भारत में पुनर्जागरण पर निबंध |Essay on Renaissance in India

भारत में पुनर्जागरण पर निबंध

भारत में पुनर्जागरण (Re-awakening in India) 

उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय और यूरोपीय संस्कृतियों एवं आदर्शों के संघर्ष के फलस्वरूप भारतीय जीवन में नवजागरण का स्पन्दन हुआ. इसी को लक्ष्य करके इस काल को ‘पुनर्जागरण’ काल कहा जाता है. सन् 1857 के जन-आन्दोलन अथवा विद्रोह के उपरान्त भारत में अंग्रेजी राज्य की प्रतिष्ठा हुई. इससे उन शक्तियों का ह्रास हुआ, जो मध्यकालीन सामाजिक व्यवस्था एवं संस्कृति की पोषिका थीं. पाश्चात्य संस्कृति तथा उसके साथ आने वाले आधुनिक विज्ञान और साहित्य ने अपने पंख फैलाये तथा उनके द्वारा हमारे देश की विचारधारा एवं देशवासियों के जीवन-मूल्य प्रभावित हुए. आधुनिक युगीन चिन्तन पद्धति, औद्योगिक क्रान्ति और सांस्कृतिक नवचेतना के संस्पर्श ने भारत की सुप्त आत्मा को जगाया और उसमें नवजीवन का संचार किया. इसकी अभिव्यक्ति विविध रूपों में हुई. 

नवचेतना का अभ्युदय 

सन् 1857 के स्वतन्त्रता आन्दोलन के साथ भारत में राजनीतिक चेतना का सूत्रपात हुआ. इस युग में देशभक्ति और राजभक्ति प्रायः अभिन्न रही. इंग्लैण्ड की महारानी विक्टोरिया के शासन की स्थापना के उपरान्त कुछ समय तक भारत का प्रबुद्ध वर्ग शासन से प्रार्थना करके अपनी स्थिति में सुधार और राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति की आशा करता रहा, परन्तु जब इस प्रकार की आशाएँ-दुराशाएँ मात्र सिद्ध हुई, तब राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए कोई सक्रिय एवं प्रभावकारी मार्ग अपनाने की बात चली. इसी सन्दर्भ में सन् 1885 में इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना की गयी. इटली के स्वतन्त्रता युद्ध, आयरलैण्ड के होमरूल आन्दोलन तथा फ्रांस की राज्य क्रान्ति के इतिहास ने जनता में शासन विरोधी भावनाओं को बल प्रदान किया. 

विज्ञान के आगमन ने विश्लेषणात्मक चिन्तन को स्फूर्ति प्रदान की तथा पाश्चात्य साहित्य के अध्ययन ने ज्ञान के नवीन क्षिजित का उद्घाटन किया. फ्रांस की राज्य क्रान्ति, इंग्लैण्ड की औद्योगिक क्रान्ति आदि से सम्बन्धित विस्तृत जानकारी ने अपनी स्थिति परिस्थिति के प्रति असन्तोष के भाव उत्पन्न किए और जातीयता (राष्ट्रीयता) के भाव उद्भूत किए. फलस्वरूप समाज सुधार सम्बन्धी एवं सांस्कृतिक आन्दोलनों का सूत्रपात हुआ. 

विदेशी शासन, पाश्चात्य साहित्य, विश्वव्यापी जागृति एवं वैज्ञानिक चिन्तन के आगमन ने भारतीय मानस को झकझोर दिया था और देश में एक नये युग का सूत्रपात हुआ, जिसे हम ‘भारतीय पुनर्जागरण का युग’ कहते हैं. उस युग की प्रेरणाएँ डॉ. श्रीमती एनी बेसेण्ट के इस कथन के अनुरूप थीं कि “भारत की स्वतन्त्रता, विश्व राष्ट्रों के मध्य स्वाभिमान की 

प्राप्ति, भारत के प्राचीन गौरव का पुनराहरण, अधिक श्रेष्ठ भविष्य का निर्माण—क्या ऐसे लक्ष्य नहीं हैं जिनके लिए हम श्रम करें, कष्ट सहें और यदि आवश्यकता आ जाये, तो प्राणों की बाजी लगा दें?”

