क्षेत्रवाद पर निबंध अथवा बढ़ती क्षेत्रीयता और राष्ट्रीय एकता (Regionalism and National Unity) 

क्षेत्रवाद  पर निबंध

क्षेत्रवाद  पर निबंध अथवा बढ़ती क्षेत्रीयता और राष्ट्रीय एकता (Regionalism and National Unity) (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2006)

भारतीय संविधान में सामाजिक समानता को मैलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी है। यह व्यवस्था हमारे देश में पिछले छह दशकों से लागू है। अम्बेडकर, गांधी और नेहरू जैसे स्वनामधन्य नीति प्रवर्तकों ने संविधान निर्माण के दौरान इस व्यवस्था का इस आधार पर पक्ष किया था कि संविधानिक स्वरूप प्राप्त कर लेने के बाद देश की सामाजिक व्यवस्था को क्षेत्रवाद से मुक्त होने का खुला अवसर प्राप्त होगा तथा देश में एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का प्रादुर्भाव होगा जिससे सभी एक समान होंगे तथा साम्प्रदायिक, भाषायी तथा क्षेत्रीय आधार पर उनमें विभेद नहीं होगा। संविधान के प्रवर्तन के इतने वर्षों बाद भी यह प्रश्न आज भी हमें उद्वेलित कर रहा है कि समता पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना के बावजूद भारत के राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक जीवन में भी क्षेत्रीय भेदभाव उसी तरह विद्यमान है जिस तरह वह स्वतंत्रता पूर्व था। 

क्षेत्रवाद की समस्या आज की समस्या नहीं है स्वतंत्रता के पूर्व भी यह समस्या थी किन्तु तब यह अंग्रेजों द्वारा प्रेरित थी जिसके पीछे उनकी ‘बांटों और राज करो’ की नीति थी। संविधान में इस दुष्प्रवृत्ति को समाप्त करने के ध्येय से भारत को ‘राज्यों का संघ’ निरूपित किया गया। एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, शक्तिशाली केन्द्र, एकीकृत अखिल भारतीय सेवा जैसी व्यवस्था कर क्षेत्रीयता को समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया गया। किन्तु स्वतंत्रता के बाद से प्राय: भारत में क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति का तीव्र गति से विकास होता गया। स्थानीय स्तर के नेता अपनी भूमिका को बनाए रखने के लिए इस तरह की प्रवृत्तियों का पोषण करने में लगे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि अंग्रेजो की ‘बांटो और राज करो’ की नीति को अब हमारे राजनेताओं ने अपना लिया है और आज वे इस मूल मंत्र का उपयोग अपने स्वार्थ के लिये कर रहे हैं। क्षेत्रवाद के नाम पर जहां देश के कुछ हिस्सों में उत्तर भारतीयों को खदेड़ने के अभियान छेड़े जा रहे हैं, वहीं अलगाव की प्रवृत्तियां भी बढ़ी हैं। 

“एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, शक्तिशाली केन्द्र, एकीकृत अखिल भारतीय सेवा जैसी व्यवस्था कर क्षेत्रीयता को समाप्त करने का हर संभव प्रयास किया गया।” 

साधारणतया क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता कोई नकारात्मक प्रवृत्ति नहीं है। अपने धर्म, संस्कृति, अपनी परम्पराओं अपने क्षेत्र से प्रेम करना एक अच्छी प्रवृत्ति है और इसके सकारात्मक प्रभाव ही होते हैं। इसमें बुराइयाँ तब पैदा हो जाती हैं, जब हम क्षेत्रवाद को राष्ट्रवाद से ऊपर स्थान देने लगते हैं। क्षेत्रवाद वास्तव में एक समाजशास्त्री अवधारणा है जिसे विभिन्न सामाजिक हितों की अभिव्यक्ति की धुरी कहा जा सकता है। एक क्षेत्र विशेष के लोगों द्वारा अपने क्षेत्र के लोगों के प्रति भावात्मक एकता होना स्वाभाविक लक्षण है किन्तु इस स्वाभाविक प्रकृति में जब संकीर्णता आने लगती है तथा व्यक्ति अपने क्षेत्र के हितों के प्रति इतना अधिक संकेन्द्रित हो जाता है कि वह राष्ट्रवाद की भावना का परित्याग कर देता है। यह प्रवृत्ति देश की एकता एवं अखण्डता के लिए घातक होती है तथा देश की सांविधानिक प्रणालियों पर कठाराघात है। 

