रैगिंग पर निबंध | Essay on Ragging in Hindi

रैगिंग पर निबंध |

रैगिंग पर निबंध | Essay on Ragging in Hindi or रैगिंग अथवा रैगिंग के दुष्परिणाम 

प्रत्येक वर्ष विश्वविद्यालयों में नये शिक्षा सत्र आरंभ होने पर रैगिंग के नये मामले प्रकाश में आते हैं जो इस पुरानी बहस को नय सिरे से जन्म देते हैं कि इस सामाजिक शैक्षिक करीति को समाप्त करने के लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए ? आज रैगिंग महामारी का रूप धारण कर चका है जो शिक्षा रूपी वट वक्ष को खोखला बना रहा है। इसकी भयावहता इस बात से और भी बढ़ जाती है कि रैगिंग के हजारों मामले या तो प्रकाश में आते ही नहीं या पता चलने पर उन्हें विद्यालय की बदनामी या किन्हीं अन्य कारणों से दबाने का प्रयास किया जाता है। प्रत्येक वर्ष सैकड़ों छात्र, जो आंखों में संदर भविष्य की कल्पना लिये कालेज की दहलीज पर कदम रखते हैं. रैगिंग के दुष्प्रभाव से गंभीर मानसिक तनाव, अवसाद या शारीरिक विकृति से ग्रस्त हो जाते हैं, जिसकी परिणति आत्महत्या तक में हो सकती है। 

परिभाषाएक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर अपनी वरिष्ठता को स्थापित करने के उद्देश्य से किये गये आक्रामक व्यवहार को रैगिंग की संज्ञा दी जा सकती है। आमतौर पर विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में पुराने छात्रों द्वारा नये छात्रों पर धौंस जमाने के लिए किए गए कार्य रैगिंग के अंतर्गत आते हैं। 

“एक व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर अपनी वरिष्ठता को स्थापित करने के उद्देश्य से किये गये आक्रामक व्यवहार को रैगिंग की संज्ञा दी जा सकती है।”

रैंगिंग के प्रकार 

रैगिंग के अंतर्गत मुख्यतः मौखिक प्रताड़ना या अपमान, अमानवीय व कठिन कार्यों को अंजाम देने के लिए उकसाना या असामाजिक कृत्यों को सबके सामने अंजाम देने को विवश करना आते हैं। अश्लील तथा अपमानजनक बातें करना, द्विअर्थी प्रश्न पूछना, थप्पड़ मारना, अखाद्य पदार्थों को खाने के लिए विवश करना, एक पैर पर खड़ा रखना, विभिन्न शारीरिक मुद्राएं बनवाना या लैंगिक अपमान करना इसके मुख्य प्रकार हैं। इस तरह रैगिंग को मौखिक, शारीरिक व लैगिंक तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

कारण व प्रभाव

सामान्यतः रैगिंग का एक मात्र कारण पुराने छात्रों द्वारा नवआगंतुकों पर अपनी प्रभुसत्ता का एहसास दिलाना ही होता है। हालांकि इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए इसके कई अन्य कारण भी गिना दिये जाते हैं। जैसे कि रैगिंग छात्र को निर्भीक बनाता है या यह वातावरण को आनन्दमय बनाने व मेल जोल बढ़ाने का एक साधन है या यह नये छात्रों में अनुशासन की भावना का विकास करता है, आदि- आदि।

परन्तु सच्चाई इन सबसे मीलों दूर है। वास्तव में निर्भीकता वह गुण है जिससे व्यक्ति आने वाली परेशानियों से अवगत होने के बावजूद सिद्धांत और सच्चाई का दामन थामे रहता है। रैगिंग से शारीरिक दुर्घटना के अलावा गंभीर मानसिक तनाव भी पैदा होते हैं जिससे छात्रों के मूल उद्देश्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार तो परिस्थितियों के साथ सामंजस्य न कर पाने के कारण छात्र आत्महत्या तक कर लेते हैं।

आनंद के बहाने किया गया यह दुःसाहस अंततः दूरगामी कष्टकारी प्रभाव ही छोडता है जिससे शिक्षा का स्तर प्रदषित हए बिना नहीं रह सकता। रैगिंग के अन्तर्गत किये जाने वाले अनेक कृत्य संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का हनन करते हैं, जिससे व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में बाधा उत्पन्न होती है। 

“अभिभावक व विद्यालय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल, सत्रारंभ के समय हेल्पलाइन व हेल्प सेंटर की स्थापना, रैगिंग रोकने व निगरानी के लिए विद्यार्थियों की एक अस्थाई समिति का गठन, रैगिंग के दुष्प्रभावों व परिणामों पर विचार गोष्ठी का आयोजन जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाकर इस महामारी पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है।”

निराकरण के उपाय 

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहितवाद के निर्णय में रैगिंग को गैरकानूनी घोषित किया है। कई राज्य सरकारों ने भी इसे रोकने हेतु कानून बनाये हैं। परन्तु कहीं न कहीं इन कानूनों पर अमल करने की प्रतिबद्धता में कमी दिखाई पड़ती है।