पुनर्जागरण 

युगीन परिस्थितियाँ परिवर्तन के लिए कसमसा रही थीं. पुनर्जागरण का शिशु जन्म लेने के लिए व्याकुल था. प्रकाश की किरण अन्धकार की घटा को फाड़कर बाहर आकर अपना आलोक विकीर्ण करने के लिए आकुल थी. परिस्थितियाँ परिवर्तन एवं प्रगति की प्रेरणाएँ प्रदान कर रही थीं. 

भारत के ‘पुनर्जागरण’ हेतु जो प्रयत्न किये गये और जिनके फलस्वरूप भारत प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज 

बंगाल के राजा राममोहन राय ने सबसे पहले सामाजिक कुरीतियों एवं रूढ़ियों के विरुद्ध सशक्त आवाज उठायी. भारतीय सामाजिक सुधार का सर्वाधिक श्रेय वस्तुतः उन्हीं को प्राप्त है. राजा राममोहन राय ने ही कठिन श्रम करके लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा कानून बनवाकर सन् 1829 में सती प्रथा को बन्द कराया. इस प्रकार आधुनिक समाज-सुधार का श्रीगणेश ‘सती-प्रथा उन्मूलन’ कानून से होता था. राजा राममोहन राय ने मूर्ति-पूजा तथा प्रचलित अंधविश्वासों के विरुद्ध कई पुस्तकें लिखी तथा नारियों की दशा सुधारने के लिए गम्भीर प्रयत्न किये. विधवाओं के पुनर्विवाह के पक्ष में सबसे पहले उन्होंने ही आवाज उठायी. बहु विवाह, छुआछूत आदि कुप्रथाओं की भर्त्सना भी सर्वप्रथम उन्होंने ही की. उन दिनों समुद्र यात्रा एवं विदेश-गमन धर्म-विरुद्ध समझे जाते थे. राजा राममोहन राय ने उसके विरुद्ध भी आवाज उठायी और सन् 1830 में इंगलैण्ड और फ्रांस की यात्रा भी की. वह वस्तुतः पाश्चात्य शिक्षा के प्रशंसक और समर्थक थे तथा प्रचलित कुरीतियों एवं अन्धविश्वासों के प्रबल विरोधी थे. उनको समाज-सुधार आन्दोलन का जन्मदाता एवं प्रवर्तक कहना सर्वथा उपयुक्त है. 

अपने सुधारवादी विचारों को गति प्रदान करने के लिए राजा साहब ने सन् 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की. ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, केशवचन्द्र सेन, देवेन्द्र नाथ ठाकुर, कवीन्द्र रवीन्द्र, प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बोस, लॉर्ड सिन्हा सदृश महानुभाव ब्रह्म समाज के सदस्य एवं पदाधिकारी रहे थे. 

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयत्नों के फलस्वरूप लड़कियों के विवाह की अवस्था कम से कम 10 वर्ष करने वाला कानून बनाया गया तथा विधवा विवाह को वैध घोषित किया गया. इस दिशा में आवाज उठाने वाले अन्य महानुभाव थे—श्री मलावरी, न्यायमूर्ति गोविन्द रानाडे तथा बम्बई के नटरंजन, ‘ब्रह्म समाज’ के तत्त्वावधान में अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित की गयीं जिन्होंने भारत के सांस्कृतिक नवजागरण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया.

