आरक्षण पर निबंध |Essay on Reservation in Hindi

आरक्षण पर निबंध

आरक्षण पर निबंध |Essay on Reservation in Hindi

आरक्षण का अभिप्राय कुछ दुर्बल व्यक्तियों को सशक्त व्यक्तियों से बचाकर पदों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है. भारत में सामाजिक एवं धार्मिक विषमताओं को ध्यान में रखते हुए यह उचित समझा गया है कि दुर्बल सामाजिक वर्गों को सबल वर्गों से बचाकर कुछ सरकारी नौकरियाँ, संसद एवं राज्य विधानमण्डलों में स्थान प्रदान किए जाए. इसके पीछे संविधान निर्माताओं का उद्देश्य समाज के सामाजिक स्तरीकरण में निम्न कहे जाने वाले वर्गों, जोकि शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए थे, की आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षिक स्थिति को सुधारना था. उनका विचार था कि समाज के ये वर्ग वर्षों से सामाजिक स्तरीकरण के कारण पद्दलित एवं शोषित रहे हैं. अतः इनका सर्वांगीण विकास कर व उन्नयन कर समाज में प्रतिष्ठा एवं सम्मानजनक स्थान दिलाना ही सामाजिक न्याय की स्थापना होगी. इस सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए आरक्षण को माध्यम बनाया गया. सरकारी नौकरियों में इन वर्गों को आरक्षण प्रदान करने के पीछे तर्क यह था कि यह वर्ग सामाजिक रूप से पिछड़ा होने के कारण शैक्षिक रूप से भी पिछड़ा हुआ है, जिसके कारण अन्य सामाजिक वर्गों की तुलना में यह नौकरियों में खुली समान प्रतियोगिताओं में सफल नहीं हो पायेंगे. इस दुर्बल वर्ग के लिए नौकरियों में स्थान सुनिश्चित करने के लिए यह स्वीकार किया गया है कि कुछ स्थानों को केवल इनके लिए सुरक्षित किया जाए तथा इनके लिए आयु आदि मानकों में भी सामान्य अभ्यर्थियों की तुलना में शिथिलता प्रदान की जाए.

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य 

सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था स्वतन्त्र भारत में ही नहीं अपितु स्वतन्त्रता से पूर्व भी यहाँ लागू थी. 1919 के भारत सरकार अधिनियम के लागू होने के बाद भारत के मुसलमानों ने भारत में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण की माँग की. इस आरक्षण की माँग के दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार ने 1925 में सीधी भर्ती होने वाली सरकारी नौकरियों में 33 प्रतिशत स्थान अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षित कर दिए. आरक्षण की इस व्यवस्था को भारत सरकार के गृह विभाग ने 4 जुलाई, 1934 को एक प्रस्ताव द्वारा एक निश्चित आकार प्रदान किया. अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित इस कोटे में से मुसलमानों के लिए 25 प्रतिशत स्थान और 8 प्रतिशत स्थान एंग्लो इण्डियन समुदाय के लिए आरक्षित किए गए. इसके अतिरिक्त अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिए 6 प्रतिशत स्थानों को आरक्षित करने का प्रावधान था. 

स्वतन्त्रता प्राप्त करने के पश्चात् सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को दिया गया समस्त आरक्षण समाप्त कर दिया गया, लेकिन एंग्लो इण्डियन समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था आगामी दस वर्ष के लिए जारी रखी गई. 

मुसलमानों एवं एंग्लो इंडियन समुदाय के स्थान पर संविधान निर्माताओं ने सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था के लिए संस्तुति की जिसे स्वीकार कर लिया गया. इस सामाजिक एवं शैक्षिक पिछड़े वर्गों में अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ और पिछड़ी जातियाँ सम्मिलित हैं. राष्ट्रपति ने 1950 में एक सांविधानिक आदेश जारी करके राज्यों एवं संघीय क्षेत्रों में रहने वाली इस प्रकार की जातियाँ (अनुसूचित जातियों) की एक अनुसूची जारी की तथा इसी वर्ष राष्ट्रपति ने एक अनुसूची जनजातियों की, जोकि सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई थी की जारी की. इन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रारम्भ में सरकारी नौकरियों में और लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में (एंग्लो इण्डियन के लिए भी) प्रारम्भिक रूप से दस वर्ष के लिए आरक्षण प्रदान किया गया जिसे समय-समय पर निरन्तर रूप से दस-दस वर्ष के लिए बढ़ाया जाता रहा जो वर्तमान में भी जारी है.

