राम मनोहर लोहिया पर निबंध | Essay on Ram Manohar Lohia in Hindi

राम मनोहर लोहिया पर निबंध

राम मनोहर लोहिया पर निबंध | Essay on Ram Manohar Lohia in Hindi |डॉ. राम मनोहर लोहिया : एक समाजवादी चिंतक 

डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक प्रखर राजनीतिक चिंतक के रूप में अपनी श्रेष्ठ पहचान बनाई और समाजवादी आंदोलन में केंद्रीय भूमिका निभाते हुए समाजवाद को एशियाई संदर्भो में अभिनव स्वरूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने जहां भारतीय परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्रीय समाजवाद की जमकर पैरोकारी की, वहीं भारत के स्वाधीनता आंदोलन को भी धार देने में आगे रहे। लोहिया हिन्दी के भी समर्पित सेवी थे और ताउम्र वे हिन्दी भाषा के उन्नयन के लिए प्रयासरत रहे। अपने व्यक्तित्व, कृतित्व एवं प्रखर विचारों से उन्होंने जहां भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी, वहीं समाजवादी चिंतक के रूप में वैश्विक ख्याति अर्जित की। 

डॉ. राम मनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च, 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर नामक स्थान में हुआ था, जो कि वर्तमान में जिला अम्बेदकरनगर में पड़ता है। पिता हीरालाल पेशे से अध्यापक थे तथा सच्चे राष्ट्र हितैषी एवं राष्ट्रभक्त थे। सही मायनों में डॉ. लोहिया को देश भक्ति एवं जन सेवा के संस्कार अपने पिता से ही मिले। लोहिया के सिर से मा चंदा देवी का साया ढाई वर्ष की अवस्था में ही उठ गया था। उनका पालन-पोषण उनकी दादी ने किया। अपनी प्रारंभिक पढ़ाई अकबरपुर से पूरी की। इंटर काशी से किया तो बी.ए. कोलकाता से। खद्दर पहनना इंटर से ही शुरू कर दिया था। वर्ष 1932 में उन्होंने बर्लिन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और डॉ. लोहिया कहलाने लगे। 

बचपन से ही राजनीति और देश सेवा के संस्कार डॉ. लोहिया को अपने पिताश्री से मिलने शुरू हो गए थे, जो कि गांधीजी के अनुयायी थे। पिता हीरालाल गांधीजी से मिलने जब भी जाते, तो डॉ. लोहिया को अपने साथ ले जाते। इन मुलाकातों के दौरान महात्मा गांधी के विराट व्यक्तित्व का उन पर गहरा असर हुआ। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर डॉ. लोहिया ने बहुत कम उम्र में ही स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। देश की स्वाधीनता के लिए उन्होंने लंबा संघर्ष किया और जेल यात्राएं कीं। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने भूमिगत रहकर अद्भुत कार्य किया। स्वाधीनता संग्राम में उनके योगदान की अहमीयत को इसी से समझा जा सकता है कि 7 जून, 1940 को दोस्तपुर (सुल्तानपुर) में दिए गए क्रांतिकारी भाषण के कारण डॉ. लोहिया को गिरफ्तार कर लिया गया तथा दो वर्ष कैद की सजा सुनाई गई। तब इस घटना से आहत महात्मा गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार दी, “लोहिया और दूसरे कांग्रेस वालों की सजाएं हिन्दुस्तान को बांधने वाली जंजीर को कमजोर बनाने वाले हथौड़े के प्रहार हैं। सरकार कांग्रेस को सिविल-नाफरमानी आरंभ करने और आखिरी प्रहार करने के लिए प्रेरित कर रही है। जब तक डॉ. राम मनोहर लोहिया जेल में हैं, तब तक मैं खामोश नहीं बैठ सकता, उनसे ज्यादा बहादुर एवं सरल आदमी मुझे मालूम नहीं।” यह कहना असंगत न होगा कि देश को आजादी दिलाने में डॉ. लोहिया ने बेजोड़ भूमिका निभाई। 

डॉ. लोहिया ने अपने समाजवादी चिंतन से भारत में लोकतंत्रीय समाजवाद को प्रोत्साहित किया। उन्होंने जहां समाजवादी आंदोलन की रूपरेखा प्रस्तुत की, वहीं वर्ष 1934 में मुंबई के बर्लि स्थित ‘रेडिमनी टेरेस’ में ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ की स्थापना में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। वह इस नवगठित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य चुने गए तथा कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र के सम्पादक का महत्त्वपूर्ण दायित्व उन्हें सौंपा गया। एक संपादक के रूप में उन्होंने बखूबी अपनी भूमिका का निर्वहन किया तथा अपने लेखों से भारतीय जनमानस को उद्वेलित कर दिया। 