स्वामी दयानन्द सरस्वती और आर्य समाज 

सन् 1850 के आस-पास स्वामी दयानन्द सरस्वती का आविर्भाव हुआ. धर्म के नाम पर समाज में प्रचलित रूढ़ियों को समाप्त करके हिन्दू धर्म एवं हिन्दू समाज की रक्षा करना तथा वेद और वैदिक संस्कृति की रक्षा करना उनका उद्देश्य था. उन्होंने वेदों और उपनिषदों की शिक्षाओं का प्रचार किया तथा मूर्ति पूजा का खण्डन किया. स्वामीजी ने शास्त्रार्थ द्वारा मुल्लाओं, मौलवियों, पादरियों, ब्राह्मण, पुरोहितों आदि सबको पराजित किया. उन्होंने वेदों की शिक्षा को सरल बनाकर ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का प्रकाशन किया. उन्होंने पहली बार यह बात कही कि मुसलमान पहले मक्का में रखे हुए काले पत्थर को तोड़ें, तब बाद में हिन्दुओं की मूर्तियों की ओर देखें. सारांश यह है कि उन्होंने हिन्दू समाज में एक नई चेतना उत्पन्न कर दी. अपने विचारों को कार्यान्वित करने के लिए स्वामीजी ने सन् 1875 में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की. तदुपरान्त सन् 1877 में लाहौर में आर्य समाज के प्रधान कार्यालय की स्थापना की. आपकी ही प्रेरणा से गुरुकुल स्थापित किये गये. ऐंग्लो वर्नाक्यूलर शिक्षा संस्थाएँ स्थापित की गयीं, जहाँ लड़के लड़की साथ पढ़ सकते थे, अनाथालयों विधवा आश्रमों की स्थापना की गयी, आदि. आर्य समाज की शिक्षा संस्थाओं में शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी न होकर हिन्दी रखा गया. इस प्रकार आपने भारत की राष्ट्रभाषा को सुदृढ़ भाव-भूमि प्रदान दिया, विधवा-विवाह का समर्थन किया, सती प्रथा का विरोध किया. उनका निश्चित मत था कि बाल-विवाह के निषेध एवं विधवा-विवाह के प्रचलन द्वारा हम वेश्यावृत्ति को रोक सकते हैं. 

हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उनका कहना था कि हम अस्पृश्यता को समाप्त करें. तभी धर्मान्तरण रोका जा सकता है. इतना ही नहीं, उन्होंने शुद्धि-आन्दोलन चलाया और अनेक गैर हिन्दुओं को हिन्दू बनाया तथा अनेक ऐसे मुसलमानों को हिन्दू समाज में वापस बुलाया जो किसी कारणवश हिन्दू धर्म छोड़कर मुसलमान बन गए थे. कहने का तात्पर्य यह है कि सुधारवादी शिक्षित वर्ग को संकुचित सीमाओं से बाहर निकालकर वे जनसाधारण के विस्तृत क्षेत्र में ले आए और इस प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना उत्पन्न करके देश के जागरण में बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान किया. 

आर्य समाज के आन्दोलन के मूलतः दो आधार थे—राष्ट्रीयता एवं जनवाद (व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य). आर्य समाज ने मानव मात्र की समानता की घोषणा की और पराधीनता के फलस्वरूप भारतवासियों में जो हीनता की भावना उत्पन्न हो गई थी, उसके उन्मूलन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रस्तुत किया.

प्रार्थना समाज 

ब्रह्म समाज अंग्रेजियत के अनुकरण का पक्षपाती था और आर्य समाज भारतीयता का कट्टर समर्थक था. इन दो अतिवादी विचारधाराओं के मध्य मध्यमार्ग के रूप में सन् 1867 में केशवचन्द्र ने प्रार्थना समाज की स्थापना की. प्रार्थना समाज वस्तुतः ब्रह्म समाज की एक शाखा ही थी. किसी धार्मिक विश्वास पर बल न देकर यह सामाजिक कार्य में विश्वास करता था. इस समाज ने पूरी शक्ति लगाकर समाज-सुधार और समाज सेवा के कार्यक्रमों को अपनाया. इस समाज ने महाराष्ट्र के नामदेव, तुकाराम, रामदास, प्रभृति सन्तों द्वारा प्रवर्तित मानव सेवा की परम्परा को आगे बढ़ाया, अनेक स्थानों पर स्कूल खोले, धर्मशालाएँ बनवाईं, भण्डारे स्थापित किये तथा अनाथालय खोले. प्रार्थना-समाज ने सामाजिक भेद मिटाने के लिए सह-भोज, अन्तर्जातीय विवाह तथा विधवा-विवाह पर विशेष ध्यान दिया. निर्धन व्यक्तियों को शिक्षित करने के लिए स्कूल पाठशालाएँ चलायीं तथा अछूतों की उन्नति के लिए अनेक हरिजन सेवा केन्द्र स्थापित किये. इस संस्था द्वारा की जाने वाली इस सार्वजनिक उपयोगी सेवा का सर्वाधिक श्रेय श्री गोपाल कृष्ण भण्डारकर को है. विद्या एवं ज्ञानार्जन की प्रगति की दृष्टि से उन्होंने Bhandarkar Institute for Oriental Research, Poona की स्थापना की. रामकृष्ण विवेकानन्द मिशन 

