रबीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध |Essay on Rabindranath Tagore in Hindi

रबीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध

रबीन्द्रनाथ टैगोर पर निबंध |Essay on Rabindranath Tagore in Hindi

विश्वविख्यात नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय तथा ‘जन गण मन…’ राष्ट्रीय गीत के रचयिता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई, सन 1862 को भारत की महानगरी कोलकाता में हुआ था। इनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर थे। ठाकुर परिवार में लक्ष्मी वास करती थी। अतः रवींद्रनाथ ठाकुर का बचपन बड़े घर के बच्चों की तरह नौकरों की देख-रेख में बीता। इनकी मां बचपन में ही चल बसी थीं, जिससे इन्हें मां के आंचल का स्नेह नहीं प्राप्त हुआ। परंतु इन्होंने इसे भगवान की मर्जी समझा। 

गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई थी। घर पर हर विषय के अलग-अलग शिक्षक रखे गए थे। वे अत्यंत प्रतिभावान एवं मेधावी छात्र थे। इनकी लेखनी से पहली कविता ‘अभिलाषा’ प्रस्फुटित हुई। इस प्रकार साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने जो कदम बढ़ाया, वह आजीवन बढ़ता ही रहा। इन्होंने अनेक कहानियों एवं उपन्यासों की भी रचना की।

चालीस वर्ष की अवस्था में गुरुदेव पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा। इनकी पत्नी का आकस्मिक देहांत हो गया तथा पुत्र-पुत्री की मृत्यु हो गई। इससे रवींद्रनाथ ठाकुर का हृदय संसार से विरक्त हो गया। ये एकांतवासी होकर साहित्य साधना में तल्लीन हो गए। कवि के शब्दों को हृदय का दर्द मिला। फलतः कवि की लेखनी से ‘गीतांजलि’ की मर्मस्पर्शी पंक्तियां फूट पड़ीं। इस विषय में कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है 

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान, 

उमड़कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।

‘गीतांजलि’ को विश्व-साहित्य में स्थान मिला। इसके लिए रवींद्रनाथ ठाकुर को ‘नोबल पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं-‘घर वापसी’, ‘काबुली वाला’, ‘पोस्ट मास्टर’, ‘तीन पुरुष’, ‘घर और बाहर’, ‘राजर्षि’, ‘गोरा’ आदि। इसके अलावा रवींद्र बाबू एक सफल चित्रकार भी थे। देश-प्रेम की भावना तो इनमें कूट-कूटकर भरी हुई थी। 

रवींद्रनाथ ठाकुर को स्कूल की वर्तमान व्यवस्था अच्छी नहीं लगती थी। वे स्कूलों की तुलना कल-कारखाने से करते थे। जैसे घंटी बजते ही कल कारखाने खुले जाते हैं, वैसे ही घंटी लगने से स्कूल खुल जाते हैं। अतः इन्होंने अपनी सोच के अनुरूप एक आदर्श विद्यालय ‘शांति निकेतन’ की स्थापना की, जो आज ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ का रूप ले चुका है। 

7 अगस्त, 1941 को इस महामानव का पार्थिव शरीर हमारे बीच से उठ गया। लेकिन इनकी कृतियां आज भी इन्हें अमर बनाए हुए हैं। कहा भी गया है, “जो कीर्तिशाली है, वही जीवित है।”

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