इस विषय पर गठित राघवन समिति ने अपने रिपोर्ट में रैगिंग को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखने की वकालत की है। इसमें रैगिंग के छोटे व छिटपुट घटनाओं की पहचान कर सख्त निषेधात्मक रवैया अपनाने को कहा गया है ताकि महामारी को जड़ से समाप्त किया जा सके। रैगिंग का शिकार व्यक्ति या अभिभावक यदि संस्थान की कार्यवाही से संतष्ट नहीं है तो स्थानीय पलिस के पास प्राथमिकी दर्ज कराना आवश्यक करने की बात कही गयी है। रैगिंग की विभिन्न घटनाओं को भारतीय दंड संहिता की अलग-अलग धाराओं में दर्ज करने की बजाय रैगिंग की अलग धारा जोड़ने का भी सुझाव दिया गया है। उत्तर प्रदेश में रैगिंग की विकरालता को ध्यान में रखते हुए रैगिंग विरोधी विधेयक को प्रभावी बनाया गया था, जिसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं- 

दोषी पाये जाने वाले छात्र को दो वर्ष की कैद या 10,000 रुपये जुर्माना हो सकता है।

रैगिंग की शिकायत लिखित रूप में किसी भी छात्र, माता पिता, अभिभावक या किसी शिक्षक द्वारा कालेज प्रशासन को की जा सकती है।

कालेज प्रशासन शिकायत की जाँच करेगा और प्रथम दृष्टया दोषी पाये जानेपर छात्र को निष्काषित करेगा।

जिलाधिकारी से अनुमति प्राप्त कर छात्र के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई जा सकती है।

दोष सिद्ध होने पर छात्र पांच साल तक कहीं भी दाखिला नहीं ले सकता।

तीस दिन के अंदर कमिश्नर के यहां अपील की जा सकती है।

जाँच में रैगिंग साबित न होने पर शिकायतकर्ता को लिखित सूचना दी जाएगी।

शिकायत के बावजूद कार्रवाई न करने पर कालेज प्रमुख को दोषी माना जाएगा। 

क्या कानून ही पर्याप्त है ?

विभिन्न प्रतिषेधात्मक कानूनों के बावजूद रैगिंग एक महामारी का रूप धारण कर चुकी है जिसमें एक साल पूर्व इसका शिकार हो चुका विद्यार्थी ही अगले साल इस कुप्रथा को आगे बढ़ाने में जुट जाता है। इस तरह यह क्रम जारी रहता है। प्रत्येक वर्ष कानून को सख्ती से लागू करने की इच्छा व्यक्त की जाती है, पर कहीं-न-कहीं इसके कार्यान्वयन में शिथिलता ही परिलक्षित होती है। निश्चित ही, इस महामारी का समूल नाश करने हेतु सख्त कानून से इतर उपायों पर विचार करना अवश्यंभावी हो जाता है। 

किसी भी समस्या के समाधान के लिए उठाये गये कदम ऐसे नहीं होने चाहिए जो बाद में चलकर एक बड़ी समस्या को जन्म दें। सर दर्द का उपचार कभी सर काटना नहीं हो सकता। अतः समाधान के दूरगामी परिणामों का अवलोकन जरूरी है। विद्यार्थियों के साथ की जाने वाली सख्ती और पुलिस कार्रवाई उन्हें मुख्यधारा में लाने की बजाय अपराध की ओर धकेल सकती है, जिससे बचा जाना चाहिए।

रैगिंग करने वाले भी गुमराह विद्यार्थी ही हैं। अतः निषेधात्मक कानून की बजाय सुधारात्मक प्रक्रिया अपनाने पर बल दिया जाना चाहिए। कालेज की प्रतिष्ठा व प्रशासन की बदनामी के भय से मामले की लीपापोती का प्रयास न कर सच्चाई को स्वीकार करना होगा। विद्यालयों में आपसी विश्वास, एकता की भावना और सहयोग को बढ़ावा मिलना चाहिए। कालेज परिसर के अंदर अनुशासन स्थापित करने का दायित्व कालेज प्रशासन का होना चाहिए न कि पुलिस का। विद्यालय परिसर में की जाने वाली पुलिस कार्रवाइयों में अत्यंत संयम व सूझबूझ की आवश्यकता है जिससे शिक्षा का मूल उद्देश्य प्रभावित न हो तथा विद्यालय को छावनी में तब्दील होने से बचाया जा सके। गंभीर आपराधिक व अमानवीय घटनाएं ही पुलिस को सौंपी जानी चाहिए ताकि उन्हें गैर अनुशासन व उदंडता से पृथक किया जा सके। 

अभिभावक व विद्यालय प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल, सत्रारंभ के समय हेल्पलाइन व हेल्प सेंटर की स्थापना, रैगिंग रोकने व निगरानी के लिए विद्यार्थियों की एक अस्थाई समिति का गठन, रैगिंग के दुष्प्रभावों व परिणामों पर विचार गोष्ठी का आयोजन जैसे वैकल्पिक उपाय अपनाकर इस महामारी पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। 

आज आवश्यकता है इस समस्या को स्वीकार करने की। इसके निराकरण के वैकल्पिक उपायों पर अमल किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा संस्थानों की गरिमा और उपयोगिता को बरकरार रखते हुए इस समस्या को नियंत्रित किया जा सके। रैगिंग को नियंत्रित करने के सामाजिक प्रयास ही अंततः एक बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। 

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