क्षेत्रीयवाद के अनेकानेक कारण हैं। हमारे देश में कोई एक राज्य या क्षेत्र नहीं बल्कि पूरा देश क्षेत्रीयवाद से प्रभावित है। इसी क्षेत्रीयतावाद के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक राजनीतिक दलों तथा संगठनों का उदय हुआ है। क्षेत्रवाद की संकीर्ण मानसिकता के साथ अस्तित्व में आए इन संगठनों ने सदैव क्षेत्रवाद को हवा देकर राष्ट्रवाद की भावना को क्षति पहुंचाने का काम किया और अनेक प्रकार की समस्याओं को जन्म दिया। भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावाद के बढ़ने के निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं- 

(1) भाषा सम्बन्धी विवाद।

(2) पृथक राज्य के गठन की मांग।

(3) स्वायत्तता की मांग।

(4) क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का विकास। 

(5) आर्थिक पिछड़ापन।

(6) भौगोलिक दृष्टि से राज्यों का बहुत बड़ा होना।

(7) संस्कृति में विभिन्नता।

(8) असंतुलित विकास।

(9) राजनेताओं का स्वार्थपूर्ण लक्ष्य।

(10) विदेशी ताकतों द्वारा प्रोत्साहन। 

भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावाद की प्रवृत्ति के अनेक रूप हैं। और इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तरीके से हुई है। कभी साम्प्रदायिक आधार पर देश के बंटवारे की मांग उठाई जाती है, तो कभी भाषाई या अन्य आधारों पर अलग राज्य के लिए उग्र व हिंसक आंदोलन होते हैं। कभी संकीर्ण भावनाओं के कारण अलगाववाद की बात की जाती है, तो कभी सुविधाओं और सहूलियतों के लिए नाजायज दबाव बनाया जाता है। 

क्षेत्रवादी प्रवृत्तियों के कारण देश में अनेक समस्याएं उभरती हैं। इस प्रवृत्ति ने देश को धर्म, भाषा, जाति, सम्प्रदाय तथा क्षेत्र के आधार पर बांटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज के युग में किसी एक स्थान पर रहकर कोई भी वर्ग विकास की कल्पना नहीं कर सकता है। भारतीय संविधान नागरिकों को देश के किसी भी हिस्से में रह कर आजीविका प्राप्त करने का अवसर देता है किन्तु क्षेत्रीयवाद इसमें आड़े आता है। महाराष्ट्र इसका उदाहरण है जहाँ गैर मराठियों को इस आधार पर महाराष्ट्र से बाहर भगाया गया है कि वे वहाँ के मूल निवासी नहीं है। इससे एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, की भावना पनपती है। विकास के बीजों का अंकुरण नहीं हो पाता। क्षेत्रवाद की संकीर्ण प्रवृत्ति हमारे देश की एकता और अखण्डता के लिए काफी घातक साबित हो रही है। यह भावनाओं को भड़काने का काम करती है। क्षेत्रीयवाद के नाम पर जम्मू कश्मीर में शुरू हुआ आन्दोलन आज विदेशी ताकतों के इशारे पर आतंकवादी रूप ले । चुका है। पिछले चार से अधिक दशकों से चल रहे इस आतंकवाद ने हजारों की जान ली है, अरबों रुपये का नुकसान किया है। क्या इसकी भरपाई संभव है। 

“स्वतंत्रता के बाद से देश में क्षेत्रीयवाद की प्रवृत्तियाँ और मुखर हुई हैं।”

स्वतंत्रता के बाद से देश में क्षेत्रीयवाद की प्रवृत्तियाँ और मुखर हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप अघोषित रूप में देश कई भागों में बंट गया है। इसी क्षेत्रीयतावाद के कारण विभिन्न राज्यों के निवासी अपने राज्य में नौकरियाँ और रोजगार में अपने लिए विशेष आरक्षण की मांग करते हैं जो कि संविधान की भावना के प्रतिकूल है। क्षेत्रीयवाद के कारण अनेक अन्य समस्याएं उपजती हैं जिनका उल्लेख इस प्रकार है – 

