भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद पर निबंध

भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद पर निबंध

भारतीय राजनीति में क्षेत्रवाद पर निबंध-Essay on regionalism in Indian politics

क्षेत्रवाद की राजनीति का अर्थ 

भारत एक विशाल देश है. यह अनेक प्रान्तों (राज्यों) जिलों, गाँवों में बँटा है. यहाँ हर राज्य की अपनी भाषा है. वेशभूषा है. अपनी संस्कृति है. खानपान है, लेकिन यह विविधता में एकता की संस्कृति है. जिस प्रकार एक गुलदस्ते में लगे विभिन्न फूल गुलदस्ते की शोभा बढ़ा देते हैं. उसी प्रकार हम भारतीय अलग-अलग भाषा बोलते हैं, अलग-अलग वेशभूषा धारण करते हैं. अलग-अलग तरह से रहते हैं. खाते हैं, पीते हैं, पर हम फिर भी मन से एक हैं. हम भारतीय पहले हैं. राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, महाराष्ट्रीयन बाद में, लेकिन आज हमारे राजनेता अपने बयानों से हमें क्षेत्र के आधार पर बाँट रहे हैं. भड़का रहे हैं, हमारे भारतीय होने के अहसास को धूमिल कर हमें क्षेत्र के आधार पर विभाजित कर रहे हैं. इसे ही कहते हैं क्षेत्रीयता की राजनीति, अलगाव की राजनीति, जो हमारे दिलों में हिंसा, नफरत, ईर्ष्या, द्वेष की भावनाएं भर रही है. हम अपने को भारतीय न कहकर क्षेत्र के आधार पर कहलाना पसन्द करते हैं.

अंग्रेजों ने भी यही राजनीति खेली और 200 वर्षों तक हम भारतीयों पर शासन किया. ‘फूट डालो और राज करो’ (Divide and Rule) उनका मूलमंत्र था और आज हमारे राजनेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए इस मूलमंत्र को अपना लिया है. पिछले दिनों महाराष्ट्र में जो हुआ. वह इसका एक छोटा-सा उदाहरण था. पूरा महाराष्ट्र एक छोटे-से बयान के बाद हिंसा की आग में जल उठा. इस क्षेत्रीयता की हिंसा में हमारे सभी प्रान्त धधके हैं, चाहे साउथ की बात की जाए. जहाँ हिन्दी भाषियों के खिलाफ हिंसा की खबरें एक सच हैं, असम, बिहार आज सभी तो इस आग में जल रहे हैं.

क्षेत्रवाद की राजनीति के कारण 

अब हमारे सामने प्रश्न आता है कि हमारे राजनेता आखिर इस तरह के विवादास्पद बयान क्यों देते हैं? उत्तर सिर्फ इतना है. सत्ता का मोह, कुर्सी की चाह, उनकी संकीर्ण मानसिकता, स्वार्थी सोच इसके लिए जिम्मेदार है. वे लोगों में अलगाव फैलाकर हिंसा, आगजनी फैलाकर वोट की राजनीति करते हैं. अपने को किसी विशेष वर्ग व क्षेत्र का रहनुमा प्रदर्शित करते हैं. उनकी संवेदनाएं हासिल करना चाहते हैं. पब्लिसिटी बटोरना चाहते हैं. वे लोगों को भड़काकर, भिड़ाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं. उन्हें देश से कोई मतलब नहीं हैं, वे तो सिर्फ वोट पाना चाहते हैं और वे सफल भी होते हैं नरेन्द्र मोदी गुजरात से चुनाव जीतते हैं. फारुख अब्दुल्ला कश्मीर में वाहवाही बटोरते हैं, बाल ठाकरे महाराष्ट्र में जमे हैं, लालू बिहार में यह राजनीति खेलते हैं. सब क्षेत्रवाद की राजनीति का खेल है. क्षेत्रवाद की राजनीति हमारे राजनेताओं को राजनीति के आकाश में उतरने का मौका देती है. क्षेत्रीयता की आंधी में असली मुद्दे, महँगाई, भ्रष्टाचार गौण हो जाते हैं, जिससे हमारे राजनेताओं को मनमाँगी मुराद मिल जाती है. 

