धर्म और राजनीति पर निबंध |Essay on Religion and Politics in Hindi

धर्म और राजनीति पर निबंध

धर्म और राजनीति पर निबंध |Essay on Religion and Politics in Hindi

6 दिसम्बर सन्, 1992 को अयोध्या में तथाकथित बाबरी मस्जिद का ढाँचा गिराए जाने के बाद राजनीति और धर्म के आपसी सम्बन्धों की समस्या पर नये सिरे से विचार करने की स्थिति उत्पन्न हो गई है. एक दबी हुई समस्या सामाजिक चिन्तन में उभरकर सामने आ गई हैं.

हम शुतुर्मुर्गी नीति अपनाते हुए इस समस्या को भुलाते आए हैं, और अब भी भुलाने का प्रयत्न कर रहे हैं, परन्तु हमें समझ लेना चाहिए कि इस समस्या को सुलझाना ही पड़ेगा और अपने सोच को इस सन्दर्भ में एक स्पष्ट दिशा प्रदान करनी होगी. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इस राजनीति बनाम धर्म के विषय पर विचार-विमर्श कम, और राजनीतिक नारेबाजी अधिक हुई है. 

धर्म से तात्पर्य है-मनुष्य द्वारा स्वयं अपनाये गये सही आचरण के नियम और धर्मग्रन्थों पर आधारित विचारधारा एवं सामाजिक संगठन. राजनीति का अर्थ है-शासन के सिद्धान्त और उनको मूर्त रूप देने की प्रणाली. 

धर्म की राजनीति का अर्थ है-देश का सत्ता-संगठन, देश की शासकीय प्रणाली, उसकी दंड संहिता, उसके नागरिकों के मूल अधिकार और कर्त्तव्य धार्मिक ग्रन्थों पर आधारित और धार्मिक मूल्यों द्वारा निर्धारित होंगे. कानून धर्म पर आधारित होगा और उसकी व्याख्या तथा उचित-अनुचित का निर्णय धर्माचार्यों द्वारा किया जाएगा. यह स्थिति किस प्रकार सम्भव है? 

यदि किसी देश में एक ही धर्म के अनुयायी बसते हों, तो इस प्रकार की व्यवस्था नागरिकों के मध्य भेदभाव किये बिना सम्भव हो सकती है, परन्तु यदि किसी देश में भिन्न भिन्न धर्मों के अनुयायी बसते हैं, तो वहाँ ऐसी व्यवस्था में शासन द्वारा नागरिकों के मध्य भेद-भावपूर्ण व्यवहार अवश्यम्भावी है. किसी के अधिकार कम होंगे, किसी के अधिक. यही स्थिति वहाँ भी उत्पन्न होगी जहाँ के नागरिकों का मूल धर्म एक है, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति के रूप भिन्न हैं, जैसे-ईसाइयों में प्रोटेस्टेण्ट, रोमन कैथोलिक, मैथोडिस्ट आदि, हिन्दुओं में सनातनधर्मी, आर्यसमाजी, मुसलमानों में शिया-सुन्नी, आदि. अतः धर्म की राजनीति के चलते यह सम्भव नहीं है कि शासन द्वारा भेदभाव न किया जाए.. 

स्पष्ट है कि नागरिक मात्र को समानाधिकार के पक्षधर जनतंत्र में धर्म-आधारित राजनीति सम्भव अत्यन्त कठित है. कम से कम धर्म-आधारित राजनीति में जनतंत्र का विकास सर्वथा असम्भव है. साथ ही ऐसी व्यवस्था में धीरे-धीरे नागरिक और शासन के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, क्योंकि धार्मिक ग्रन्थों पर आधारित धार्मिक मान्यताओं में परिवर्तन सम्भव नहीं है, जबकि सामाजिक परिवेश निरन्तर बदलता रहता है. धर्म-आधारित शासन सत्ताओं का इतिहास ही बताता है. इस सन्दर्भ में भारत की चर्चा करना 

अप्रासंगिक नहीं होगा. भारत में जनतांत्रिक शासन व्यवस्था अपनाई गई है. अतः उसका राजनीतिक ढाँचा धर्म-निरपेक्ष हो, यह सर्वथा स्वाभाविक भी है और उचित भी है, परन्तु वोट की राजनीति ने एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है. अल्पसंख्यक के नाम पर इस्लाम धर्म एवं ईसाई धर्म के अनुयायियों को विशेष संरक्षण, सुविधाओं, विशेषाधिकारों का प्रावधान कर दिया गया है. इसी अनुपात में शासन भेदभाव की नीति अपनाने को विवश है और इसने नागरिक और शासन के मध्य टकराव की स्थिति उत्पन्न कर दी है. 6 दिसम्बर, 1992 को अयोध्या में घटित होने वाली दुर्भाग्यपूर्ण घटना इसी ओर संकेत करती है. भेद भाव की नीति धर्म की अगली सीढ़ी जातीयता पर पहुँच गई है और टकराव की स्थिति एक सुनिश्चित रूप धारण करती जा रही है,