संवैधानिक प्रावधान 

भारत के संविधान में समानता के मौलिक अधिकार के तहत लोक नियोजन में व्यक्ति को अवसर की समानता प्रदान की गई. अनु. 16 के अनुसार राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से सम्बन्धित विषयों में सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के अवसर की समानता प्रदान की गई है, लेकिन राज्य को यह अधिकार दिया गया है कि वह राज्य के पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों में आरक्षण के लिए व्यवस्था कर सकता है. साथ ही 77वें संविधान संशोधन द्वारा अनु. 16 में 4 क जोड़ा गया जिसके द्वारा अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के पक्ष में राज्य के अधीन सेवाओं में प्रोन्नति के लिए प्रावधान करने का अधिकार राज्य को प्रदान किया गया है. 

पिछड़े वर्ग का तात्पर्य यहाँ सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए वर्ग से है. अन्. 15 में धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध किया गया है साथ ही अनु. 15 (4) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष उपबन्ध करने का अधिकार प्रदान करता है.

अनु. 341 और 342 राष्ट्रपति को यह अधिकार देते हैं कि वह सम्बन्धित राज्य या संघ राज्य क्षेत्र में ततसम्बन्धित राज्यपाल या उप-राज्यपाल या प्रशासक से परामर्श करके लोक अधिसूचना द्वारा उन जातियों, मूल वंशों या जनजातियों अथवा जातियों, मूल वंशों या जनजातियों के भागों या उनमें समूहों के अनुसूचित जाति के रूप में उस राज्य के लिए विनिर्दिष्ट कर सकेगा (अनु. 341). इसी प्रकार राष्ट्रपति अनुसूचित जनजातियों या जनजातीय समुदायों या उनके कुछ भागों अथवा समूहों को तत्सम्बन्धित राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के लिए अनुसूचित जनजातियों के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकता है (अनु. 342). 

इस अनुसूची में संसद किसी को सम्मिलित या निष्कासित कर सकती है. अनु. 335 में संघ या राज्य की गतिविधियों से सम्बन्धित किसी पद या सेवा में नियुक्ति में प्रशासनिक कार्यकुशलता बनाये रखने के साथ-साथ अनुसूचित जातियों/जनजातियों के सदस्यों के दावों का लगातार ध्यान रखने की व्यवस्था है. 

पात्रता का आधार 

किसी वर्ग को आरक्षण प्रदान करने के लिए आवश्यक है कि-

(1) वह वर्ग सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा हो.

(2) इस वर्ग को राज्याधीन पदों पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिल सका हो. 

(3) कोई ‘जाति’ इस वर्ग में आ सकती है यदि उस जाति के 90% लोग सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हों. 

दूसरा प्रमुख विवाद का विषय यह रहा है कि कुल कितने प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जा सकता है. संविधान में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा है. लेकिन उच्चतम न्यायालय ने एम. आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्यवाद (1963) में यह निर्णय दिया कि कुल आरक्षण कुल रिक्तियों के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. मंडल आयोग की संस्तुतियों को 1991 में लागू करने पर इसे उच्चतम न्यायालय की विशेष संविधान पीठ ने भी यह निर्णय दिया कि कुल आरक्षण कुल रिक्तियों के पचास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. 

अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए प्रावधान 

1955 से सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण का लाभ मिल रहा है. उच्चतम न्यायालय की विशेष संविधान पीठ ने 1992 में यह निर्णय दिया कि आरक्षण केवल प्रारम्भिक नियुक्तियों तक ही सीमित है. अतः प्रोन्नति में आरक्षण नहीं किया जा सकता है तथा जहाँ लागू है वहाँ अगले पाँच वर्ष (16 नवम्बर, 1997) तक लागू रहेगा. प्रोन्नति में आरक्षण अनु. 335 के अनुसार प्रशासन में कार्यकुशलता के हित में नहीं है. 

सतहत्तरवें (77) संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 के द्वारा अनुच्छेद 16 में एक नया खण्ड (4 क) जोड़ा गया, जिसके द्वारा यह निर्धारित किया गया कि अनुसूचित जाति तथा जनजातियों के किसी वर्ग के लिए जिसका राज्य की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं हुआ है, प्रोन्नति में आरक्षण मिलता रहेगा. 

