सूचना का अधिकार पर निबंध : विकास की कुंजी |Essay on Right to Information: Key to Development

सूचना का अधिकार पर निबंध : विकास की कुंजी

सूचना का अधिकार पर निबंध : विकास की कुंजी (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2011) अथवा क्या सचना का अधिकार अधिनियम स्वच्छ एवं न्यायपूर्ण प्रशासन सुनिश्चित कर सकता है? (आईएस मुख्य परीक्षा, 2010) अथवा सूचना क्रांति के रूप में आरटीआई अधिनियम की भूमिका अथवा सूचना का अधिकार और भ्रष्टाचार अथवा सूचना का अधिकार और जनविश्वास अथवा सूचना के अधिकार का मौजूदा परिदृश्य 

भारत में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है। इस व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सरकार बनाते हैं और शासन चलाते हैं। यानी जनता द्वारा चयनित लोग ही सरकार चलाते हैं। ऐसे में जनता को भी यह जानने का अधिकार है कि सरकार उनके हित और कल्याण के लिए क्या कर रही है? जो कर रही है, उसे कैसे कर रही है? उसमें कितनी पारदर्शिता है? इन्हीं प्रश्नों के परिप्रेक्ष्य में भारत में सूचना के अधिकार कानून की आवश्यकता महसूस की गई और वर्ष 2005 में भारत सरकार द्वारा यह अधिकार भारतवासियों को एक अधिकार के रूप में मिला। जनता को सही जानकारी उपलब्ध कराना ही सूचना के अधिकार की आत्मा है। 

“जनता द्वारा चयनित लोग ही सरकार चलाते हैं। ऐसे में जनता को भी यह जानने का अधिकार है कि सरकार उनके हित और कल्याण के लिए क्या कर रही है? जो कर रही है, उसे कैसे कर रही है? उसमें कितनी पारदर्शिता है?” 

यह सच है कि भारत में सूचना का अधिकार थोड़ी देर से कानून के रूप में अस्तित्व में आया, जबकि वैश्विक संदर्भ में देखें, तो संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर, 1948 को स्वीकार किए गए मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में इस अधिकार को मान्यता दे दी गई थी। संयुक्त राज्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया, डेनमार्क, स्वीडन तथा ब्रिटेन आदि देशों में इस अधिकार को काफी पहले ही कानून के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई थी, जहां इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए। भारत में 12 मई, 2005 को संसद द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया गया तथा 15 जून, 2005 को इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। 12 अक्टूबर, 2005 को अधिसूचित होने के बाद यह कानून के रूप में भारत में प्रभावी हुआ। इस अधिनियम के दायरे में केन्द्र एवं राज्य सरकार के सभी कार्यालयों के अतिरिक्त पंचायतों, स्थानीय निकायों तथा सरकार से सहायता, अनुदान एवं किसी अन्य रूप से धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठनों को लाया गया। इस प्रकार सरकारों, कार्यपालिका एवं विधायिका को इसके दायरे में लाकर इस कानून को व्यापकता प्रदान की गई। सूचना पाने की प्रक्रिया को सहज बनाया गया और मात्र 10 रुपये के पोस्टल आर्डर के साथ वांछित सूचना मांगने की व्यवस्था दी गई। समय सीमा का भी ध्यान रखा गया तथा 30 दिनों में सूचना दिए जाने की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। ‘केन्द्रीय सूचना आयोग’ को वे सभी अधिकार प्रदान किए गए, जो एक सिविल कोर्ट को प्राप्त होते हैं। राज्यों में राज्य सूचना आयोग’ के गठन की व्यवस्था इस अधिनियम में दी गई। सूचना आयुक्त को इस कानून की अवहेलना करने वाले विभागीय अधिकारियों पर 25,000 रुपये तक जुर्माना करने की व्यवस्था दी गई। उल्लेखनीय है कि देश की शीर्ष अदालत एक प्रकरण में निर्णय सुनाते हुए ‘सूचना के अधिकार’ को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत ‘वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के एक महत्त्वपूर्ण घटक के रूप में अभिहित कर चुकी है। ध्यातव्य है कि 9 मई, 2014 को राष्ट्रपति द्वारा ‘व्हिसिल ब्लोअर्स संरक्षण विधेयक, 2011’ को मंजूरी दी जा चुकी है, जिसमें अपराधों का जनहित के लिए खुलासा या प्रकटीकरण करने वाले व्यक्ति को पर्याप्त वैधानिक संरक्षण दिए जाने का प्रावधान है। इससे सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करने वाले भी लाभान्वित होंगे, क्योंकि वे संवैधानिक संरक्षण के दायरे में होंगे। ध्यातव्य है कि केंद्रीय विधायिका यानी संसद ने जुलाई, 2019 में सूचना का अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2019 पारित किया। यह विधेयक मुख्य सूचना आयुक्त के कार्यकाल को केंद्र सरकार द्वारा तय किये जाने को प्रस्तावित करता है। गौरतलब है कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अनुसार मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यकाल 5 वर्ष (या फिर 65 वर्ष तक की आयु तक) था। 