(1) विभिन्न क्षेत्र के लोगों के मध्य विद्वेष की भावना का प्रसार।

(2) राज्य तथा केन्द्र सरकार के मध्य तनाव की स्थिति।

(3) विभिन्न राज्यों में स्वार्थपूर्ण नेतृत्व का विकास।

(4) भाषाई तथा सांस्कृतिक टकराव की समस्या।

(5) विकास संबंधी कार्यों में अवरोध।

(6) नौकरशाही में भ्रष्टाचार।

(7) देश की एकता तथा अखण्डता को चुनौती।। 

क्षेत्रीयवाद को रोकना तथा इस प्रवृत्ति पर लगाम लगाना हमारे लिए आज सबसे बड़ी चुनोती है। किसी भी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की सदढता के लिए आवश्यक है कि उसकी एकता और अखण्डता पर आंच न आए। इसके लिए हमारे राजनेताओं को आगे आना होगा। अपने क्षेत्र में क्षेत्रीयतावादी राजनीति कर अपने नेतृत्व को बनाए रखने वाले नेताओं को राष्ट्रवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता में ही भलाई है। जब राष्ट्र ही छिन्न भिन्न हो जायेगा तो उनकी राजनीति और उनके क्षेत्र का क्या हश्र होगा? देश की एकता पर आंच आने वाले बयान देने वाले नेताओं के साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए। इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों को आगे आना होगा। नफरत फैलाने वाले बयान देने तथा क्षेत्रवाद के नाम पर हिंसक आन्दोलन के सूत्रधार इन राजनेताओं का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए और इसके लिए देश के बुद्धिजीवी वर्ग को आगे आना चाहिए। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीयता को समाप्त करने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं- 

(1) देश के सभी क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

(2) केन्द्रीय मंत्रिमंडल में सभी क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।

(3) अविकसित तथा आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के विकास के लिए विशेष रणनीति अपनाई जानी चाहिए ताकि क्षेत्रीय असंतोष न उत्पन्न हो।

(4) क्षेत्रीय आधार पर भाषा और संस्कृति संबंधी टकराव को रोकने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाना चाहिए।

(5) किसी एक क्षेत्र में सिमटी संस्कृति एवं भाषा को प्रचार प्रसार द्वारा फैलाया जाना चाहिए ताकि सांस्कृतिक आदान प्रदान की स्थिति बने और सौहार्दपूर्ण वातावरण का निर्माण हो। 

(6) राष्ट्रवाद की भावना का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए ताकि क्षेत्रीयतावादी संकीर्ण विचारधारा का लोप हो सके।

(7) विश्व बंधुत्व की भावना का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए।

(8) जनसामान्य को शिक्षित एवं जागरूक किया जाना चहिए ताकि वे अपने तथा अन्य के नागरिक एवं संवैधानिक अधिकारों का आदर कर सकें।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट के लिए क्षेत्रीयतावाद एक विष है जो धीरे-धीरे राष्ट को खोखला कर देता है। भारत एक विशाल देश है और यहाँ सामाजिक और सांस्कृतिक विभिन्नता अन्य किसी देश की अपेक्षा बहुत अधिक है, किन्तु हम विविधता में एकता के पक्षधर हैं और यही हमारे देश की विशेषता है। हमें यह सदैव ध्यान रखना होगा कि हम भारतीय पहले हैं तथा मराठी, पंजाबी, राजस्थानी, असमी, बंगाली बाद में। देश की संप्रभुता एकता और अखण्डता का हमें सम्मान करना चाहिए। और इसके लिए हमें उन ताकतों को जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा जो सिर्फ अपनी राजनीति को चमकाने के लिए क्षेत्रवाद का विष रूपी वृक्ष रोपते हैं। हमें क्षेत्रीयतावाद के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों स्वरूपों का विभेद भी करना होगा क्योंकि क्षेत्रीयतावाद सभी अर्थों में बुरा नहीं है। क्षेत्रीयतावाद की भावना एक क्षेत्र विशेष के लोगों को विकास और उन्नति के लिए प्रेरित करती है। किन्तु यह तब घातक हो जाती है जब यह राष्ट्रवाद से स्पर्धा करने लगती है। 

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