भारत को हमने राज्यों में, जिलों में, गाँवों में बाँटा है. ताकि यहाँ का विकास अच्छी तरह से हो सके. हम आर्थिक, सामाजिक उन्नति कर सकें. पर राजनेताओं ने तो हमें सचमुच बाँट दिया है. उन्होंने अपनी भूमिका बदल दी है. देश के रहनुमा ही अगर देश को खाने लगें, तो उसे कौन बचाएगा, यही आज हमारे देश में हो रहा है. हम भारतवासी क्षेत्रों में बँट गए हैं. हमारे राजनेताओं के स्वार्थों ने क्षेत्रवाद की राजनीति को जन्म दिया हैं|

क्षेत्रवाद की राजनीति के कारण उत्पन्न समस्याएं 

क्षेत्रवाद की इस राजनीति ने देश को धर्म, जाति, भाषा, साम्प्रदायिकता के आधार पर बाँट दिया है. इस राजनीति में न जाने कितने निर्दोष लोग बलि चढ चुके हैं. हमारे मन आज भी एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा से भर उठे हैं. अपनी श्रेष्ठता के दम्भ में हमने दूसरों को हीन मानकर अपने नैतिक पतन के मार्ग को प्रशस्त किया है. श्रेष्ठता के दम्भ में हम अपनी सीमाएं, मर्यादाएं, वर्जनाएं भूलते जा रहे हैं. हमारी एकता टूट रही है, हमारे दिल टूट रहे हैं. हम एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देख रहे हैं. दूसरे के विकास पर हम खुश नहीं होते. हमारे विचार संकुचित बनते जा रहे हैं. हम कुएँ के मेढक बन रहे हैं, जो अपनी सीमा को ही सबसे बड़ी मान लेता है. आज जब प्रौद्योगिकी व संचार का जमाना है. विश्व में लोग एक-दूसरे के समीप आ रहे हैं. एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. वहीं दूसरी ओर हम सिर्फ अपने क्षेत्र और अपना गुणगान कर रहे हैं. इसने हिंसा की आग फैलाई है, अलगाव की आग को हवा दी है. साम्प्रदायिकता व भ्रष्टाचार को फैलाया है. हमारे अन्दर के राक्षस को जगाया है. हमारे नैतिक पतन को दिशा दी है. 

