लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर निबंध |Essay on Role of Opposition in Democracy

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका 

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अथवा लोकतंत्र में विपक्षी दलों का महत्त्व (यूपी लोअर सबऑर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2009) 

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका पर चर्चा करने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि विपक्ष यानी प्रतिपक्ष से अभिप्राय क्या है? वस्तुतः विपक्ष (प्रतिपक्ष) अथवा विरोधी दल वह दल होता है, जो संसद या विधान सभाओं में सत्तारूढ़ दल से इतर दल होता है। प्रतिपक्ष अथवा विरोधी दल का नेतृत्व करने वाला ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of the Opposition) कहलाता है। प्रतिपक्ष अथवा विरोधी दल के नेता का सिद्धांत ब्रिटिश संसदीय पद्धति की देन माना जाता है। विरोधी दल के नेता को इस योग्य होना चाहिए कि वह समूचे प्रतिपक्ष की ओर से सरकार से बातचीत कर सके। 

संसदीय लोकतंत्र की जीवंतता एवं अर्थवत्ता के लिए एक सक्रिय, सशक्त एवं प्रभावी विपक्ष को आवश्यक माना जाता है। चूंकि भारत में संसदीय लोकतंत्र है, अतः यह बात भारत पर भी लागू होती है। वस्तुतः संसदीय लोकतंत्र में विरोधी दल व्यापक अर्थों में शासन तथा विधानमंडल का महत्त्वपूर्ण अंग होता है। संसदीय प्रणाली में सरकार आत्मविश्वास, सद्भावना और संविधान के मूल सिद्धांतों – पर आधारित होती है। सरकार और विरोधी दल दोनों को निश्चित परम्पराओं के आधार पर कार्य करना पड़ता है। इस व्यवस्था में प्रतिपक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष का सार्वजनिक महत्त्व होता है। 

भारतीय लोकतंत्र में अब तक विपक्ष की भूमिका क्या रही, कितनी प्रभावी रही तथा इसने भारतीय लोकतंत्र की किस हद तक ‘श्रीवृद्धि’ की, इन बिंदुओं की समीक्षा करने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि विपक्ष की एक स्वस्थ लोकतंत्र में क्या भूमिका होनी चाहिए। वस्तुतः संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष के ऊपर बहत ही महत्त्वपूर्ण दायित्व होता है। एक अच्छे विपक्ष से जनता यह अपेक्षा रखती है कि वह सत्ता की निरंकुशता पर नियंत्रण रखकर जनतांत्रिक मूल्यों एवं जनतांत्रिक व्यवस्था को संरक्षित रखे। इस तरह देखें तो विपक्ष की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका लोकतंत्र के संरक्षक की होती है। उसका यह दायित्व बनता है कि वह सरकार की जनविरोधी नीतियों को कुछ इस तरह से प्रभावित करे, जिससे सरकार सावधान हो जाए और मनमानी न कर सके। विपक्ष से लोकतंत्र के सजग प्रहरी की भूमिका की अपेक्षा की जाती है। जनतंत्र में विपक्ष की भूमिका के महत्त्व को रेखांकित करते हुए प्रो. जेनिंग्स ने कहा है- “यदि यह जानना हो कि देश की जनता स्वतंत्र है, तो यह जानना आवश्यक है कि वहां विरोधी दल है या नहीं और है तो कैसा।” 

“संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष के ऊपर बहुत ही महत्त्वपूर्ण दायित्व होता है। एक अच्छे विपक्ष से जनता यह अपेक्षा रखती है कि वह सत्ता की निरंकुशता पर नियंत्रण रखकर जनतांत्रिक मूल्यों एवं जनतांत्रिक व्यवस्था को संरक्षित रखे।” 

सरकारें जब-जब दिग्भ्रमित होती हैं, तो विपक्ष ही संवैधानिक उपायों द्वारा उसे दिशा बोध करवाता है। एक सशक्त विपक्ष का यह दायित्व बनता है कि वह सरकार की गतिविधियों पर एवं सत्ता पक्ष के नेताओं पर पैनी नजर रखे तथा सरकार की गैरजिम्मेदाराना एवं जनविरोधी नीतियों की जमकर आलोचना करते हुए उसे शक्ति के दुरुपयोग से रोके। यह आलोचना सिर्फ सदन में नहीं, बल्कि सदन के बाहर जनता के बीच भी करनी चाहिए क्योंकि जनतंत्र में जनता ही ‘जनार्दन’ होती है। विपक्षी दल से यह भी अपेक्षित होता है कि वह सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले बजट एवं सदन में लाए जाने वाले विधेयकों पर पैनी नजर रखे तथा इसमें यदि कुछ आपत्तिजनक हो या लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हो तो उसका जमकर विरोध करें। दोषों और भूलों को सामने लाकर इनके सुधार के लिए सरकार पर दबाव बनाए। इसके लिए वाद-विवाद, काम रोको प्रस्ताव, धरना, अनशन जैसे संवैधानिक हथकंडों का तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है, आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है। विपक्ष जनविरोधी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव’ भी ला सकता है।

यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि सिर्फ हंगामा खड़ा करना या निहित स्वार्थों एवं हितों की पूर्ति करना एक अच्छे विपक्ष के लक्षण नहीं हो सकते। आजकल अपने इन्हीं कृत्यों के कारण विपक्ष आलोचना का शिकार हो रहा है, क्योंकि व्यर्थ के हंगामे एवं राजनीतिक हित साधने की दूषित प्रवृत्ति के कारण संसद में गतिरोध पैदा किया जाता है और कामकाज ठप रहने से इसका प्रतिकूल प्रभाव देश के विकास एवं कायों के सम्पादन पर पड़ता है। जनता विपक्ष से जिस रचनात्मकता की अपेक्षा रखती है, उसका उसे परिचय देते हुए सरकार की नेक पहलों में उसका साथ देना चाहिए। विपक्ष से यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि वह सरकार की हर गतिविधि के विरोध के लिए ही बना है। सरकार की रचनात्मक एवं स्वागत योग्य पहलों का उसे समर्थन करना चाहिए। विपक्ष से यह अपेक्षा तो विशेष रूप से की जाती है कि वह राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करे तथा देश की बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा से जड़े मामलों, वैदेशिक संदर्भो एवं युद्ध के समय सहयोगी रवैया अपनाए, ताकि राष्ट्र पर किसी भी प्रकार से आंच न आने पाए। 

“हाल के दिनों में जिस तरह से विपक्ष की भूमिका का क्षरण हुआ है, वह चिंतनीय है। इसे रोकना होगा। नहीं रोका गया तो हमारा जनतंत्र ‘श्रीहीन हो जाएगा।” 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भले ही है, किंतु हमारे यहां एक प्रभावी एवं रचनात्मक विपक्ष का प्रायः अभाव ही रहा। भारत के संविधान में विपक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष के संबंध में कहीं कोई प्रावधान नहीं है। भारत में फरवरी, 1967 में संपन्न चौथे आम चुनाव तक केंद्र तथा राज्यों में एक ही दल (कांग्रेस) की सरकार रही। वर्ष 1967 के आम चुनावों के बाद कांग्रेस के प्रति जनसाधारण का मोहभंग होना शुरू हुआ। फलतः विपक्ष में बैठने वाले सदस्यों की संख्या में वृद्धि हुई। इस प्रकार देश में पहली बार विपक्षी दल को औपचारिक रूप से मान्यता मिली। वर्ष 1969 में पहली बार लोकसभा में राम सुभग सिंह तथा राज्य सभा में श्यामानंदन मिश्रा को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता प्रदान की गई। वर्ष 1977 में जनता पार्टी के शासनकाल में संसद द्वारा ‘नेता प्रतिपक्ष (वेतन एवं भत्ता) अधिनियम, 1977’ पारित किया गया। नेता प्रतिपक्ष को वैधानिक स्वीकृति मिलने का देश में यह प्रथम अवसर था। अधिनियम द्वारा नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का स्तर प्रदान करते हुए वेतन-भत्ते एवं अन्य सुविधाएं देने का प्रावधान किया गया। अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर नेता प्रतिपक्ष को सूचना के सरकारी माध्यमों पर अपने विचार प्रकट करने के अधिकार को भी मान्यता दी गई। इस अधिनियम के अंतर्गत नेता प्रतिपक्ष को प्राप्त सभी सुविधाएं प्राप्त करने वाले देश के प्रथम नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस के यशवंत राव चहाण (लोकसभा) थे। नेता प्रतिपक्ष कई महत्त्वपूर्ण पदों हेतु चयन एवं नियुक्त संबंधी तथा अन्य विशिष्ट समितियों का पदेन सदस्य होता है। लोकसभा की नियम संख्या 121 (सी) के अनुसार विपक्ष के रूप में मान्यता प्राप्त करने हेतु किसी दल के लिए लोकसभा के कोरम (10%) को पूर्ण करने हेतु सदस्य संख्या अवश्य होनी चाहिए। संसद में विभिन्न दलों को दी जाने वाली सुविधाओं की श्रेणी से संबंधित वर्ष 1998 में पारित विधेयक में मुख्य विपक्षी दल हेतु लोकसभा में 55 तथा राज्य सभा में 25 सदस्यों की न्यूनतम संख्या (जो सदन की कुल सदस्य संख्याओं का 10% है) निर्धारित की गई। 

भारत में एक तो वैधानिक स्तर पर बहुत देर से विपक्ष ने आकार लेना शुरू किया, दूसरे भारत में द्विदलीय पद्धति न होने के कारण विपक्ष कभी भी बहुत प्रभावी नहीं सिद्ध हो पाया। राजनीतिक स्वार्थों, वैचारिक मतभेदों एवं दलगत स्वार्थों की वजह से विपक्ष में सदैव बिखराव बना रहा और वह एकजुटता नहीं दिखी, जो एक मजबूत प्रतिपक्ष में दिखनी चाहिए। प्रायः विपक्ष में रचनात्मकता का भी अभाव देखा गया। आज संसद के सत्रों के दौरान प्रतिपक्ष की जो हंगामाखेज भूमिका देखने को मिल रही है, वह कहीं से भी उचित नहीं ठहराई जा सकती। जब प्रतिपक्ष स्वयं पर ही नियंत्रण नहीं रख पा रहा है, तो वह सत्ता के प्रति संतुलन का काम कैसे करेगा? यह प्रश्न अहम है। प्रतिपक्ष को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। 

यह सच है कि भारत में प्रतिपक्ष की मौजूदा भूमिका संतोषजनक नहीं है, तथापि प्रतिपक्ष की भूमिका को एकदम से खारिज भी नहीं किया जा सकता। अनेक अवसरों पर प्रतिपक्ष ने सराहनीय भूमिका निभाते हए न सिर्फ सत्ता पक्ष को रास्ते पर लाने का काम किया है, अपितु राष्ट्रीय हित के मामलों में रचनात्मकता का परिचय देकर अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है। हाल के दिनों में जिस तरह से विपक्ष की भूमिका का क्षरण हुआ है, वह चिंतनीय है। इसे रोकना होगा। नहीं रोका गया तो हमारा जनतंत्र ‘श्रीहीन’ हो जाएगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिज्ञ स्वयं आत्मनिरीक्षण करें, तो जनता उस पर सही व प्रभावी भूमिका निभाने के लिए दबाव बनाए। 

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