नदी जल विवाद पर निबंध अथवा अन्तर्राज्यीय नदी जल-विवाद पर निबंध

नदी जल विवाद पर निबंध

नदी जल विवाद पर निबंध अथवा अन्तर्राज्यीय नदी जल-विवाद पर निबंध(Essay on River Water Dispute)

पंछी नदिया पवन के झोंके 

कोई सरहद न इन्हें रोके

सरहदें इंसानों के लिये हैं 

सोचो तुमने और मैंने क्या पाया इंसा हो के।

जावेद अख्तर द्वारा लिखित ‘रिफ्यूजी’ फिल्म का यह गीत प्रदर्शित करता है कि पंछी, नदी एवं पवन की कोई सरहद नहीं होती। 

भारत नदियों का देश है। गंगा, यमुना, सिन्धु, झेलम, ब्रह्मपुत्र, चम्बल, बेतवा, ताप्ती, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी आदि नदियाँ भारत की पहचान हैं। गौरतलब है कि नदियाँ अपने अपवाह क्षेत्र के अनुरूप कई प्रकार की होती हैं। कुछ नदियाँ ऐसी होती हैं जो उसी राज्य से निकलकर उसी में समाप्त हो जाती हैं तो कुछ अन्तर्राज्यीय एवं कई बार तो अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति की होती है। भारत की जलवायु 

मानसूनी होने के कारण यहाँ चार महीने की बारिश होती है। ऐसे राष्ट्र में जहाँ लगभग आठ माह बारिश न होती हो उस राष्ट्र के राज्यों के बीच अन्तर्राज्यीय जल विवाद कोई आश्चर्यजनक मसला नहीं है। 

ध्यातव्य है कि जल विवादों की प्रकृति कई बार अन्तर्राज्यीय तो कई बार अन्तर्राष्ट्रीय भी हो जाती है। 

भारत के प्रमुख अन्तर्राज्यीय जल विवादों को क्रमवार दिया गया है- 

कावेरी नदी जल विवाद-कावेरी नदी दक्षिण भारत की गंगा कही जाती है तथा इसका उद्गम स्थल कर्नाटक की सह्याद्रि पर्वत का दक्षिणी छोर है। यह नदी कर्नाटक से होते हुए तमिलनाडु, केरल तथा पदुचेरी होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिरती है। उल्लेखनीय है कि 87,900 वर्ग किमी का कावेरी बेसिन भारतीय अपवाह क्षेत्र का 2.7% है। कावेरी जल विवाद आजादी के पूर्व से चला आ रहा है। वर्ष 1892 में पहली बार मैसूर राज्य एवं मद्रास प्रेसिडेंसी के बीच जल बँटवारे को लेकर समझौता संपन्न हुआ था। इसके पश्चात् 1892 तथा 1924 में भी समझौते हुए परन्तु कर्नाटक इससे सहमत नहीं था। भारत सरकार द्वारा 1972 में गठित एक समिति की सिफारिश पर अगस्त 1976 में कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल तथा पदुचेरी के बीच एक समझौता हुआ। इसके पश्चात् 1990 में कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना की गई जिसके बाद वर्ष 2013 में केन्द्र सरकार ने न्यायाधिकरण के आदेश से संबंधित अधिसूचना जारी की। इसके तहत तमिलनाडु को 419टीएमसी फुट, कर्नाटक को 270 टीएमसी फुट, केरल को 30 तथा पदुचेरी को 7 टी एम सी फुट जल का आवंटन किया गया। हालांकि 16 फरवरी, 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के हिस्से से 14.75 टीएमसी फुट जल काटकर कर्नाटक को दे दिया। 

“संविधान सभा के सदस्य अन्तर्राज्यीय जल विवादों के संदर्भ से वाकिफ थे इसलिये उन्होंने संविधान में इस बात का उल्लेख किया। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 कहता है कि संसद विधि द्वारा किसी अन्तर्राज्यीय नदी या नदी दून के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या परिवाद के न्याय निर्णयन हेतु उपबंध कर सकेगी।” 

कृष्णा नदी जल विवाद-कृष्णा नदी का उद्गम महाराष्ट्र राज्य में महाबलेश्वर के समीप पश्चिमी घाट शृंखला से होता है, इसके पश्चात यह नदी कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। कृष्णा नदी के जल को लेकर आंध्रप्रदेश एवं कर्नाटक के बीच विवाद है। 1969 में गठित बछावत न्यायाधिकरण ने इस विवाद से संबंधित फैसला 1976 में दिया। जिसके तहत आंध्रप्रदेश को 811, कर्नाटक को 734 तथा महाराष्ट्र को 585 अरब घन फुट मीटर पानी प्राप्त होता था। हालांकि कृष्णा नदी जल विवाद प्राधिकरण ने 30 दिसंबर, 2010 को अपना निर्णय दिया कि अब से आंध्र प्रदेश को 1001 अरब घन फुट, महाराष्ट्र को 666 तथा कर्नाटक को 911 टीएमसी प्राप्त होगा। यह जल बँटवारा 31 मई, 2050 तक वैध होगा। 

नर्मदा नदी जल विवाद : नर्मदा नदी मध्य प्रदेश में अमरकंटक से निकलती है। इसकी लम्बाई 1300 किलोमीटर है। गुजरात, मध्य प्रदेश व राजस्थान में नर्मदा के जल को लेकर विवाद है। इस मामले को सुलझाने को लेकर केंद्र सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया। न्यायाधिकरण ने 7 दिसंबर, 1979 को अपना निर्णय दिया। इस निर्णय में नर्मदा जल विवाद से जुड़े राज्य गुजरात को 90 लाख एकड़ फीट, मध्य प्रदेश को 182.5 लाख एकड़ फीट, महाराष्ट्र को 2.5 लाख एकड़ फीट जल उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। 