जनतंत्र और नागरिकों के मध्य भेदभाव में मौलिक विरोध है. अतएव जहाँ जहाँ जनतंत्र की स्थापना का संघर्ष हुआ है, वहाँ-वहाँ धर्म-आधारित सत्ता को चुनौती दी गई है और सत्ता पर धर्म के नियन्त्रण को नकारा गया है. सामन्ती शासन में तो शासक और धर्माचार्य के मध्य वैचारिक विरोध नहीं रहता है. जहाँ विरोध उत्पन्न हुआ, वहाँ सामन्ती शासन ने धर्म का स्वरूप ही बदल कर विवाद को समाप्त कर दिया जैसाकि इंगलैंड में हेनरी अष्टम के समय में हुआ. आधुनिक काल में भी जहाँ धर्मशास्त्रों द्वारा शासन नियन्त्रित हुआ है. वहाँ जनतन्त्र जड़ें नहीं पकड़ सका है. इजराइल, ईरान तथा पाकिस्तान इसके उदाहरण हैं. 

भारत में कतिपय धर्मावलम्बियों को विशेषाधिकार देकर अनजाने ही जनतंत्र को दुर्बल बनाया जा रहा है. कश्मीर में आतंकवाद तथा देश के अन्य भागों में हिंसा की प्रवृत्ति का उभार इसी ओर इंगित करते हैं. अतः हमें यह समझ लेना चाहिए कि हम जितने अंश में शासन-प्रशासन में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से धर्म सम्बन्धी पक्षपात को स्थान देते हैं, उतने ही अंशों में जनतंत्र में विश्वास नहीं करते हैं. 

जनतंत्र में किसी विचारधारा का अनुमोदन तर्क पर निर्भर करता है और धर्म में भावना या आस्था पर. यही कारण है कि धार्मिक भावनाओं को उकसाना राजनीतिक समर्थन प्राप्त करने का एक सहज एवं श्रेष्ठ तरीका बन गया है. इसमें दो लाभ होते हैं. एक तो जनता का समर्थन मिल जाता है और दूसरे जनता के लिए कुछ करने की बंदिश भी नहीं होती है, क्योंकि धर्म की रक्षा मात्र के लिए वोट प्रदान किये जाते हैं. वास्तविकता यह है कि हमारा जीवन संकट में पड़ सकता है, परन्तु हमारा धर्म संकट में नहीं पड़ सकता है, परन्तु विडम्बना यह है कि ‘धर्म संकट में है’ का नारा लगाकर ही जनता का समर्थन प्राप्त किया जाता है. 

भारत में जनता के शोषण के लिए राजनीतिक पार्टियों के पास ‘धर्म संकट में है’ के नारे के अलावा, जातिवाद का नारा, राष्ट्रीय एकता की पुकार, देश की अखंडता के संकट का हौवा आदि अनेक नारे हैं. एक विद्वान के शब्दों में, “कोई भी ऐसा प्रलोभन या वायदा, जिसके पूर्ण होने को अनुभव की कसौटी पर परखा न जा सके; जनता का समर्थन प्राप्त करने का नायाब तरीका बन जाता है.” इन सबके लिए जनतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. विरोधाभास यह है कि इस प्रकार के जन-शोषण द्वारा जनतंत्र की जड़ें मजबूत करने का सुख स्वप्न सँजोया जाता है. 

राजनीति का धर्म क्या है—अब इस पर विचार करते हैं. देश की जो राजनीतिक मान्यताएँ हैं, उनका अनुसरण करना और देश के संविधान के अनुसार देश के जो राजनीतिक उद्देश्य हैं, उनकी पूर्ति करना, यही राजनीति का धर्म होना चाहिए. भारत जैसे विशाल देश में अपने संविधान की सीमाओं में कार्य करना राजनीति का धर्म होना चाहिए. इसके बाहर जाने का अर्थ होगा-राजनीति के धर्म का उल्लंघन. इस दृष्टि से संविधान में संशोधन करते समय बहुत सोच-समझकर कार्य करना चाहिए, जहाँ तक हो यथास्थिति वाली दृष्टि अपनाई जाए, क्योंकि एक बार छूट के लेने पर छूट का अंत नहीं होता है. भारत इसका ज्वलंत उदाहरण है. प्रतिवर्ष औसतन दो संशोधन करके संविधान को अपना अनुगामी बनाकर हम क्या राजनीति के धर्म को धता नहीं बता रहे हैं ? 