19 सितम्बर, 1999 को उच्चतम न्यायालय ने एक वाद में निर्णय देते हुए यह व्यवस्था दी कि आरक्षित कोटे से नौकरी प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी प्रोन्नति के मामले में सामान्य श्रेणी के कर्मचारियों से ऊपर वरिष्ठता पाने के हकदार नहीं हो सकते. संविधान का अनु. 16 (4) ऐसा कोई मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करता.. 

2000 में संसद ने बानवेवाँ संविधान संशोधन पारित कर दिया. इसके द्वारा संविधान के अनु. 16 (4)-ए में संशोधन कर पुनः अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिए प्रोन्नति में आरक्षण की सुविधा प्रदान की गई है.

अति पिछड़े वर्ग के लिए प्रावधान 

सर्वप्रथम काका कालेलकर की अध्यक्षता में एक पिछड़ी जाति आयोग का गठन 1953 में किया गया, जिसने 1955 में अपना प्रतिवेदन दिया. इसकी रिपोर्ट लागू नहीं हुई. 1977 में जनता सरकार ने तत्कालीन संसद बी. पी. मंडल की अध्यक्षता में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग नियुक्त किया जिसने दिसम्बर 1980 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी, लेकिन तब यह लागू नहीं हो सकी. 

13 अगस्त, 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार ने सरकारी सेवाओं में 27% आरक्षण लागू कर दिया. आरक्षण के इस निर्णय का जनता में अत्यधिक विरोध हुआ तथा उच्चतम न्यायालय में याचिकाएँ दायर की गई. उच्चतम न्यायालय ने इस कार्यपालिका आदेश पर अक्टूबर 1990 को मुकदमे का निर्णय होने तक रोक लगा दी. 1991 में कांग्रेस फिर सरकार बनाने में सक्षम हुई, तो पी. वी. नरसिंह राव की सरकार ने 13 अगस्त, 1991 को एक कार्यपालिका आदेश के द्वारा पिछड़े वर्गों को 27% तथा उच्च वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए 10% आरक्षण की व्यवस्था की. उच्चतम न्यायालय में इन आदेशों को चुनौती दी गई. उच्चतम न्यायालय की विशेष संविधान पीठ ने 6-3 के बहुमत से निर्णय देते हुए वी. पी. सरकार के कार्यपालिका आदेश को वैध बताया, लेकिन विहित शर्तों को मानना अनिवार्य बताया गया. पी. वी. नरसिंह राव के आदेश को जिसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान किया गया था अवैध माना गया. निर्णय के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु इस प्रकार हैं- 

(1) अनु. 16 (4) अनु. 16 (1) का उदाहरण है, अपवाद नहीं. 

(2) जो वर्ग अनु. 15 (4) में नहीं आते वह अनु. 16 (4) के अधीन पिछड़े वर्ग में आयेंगे. पिछड़े वर्ग का तात्पर्य केवल अनुसूचित जाति और जनजाति ही नहीं है. 

(3) आर्थिक आधार पर पिछड़ेपन की कसौटी नहीं है.

(4) पिछड़े वर्गों में सम्पन्न लोगों (क्रीमीलेयर) को निकालकर आरक्षण दिया जाये.

(5) आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% हो सकती है.

(6) पिछड़े वर्गों को पिछड़े तथा अन्य पिछड़े वर्गों में विभाजित किया जा सकता है. 

(7) प्रोन्नति में आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा.

राजनीतिक सौदेबाजी 

संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की वकालता और व्यवस्था भले ही सकारात्मक सोच के कारण की हो, लेकिन स्वतन्त्र भारत के राजनीतिज्ञों एवं राजनीतिक दलों ने आरक्षण को राजनीति का मुद्दा बना दिया. आरक्षण की मूल भावना को तिरोहित कर आरक्षित जाति को चुनावों की राजनीति में अपनी ओर मतदान कराने के लिए हर सम्भव प्रयास इनके द्वारा किए जाते रहे. कांग्रेस दल इस आरक्षित वर्ग के लिए निरन्तर आरक्षण बनाए रखकर लगभग चालीस वर्ष तक इसे अपने साथ बाँधे रखने में सफल रहा. 