हम भारतीय हैं. यह हमारा अधिकार है कि हम भारत के किस प्रान्त में रहें और कहाँ नौकरी करें या व्यवसाय करें, लेकिन मुम्बई में जिस तरह से उत्तर भारतीयों को निशाना बनाया गया. वह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है, आज के युग में सिर्फ आप एक जगह रहकर विकास की कल्पना नहीं कर सकते तथा संकीर्णता विकास के मार्ग अवरुद्ध कर देती है. मुम्बई में अमिताभ बच्चन के घर पर निशाना साधा गया और वहाँ रह-रहे उत्तर भारतीयों को हिंसा का सामना करना पड़ा और इसके बाद वहाँ से उत्तर भारतीयों का पलायन शुरू हो गया. जिसका असर मुम्बई के उद्योगों पर पड़ा, अर्थव्यवस्था पर पड़ा. मजदूरों के पलायन से निर्माण कार्य रुक गए. कई सेवाएं ठप्प हो गईं. उद्योग धन्धों का नुकसान हुआ. वहाँ की कम्पनियों को हानि झेलनी पड़ी. इस प्रकार मुम्बई ने न केवल धन-जन की हानि को सहा वरन वहाँ के लोगों को भी कई प्रकार की अव्यवस्थाओं को सहना पड़ा. विकास का मार्ग अवरुद्ध हुआ. वैसे भी आज के युग में आप अकेले नहीं चल सकते. समाज में सहयोग का संबल, एकता का संबल आपको विकास के अवसर देता है. महाराष्ट्र की घटना सिर्फ महाराष्ट्र में ही नहीं घटी, पूरे भारत में इस पर प्रतिक्रियाएं हुईं हिंसा की आग में हमारे राज्य जल उठे. हमारी एकता के लिए खतरा पैदा हो गया. हमारे देश में अव्यवस्थाएं फैली. खून-खराबा हुआ. नुकसान किसका हुआ? इस देश का हुआ. हमारे देश के लोगों का हुआ. लेकिन फायदा किसे हुआ. सिर्फ उन राजनेताओं को जो इस तरह के बयान देकर सस्ती वाहवाही लूटना चाहते हैं या फिर पब्लिसिटी पाना चाहते हैं, जो कहते हैं कि बदनाम हुए तो क्या हुआ? नाम तो हुआ, फिर लगातार बहस आरम्भ. राज ठाकरे का बयान, लालू यादव की प्रतिक्रिया, बाल ठाकरे के बयान. सबने मामले को संवेदनशील बना दिया. यह सिर्फ महाराष्ट्र का सच नहीं है. पूरे देश में आज यह क्षेत्रवाद हावी है. हमने खिलाड़ियों को क्षेत्रों में बाँट दिया है. हम नौकरी में अपने क्षेत्र को प्राथमिकता देते हैं. जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. क्षेत्र की उन्नति की बात तो ठीक है, क्षेत्र के विकास की प्राथमिकताएं तय होनी चाहिए, लेकिन यह क्या? हमारे नेता जिस क्षेत्र से चुनाव जीतते है, उस क्षेत्र को कुछ समय के लिए विशेष रियायतें दी जाती हैं, विशेष घोषणाएं की जाती हैं. विशेष बिजली दी जाती है. यह सब क्या है आखिर? आज तो हम सभी अपने को क्षेत्रों में बाँटने लगे हैं, यह संकीर्णता की प्रवृत्ति है. संकीर्णता की इस प्रवृत्ति ने हमारे देश का बहुत नुकसान किया है. हमारे लोगों की भावनाओं को भड़काया है. उसने हमें गलत राह दिखाई है. कश्मीर के नाम पर जो आतंकवाद आज हम सह रहे हैं, वह क्या कम है, क्योंकि आज सभी क्षेत्रों से विभाजनों की बातें चल रही हैं? हमारी एकता खण्डित हो रही है. हम भाषा के नाम पर लड़ रहे हैं, धर्म विशेष के नाम पर लड़ रहे हैं. जाति के नाम पर लड़ रहे हैं. यह सब क्षेत्रवाद की राजनीति है. इसी राजनीति ने हमारे अखण्ड भारत को टुकड़ों में बाँट दिया. हमारी एकता को छिन्न-भिन्न किया है. अराजकता, हिंसा, कफ्यूं इसी की देन हैं.

क्षेत्रवाद की राजनीति को दूर करने के उपाय 

क्षेत्रों की रचना इसलिए की गई थी कि उनका विकास हो, लेकिन आज की राजनीति ने हमारे समक्ष क्षेत्रवाद की एक समस्या खड़ी कर दी है. हर क्षेत्र के निवासी दूसरे क्षेत्र के निवासियों से अपने को ऊँचा समझते हैं. उनसे ज्यादा रियायतें माँगते हैं. अतः इस राजनीति के खिलाफ सबसे पहला कदम तो यह होना चाहिए कि ऐसी राजनीति करने वाले राजनेताओं को जनता जवाब दे. इसके लिए जनता वोट का इस्तेमाल करे, साथ ही देश का बुद्धिजीवी वर्ग आगे आकर लोगों को जागरूक करे तथा ऐसे बयान देने वाले पर कानून का भी शिकंजा हो, क्योंकि हिंसा भड़काने वाले पर सजा का प्रावधान होना चाहिए. ताकि दूसरे लोग इस तरह की बयानबाजी न करें आज के युग में जरूरत है. लोगों को शिक्षित बनाने की, जनजागरण की. ताकि क्षेत्रवाद की राजनीति को समाप्त किया जा सके. इसके लिए सभी को आगे आकर इस प्रकार की राजनीति का विरोध भी दर्शाना चाहिए. 

हमारा भारत अखण्ड रहे कोई हमारी एकता को खण्डित न कर सके. इसके लिए हमें फिर से प्रेम, विश्वास, सौहार्द के वातावरण का सृजन करना होगा. आस्था, श्रद्धा से वातावरण को विनिर्मित करना होगा. ताकि कोई हमारे दिलों में नफरत न पैदा कर पाए तथा हमें नफरत की आग में झुलसाने वाले को सजा देनी होगी. उसका बहिष्कार करना होगा. इसके लिए कड़े कानून भी होने चाहिए. स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति होनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका दुरुपयोग हो और आप कुछ भी प्रचारित करें, प्रसारित करें. इसके लिए लचीली कानून व्यवस्था से काम नहीं चलेगा. सख्त कानूनों का निर्माण करना होगा. जैसा कि अभी हाईकोर्ट ने राज ठाकरे को चेतावनी दी कि वे इससे बाज आएं. 