सूचना का अधिकार मिलने के बाद से इसके सकारात्मक परिणाम परिलक्षित हुए हैं। किसी हद तक यह कानून स्वच्छ एवं न्यायपूर्ण प्रशासन सुनिश्चित कराने में सहायक सिद्ध हुआ है। चूंकि इससे सरकारी कार्यों में पारदर्शिता बढ़ी है, अतः इसे विकास की कुँजी माना जा सकता है। सच तो यह है कि इस रूप में भारत में सूचना क्रांति का सूत्रपात हो चुका है। अब यह अधिकार मात्र एक वैधानिक अधिकार नहीं रहा. बल्कि इसने एक ‘जनअभियान’ का रूप ले लिया है। यही कारण है कि इस अधिकार का प्रयोग करने वालों की संख्या बराबर बढ़ रही है। लोगों में इस अधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ी है। ग्रामीण और शहरी दोनों इस अधिकार का इस्तेमाल बढ़-चढ़ कर करते देखे जा रहे हैं। उन सरकारी नुमाइन्दों को अब इस कानून का डर सताने लगा है, जो कल तक पद, हैसियत एवं सरकारी तंत्र का हवाला देकर न तो कामकाज में ही पारदर्शिता बरतते थे और न ही ईमानदारी से काम ही करते थे। ऐसे ऐसे अनेक दृष्टांत है जिससे पता चलता है है किइस कानून ने गोपनीयता की आड़ लेकर जनता को गुमराह करने वाले भ्रष्ट नौकरशाहों एवं सत्ताधारियों की काली कारगुजारियों को उजागर किया है।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में यह अधिकार विशेष रूप से सहायक सिद्ध हुआ है। अब गोपनीयता की आड़ में भ्रष्टाचार की गुंजाइश घटी है। इस अधिकार के जरिए आम आदमी की गाढ़ी कमाई से वसूले गए कर क उपयोग का लेखा-जोखा मिलना शुरू हुआ है। इस प्रकार जहां विकासात्मक कार्यों को गति और लय मिली है, वहीं इसके जरिए स्वच्छ एवं न्यायपूर्ण प्रशासन स्थापित करने में सहयोग मिला है। सबसे अच्छी बात तो यह है कि शासन-प्रशासन के गोपन दुर्ग में छेद करने वाला यह कानून जहां भ्रष्टाचार नियंत्रण में प्रभावी भूमिका निभा रहा है, वहीं जनतंत्र को दृढ़ एवं व्यापक बनाने में भी इसकी भूमिका श्लाघनीय है। सारतः यह कहा जा सकता है कि हमारे देश में सूचना के अधिकार से जुड़ा मौजूदा परिदृश्य अत्यंत सकारात्मक है। 

