रिक्शा चालक पर निबंध

रिक्शा चालक पर निबंध

रिक्शा चालक पर निबंध-Essay on rickshaw driver

मेरे एक संबंधी अस्पताल में भर्ती थे। उनकी सहायता हेतु मुझे और मां को अस्पताल जाना जरूरी था। माघ की कड़कड़ाती ठंड में सुबह ही हम लोग घर से निकल पड़े। कुछ ही कदम आगे बढ़े होंगे कि ठंड से हाथ-पांव जवाब देने लगे। सवारी की खोज में हम लोग इधर-उधर देखने लगे, क्योंकि समय पर आज अस्पताल पहुंचना जरूरी था। तभी फटे-मैले कपड़ों में एक हट्टा-कट्टा नौजवान रिक्शा लेकर आ गया। वह बीड़ी पीते हुए गुनगुना रहा था 

बाबू, मैं हूं रिक्शा वाला, बोझ-सवारी ढोने वाला। 

भेदभाव को दूर भगाकर, सबकी सेवा करने वाला।

हम लोग रिक्शे पर सवार हो गए। रिक्शा वाला बोला, “कहां जाना है?” 

मैंने रिक्शा चालक से सदर अस्पताल चलने को कहा। रिक्शा चल पड़ा और साथ ही शुरू हो गई रिक्शा वाले की राम कहानी

“दीदी, मैं एक मैट्रिक पास युवक हूं। घर में बूढ़े मां-बाप के अलावा एक छोटी बहन भी है। मुझे कहीं नौकरी नहीं मिली, तब लाचार होकर अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए इस रिक्शे का सहारा लेना पड़ा। यह रिक्शा किराये का है। शाम के समय मालिक को पंद्रह रुपये देने पड़ते हैं। शेष रुपये से मैं अपना एवं अपने परिवार का भरण-पोषण करता हूं। मैंने सुना है कि महानगरों में मोटर चालित रिक्शे भी चलने लगे हैं। उन रिक्शों के दाम अवश्य ही ज्यादा होंगे। साथ ही भाड़े पर लेकर चलाना भी असंभव है। कोशिश कर रहा हूं कि बैंक या किसी वित्तीय संस्था से अनुदान में मुझे भी पांव चालित रिक्शा मिल जाए, ताकि रिक्शा-मालिक के शोषण से निजात पा सकू। अगर आप लोगों की पैरवी हो, तो इस कार्य में मेरी मदद करें। ईश्वर आपका भला करेगा।” 

 इस प्रकार रिक्शा बढ़ने के साथ-साथ रिक्शा वाले की राम कहानी आगे बढ़ती है, “दीदी, समाज में हमारी कोई इज्जत नहीं है। कोई-कोई रंगदार किस्म के सवार गंतव्य पर पहुंचने के बाद भी उचित मजदूरी नहीं देते। उचित मजदूरी मांगने पर मारपीट और गाली-गलौज मिलती है।” तभी अचानक एक पुलिस वाले ने रिक्शे का हैंडिल थाम लिया और दो बेंत लगाकर रिक्शा चालक से बोला, “कल की सलामी अभी तक नहीं दी, चोर कहीं का!” फिर वह रिक्शे की हवा खोलने के लिए झुक गया। 

हमारे काफी अनुनय-विनय पर पुलिस वाले ने रिक्शा चालक को धमकी देकर छोड़ दिया। मैंने रिक्शा वाले से पूछा, “यह सलामी क्या है?” 

रिक्शा चालक ने बताया, “दीदी, ये पुलिस वाले हम लोगों के लिए कंस और रावण के समान हैं, जो सलामी के रूप में नित्य कुछ रुपये लेकर मुझ जैसे मेहनतकशों का खून चूसा करते हैं।” 

पुलिस की बेंत खाकर एवं गाली सुनकर रिक्शा चालक ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर बिना किसी हीनता के आगे बढ़ चला। ऐसा लग रहा था कि बेंत और गालियों का रिक्शा चालक पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ा। ऐसी परिस्थिति में मैं ‘रामचरित मानस’ की इन पंक्तियों को गुनगुनाने लगी 

सबके प्रिय सबके हितकारी। 

दुख-सुख सरित प्रशंसा गारी॥

अनुरोध करने पर रिक्शा चालक ने तेजी से रिक्शा चलाते हुए हम दोनों को अस्पताल पहुंचा दिया। वहां रोगी की हालत गंभीर थी। डॉक्टर के अनुसार रोगी को खून की आवश्यकता थी। हट्टा-कट्टा रिक्शा चालक अब भी वहां मौजूद था। उसके सामने खून देने का प्रस्ताव रखने पर वह तुरंत बिना किसी मोल-तोल के सहर्ष खून देने को तैयार हो गया। इस प्रकार रोगी की जान बच गई। रिक्शा चालक अपनी मजदूरी पाकर प्रसन्नचित्त लौट गया। उसके जाने के बाद मैं सोचने लगी, ‘क्या इसके रक्त की कीमत लगाई जा सकती है?’ 

चाहे जेठ की आग उगलती धूप हो अथवा सावन-भादों की मूसलाधार बारिश या माघ की कड़कड़ाती ठंड-रिक्शा वाला हमेशा समाज की सेवा में तत्पर रहता है। अतएव समाज को भी इन्हें आदर की दृष्टि से देखना चाहिए।

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