भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध | Essay on Problem of Unemployment in India

भारत में बेरोजगारी की समस्या पर निबंध |

भारत में बेरोजगारी अथवा भारत में बेरोजगारी की समस्या (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2004 एवं यूपी लोअर सबॉर्डिनेट परीक्षा, 2006) अथवा बेरोजगारी और युवा आक्रोश (यूपीपीसीएस मुख्य परीक्षा, 2007) अथवा बेकारी की समस्या (बिहार पीसीएस मुख्य परीक्षा, 2016) 

“भूमंडलीकरण से प्रभावित लोगों के लिए रोजगारविहीन विकास, आनंदविहीन विकास है।” -एम.एस. स्वामीनाथन 

विकास और रोजगार के संबंध में स्वामीनाथन जी ने जो कहा, वह भारतीय संदर्भ में आज भी प्रासंगिक है। बेरोजगारी इस देश के लिए अभिशाप है और इसके बने रहने तक यकीनन हमारा विकास आनंदविहीन और फीका है। भारत की अर्थव्यवस्था विकासशील होने के कारण यहां बेरोजगारी का स्वरूप उन देशों से भिन्न है, जहां की अर्थव्यवस्था विकसित है। 

एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि बेरोजगारी है क्या? बिना शास्त्रीय परिभाषा में जाए, अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो बेरोजगारी से तात्पर्य उपलब्ध श्रमशक्ति में रोजगार में लगे श्रमिकों को घटाने से जो श्रम शक्ति बचती है उसे बेरोजगारी कहते हैं जबकि किसी देश की श्रम शक्ति से अभिप्राय उन व्यक्तियों से है जो 15-65 आयु वर्ग के हैं। 

एक प्रश्न यह भी है कि कब किसी व्यक्ति को बेरोजगार माना जाए। प्रो. राजकृष्ण इसके संबंध में चार कसौटियों की बात करते हैं—(1) यदि कोई व्यक्ति किसी वर्ष में इष्टतम पर्व रोजगारीय घंटे या दिन से काम करता है तो उसे हम समय आधार पर बेरोजगार कहेंगे। (2) यदि कोई वांछित न्यूनतम स्तर से कम आय अर्जित करता है तो उसे आय कसौटी पर बेरोजगार कहेंगे। (3) यदि कोई व्यक्ति वर्तमान में लगे हुए काम से अधिक कार्य करने के लिए इच्छुक है तो उसे इच्छुकता के आधार पर बेरोजगार कहेंगे। तथा (4) यदि किसी व्यक्ति के रोजगार से निकालने के बाद भी कुल उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़े तो उसे निष्पादन आधार पर बेरोजगार कहेंगे। 

“बेरोजगारी इस देश के लिए अभिशाप है और इसके बने रहने तक यकीनन हमारा विकास आनंदविहीन और फीका है।” 

भारत में संरचनात्मक स्वरूप की बेरोजगारी अपने भयावह स्वरूप में विद्यमान है। यहां की बेरोजगारी के मुख्य दो विभाजन हैं (1) शहरी बेरोजगारी, (2) ग्रामीण बेरोजगारी। शहरी बेरोजगारी दो प्रकार की हो सकती है—(1) औद्योगिक श्रमिकों में पायी जानेवाली बेरोजगारी, (2) शिक्षित बेरोजगारी। 

औद्योगिक श्रमिकों में पायी जानेवाली बेरोजगारी मुख्यतया संगठित क्षेत्र में है। औद्योगिक क्षेत्र में पायी जाने वाली बेरोजगारी मुख्य रूप से औद्योगिक क्षेत्र के विकास की कम दर के कारण है। 

शिक्षित बेरोजगारी मुख्यतया शहरी क्षेत्रों में पायी जाती है। इसका मुख्य कारण एक ओर दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है जिसका व्यावसायिक पहलू कमजोर है और शिक्षा व्यावसायिक मांग या आवश्यकता के अनुरूप नहीं है तथा दूसरी ओर रोजगार सृजन के अवसरों में धीमी वृद्धि है। 

