भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध | Essay On Relation Between India And China In Hindi

भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध

भारत चीन सम्बन्ध पर निबंध | Essay On Relation Between India And China In Hindi

चीन, भारत का पड़ोसी राष्ट्र है। पड़ोसी राष्ट्र के नाते भारत ने सदैव चीन के साथ मित्रवत व्यवहार बनाने और भाईचारा बढ़ाने पर बल दिया। भारत यह जानता है कि जब दो पड़ोसी देश मिलकर सद्भावपूर्वक रहते हैं, तो इसका सकारात्मक प्रभाव दोनों देशों पर पड़ता है। व्यापारिक और वाणिज्यिक संबंध प्रगाढ़ बनने से विकास और समृद्धि भी बढ़ती है। यही कारण है कि जहां भारत ने ‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’ का आत्मीय नारा दिया, वहीं मानवतावादी कवि गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने चीन को ‘ब्रदर कंट्री’ की संज्ञा दी। यह कहना असंगत न होगा कि भारत के नरम रुख के बावजूद चीन का रवैया भारत के प्रति एक ‘विश्वासघाती’ का रहा। अपने भारत विरोधी आचरण से जहां उसने ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई जैसे नारे को ‘चिंदी-चिंदी’ कर दिया, वहीं वह ‘ब्रदर कंट्री’ के मानकों पर भी खरा नहीं उतरा। वर्ष 1962 में उसने भारत पर आक्रमण कर जहां दोस्ती की आड़ में भारत की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया, वहीं पिछले कुछ दिनों से उसके द्वारा भारतीय सीमा में की जा रही घुसपैठ भी यह बयां कर रही है कि वह भारत का हितैषी नहीं है। स्थिति यह है कि हम तो दोस्ती के नाते चीन को एहतरामन सलाम करते हैं, जिसका जवाब वह इंतकामन देता है। इससे भारत और चीन के मध्य राजनीतिक व राजनयिक संबंध प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। 

“जहां भारत ने हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का आत्मीय नारा दिया, वहीं मानवतावादी कवि गुरुवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने चीन को ‘ब्रदर कंट्री’ की संज्ञा दी।” 

चीन कितना एहसान फरामोश है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक राष्ट्र के रूप में चीन के अस्तित्व में आने के बाद से भारत ने उसे सदैव अपना हितैषी और सच्चा मित्र मानते हुए उसके हित संवर्धन को ध्यान में रखा और विश्व राजनीति में हर कदम पर उसका साथ दिया। अमेरिका, ब्रिटेन व अन्य यरोपीय देशों के विरोध के बावजूद भारत ने उसे मान्यता दी। भारत ने ही चीन को निर्गट आंदोलन और विश्व के तमाम देशों से परिचय करवाया। इन एहसानों का बदला उसने वर्ष 1962 में भारत पर जबरदस्त आक्रमण कर चुकाया और दोनों देशों के संबंधों को तार तार कर दिया। यह हमला उसने उस समय किया, जब भारत चीन के प्रति अपने मधुर संबंधों को लेकर आश्वस्त था। 

“चीन ने पाकिस्तान को न केवल अणु तकनीक दी बल्कि विस्फोट के लिए बम भी दिये।” 

भारत द्वारा चीन का भरपूर साथ दिये जाने की फेहरिस्त काफी लंबी-चौड़ी है। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों में भी चीन का जमकर साथ दिया और हमेशा उसके साथ खड़ा नजर आया। भारत ने जहां चीन को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने के लिए पैरोकारी की. वहीं विश्व व्यापार संगठन में भी उसकी सदस्यता के लिए आवाज उठाई। विश्व मंच पर भारत ने हमेशा चीन का साथ दिया। यह जानते हुए भी कि चीन एक बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है, भारत ने जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में उसका साथ दिया और विकसित देशों का प्रहार उसे अकेले नहीं सहन करने दिया। 

भारत ने चीन के साथ सदैव उदार व्यापारिक व वाणिज्यिक संबंधों को वरीयता दी, किंतु यहां भी चीन ने सदैव खोटी नीयत का परिचय दिया। दुश्वारी यह है कि वह सदैव इस बात पर जोर देता है कि व्यापारिक संतुलन उसके पक्ष में रहे। यानी वह भारत से आयात कम करना चाहता है और भारत को निर्यात ज्यादा से ज्यादा करना चाहता है। यानी यहां भी वह दादागीरी से बाज नहीं आ रहा है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारत के घरेलू व्यापार में जबरदस्त पैठ बनाई है। भारतीय बाजार चीनी सामानों से पटे पड़े हैं। चीनी खिलौनों, सेट टॉप बॉक्स, बिजली के उकपरणों, टाचों व इलेक्ट्रानिक उपकरणों आदि से तो भारतीय बाजार पटे ही पड़े है। 