इन्हीं दिनों बंगाल में एक अन्य धार्मिक आन्दोलन ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना हुई. अपने आध्यात्मिक गुरु पूज्य रामकृष्ण परमहंस की स्मृति में स्वामी विवेकानन्द ने इसकी स्थापना की थी. रामकृष्ण मिशन एक प्रकार से भक्ति-संस्था है. चण्डीदास और महाप्रभु चैतन्य देव की परम्परा में इसे रखा जा सकता है. भौतिकवादी पाश्चात्य सभ्यता से भारतवर्ष की रक्षा करने के उद्देश्य से इसकी स्थापना की गई थी. 

इस मिशन का भी उद्देश्य मानव सेवा है. छुआछूत, असमानता तथा अन्य सामाजिक अभिशापों को दूर करने के संकल्प को लेकर यह मिशन कार्य करता आ रहा है. इस मिशन के तत्त्वावधान में विभिन्न स्थानों पर अनाथालय, विद्यालय, अस्पताल आदि समाज-सेवी संस्थाएँ कार्य करती हुई देखी जा सकती हैं. 

स्वामी विवेकानन्द पर पश्चिम के व्यावहारिक जीवन दर्शन का गहरा प्रभाव पड़ा था. लोक को भुलाकर केवल परलोक की बात करना, यथार्थ की भूमि छोड़कर केवल आकाश के तारागण को देखने की बात करना उन्हें रुचिकर नहीं था. उनका कहना था कि भारतवासियों को जीवित रहने के लिए आवश्यक है कि उनकी माँसपेशियाँ लोहे की हों. भारत के निवासियों में आत्म-बल की स्फूर्ति उत्पन्न करना इस मिशन का मूलभूत उद्देश्य रहा है.

तिलक द्वारा समाज-सुधार 

बाल गंगाधर तिलक हिन्दू समाज के धार्मिक संगठन में लग गये. उन्होंने गौ वध के विरुद्ध आन्दोलन चलाया. इसके बाद उन्होंने दो उत्सव आरम्भ किये—गणपति उत्सव और शिवाजी उत्सव, ये उत्सव महाराष्ट्र में आज भी राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मनाये जाते हैं. तिलक धार्मिक नैतिकता के प्रबल समर्थक थे और स्वतन्त्रता एवं स्वराज को मानव का जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे. 

 बम्बई में थियोसोफीकल सोसाइटी ऑफ दी आर्य समाज का कार्यालय स्थापित हुआ. विकासवादी विचारधारा तथा पौराणिक संस्कृति के प्रति रुचि के कारण इस संस्था को आर्य समाज से सम्बन्ध विच्छेद करना पड़ा और सन् 1883 में इसका प्रधान कार्यालय अडियार (मद्रास) में स्थापित किया गया. विश्व बन्धुत्व का प्रचार-प्रसार एवं मानव-सेवा इसके उद्देश्य थे. सर्वधर्म समन्वय, पूर्वाग्रह रहित चिन्तन, कठमुल्लापन से मुक्ति इसके साधन-सोपान निर्धारित किये गये. इस संस्था ने शिक्षा, धर्म दर्शन, उपासना, योग, हरिजन-उद्धार आदि प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करके लोकप्रियता प्राप्त की. इतना ही नहीं, इसके सदस्यों ने स्वतन्त्रता आन्दोलन में भी भाग लिया. सोसाइटी की अध्यक्ष श्रीमती ऐनी बीसेंट इण्डियन नेशनल कांग्रेस की भी अध्यक्ष बनीं और इस रूप में उन्होंने जेल यात्रा की… 

इस सोसाइटी ने भारत की सर्वतोन्मुखी प्रगति के लिए विभिन्न प्रकार से योगदान किया. भारतीय धर्म, संस्कृति एवं इतिहास से सम्बन्धित अनेक पुस्तकें प्रकाशित की तथा भारतीय संस्कृति के प्रति प्रीति करने वाली शिक्षा का प्रचार किया. कहने की आवश्यकता नहीं है कि थियोसोफीकल सोसाइटी द्वारा स्थापित हिन्दू स्कूल ही क्रमशः विकसित होकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय बना है. इस संस्था ने शिक्षित वर्ग को विशेष रूप से प्रभावित किया और उन्हें भारतीय पद्धति के चिन्तन के प्रति उन्मुख किया. 

