ग्रामीण समाज की समस्याएं पर निबंध | Essay on Problems of Rural Society in Hindi

ग्रामीण समाज की समस्याएं पर निबंध

ग्रामीण समस्याएँ और उनका समाधान (Rural Problems And Their Solution) 

“भारत की आत्मा यहाँ के गाँवों में बसती है.” यह कथन उतना ही सत्य है जितना जल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का होना. यही कारण है कि भारत जैसे कृषिप्रधान व ग्रामप्रधान देश को विकसित बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रह जाएगा जब तक कि हमारे सभी गाँवों में जीवन की सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो जाती. अगर हमारे गाँव ही समस्याओं से त्रस्त हैं, तो सफल लोकतंत्र का दंभ भरना उचित नहीं होगा. यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि जिस सशक्त व सुदृढ़ ग्रामीण आधारभूत ढाँचे की बात ‘महात्मा गांधी’ ने भारत के विकास के लिए निर्धारित की थी, वह आज भी कोसों दूर है. आज आजादी के 58 साल बीत जाने के बाद भी हमारी अधिकांश ग्रामीण जनता जीवन की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के लिए अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. गौरतलब है कि भारत की 65% से अधिक आबादी आज भी गाँवों में ही निवास करती है, परन्तु जनसंख्या के अनुपात में इन्हें भारत के आर्थिक विकास का लाभ नहीं मिल पा रहा है. वास्तव में भारत के ‘स्वराज्य’ का इनके लिए कोई अर्थ नहीं रहा है. आज भी असंख्य गाँव राज्य की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाए हैं. अपने को जनहितैषी तथा विकास का नारा बुलंद करने वाली सरकार ने कभी भी ग्रामीण समस्याओं को गम्भीर रूप से नहीं लिया है. प्रायः हर सरकार शहरी जनता को ही खुश करने में लगी रहती है. 

एक बात और ध्यान देने योग्य है कि जो गाँव शहर के जितने पास होते हैं उनके विकास की सम्भावनाएं बनी रहती हैं, परन्तु दूरदराज के पिछड़े गाँवों के प्रति न तो केन्द्र सरकार, न ही राज्य प्रशासन और न ही जिला प्रशासन अपना कर्तव्य निभाता है. यही कारण है कि हमारे गाँव सभ्यता की दौड़ में पीछे छूट गए हैं. 

भारतीय गाँवों की समस्याओं में भी विविधता देखने को मिलती है. बिहार उत्तर प्रदेश की ग्रामीण समस्याएं पंजाब-हरियाणा के गाँवों की समस्या से अलग हैं, वहीं पूर्वोत्तर राज्य के गाँवों की समस्याएं शेष भारत से भिन्न हैं. समस्या चाहे अलग-अलग हों, परन्तु इनके कारण हमारी ग्रामीण जनता का सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मानसिक विकास अवरुद्ध हो रहा है. अतः इनका तत्काल समाधान आवश्यक है अन्यथा जिस ‘भारत : 2020’ के प्रति हम इतने आशान्वित हैं, वह मृग मरीचिका ही साबित होगी.

ग्रामीण समस्याएं एवं समाधान 

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही संविधान में उल्लिखित ग्रामीण कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए विभिन्न पंचवर्षीय योजनाएँ एवं समय-समय पर ग्रामीण विकास के सपने को साकार करने के लिए अनेक कार्यक्रम लागू किए जाते रहे हैं. इनमें से कुछ सफल व कुछ असफल हुए, परन्तु विकास के नाम पर खर्च अरबों रुपए तथा सरकारी तंत्र का वृहत प्रयोग भी समन्वित विकास स्थापित नहीं कर पाया. आज भी अपनी क्षेत्रीय विविधता एवं व्यापक प्रभाव रखने वाली निम्नलिखित समस्याएं ग्रामीण विकास के नाम पर सुरसा की भांति मुँह बाए खड़ी हैं 

(क) गरीबी-गरीबी को इस संसार में सबसे बड़ा अभिशाप माना जाता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह भयंकर रूप धारण कर चुकी है. वर्तमान में भारत की 78 करोड़ ग्रामीण आबादी में लगभग 30% अर्थात् 20-21 करोड़ आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही है. ‘बीमारू राज्यों में तो प्रायः ग्रामीण आबादी का 70-80% गरीबी की मार झेलने को विवश है. गाँवों में आज भी कई परिवारों को दो जून की रोटी भी नसीब नहीं होती, जबकि देश के गोदाम अनाजों से भरे पड़े रहते हैं, काम के अभाव तथा आमदनी अत्यंत कम होने के कारण ये न तो अच्छा खा पाते हैं, न पहन पाते हैं और न ही अच्छे घरों में रह पाते हैं, शिक्षा-स्वास्थ्य मनोरंजन तो दूर की बात है. 