अब वह दीपावली जैसे त्योहारों पर चीनी गणेश-लक्ष्मी सस्ते दामों में भारतीय बाजार में उतार कर बाजारों पर कब्जा जमा लेता है। यही कारण है कि चीन के साथ हमारा भुगतान संतुलन भारी घाटे में है। भारत ने इधर कुछ प्रतिबंध लगाये हैं जिससे आयात घटा है। मूल रूप से विटामिन सी, डेयरी उत्पाद और खिलौने के आयातों पर रोक है। जिससे चीनी निर्यात पर रोक लगी है। चीन इससे नाराज हो गया है। भारत चाहता है कि कुछ व्यापारिक पूंजी निवेश कर भुगतान संतुलन को अपने पक्ष में करे परंतु यह न तो संभव दिखता है और न चीन इसके लिए तैयार ही है। भारत चाहता है कि चीन पेट्रो केमिकल, स्टील, हेल्थ केयर के सामान, सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आयात करे। किंतु चीन सिर्फ अपने हित और लाभ की स्थिति की सोचता है। 

यह तो रही व्यापार में चीन की खोटी नीयत की बात। अब आते हैं, चीन द्वारा भारत की घेराबंदी के मुद्दे पर, जिसने भारत को चिंता में डाल रखा है। भारत को घेरने की दृष्टि से चीन ने हिन्द महासागर में अपनी पैठ बनानी शुरू कर दी है। वह म्यांमार में अपना एक विशाल नौसैनिक अड्डा बनाने जा रहा है, जो भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह से कुछ सौ किलोमीटर दूर पर स्थित है। इससे वह न केवल निकोबार में बनने वाले भारत-अमेरिका संयुक्त नौसैनिक अड्डे की निगरानी कर सकेगा अपितु मलास्का जलडमरूमध्य से होने वाले जहाजरानी व्यापार पर भी निगाह रखेगा क्योंकि चीन का जहाजरानी व्यापार और खाड़ी के देशों से तेल का आयात इसी रास्ते से होता है। 

डोकलाम विवाद के बाद भारत एवं चीन के कार्यपालिका प्रमुख वुहान में (चीन) 2018 में मिले। दोनों देशों के बीच वुहान सहमति पर हस्ताक्षर किये गये। इसके माध्यम से सीमा संबंधी विवादों, व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाने को लेकर समझौते हुए। यह कहना उचित होगा कि बदली हुई परिस्थितियों में भारत एवं चीन भले एक-दूसरे के दोस्त न हों पर दुश्मन होने का जोखिम नहीं उठा सकते। 

चीन ने इसी तरह न केवल पाकिस्तान में ग्वादार बंदरगाह को अति-आधुनिक सुविधाओं से लैस किया है अपितु बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर भी उसने अपनी दस्तक दी है। श्रीलंका के एक बंदरगाह हम्बन टोटा को विकसित करने का कार्य भी चीन कर रहा है। वह श्रीलंका को हथियार भी बेचता है। इस तरह चीन भारत का घेराव करना अपना प्रमुख कार्य मान रहा है। चीन ने एशियाई सामूहिक सुरक्षा के रूसी प्रस्ताव पर कभी नहीं गौर किया और भारत ने हमेशा कहा कि जब तक भारत-चीन सीमा विवाद तय नहीं होता, यह समझौता संभव नहीं हो सकता है। यही कारण है कि रूस ने भी अपने प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इसी तरह चीन ने अपनी समृद्धि और सेना की बड़ी तैयारी से भारत को भयभीत करने का भी कार्य इसी के तहत किया है। चीन ने नेपाल के रास्ते भारत के कुछ प्रांतों में जहां माओवादी प्रभाव पैदा कर ‘नक्सली हिंसा’ को प्रोत्साहित किया है, वहीं वह पाकिस्तान से मिलकर भारत को पश्चिमोत्तर में घेरने का काम भी कर रहा है। चीन का आचरण पण पग पर भारत विरोधी है। भारत की घेराबंदी की गरज से वह भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलका क साथ मॉरिशस व मालदीव में भी अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी चीन की नीयत साफ नहीं है, जिस पर अपने आधिपत्य का वह बराबर दावा करता चला आ रहा है। यहां तक कि भारतीय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के इस क्षेत्र में जाने पर चीन को आपत्ति है। भारत के गणतंत्र दिवस पर्व पर जब अरुणाचल प्रदेश की झांकी जाती है तो उस पर चीन आपत्ति करता है। भारत ने उसकी इन बातों पर कोई भी प्रतिक्रिया न व्यक्त करके अपने कार्य | को यथावत करना जारी रखा है परंतु चीन अपनी आपत्ति से गुरेज नहीं करता। 

