एवं सहयोगात्मक वातावरण में कार्य कर सके. हाल ही में बी.बी.सी. (ब्रिटिश ब्रॉड-कास्टिग कॉर्पोरेशन) के हिन्दी भाषा के प्रसारण में ‘आपसे मिलिए’ कार्यक्रम के अन्तर्गत एक भेटवार्ता में तेज-तर्रार एवं दृढ़ इच्छाशक्ति की धनी आई. पी. एस. अधिकारी डॉ किरण बेदी ने अपने विचार प्रस्तुत किए और उन्होंने स्वीकार किया कि पुलिस अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जाती है, परन्तु यदि दृढ़ता दिखलाई जाए तो कार्यशैली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता. साथ ही उन्होंने भी पुलिस-तंत्र के लिए एक नए मॉडल को प्रस्तुत करने की भी इच्छा व्यक्त की जो पुलिस को किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रख सके और जनता से सहयोगात्मक सम्बन्ध बनाकर कार्य करने में सहायक हो. 

द्रष्टव्य है कि जिन उददेश्यों की पूर्ति के लिए पुलिस विभाग की स्थापना की गई थी यदि उनकी जानकारी को व्यापक बना दिया जाए तो कोई कारण नहीं कि पुलिस समाजोत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन न कर सके सम्बन्धित अधिनियम में पुलिस के कर्त्तव्य संक्षेप में इस प्रकार बताए गए हैं-कानून और व्यवस्था की स्थापना, अपराधी एवं असामाजिक तत्वों पर नियन्त्रण, राष्ट्र विरोधी तत्वों से मोर्चा लेना, तस्करी रोकना, मादक द्रव्यों की अवैध बिक्री पर नियन्त्रण, समाज की सुरक्षा करना तथा उसके विकास कार्यों में योग करना कुछ विचारकों का कहना है कि अंग्रेजी के Police का निर्माण करने वाला प्रत्येक अक्षर अपनी अर्थवत्ता रखता है यथा- 

P= Politeness-नम्रता , 0=Obedience-आज्ञा पालन, L= Loyalty-कर्त्तव्य निष्ठा, I = Integrity-सत्य निष्ठा, C = Courage-साहस, E= Efficiency-सक्षमता. 

पुलिस विभाग यदि अपने नाम को सार्थक कर सके, तो समाज का उत्थान स्वयं सिद्ध यथार्थ बन जाए. 

अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि यदि पुलिसकर्मी अपने तुच्छ निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में जनता की समस्याओं का समाधान करें तथा उनके हित में यथासम्भव ईमानदारी से कार्य करें, तो वे समाजोत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं तथा समाज में सम्मान पाने के भी हकदार होंगे. साथ ही यदि आने वाले दिनों में डॉ. किरण बेदी जैसे पुलिस अधिकारियों के सद्विचार यथार्थ के धरातल पर ठोस स्वरूप ग्रहण कर सके तो यह पुलिस-तंत्र और देश की जनता, दोनों के लिए अच्छे परिणाम ला सकते हैं एवं समाज को एक नई दिशा मिल सकती हैं. 

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