समाधान-हालांकि आजादी के बाद ग्रामीण-गरीबी दूर करने के लिए कृषि के विकास पर जोर दिया गया जिससे कुछ खास क्षेत्रों- पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र आदि के गाँवों में अभूतपूर्व परिवर्तन आया, परन्तु अनेक राज्य इससे अछूते रह गए. अतः समय-समय पर सरकार ने अनेक योजनाएं यथा-ट्राइसेम, आई.आर. डी.पी., ड्वाकरा, प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (PMGY) इत्यादि चलाए हैं और आगे भी चलाए जाएंगे, सबसे ज्यादा जरूरी है-इन योजनाओं का सही ढंग से कार्यान्वयन.. 

(ख) बेरोजगारी वस्तुतः बेरोजगारी सभी ग्रामीण समस्याओं की जड़ है, क्योंकि समस्त समस्याएं किसी-न-किसी प्रकार से इसी से उत्पन्न हुई हैं और शायद इसी से सभी समस्याओं का निदान भी सम्भव है. प्रायः गाँवों में लोग हर तरह के कार्य करने में सक्षम होते हैं और वे काम करना भी चाहते हैं, परन्तु रोजगार के अभाव में वे पहले बेरोजगार तत्पश्चात् गरीब बन जाते हैं. शहरी बेरोजगारी (वार्षिक वृद्धि 1-2%) की तुलना में ग्रामीण बेरोजगारी की दर (2.5%) भी अधिक है. गाँवों में कृषि का काम प्रायः 7 से 8 महीने ही रहता है. शेष महीने किसानों को बेकार बैठे रहना पड़ता है. इसी प्रकार गाँवों में खेतों में प्रत्यक्ष रूप से काम मिलकर भी लोग अर्द्धबेरोजगारी का शिकार हो जाते हैं. यह अदृश्य तथा मौसमी लगातार लोगों की कार्यक्षमता घटाती जा रही है. गौरतलब है कि ग्रामीण आबादी का लगभग 7.21% अर्थात् कुल 20 करोड़ ग्रामीण बेरोजगार हैं. 

समाधान ग्रामीण आधारित अर्थव्यवस्था की स्थापना, कुटीर, लघु उद्योगों के विकास पर बल, कृषि में पर्याप्त निवेश, किसानों को सालों भर कृषि उपलब्ध कराकर ही ग्रामीण बेरोजगारी को नियंत्रित किया जा सकता है. सरकार ने भी गरीब मजदूरों, भूमिहीन श्रमिकों व बेरोजगारों को उचित आय प्रदान करने के लिए अनेक योजनाएं यथा- अंत्योदय योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम इत्यादि चलाए हैं. 

(ग) कृषिगत समस्याएं खेत जोताई से लेकर फसल की बिक्री तक किसानों को अनेक समस्याओं से दो चार होना पड़ता है. कृषि यंत्रों का परम्परागत व अवैज्ञानिक होना, सिंचाई का अभाव, मानसून पर निर्भरता, अच्छे बीज-खाद-यंत्र खरीदने लायक पूँजी की कमी, सरकारी ऋण मिलने में कठिनाई, महाजनों के दाँव पेंच, अत्याधुनिक कृषि के प्रति अज्ञानता, फसल बिक्री की समस्या, फसल सुरक्षा, भण्डारण की समस्या व सब्सिडी का लगातार कम होता जाना, एक गरीब किसान के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए काफी है. यही सब कारण है कि आज आंध्र प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक इत्यादि राज्यों से भी कृषकों के आत्महत्या की खबरें आने लगी हैं. वस्तुतः छोटे व गरीब किसानों के लिए खेती अब लाभदायक पेशा नहीं माना जाता, बल्कि वे इसे मजबूरी में करने को विवश हैं. इन समस्याओं से तंग आकर ही लोग शहर की ओर भाग रहे हैं. हाल के वर्षों में कृषि उत्पाद की वार्षिक वृद्धि दर का 1-5% पर स्थिर होना कृषि के प्रति घटते आकर्षण का प्रतीक है. 

समाधान-दसवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानकर इसमें सार्वजनिक व दीर्घकालीन निवेश उपलब्ध कराने का निर्णय लिया गया है. जल निकायों की उचित देखरेख, बाढ़ की रोकथाम, आश्वस्त सिंचाई, उचित दर पर सरलता से ऋण की प्राप्ति व किसानों के लिए खुली मंडी स्थापित करने जैसे उपायों के साथ उन्हें वैज्ञानिक खेती में सहयोग देना भी जरूरी है. 

(घ) सामाजिक समस्याएं भारतीय गाँवों में अनेक सामाजिक कुप्रथाएं, जैसे-अंधविश्वास, जाति-प्रथा, लिंगभेद, भ्रूण हत्या, शोषण, जादू टोना, दहेज प्रथा, सती प्रथा इत्यादि प्रचलित हैं जिन्हें घृणास्पद सत्य कहना उचित होगा. गाँवों में छुआछूत व ऊँच-नीच का भाव भी मौजूद है जो अन्दर ही अंदर गाँव के विकास को बाधित करता है. इनके कारण गाँव में मारपीट व हिंसा का माहौल बन जाता है. इन समस्याओं में सर्वाधिक भयावह जातिप्रथा व दहेज प्रथा है, क्योंकि एक ओर जहाँ जाति प्रथा के कारण ग्रामीण टुकड़ों में बँटकर तनाव बढ़ाते हैं, वहीं दहेज प्रथा से महिलाओं की स्थिति धीरे-धीरे और भी खराब हो रही है. 

