आरक्षण पर निबंध | Essay on Reservation In Hindi

आरक्षण पर निबंध

आरक्षण : सही या गलत

भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्थिति को देखते हए सन 1950 में इस बात की व्यवस्था की थी कि जो जातियां या समुदाय सदियों से पिछड़े हुए हैं तथा उच्च जातियों द्वारा शोषण के शिकार होते रहे हैं, उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से ऊपर उठाने के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए। ऐसे में राजनीति के क्षेत्र-लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में इन जातियों के लिए स्थान आरक्षित किए गए। आरंभ में यह व्यवस्था अनुसूचित जातियों के लिए 18 प्रतिशत और जनजातियों के लिए 47 प्रतिशत की गई थी, जो अभी तक चल रही है। 

जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 7 अगस्त, 1990 को अपने उप-प्रधानमंत्री देवी लाल को नीचा दिखाने के लिए वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग की रिपोर्ट रातो-रात लागू कर दी, जिसके पक्ष और विपक्ष में देश में एक तूफान उठ खड़ा हुआ। आयोग के अनुसार केंद्रीय सेवा और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत स्थानों के आरक्षण की घोषणा कर दी गई। सवर्ण जाति के लोगों ने इस नीति के विरोध में हिंसा का रास्ता अपनाया, परंतु सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। 

इस प्रश्न पर शायद ही कोई असहमत हो कि आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों की दशा सुधारने के लिए यथासंभव प्रयास किया जाना चाहिए। किंतु ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, जिससे किसी व्यक्ति की कार्य कुशलता, सामाजिक न्याय या राष्ट्रहित प्रभावित हो । केवल जाति के आधार पर वर्तमान आरक्षण नीति से सामाजिक न्याय का जो स्वप्न हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने देखा, वह पूरा नहीं हो सकेगा। देश में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं, जहां पिछड़ी जाति के समृद्ध लोग रहते हैं, जबकि उनकी तुलना में सवर्ण जाति के लोग निर्धन और लाचार हैं। ऐसी दशा में उन समृद्ध एवं प्रभावशाली पिछड़े लोगों के पक्ष में और निर्धन सवर्णों के विरुद्ध भेदभाव करना कहां का न्याय है? 

यह बात भी ध्यान रखने की है कि मंडल आयोग ने जिन पिछड़ी जातियों को आरक्षण की सीमा रेखा में लिया है, वह निर्धारण सही नहीं है। अनेक राज्यों में एक ही जाति के लोग एक समान सामाजिक स्थिति में नहीं हैं। कुछ जातियां जो बिहार में पिछड़ी जाति में आती हैं, वे उत्तर प्रदेश में सवर्णों के अंतर्गत हैं। अतः पूरे भारतवर्ष में एक जाति को किस वर्ग में सम्मिलित किया जाए-मंडल आयोग के पास इसका सही पैमाना नहीं था। 

1947 से पूर्व हुई जनगणना को मंडल आयोग ने जो आधार माना, वह गलत था। स्वतंत्रता के बाद जातियों के आर्थिक और सामाजिक रूप में काफी परिवर्तन आया है। श्री नरसिम्हा राव ने प्रधानमंत्री बनने के बाद आरक्षण के बारे में अपना अलग ही फॉर्मूला प्रस्तुत कर दिया। आरक्षण का बेताल पुनः पेड़ से जा लटका। वातावरण में एक बार फिर तनाव उत्पन्न हो गया। 

आरक्षण की वर्तमान नीतियां वास्तव में अनेक खतरों से भरी हुई हैं। आरक्षण नीति द्वारा जिन लोगों के लिए पद आरक्षित कर दिए जाते हैं, उनमें पूर्णतः प्रतियोगिता की भावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार आरक्षण के चलते अनुपयुक्त व्यक्ति का भी चुनाव हो जाता है। यदि यही व्यवस्था चलती रही, तो प्रतिभाशाली और परिश्रमी युवकों को कार्य करने के अवसर नहीं मिल सकेंगे। सरकारी नौकरी मृग-मरीचिका बनकर रह जाएगी। राष्ट्र को अपने कार्यों का संपादन करने के लिए सर्वोत्तम प्रतिभा की आवश्यकता होती है और यह तभी उपलब्ध होगी, जब सभी युवकों को कठिन प्रतियोगिता की अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। साथ ही साथ चयन प्रक्रिया पूर्णरूपेण निष्पक्ष हो, जिससे प्रतिभा को सही सम्मान तथा स्थान मिल सके। 

आरक्षण प्रतिभाशाली युवकों को कुंठित कर रहा है। यह जिस रूप में वर्तमान समय में लागू है, भारत के लिए घातक है। एक व्यक्ति सिर्फ इसलिए पदोन्नत कर दिया जाता है कि वह किसी जाति विशेष से संबंधित है, जबकि उससे ज्यादा परिश्रमी और प्रतिभावान व्यक्ति इसलिए पदोन्नति नहीं कर पाता कि वह किसी सवर्ण जाति का है। इससे कार्य करने की शैली बदलती जा रही है। क्या यह आरक्षण पद्धति कठिन परिश्रम को हतोत्साहित नहीं करेगी? जिस देश में पुरुषार्थ की कद्र न हो, उसे भगवान भी नहीं बचा सकता। 

यह बात तो निर्विवाद है कि पिछड़ी जातियों और निर्धनों का उत्थान किया जाए। जाति पर आधारित आरक्षण से उनका भला नहीं हो सकेगा। क्योंकि इस प्रकार के आरक्षण का लाभ पिछड़ी जाति के संपन्न लोग हड़प जाएंगे। यदि राजनीतिज्ञ सच्चे मन से पिछड़े वर्ग का उत्थान करना चाहते हैं, तो उन्हें पिछड़ेपन की समस्या का मूल खोजना होगा। इसका पहला उपाय यह है कि कानून द्वारा जाति प्रथा को समाप्त कर दिया जाए। पदों के लिए निर्धारित प्रार्थना पत्रों में से जाति का कॉलम हटा दिया जाए और साक्षात्कार आदि के समय जाति पूछने पर रोक लगे। इसके अतिरिक्त प्रत्येक गांव, कस्बा या नगर के स्तर पर निर्धन, दलित और वंचित बच्चों का पता लगाकर सरकार की ओर से उनकी शिक्षा की सर्वोत्तम व्यवस्था की जाए। बच्चों की रुचि और अभिरुचि के परीक्षण के बाद उनके लिए विशेष शिक्षण संस्थानों का प्रबंध किया जाए, जिससे युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी कराई जा सके। 

नौकरी के अतिरिक्त अन्य आजीविका अर्जित करने के विकल्प भी खोजे जाएं। शिक्षा को सबके लिए अनिवार्य रूप से सुलभ कराया जाए और आरक्षण का लाभ एक परिवार को एक ही बार दिया जाए। अच्छी नौकरी वालों के बच्चों को यह लाभ न मिले। ये सब उपाय साथ-साथ चलाने होंगे, क्योंकि देश जो विकास की ओर अग्रसर है, इतना समय खोने की स्थिति में नहीं है, अत: नित्य नये प्रयोग किए जाएं। राजनीतिज्ञों को भी जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर इस बारे में नीतियों का निर्धारण करना चाहिए।

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