सन् 1905 में श्री गोपालकृष्ण गोखले ने एक अत्यन्त उपयोगी एवं सेवाभावी संस्था, सेवा समिति (Servants of India Society) की स्थापना की. इस संस्था ने अनेक समाजोपयोगी कार्यों की परम्परा डाली, जैसे—स्कूल खोले, पत्रों का संचालन किया, सहकारी संस्थाएँ स्थापित की, मेले तमाशों में स्वयंसेवक भेजकर व्यवस्था करने में प्रशासन को सहयोग दिया, समाज के स्वास्थ्य की ओर ध्यान देते हुए अनेक गंदे स्थानों की सफाई की. 

सेवा-समिति ने नारियों की दशा सुधारने के लिए, उनका उत्थान-उद्धार करने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया. इस दृष्टि से गोपालकृष्ण देवधर, आगरकर और भण्डारकर के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं. उन्होंने विधवा-विवाह का प्रचार किया और इस हेतु ‘विधवा विवाह संघ’ की स्थापना की. माता अथवा पिता द्वारा पुनर्विवाह कर लेने की स्थिति में जो बालक अनाथवत् हो जाया करते थे, उनके रहने के लिए इन्होंने एक आवास गृह स्थापित किया. आगरकर इस संस्था के प्राण थे. 

सन् 1899 में श्री कार्वे ने पूना के उद्यान में एक विधवा आश्रम की स्थापना की. आगे चलकर इसमें विधवाओं के रिश्तेदारों और अविवाहित कन्याओं को भी प्रवेश मिलने लगा. सन 1907 में इसके तत्वाधान में ‘महिला विद्यालय की स्थापना हुई. श्री रानाडे द्वारा स्थापित ‘सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन’ ने स्त्री-शिक्षा पर जोर दिया और विधवा-विवाह को प्रोत्साहन प्रदान किया. इसी सन्दर्भ में भारतवर्ष मण्डल सोसाइटी, देव समाज तथा राधास्वामी सत्संग के नाम भी महत्वपूर्ण हैं.

मुस्लिम समाज में सुधार कार्य 

यद्यपि नवजागरण देशव्यापी था, तथापि मुसलमान समाज अपने आपको भारतीयता के साथ तदाकार करने में अपनी स्वाभाविक संकोचशीलता का अनुभव कर रहा था, परन्तु फिर भी कतिपय मुसलमान नेताओं ने सांस्कृतिक एकरूपता लाने की दृष्टि से कुछ महत्वपूर्ण योगदान किया. इनमें सर सैयद अहमद खाँ का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय एवं स्मरणीय है. उन्होंने मुसलमानों में सांस्कृतिक जागृति उत्पन्न करने के लिए कई पुस्तकें लिखीं, कई पत्रिकाएँ निकाली तथा उनके अधिकारों की मांग के लिए आन्दोलन किये. शिक्षा प्रसार के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की नींव सर सैयद ने ही डाली. 

हम निःसंकोच कह सकते हैं कि हमारी सभ्यता और संस्कृति को नये रूप में विकसित करने, धार्मिक अन्ध-विश्वासों और रूढ़ियों का खण्डन करने, अज्ञान के अन्धकार को दूर करने, ज्ञान का प्रकाश लाने, ज्ञान-विज्ञान का प्रसार करने, दलितोद्धार, नारी-उत्थान करने, देश-प्रेम, राष्ट्रीयता और स्वतन्त्रता के भाव जाग्रत एवं पुष्ट करने तथा सर्वतोन्मुखी उन्नति करने की प्रेरणा प्रदान करने का श्रेय इस पुनरिण-युग को है. इसी काल में आधुनिक भारत के नव-निर्माण की आधारशिला रखी गई. पुनर्जागरण की नींव पर ही भारत के स्वातन्त्र्य आन्दोलन का स्वरूप निर्धारण किया गया एवं देश के नव-निर्माण का प्रारूप निर्धारित किया गया था. 

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