राष्ट्रीय दृष्टि से शिक्षित बेरोजगारी सबसे गंभीर समस्या है क्योंकि इसमें श्रमिक पर शिक्षा व्यय के रूप में विनियोग होता है पर उस पर प्रतिफल नहीं मिलता। 

ग्रामीण क्षेत्रों में पायी जाने वाली बेरोजगारी दो प्रकार की होती है-(1) मौसमी बेरोजगारी और (2) प्रच्छन्न बेरोजगारी। 

गांवों में कृषि की जुताई, बुवाई, कटाई आदि कायों के समय तो श्रम को रोजगार मिलता है, परंतु जब कृषि का समय नहीं रहता तो रोजगार नहीं मिलता। तात्पर्य यह कि वर्ष के कुछ भाग में काम नहीं रहता है। ऐसे समय में पायी जानेवाली बेरोजगारी को हम मौसमी बेरोजगारी कहते हैं। यह बेरोजगारी स्थायी स्वभाव की होती है। 

भारत में देखा गया है कि खेत में उत्पादन के दृष्टतम स्तर को प्राप्त करने के लिए जितने लोगों की आवश्यकता होती है उससे अधिक लोग खेती में लगे रहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें यदि खेती से निकाल दिया जाए तो भी कृषि से प्राप्त कुछ उत्पादन में कोई कमी नहीं होगी, ऐसे श्रमिकों को हम प्रच्छन्न बेरोजगार कहते हैं। भारतीय कृषि की यह सबसे विचित्र पर गंभीर समस्या है।

बेरोजगारी चाहे किसी भी प्रकार की क्यों न हो, बेरोजगारी एक अभिशाप, संत्रास और कलंक होती है। इससे युवा असंतोष पनपता है, जिसके घातक परिणाम सामने आते हैं। भारत में किसी एक कारण से बेरोजगारी की समस्या नहीं है। यहां इसके अनेक कारण हैं, जिनपर गौर करना समीचीन रहेगा। मुख्य कारण इस प्रकार हैं 

जनसंख्या में तीव्र वृद्धि : स्वतंत्रता के बाद से देश में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि दर्ज की गयी है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि का पता इसी से चलता है कि पिछले दशक (2001-2011) में भारत की जनसंख्या में 18.2 करोड़ की वृद्धि हुई, जो ब्राजील (विश्व में जनसंख्या के संदर्भ में 5वां स्थान) की कुल जनसंख्या के निकट है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होती है जो अंततः बेरोजगारों की भीड़ बढ़ाते हैं। देश में गरीबी भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है, क्योंकि पूंजी के अभाव में बेरोजगारी बढ़ती है। 

दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली : भारत में लार्ड मैकाले द्वारा शुरू की गयी शिक्षा प्रणाली आज भी लागू है। इस शिक्षा प्रणाली की शुरुआत अंग्रेज प्रशासकों की सहायता के लिए क्लर्क पैदा करने के लिए की गई थी। आज भी हम उसी परिपाटी पर चल रहे हैं। व्यावसायिक शिक्षा तथा कौशलपूर्ण शिक्षा का हमारे देश में अभाव है। गांव का युवा वर्ग माध्यमिक या उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने को सरकारी नौकरी के काबिल समझने लगता है और उसी के लिए प्रयास करने लगता है। उद्यमशीलता के अभाव के कारण वह किसी और दिशा में सोच ही नहीं पाता। चार-छह वर्षों के भटकाव के बाद उसे ज्ञात होता है कि वह गलत दिशा में प्रयास कर रहा था। पढ़-लिख कर उसने कोई व्यवसाय चुना होता तो अधिक अच्छा होता। 

दोषपूर्ण योजनाएं : भारत में 1951 से पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा विकास के कार्य किए जा रहे हैं। पिछली लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं के एजेंडा का अध्ययन किया जाय तो सभी में एक साम्यता जो नजर आती है वह है रोजगार के सृजन अथवा बेरोजारी को कम करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया है। इन योजनाओं में यह मान लिया गया है कि विकास करने से बेरोजगारी स्वतः समाप्त हो जायेगी। 