समाधान-शिक्षा को बढ़ावा देकर, अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देकर, लोगों में जागरूकता लाकर व कड़े कानूनों का निर्माण कर हम सामाजिक समस्याओं पर अंकुश लगा सकते हैं, परन्तु जनजागरण इसकी सबसे पहली आवश्यकता होगी. 

(ङ) बिजली का अभाव आज हर आवश्यक कार्य में ऊर्जा के लिए बिजली की जरूरत होती है, परन्तु देश के कुल 14 करोड़ ग्रामीण परिवारों में लगभग 6 करोड़ परिवारों को बिजली की सुविधा न होना शायद ‘लालटेन युग’ का सूचक है. शेष गाँवों में भी बिजली की निरंतर आपूर्ति संदेहात्मक रही है. बिजली की कमी से कृषि पैदावार पर बुरा असर पड़ रहा है. ‘बीमारू राज्यों में तो 80% जनता बिजली कमी का रोना रो रही है. 

समाधान-ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (1969-70) तथा हाल की राष्ट्रीय ग्रिड योजना समस्त गाँवों को विद्युतीकृत करने के लिए एक सराहनीय कदम है, परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में गोबर गैस से बिजली उत्पादन तथा छोटे बाँध द्वारा जल उत्पादन ज्यादा लाभदायक सिद्ध होता. 

(च) अशिक्षा-एक तरफ तो हम सूचना प्रौद्योगिकी में उन्नत होने का दंभ भरते हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे गाँवों में बच्चे बुनियादी शिक्षा के अभाव में कच्ची उम्र में ही कामों में लग जाते हैं. ऐसा अनुमान है कि लगभग 60 हजार गाँव आज भी विद्यालयविहीन हैं. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा आदि राज्यों में लोग शिक्षा के प्रति उदासीन से हो गए हैं, बिना शिक्षा के उनसे एक जागरूक नागरिक के कर्त्तव्य की उम्मीद नहीं की जा सकती है. शिक्षा के अभाव के कारण वे जाने-अनजाने बीमारियों को घर ले आते हैं, रोगों के लक्षण नहीं जान पाते हैं, सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं. 

समाधान-प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य व निःशुल्क बनाना ही इसके लिए सक्षम नहीं है, हमें ग्रामीणों को शिक्षा के प्रति आकर्षित करना होगा. दोपहर में भोजन, मनोरंजन, व्यावसायिक शिक्षा, छात्रवृत्ति इत्यादि के द्वारा शिक्षा प्रसार को बढ़ाया जा सकता है. 

(छ) पेयजल की समस्या शुद्ध पेय-जल मानव के लिए उतना ही जरूरी है जितना साँस लेने के लिए शुद्ध हवा, परन्तु गाँवों में पेयजल की सुविधा न होने से ग्रामीणों को शुद्ध जल के लिए कई मील दूर जाना पड़ता है. फलतः वे गंदे जल को पीकर हैजा, टाइफाइड, पीलिया जैसे रोग के शिकार हो जाते हैं. गर्मियों में तो स्थिति और भी खराब हो जाती है. 

समाधान-सरकार भौम जल स्तर को उचित स्तर पर लाने के लिए समय-समय पर अनेक योजनाएं यथा- चौधरी चरणसिंह नलकूप योजना, स्वजल धारा योजना इत्यादि चला रही है. निःशुल्क बोरिंग का स्थापित किया जाना भी सराहनीय है. 

(ज) आवास कुल ग्रामीण- आबादी का लगभग 20% अर्थात 15 करोड़ लोग ऐसे जगह में रह रहे हैं, जिन्हें कम से कम आवास नहीं कहा जा सकता. प्रतिवर्ष आने वाली बाढ़ घरवालों को भी बेघर बना जाती है. बरसात में कच्चे घरों के ढहने से ग्रामीणों की अक्सर मौत होती रहती है. सरकार ने आवास समस्या को सुलझाने के लिए अनेक योजनाएं यथा ग्रामीण आवास योजना, इंदिरा आवास योजना चलाई हैं. 

(झ) अन्य समस्याएं 

(1) ग्रामीण सड़कों की हालत असंतोषजनक है.

(2) कुपोषण की समस्या.

(3) स्वास्थ्य संस्थाएं जैसे अस्पताल का अभाव,

(4) धार्मिक क्रियाओं पर अधिक खर्च.

(5) महिलाओं के साथ भेदभाव.

(6) जनसंख्या में तीव्र वृद्धि.

(7) संचार साधनों का अभाव. 

(8) उद्योग व कारखानों की कमी.

समन्वित मिशन 

ग्रामीण समस्याओं को सुलझाने के लिए महामहिम राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के सैद्धान्तिक विचारों को केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने ‘पूरा मॉडल’ अर्थात् ‘प्रोवाइडिंग अर्बन एमिनिटिस इन रूरल एरीयास’ की संज्ञा दी है, परन्तु इसके सफल क्रियान्वयन के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है तभी ग्रामीण विकास का सपना पूरा हो सकेगा. 

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