सामन्ती और औपनिवेशिक विचारधाराओं में न कोई अन्तर्विरोध है और न तात्त्विक अन्तर है, क्योंकि दोनों की जड़ में सत्ता की निरंकुशता का सिद्धान्त है. सामन्ती या औपनिवेशिक सत्ता चाहे माई-बापी हो अथवा दमनकारी हो, निरंकुश शासन का ही एक रूप है. इसी कारण हमारे नेता कानूनी शासन एवं धार्मिक अनुशासन को भुलाकर विशेषाधिकार का खेल खेलते रहते हैं.

धर्म और कर्त्तव्यबोध 

संस्कृत का शब्द धर्म अपने मौलिक रूप में कर्त्तव्य का वाचक है. रिलीजन, मजहब, मत, पंथ आदि के रूप में न तो उसको अनुवादित किया जा सकता है और न इनमें किसी का उसके धर्म के समकक्ष खड़ा ही किया जा सकता है. धर्म-धर्म है. वह हमें प्रतिक्षण कर्तव्य बोध कराता है. इस परिप्रेक्ष्य में धर्म की राजनीति और राजनीति के धर्म में कोई अन्तर नहीं रह जाता है. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार, “धर्म वस्तुतः जीवन की एक पद्धति है, जो मनुष्य को उसके कर्तव्यों का बोध कराती है. जिन सिद्धान्तों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है, वे सब धर्म हैं. धर्म जीवन का सत्य है और हमारी प्रकृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है.” इस दृष्टि से राजनीति का भी धर्म होना चाहिए. धर्मविहीन राजनीति असामाजिक होगी. 

भारत में सामाजिक संस्थाएँ धार्मिक मान्यताओं को स्वीकार करती आई हैं. यहाँ के परम्परागत सामाजिक जीवन में धर्म का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है. भारत में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को नियंत्रित करने में धर्म ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है. भारतीय ग्रन्थों में धर्म को चाहे जिस प्रकार परिभाषित किया गया हो, सबका लक्ष्य एक ही है—धर्म जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करने की विधि है. महर्षि वेदव्यास का कथन प्रमाण है 

श्रूयतां धर्म सर्वस्व श्रुत्वा चैवात धर्मताम् । 

आत्मा न प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।

अर्थात् धर्म का सार क्या है, यह भी जान लो और उसे सुनकर अपने मन में दृढ़ता से धारण कर लो, इसका सार यह है-अपनी अन्तरात्मा के विरुद्ध अन्य व्यक्तियों के साथ आचरण नहीं करना चाहिए. कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय मनीषा की दृष्टि में धर्म मानव धर्म है और वह राजनीति को उतना ही और उसी तरह प्रभावित करता है, जितना वह जीवन और जगत् के किसी अन्य पक्ष को. वह राजनीति को केवल विवेकपूर्ण नीतियाँ अपनाकर कर्तव्य-बोध के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है. भारतीय धर्म रिलीजन आदि की भांति राजनीति एवं राजसत्ता की राजनीति के पचड़े में नहीं पड़ता है. वह तो केवल इतना ही इंगित करता है कि राजनीति धर्म के मार्ग पर चले जिससे सब लोग अपने धर्म का पालन कर सकें. आधुनिक राजनीतिक भाषा के सन्दर्भ में धर्म की राजनीति जैसी वस्तु के लिए धर्म में कोई स्थान नहीं है. 

भारतीय चिन्तन के सन्दर्भ में राजनीति को धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, परन्तु पाश्चात्य परम्परा की भाँति धर्म की कोई राजनीति नहीं होती है. परन्तु सन् 1947 में भारत को स्वतन्त्रता मिलने के अवसर पर अल्पसंख्यक शब्द को गढ़कर धर्म को राजनीति के साथ जोड़ दिया गया. अब स्थिति यह बन गई है कि धर्म की आड़ में साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारा जाता है और साथ ही धर्मनिरपेक्ष होने का दावा भी किया जाता है. स्वतन्त्रता प्राप्ति के 50 वर्ष बाद भी भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द का सर्वथा अभाव दिखाई देता है और जरा सा बहाना मिल जाने पर साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठते हैं. इसकी परिणति जातीय अथवा वर्ण संघर्ष में होने लगी है. 

धर्म अथवा मानव धर्म राजनीति को पवित्र बनाता है. महात्मा गांधी ने राजनीति में मानवतावादी धर्म का समावेश करके राजनीति को नैतिकता से जोड़ा था. हम रिलीजन, मजहब, पंथ आदि को राजनीति से जोड़कर धर्मनिरपेक्षता का नारा देते हैं. इसका कारण यह है कि हम लोग धर्म के मर्म एवं उसके मूल अर्थ की उपेक्षा करते हैं. राजनीति का धर्म हो, यह संघटन एवं विकास का मार्ग है. रिलीजन को राजनीति से दूर रखने में ही मानव समाज का कल्याण है. धर्म एक है, रिलीजन अनेक हो सकते हैं.

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