रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध |Essay on Ramdhari Singh Dinkar in Hindi

रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध

रामधारी सिंह दिनकर पर निबंध |Essay on Ramdhari Singh Dinkar in Hindi

‘पद्मभूषण’, ‘भारतीय ज्ञानपीठ’, ‘राष्ट्रीय अकादमी’ एवं ‘राष्ट्रकवि’ आदि सम्मानों से विभूषित तथा तत्कालीन साहित्यकारों में स्थापित रामधारी सिंह ‘दिनकर’ प्रगतिवादी युग के शीर्ष कवि थे। इनकी सभी कविताएं गेय हैं तथा सरल एवं सरस भाषा में गूढ तत्व लिए हुए हैं। इनकी काव्य शैली ओजपूर्ण है, जो हृदय के तंतुओं को झंकृत कर देती है। एक उदाहरण देखिए 

मानव जब जोर लगाता है, 

पत्थर पानी बन जाता है।

कविवर दिनकर का जन्म 30 सितंबर, 1908 को बिहार प्रांत के बेगूसराय जिलांतर्गत सिमरिया घाट नामक गांव में एक अति सामान्य किसान परिवार में हुआ था। इनमें बचपन से ही कवित्व शक्ति थी। ‘वीर बाला’ और ‘प्रणभंग’ इनकी किशोरावस्था के खंड काव्य हैं। लेकिन ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ काव्यों की रचना ने इन्हें हिंदी साहित्य जगत में राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया। उसके बाद अबाध गति से ‘रसवंती’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘कामधेनु’, ‘बापू’, ‘पंछाह’, ‘रश्मि रथी’, ‘नील कुसुम’, ‘उर्वशी’, ‘परशुराम की प्रतिज्ञा’, ‘हारे को हरिनाम’ आदि श्रेष्ठ काव्य कृतियां इनकी लेखनी से नि:सृत हुईं। ‘उर्वशी’ को श्रेष्ठ काव्य माना गया और इस कृति पर इन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से 1973 में सम्मानित किया गया। 

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न दिनकर की लेखनी समय के अनुरूप चलती थी। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में ये गरम दल के समर्थक थे। इसलिए इनकी लेखनी ‘रेणुका’ काव्य में हिमालय से कहती है कि हमें भीम और अर्जुन को लौटा दे, ताकि हम अपने दुश्मनों से लोहा ले सकें 

रे रोक! युधिष्ठिर को न यहां, जाने दो उनको स्वर्ग धीर, 

पर फिरा हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।

दिनकर जी का अधिकांश जीवन अभावग्रस्त रहा, इसीलिए शोषितों और पीड़ितों के दर्द को उन्होंने अपने काव्य में उचित स्थान दिया। अग्रलिखित पंक्तियों में सामाजिक विषमता का जीवंत चित्रण है –

श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बच्चे अकुलाते हैं, 

मां की हड्डी से चिपक-ठिठुर, जाड़े की रात बिताते हैं।

ऐसे ही शोषकों के विरुद्ध दिनकर की कलम हुंकार कर उठती है 

हटो व्योम के मेघ पंथ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं, 

दूध-दूध ओ वत्स! तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं।

आजादी के बाद जब कविवर दिनकर जी को लगा कि हमारे नेता जनता का कार्य न करके भोग और विलास में आकंठ डूबे हुए हैं, तब उनकी लेखनी सिंहासनस्थ लोगों को इस प्रकार आगाह करती है 

दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, 

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। समाज में किसे सम्मानित किया जाए–गुण या वेश को? प्रारंभ से ही हमारे समाज का यह विचारणीय प्रश्न रहा है। राष्ट्रकवि दिनकर की प्रगतिवादी लेखनी इसका स्पष्ट निराकरण करती है 

किसी वृंत पर खिले, विपिन में, पर नमस्य हैं फूल, 

सुधी खोजते नहीं गुणों का, आदि शक्ति का मूल।

और अंत में भारतीय संस्कृति के अनुरूप दिनकर जी सांसारिकता से थककर एक दर्शनिक बन जाते हैं। ‘हारे को हरिनाम’ कविता की पंक्तियां उनके इसी व्यक्तित्व की ओर इशारा करती हैं 

राम तुम्हारा नाम कंठ में रहे,

हृदय जो कुछ भेजो वह सहे,

दुख से त्राण नहीं मांगू,

मांगू केवल शक्ति दुख सहने की। 

काव्य के तीन गुण माने जाते हैं सादगी, असलियत और जोश। दिनकर जी की रचनाओं में ये तीनों गुण समान रूप से विद्यमान हैं। इसके अलावा देश प्रेम और राष्ट्रीयता उनके काव्य के प्राण हैं। साथ ही शृंगार, प्रेम, दर्शन आदि इनके काव्य के प्रमुख अवयव हैं, जो इनकी लोकप्रियता बढ़ाते हैं।

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