एक लेखक के रूप में डॉ. लोहिया ने समाजवादी चिंतन को उच्च आयाम दिए। उन्होंने अपनी चर्चित कृति ‘व्हील ऑफ हिस्ट्री’ में यह रेखांकित किया कि इतिहास, चक्र की गति से आगे बढ़ता है। इस व्याख्या के अंतर्गत उन्होंने चेतना की भूमिका को मान्यता देते हुए द्वंद्वात्मक पद्धति को एक नई दिशा में विकसित किया, जो हेगेल और मार्क्स दोनों की व्याख्याओं से भिन्न थी। इसी प्रकार उन्होंने अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘आस्पैक्ट्स ऑफ सोशलिस्ट पॉलिसी’ में समाज की संरचना की बड़ी सटीक व्यवस्था देते हुए ‘चौखंबा राज्य’ की अवधारणा प्रस्तुत की तथा यह प्रतिपादित किया कि यह व्यवस्था अपनाकर राज्य जहां समुदाय का सच्चा प्रतिनिधि बन सकता है, वहीं इसके द्वारा केंद्रीकरण एवं विकेंद्रीकरण की परस्पर विरोधी अवधारणाओं में सामंजस्य भी स्थापित किया जा सकता है। 

लोहिया का समाजवादी चिंतन अत्यंत व्यापक था। समाजवाद के एशियाई संदर्भ में उनके चिंतन की व्यापकता का पता चलता है। उन्होंने इस महाद्वीप के समस्त समाजवादियों को यह पैगाम दिया कि उन्हें इस महाद्वीप की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी नीतियां विकसित करनी चाहिए। यहां की सभ्यता सदियों पुराने निरंकुश तंत्र और सामंतवाद में से उभर कर सामने आई है। एशिया की राजनीति कठोर धार्मिक रूढ़ियों और राजनीतिक प्रथाओं का मिश्रण है, जो संकीर्ण मनोवृत्ति और सम्प्रदायवाद को जन्म देती है। लोकतंत्रीय राजनीति की किसी स्थिर परंपरा के अभाव में बहुधा आतंक और हत्याएं राजनीति का हिस्सा बन जाती हैं। एशिया के समाजवादियों को इन सब बुराइयों से जूझना होगा। उन्हें अपने लिए ऐसा मौलिक एवं विस्तृत समाज-दर्शन विकसित करना होगा, जो एशियाई समाज एवं राजनीति की विशेष परिस्थितियों से जुड़ी हुई व्याधियों का प्रतिकार कर सके। 

डॉ. लोहिया एक प्रखर समाजवादी चिंतक एवं राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ एक महान समाज सुधारक भी थे। वह जाति को एक ऐसी रूढ़िवादी शक्ति के रूप में अभिहित करते थे, जो जड़ता को बढ़ावा देती है और समाज को बंधी-बंधाई लीक पर चलने को विवश करती है। वह भारत के इतिहास में दासता के लंबे दौर को जाति-प्रथा की ही देन मानते थे। उनका कहना था कि यह दुष्प्रथा भारतीय जनजीवन को सदियों तक भीतर से कमजोर करती रही। इस जातिप्रथा के विरुद्ध अनथक संघर्ष करने वाले को ही सच्चा क्रांतिकारी मानना चाहिए। इस दृष्टि से बहुत सारे ऋषि-मुनि, साधु-संत और समाज सुधारक सच्चे क्रांतिकारी थे। डॉ. लोहिया ने सतीप्रथा का विरोध कर जहां सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार किया, वहीं विधवा पुनर्विवाह का समर्थन कर समाज सुधार की पहलें कीं। 

डॉ. लोहिया ने देश-सेवा एवं स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेकर जहां प्रेरक मिसालें पेश कीं, वहीं सच्चे समाजवादी होने के आदर्श प्रस्तुत किए। उन्होंने जहां समाज सेवा के क्षेत्र में आगे रहकर समाज सुधार की अलख जगाई, वहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन बनाने की स्वतंत्रता एवं जीवन के अंतरंग क्षेत्र की सुरक्षा पर विशेष बल देकर जीवंत लोकतंत्र की पैरोकारी की। 

डॉ. लोहिया का देहावसान वर्ष 1968 में हुआ। इस सच्चे देशभक्त ने देशवासियों के मन-मस्तिष्क पर अपने व्यक्तित्व-कृतित्व से अमिट छाप छोड़ी। जब-जब देश के स्वाधीनता संग्राम, समाजवाद, समाज सुधार एवं मातृभाषा की बात छिड़ेगी, डॉ. लोहिया अवश्य याद किए जाएंगे। 

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