आरक्षण, जिसकी व्यवस्था विशेष पिछड़े वर्गों को ऊपर उठाकर समाज में समरसता लाने के लिए एक साधन के रूप में की गई थी, को राजनीतिक दलों ने मत प्राप्त करने का साधन बना लिया. अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के अतिरिक्त अन्य जातियों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए नेताओं ने उन्हें चिन्निहत कर इस ओर प्रयास किए. सर्वप्रथम इस दिशा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने प्रयास किया. मोरारजी देसाई सरकार ने बी. पी मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग गठन किया जिसे पिछड़े वर्गों को आरक्षण के लिए संस्तुति देने को कहा गया. यद्यपि काका कालेलकर की अध्यक्षता में भी एक इसी प्रकार का आयोग 1953 में गठित किया गया था, लेकिन उसकी संस्तुतियों को माना नहीं गया. 

दुर्भाग्य से जनता पार्टी की सरकार चली गई और इस आयोग की रिपोर्ट लागू नहीं हो सकी. वी. पी. सिंह की सरकार ने पिछड़े वर्गों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए इस मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया, जिसका हिंसक विरोध भी हुआ, लेकिन विरोधों के बाद भी यह लागू हो गया. उसके बाद भी पी. वी. नरसिंह राव सरकार ने इसे लागू किया. अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भी राजनीतिक दलों के प्रयास सदैव चलते रहे, लेकिन साथ ही पिछड़े वर्गों को आरक्षण देकर नए वोट बैंक बनाने के प्रयास प्रारम्भ हो गए, राजनीतिक दलों की सरकारों में अब यह प्रतिस्पर्धा हो गई कि अनेक जातियों को इस वर्ग में सम्मिलित कर उन्हें आरक्षण दिलवाने का श्रेय स्वयं लिया जाए, जिससे वह उनके वोट बैंक बन जाए. राज्यों में यह प्रतिस्पर्धा अति तीव्र गति से गतिमान रही. राजस्थान में जाटों को आरक्षण, उत्तर प्रदेश में मुख्यमन्त्री राजनाथ सिंह द्वारा पिछड़ों में भी अति पिछड़ों को आरक्षण प्रदान करना इसका ज्वलंत उदाहरण है. आरक्षण को समाप्त करने अथवा कम करने का साहस किसी भी राजनीतिक दल अथवा नेतृत्व में नहीं है. अपितु इसको और अधिक-से-अधिक बढ़ाने की लालसा दिखाई देती है. ऐसा लगता है कि वोट लेने के लिए आरक्षण सम्भवतः अन्तिम और एकमात्र साधन है.

पुनर्विचार करें 

आरक्षण देने के पीछे मूल भावना का दुरुपयोग यदि राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, तब इस विषय पर गम्भीर चिन्तन-मनन की आवश्यकता है. कारण यह है कि इस प्रवृत्ति से समाज में आरक्षित एवं अनारक्षित दो वर्ग बनते जा रहे हैं जिनमें मनोवैज्ञानिक आधार पर परस्पर वैमनस्यता धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है जो एक लम्बे समय बाद परस्पर संघर्ष को जन्म दे सकती है. संविधान निर्माता भी इस दुष्परिणाम की कल्पना कर सके थे इसलिए उन्होंने इसे एक अल्प समय के लिए ही रखना उचित समझा सदैव के लिए नहीं. 

लेखक का व्यक्तिगत सुझाव यह है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण के लिए विचार किया जाना चाहिए न कि केवल कुछ विशेष जातियों या वर्गों के विषय में. कल्याण का आधार व्यक्ति होना चाहिए न कि जाति. इसके लिए आवश्यक है कि समाज के कमजोर व्यक्तियों का निर्धारण उनके परिवार की आर्थिक स्थिति एवं शिक्षा के स्तर को आधार बनाकर किया जाना चाहिए. 

सामाजिक न्याय करते करते अन्य वर्गों के साथ भी अन्याय न होता चला जाए इसका ध्यान रखना भी अनिवार्य है. लेखक का मत है कि केवल आरक्षण ही सामाजिक न्याय दिला सकता है. यह सोचना गलत है. अतः आरक्षण के अतिरिक्त और कोई अन्य विकल्प खोजा जाना चाहिए जो सभी वर्गों की उन्नति करे. न्याय प्रदान करे और भाईचारे से युक्त समाज की स्थापना कर सके.

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