आश्चर्य तो यह है कि इस क्षेत्र में मैकमोहन रेखा जिसको चीन म्यांमार के साथ सीमा मानता है, भारत के साथ नहीं मानता, इस क्षेत्र के उत्तर से होकर गुजरती है यह रेखा, लेकिन भारत के साथ सीमा के रूप में मैकमोहन रेखा को चीन नहीं मानता। चीन का एक पुराना प्रस्ताव 30-35 वर्षों से चलता आ रहा है कि भारत यदि अक्साई चिन के क्षेत्र पर चीन का दावा मान ले तो वह अरुणाचल पर अपना दावा छोड़ देगा। यह चीन के एकमुश्त समझौते का प्रस्ताव है जिसे न तो कभी भारत स्वीकार कर सका और न वह स्वीकार करने योग्य ही 

चीन तिब्बत में भी आतंक फैलाने से बाज नहीं आया, जिस वजह से धर्मगुरु दलाईलामा को भारत में शरण लेनी पड़ी थी। चीन के मंसूबे कितने गलीज हैं, इसका पता इसी से चलता है कि उसने भारत के पाक अधिकृत कश्मीर राज्य के बड़े भू-भाग को पाकिस्तान से ठेके पर ले रखा है और अब वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में तमाम विकास कार्य करना चाह रहा है। 

चीन ने पाकिस्तान को न केवल अणु तकनीक दी बल्कि विस्फोट के लिए बम भी दिये। कई तरह की मिसाइलें पाकिस्तानी आयुध भंडार में भर दीं। इस तरह भारत के विरुद्ध पाकिस्तान की न केवल सैन्य मदद कर रहा है अपितु उसका कूटनीतिक मार्गदर्शक बना है। पाकिस्तान की दोस्ती चीन के साथ इतनी गाढ़ी है कि पाकिस्तान अमेरिका को भी चीन की अपेक्षा कम महत्त्व देता है। । भारत और चीन के मध्य की साझा नदियों का पानी रोककर भी चीन | गैर दोस्ताना रुख का परिचय दे रहा है। सीमा पार से भारत में आतंकवाद को प्रोत्साहन दिए जाने में भी चीन आगे है और कई बार उसकी भूमिका उजागर हो चुकी है। उक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि चीन के प्रति भारत सदैव इकतरफा दोस्ती की पेंगे भरता रहा, तो चीन ने भारत के झूले की रस्सियां काटने का काम किया। हालांकि डोकलाम विवाद के बाद भारत एवं चीन के कार्यपालिका प्रमुख वुहान में (चीन) 2018 में मिले। दोनों देशों के बीच वुहान सहमति पर हस्ताक्षर किये गये। इसके माध्यम से सीमा संबंधी विवादों, व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाने को लेकर समझौते हुए। यह कहना उचित होगा कि बदली हुई परिस्थितियों में भारत एवं चीन भले एक दूसरे के दोस्त न हों पर दुश्मन होने का जोखिम नहीं उठा सकते। 

हालांकि चीन ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने को लेकर अप्रत्यक्ष नाराजगी व्यक्त की एवं मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ले गया। अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति को समझते हुए यह कहा जा सकता है कि ओवोर परियोजना के लिए पाकिस्तान को खुश करना चीन की मजबूरी भी है। 

भारत और चीन के मध्य संबंधों की समरसता जरूरी है, किंतु इसमें चीन की महत्त्वाकांक्षा का आड़े आना स्वाभाविक है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने विकास की लंबी छलांग लगाई है। उसकी अर्थव्यवस्था भी उभार वाली है। अपने विकास और वैज्ञानिक प्रगति के बलबूते पर चीन वैश्विक मंच पर खुद को सुदृढ़ कर रहा और वह अमेरिका को टक्कर देने का ‘दिवास्वप्न’ देख रहा है। ऐसे में वह यह नहीं चाहता कि भारत दक्षिण एशिया या वैश्विक स्तर पर सशक्त राष्ट्र बने। यानी उसकी नीतियां वर्चस्व वादी हैं, जो संबंधो की मधुरता में सबसे बड़ी बाधक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि चीन अपनी इन नीतियों में बदलाव | लाकर भारत को साथ लेकर चले। तभी वह अमेरिका को भी टक्कर दे सकेगा और एशियाई दबदबे को भी बढ़ा सकेगा। 

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