यमुना जल विवाद : यमुना जल विवाद भी काफी पुराना है। पाँच राज्य हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जुड़े हुए हैं। सबसे पहले यमुना जल समझौता 1954 में मात्र दो राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश के मध्य हुआ था, जिसके अंतर्गत यमना जल में हरियाणा का हिस्सा 77 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश का हिस्सा 23 प्रतिशत निर्धारित किया गया था और राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश के हिस्से का जिक्र तक नहीं आया था। इन राज्यों द्वारा भी अपने हिस्से की माँग के साथ विवाद गरमाने लगा। 

इन विवादों के अतिरिक्त गोदावरी नदी को लेकर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश तथा ओडिशा के बीच विवाद, महादायी नदी को लेकर गोवा, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के बीच विवाद आदि प्रमुख हैं। 

संविधान सभा के सदस्य अन्तर्राज्यीय जल विवादों के संदर्भ से वाकिफ थे इसलिये उन्होंने संविधान में इस बात का उल्लेख किया। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262 कहता है कि संसद विधि द्वारा किसी अन्तर्राज्यीय नदी या नदी दून के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या परिवाद के न्याय निर्णयन हेतु उपबंध कर सकेगी। ध्यातव्य है कि इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी संसद विधि द्वारा उपबंध कर सकेगी कि उच्चतम न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय इस तरह के विवादों के संदर्भ में किसी अधिकारिता का इस्तेमाल नहीं करेगा। 

भारत में नदी जल विवाद बहुत पुराने हैं। कुछ तो ब्रिटिश काल से ही अस्तित्व में है। ध्यातव्य है कि केन्द्र सरकार समय-समय पर विभिन्न प्रयासों द्वारा नदी जल विवादों का प्रयास करती रही है। 1956 में जल विवाद अधिनियम लाया गया जिसके माध्यम से विवादों के लिए न्यायाधिकरण की बात की गई। इसके पश्चात् वर्ष 2002 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। एवं अंततः 2019 में फिर से इस अधिनियम में संशोधन हेतु 2019 में विधेयक प्रस्तुत किया गया। 

अन्तर्राज्यीय नदी जल-विवाद (संशोधन) बिल, 2019 

जुलाई, 2019 में लोकसभा में अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित हो गया। विधेयक अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद एक्ट, 1956 में संशोधन करता है। एक्ट राज्यों के बीच नदियों और नदी घाटियों से संबंधित विवादों में अधिनिर्णय का प्रावधान करता है। विदित हो कि एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार केंद्र सरकार से आग्रह कर सकती है कि वह अन्तर्राज्यीय नदी विवाद को अधिनिर्णय के लिए ट्रिब्यूनल को सौंपे। बिल के अंतर्गत अगर राज्य किसी जल विवाद के संबंध में अनुरोध करता है तो केंद्र सरकार उस विवाद को सौहार्दपूर्ण तरीके से हल करने के लिए विवाद निवारण कमिटी (डीआरसी) की स्थापना कर सकती है। डीआरसी एक साल के अंदर विवादों को हल करने का प्रयास करेगी (इस अवधि को छह महीने तक और बढ़ाया जा सकता है) और केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौपेंगी। केंद्र सरकार जल विवादों का फैसला देने के लिए अन्तर्राज्यीय नदी विवाद ट्रिब्यूनल की स्थापना करेगी। इस ट्रिब्यूनल की अनेक खंडपीठ हो सकती है। उल्लेखनीय है कि सभी मौजूदा ट्रिब्यूनलों को भंग कर दिया जाएगा और उन ट्रिब्यूनलों में निर्णय लेने के लिए जो मामले लंबित पड़े होंगे, उन्हें नए ट्रिब्यूनल में स्थानांतरित कर दिया जाएगा। ट्रिब्यूनल में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन न्यायिक सदस्य तथा तीन विशेषज्ञ होंगे। 

भारत में विश्व की भूमि का 2.4%, विश्व की आबादी का 18% है। लेकिन नवीकरणीय जल संसाधन का केवल 4% विद्यमान है। यदि पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए, तो असमान जल वितरण से पानी के टकराव की संभावना बढ़ जाएगी। अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद हमारे राष्ट्र के सहकारी संघवाद में बाधा डालते हैं। हम सबको यह महसूस करना चाहिए कि हमारा राष्ट्र एक ऐसा परिवार है जिसमें सभी राज्य इसके सदस्य हैं। 

“जुलाई, 2019 में लोकसभा में अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित हो गया। बिल अन्तर्राज्यीय नदी जल विवाद एक्ट, 1956 में संशोधन करता है। एक्ट राज्यों के बीच नदियों और नदी घाटियों से संबंधित विवादों में अधिनिर्णय का प्रावधान करता है।” 

इसलिए विवादों को बातचीत और संवाद से हल किया जाना चाहिए और राजनीतिक अवसरवाद से बचना चाहिए। अंतरराज्यीय परिषद में विवाद पर चर्चा करके मुद्दे को हल किया जा सकता है जो वार्ता के लिए एक मंच प्रदान करने में फायदेमंद हो सकता है। राज्यों के बीच अधिक से अधिक सहयोग सुनिश्चित करने के लिए ऐसे विवादों को जल्द से जल्द हल किया जाना चाहिए। 

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