तमाम खूबियों के बावजूद इस कानून में कुछ खामियां भी हैं। जहां तक कमियों और खामियों का सवाल है, तो सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें जवाबदेही तय करने की व्यवस्था नहीं है। शिथिलता बरती जाने के कारण इस कानून की धारा-4 प्रायः प्रभावहीन हो चुकी है। धारा-4 में यह प्रावधान है कि सभी सरकारी विभाग विभागीय जानकारियां इंटरनेट व सूचना एवं संचार के अन्य माध्यमों पर इस प्रकार पेश करेंगे कि वह सर्वसुलभ हो और उसे देखा जा सके। यह व्यवस्था वर्ष 2005 में, इस अधिकार के लागू होने के वर्ष में ही सुनिश्चित हो जानी थी, किन्तु इस व्यवस्था को पूरा आकार नहीं दिया जा सका। चूंकि जवाबदेह अधिकारी को दंडित करने का कोई प्रावधान इस कानून में नहीं है, अतएव इस दिशा में सक्रियता नहीं दिखाई जा रही है। इस शिथिलता के कारण लंबित आपत्तियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। यदि नेट या अन्य माध्यमों पर सारी सूचनाएं मिल जाएं, तो तमाम आपत्तियों का निपटान स्वतः ही हो जाए। आवश्यकता इस बात की है कि धारा-4 के संदर्भ में शिथिलता बरतने वालों को दंडित करने का प्रावधान बनाया जाए, ताकि सूचनाओं और जानकारी को सार्वजनिक करने के संबंध में सभी विभाग अद्यतन रहें। दंड का प्रावधान न होने से इस कानून की धार कुंद हुई है। 

इस कानून से जुड़ी एक विसंगति यह भी है कि सरकार ने कानून बना तो दिया, किन्तु इसे लागू करने के बाद से इसके ढांचे को पर्याप्त रूप से विकसित करने में रुचि नहीं दिखाई। पर्याप्त ढांचागत विकास न हो पाने के कारण काम का बोझ बढ़ा है और आपत्तियों के निस्तारण में अनावश्यक रूप से देरी हो रही है। इस कानून की धारा 5 के अनुसार हर राज्य में एक मुख्य सूचना आयुक्त और अधिकतम दस सूचना आयुक्त होने चाहिए। यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बड़े राज्यों के लिए यह संख्या पर्याप्त है? यह संख्या पर्याप्त नहीं है और इसमें इजाफे की दरकार है। अन्य, संबंधित स्टॉफ एवं ढांचागत जरूरतों की भी कमी है। आपत्तियों के निस्तारण के लिए सूचना आयुक्तों के यहां कोई अधिकतम अवधि तय न किए जाने से भी लंबित मामलों में इजाफा हो रहा है। एक तरफ तो सूचनाधिकारी के लिए अधिकतम 30 दिन और प्रथम अपीलीय अधिकारी के लिए अधिकतम 45 दिन की समय-सीमा तय की गई है, तो दूसरी तरफ सूचना आयुक्तों को इस दायरे में नहीं लाया गया है। इससे आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ी हैं। इस कानून से जुड़ी एक कमी यह भी है कि यह सुरक्षित भी नहीं है। देश के कई प्रांतों में सूचना कार्यकर्ताओं एवं कार्यकत्रियों पर हमले किए जाने एवं उन्हें जान से मारने की घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। 

इस अधिकार की धारा 19(1) भी कमजोर है। इस धारा के तहत लोक सूचना अधिकारी के निर्णय के खिलाफ उसी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी के यहां अपील की व्यवस्था है। चूंकि सूचना अधिकारी और अपीलीय अधिकारी एक ही विभाग के होते हैं, 

