उत्पाद पेटेंट व्यवस्था पर निबंध |Essay on Product Patent Regime

उत्पाद पेटेंट व्यवस्था पर निबंध 

उत्पाद पेटेंट व्यवस्था पर निबंध 

विश्व व्यापार संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा करने के उद्देश्य से सरकार ने पेटेंट अधिनियम में संशोधन हेतु एक अध्यादेश गत 26 दिसंबर, 2004 को जारी किया था। इसके अनुसार बहु विवादित उत्पाद पेटेंट व्यवस्था जनवरी, 2005 से प्रभावी हो गई है। इससे पूर्व 1999 तथा 2002 के पेटेंट संशोधन अधिनियम प्रक्रिया द्वारा दवाओं, रसायनों तथा अनाज के मामलों में उत्पाद पेटेंट अभी तक लंबित था। विश्व व्यापार संगठन के बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते के तहत भारत को दवाओं, खाद्य पदार्थों तथा रसायनों के मामले में उत्पाद पेटेंट व्यवस्था को 1 जनवरी, 2005 तक लागू करना था। इस प्रतिबद्धता को संदर्भित अध्यादेश द्वारा पूरा किया गया है। 

विश्लेषकों का मत है कि उत्पाद व्यवस्था लागू होने पर शुरू के कुछ वर्ष तक इसका अधिक प्रभाव आम व्यक्तियों पर नहीं पड़ेगा, किंतु उन्नत दवाओं, रसायनों एवं कृषि बीजों के मूल्यों में भारी वृद्धि अवश्य होगी। विश्व व्यापार संगठन ने बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते के तहत नई खोजों पर आधारित उत्पादों के 20 वर्ष तक विपणन का विशेषाधिकार केवल शोधनकर्ता व्यक्ति अथवा कंपनी को प्राप्त होगा तथा उसे उनके मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतंत्रता होगी। इन आलोचनाओं का खंडन करते हुए सरकार ने दावा किया है कि नये अध्यादेश के कारण न तो दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर होंगी और न ही भारतीय उद्योगों पर इसका बुरा असर पड़ेगा। 

नये पेटेंट रिजीम में भारतीय फार्मा इंडस्ट्री को पहले से अधिक उन्नति के अवसर प्राप्त होंगे तथा बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से दवाएं सस्ती भी हो सकती हैं। इस संदर्भ में तीन तथ्यों का हवाला सरकार ने दिया है। एक तो यह कि बाजार में उपलब्ध 97 प्रतिशत दवाएं पेटेंट के दायरे में नहीं आती, इसलिए उनके महंगा होने का सवाल ही नहीं पैदा होता। दूसरे, पेटेंट के दायरे में आने वाली बाकी तीन प्रतिशत दवाओं में भी ऐसी अनेक दवाएं हैं, जिनके विकल्प बाजार में उपलब्ध हैं। तीसरे, भारत सरकार ने संशोधित कानून में जनहित की दृष्टि से 7 विशेष प्रावधान रखे हैं, जिनके द्वारा सरकार किसी भी पेटेंट को रद्द करने, पेटेंट शुदा प्रोजेक्ट का आयात करने अथवा किसी भी आविष्कार को अपने लिए इस्तेमाल करने का अधिकार रख सकेगी। 

विदित है कि एक दशक पूर्व भारत में पेटेंट कानून की बात डराती थी, क्योंकि तब ऐसे कानून से सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होता नजर आता था, किंतु आज हालात बदल गए हैं। अब स्वयं भारतीय दवा कंपनियों को विश्व बाजार में झंडे गाड़ने के लिए पेटेंट संरक्षण की आवश्यकता है। ज्ञातव्य हो कि 10 वर्ष पूर्व भारत का फार्मा निर्यात एक हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। भारतीय फार्मा का निर्यात प्रतिवर्ष 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। कंपनियां 6-8 प्रतिशत भाग अनुसंधान में लगा रही हैं। इन परिस्थितियों में वर्तमान कड़े पेटेंट कानून से भारतीय दवा बाजार को नुकसान नहीं, अपितु फायदा होने जा रहा है। 

उल्लेखनीय है कि ट्रिप्स समझौते के अनुपालन हेतु 1970 के पेटेंट अधिनियम में यह तीसरा संशोधन 26 दिसंबर, 2004 के अध्यादेश द्वारा किया गया तथा 23 मार्च, 2005 को इसे संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया। पहला संशोधन विधेयक मार्च, 1999 में अधिसूचित किया गया था, जो 1 जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ था। जून, 2002 में अधिसूचित दूसरा संशोधन विधेयक 1 जनवरी, 2005 से प्रभावी हुआ है। 

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