लेकिन आज अगर हम चाहते हैं कि क्षेत्रवाद की राजनीति करने वालों को करारा जवाब दिया जाए, तो इसके लिए हमें फिर से बच्चों को संस्कारित करना पड़ेगा. उन्हें संस्कार देने पड़ेंगे. हमें उन्हें बार-बार बताना पड़ेगा कि यह पूरा भारत हमारा है. उनके अन्दर विश्वबन्धुत्व की भावना जगानी पड़ेगी. उनकी संकीर्णता को तिरोहित करना होगा. यह काम कठिन अवश्य है, लेकिन असम्भव नहीं. जब-जब हम भारतीयों पर संकट के बादल आए हैं, हमने मिलकर उनका सामना किया है. जातीयता की दीवारें टूटी हैं. क्षेत्रीयता की दीवारें टूटी हैं. धर्म की बेड़ियाँ कमजोर हुई हैं. हमने एकजुट होकर लड़ाई लड़ी है और जीती है. ऐसा ही समय आज है. आज हमारे समक्ष आतंकवाद, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, जैसी न जाने कितनी अनसुलझी समस्याएं हैं. आज हमारा देश न जाने किस प्रकार बँट रहा है. ऐसे में क्या हम भारतीयों का कर्त्तव्य नहीं है कि हम क्षेत्रवाद की संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठे. एक कहानी आपने पढ़ी होगी. लकड़ियों के गट्ठर को तोड़ना मुश्किल है, लेकिन एक लकड़ी को तोड़ा जा सकता है. ऐसे ही जो हमें कमजोर करना चाहते हैं, हमारी एकता को विखण्डित करना चाहते हैं. उन्हें जवाब देने के लिए नवयुवकों व बुद्धिजीवियों को आगे आना ही होगा तथा वोट की राजनीति करने वालों को तो जवाब दिया ही जाना चाहिए. देश की सम्प्रभुता, एकता व मान-मर्यादाओं को तोड़ने वाले को जवाब हमें ही देना होगा. सबसे अच्छा जवाब यह है कि इसके लिए हम उनका बहिष्कार करें. उन्हें हरा दें. उन्हें राजनीति से बेदखल कर दें. 

आज इसके लिए जरूरत है, जनसामान्य को शिक्षित करने, जागरूक करने की, ताकि हिंसा को रोका जा सके, लोगों को समझाया जा सके. यदि लोग समझदार हो जाएंगे, तो बयानबाजी अपने आप रुक जाएगी. 

हम भारतीय इस भारत भूमि में रहते हैं. यह हमारी माँ है हम इसे और नहीं बँटने देंगे. जिस तरह कारगिल के युद्ध में हमने जवाब दिया. वैसा ही जवाब फिर चाहिए. हमारे दिलों में अलगाव, नफरत, ईर्ष्या की भावना पैदा करने वाले को हम माफ नहीं कर सकते. ईर्ष्या-से-ईर्ष्या पैदा होती है, प्रेम से प्रेम. अतः जरूरत है फिर से उन महापुरुषों की. उन महान् आत्माओं की, जो गन्दी राजनीति से देश को बचा सकें. देश विभाजनकारी ताकतों को जवाब दे सकें. कोई भी महान् पुरुष किसी विशेष क्षेत्र का नहीं होता, उसके कार्य सारी मानवता के लिए होते हैं. फूल पूरे उपवन में खुशबू बिखेरता है. गंगा, यमुना जैसी नदियाँ सभी को समान रूप से अपना जल देती हैं. फिर आदमी क्यों अपने को सीमाओं मे बाँधना चाहता है. यह पूरा भारत देश हमारा है. यहाँ पर रहने वाले सभी भारतीय हमारे भाई-बहन हैं. यह भावना ही हमारे भारत की एकता को अक्षुण्ण रख सकती है. 

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