सला उनमें साठ-गांठ की पूरी गुंजाइश रहती है। इस कानन में लोक सचना अधिकारी द्वारा लापरवाही व शिथिलता बरतने पर तो जर्माने का प्रावधान है, किन्तु अपीलीय अधिकारी के विरुद्ध ऐसा कोई प्रावधान न होने से कई मामलों में यह विभागीय कमियों को छिपाने में कठोर रक्षा कवच की भूमिका अपनाने लगा है। इस कमी को अतिशीघ्र दूर किए जाने की जरूरत है, क्योंकि यह कमी एक अच्छे कानून को पंगु बनाने का काम कर रही है। 

“इस कानून ने ‘सुशासन’ की अवधारणा को साकार करने में यथेष्ट योगदान दिया है। सरकारी काम-काज में पारदर्शिता बढ़ी है, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है।” 

सूचना के अधिकार से जुड़ी एक विडंबना यह भी है कि हमने यह अधिकार तो जनता को दे दिया, किन्तु इस अधिकार की आत्मा के विपरीत पहले से विद्यमान 1923 के सरकारी गोपनीयता कानून को समाप्त नहीं किया। इससे विरोधाभास की स्थिति निर्मित हई है। हालांकि सूचना अधिकार की धारा 22 में यह प्रावधान है कि इस कानून को सरकारी गोपनीयता कानून के संदर्भ में वरीयता दी जाएगी, किन्तु शासकीय गोपनीयता कानून के उल्लंघन की दशा में चूंकि दोषी अधिकारी को चार साल के दंड का प्रावधान है, अतएव सूचना न देने के इच्छुक अधिकारी इसका इस्तेमाल ढाल की तरह करते हैं। इस कानून का खौफ भी उनमें रहता है। पारदर्शिता के मार्ग में यह कानून अवरोधक की तरह है, अतएव सूचना के अधिकार को अधिक प्रभावी व कारगर बनाने के लिए इसे समाप्त किया जाना ही श्रेयस्कर है। जहां तक गोपनीयता का सवाल है, तो सूचना के अधिकार में समाज और राष्ट्रहित में कतिपय जानकारियों को सार्वजनिक 

न किए जाने का भी निर्देश है। ऐसे में शासकीय गोपनीयता कानन का अब औचित्य भी नहीं रहा। _ यह एक अच्छी बात है कि हमारे देश में सूचना के अधिकार से जुड़ी खामियों को दूर किए जाने की दिशा में शुरुआत हो चुकी है। इस अधिकार से जुड़ी ‘असुरक्षा’ की खामी को दूर करने के उद्देश्य से सरकार की तरफ से ‘व्हिसिल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2011’ के रूप में एक नेक पहल की गई है। इसमें अपराधों का जनहित के लिए खुलासा या प्रकटीकरण करने वाले व्यक्ति को पर्याप्त वैधानिक संरक्षण प्रदान किए जाने का प्रावधान है। अधिनियम के प्रावधानों के तहत शिकायतकर्ता की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी तथा गोपनीयता का उल्लंघन करने वाले को 3 वर्ष तक के कारावास का दंड तथा 50 हजार रुपये जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। इसमें झूठी शिकायत करने वाले व्यक्ति के लिए भी दंड की व्यवस्था की गई है। यह एक अच्छी पहल है। सूचना के अधिकार कानून को अधिक सशक्त, उपयोगी एवं असरदार बनाने के लिए यह आवश्यक है कि इसके कमजोर पक्षों को सबल बनाया जाए। इस दिशा में सरकार को तत्परता का परिचय देना होगा। 

अब तक इस कानन ने ‘सशासन’ की अवधारणा को साकार करने में यथेष्ट योगदान दिया है। सरकारी काम-काज में पारदर्शिता बढ़ी है, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा है। विकास को गति मिली है, तो इस कानून के प्रति जनविश्वास बढ़ने से जनतंत्र को भी बल मिला है। इस कानून के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है, तो इसकी वजह से सरकारी तंत्र में जवाबदेही बढ़ी है। ये उपलब्धियां एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभता का प्रतीक हो सकती हैं। 

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