धीमा औद्योगिक विकास और घटती कृषि विकास दर : औद्योगिक विकास भी अपेक्षाकृत धीमा रहा है, जिससे उद्योगों में रोजगार सृजन नहीं हो पाया जबकि दूसरी ओर कृषि विकास की दर निरंतर घटती जा रही है। इससे दोहरी मार पड़ रही है, क्योंकि कृषि विकास दर के धीमा पड़ने से कृषि क्षेत्र में लगे लोग भी बेरोजगार हो यह भी ध्यान देने योग्य है कि कृषि एवं उद्योगों में नवीन तकनीकों के प्रयोग से जिन कार्यों के लिए अधिक श्रमिक लगते थे अब उन कार्यों हेतु मशीनों का प्रयोग होने लगा है। इससे भी बेरोजगारी में वृद्धि हुई है। 

बेरोजगारी बढ़ने से देश में अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हुई हैं। युवा-तनाव एवं युवा-असंतोष बढ़ा है, जो हिंसा और अराजकता के रूप में आए दिन सामने आ रहा है। बेरोजगारी से परेशान युवकों को आत्महत्या तक करते देखा जा रहा है। बेरोजगारी के कारण ही अपराध और भ्रष्टाचार में इजाफा हुआ है। इसके अनेक सामाजिक दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। इससे युवकों में निराशा के भाव बढ़ते हैं और वे नशाखोरी की ओर उन्मुख हो जाते हैं। कहने का आशय यह कि बेरोजगारी ने देश में अनेक प्रकार की विसंगतियों व विद्रूपताओं को जन्म दिया है। 

“बेरोजगारी बढ़ने से देश में अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा हुई हैं। युवा-तनाव एवं युवा-असंतोष बढ़ा है, जो हिंसा और अराजकता के रूप में आए दिन सामने आ रहा है। बेरोजगारी से परेशान युवकों को आत्महत्या तक करते देखा जा रहा है।” 

ऐसा नहीं है कि सरकार द्वारा देश में बेरोजगारी दूर करने की पहलें न की गई हों। सबसे महत्त्वपूर्ण पहल तो ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (NREGA) के रूप में वर्ष 2005 में की गई, जिसे 2 अक्टूबर, 2009 को नया नाम ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) दिया गया। रोजगार के इस महा-अभियान के तहत प्रत्येक वित्त वर्ष में न्यूनतम 100 कार्य दिवसों का अकुशल श्रम रोजगार उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया। 2 फरवरी, 2016 को मनरेगा ने अपने 10 वर्ष पूरे किए। रोजगार की दृष्टि से वर्ष 2016 में सरकार द्वारा शुरू की गईं ‘स्टार्ट अप इंडिया’ एवं ‘स्टैंड अप इंडिया’ पहलें महत्त्वपूर्ण मानी जा रही हैं, क्योंकि इनमें उद्यमशीलता को प्रोत्साहित कर स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया गया है। युवकों को विभिन्न प्रकार के रोजगारों हेतु प्रशिक्षण के उद्देश्य से जहां जुलाई 2015 में ‘कौशल भारत अभियान’ का सूत्रपात किया गया, वहीं वर्ष 2014 में देश के ग्रामीण क्षेत्रों के 15-35 वर्ष के युवकों के कौशल विकास और उनमें उत्पादक क्षमता का विकास करने के उद्देश्य से ‘दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना’ का श्रीगणेश किया गया। बेरोजगारी भगाने की ये सरकारी पहले श्लाघनीय अवश्य हैं, किंतु ये बेरोजगारी की समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन सकतीं। ये पहले हमें बेरोजगारी की समस्या से अंशतः ही उबार सकती हैं, जबकि आवश्यकता इस समस्या के स्थायी समाधान की है। 

भारत से बेरोजगारी को भगाने के लिए हमें इस समस्या के निवारण हेतु स्थायी उपाय करने होंगे। इसके लिए हमें सबसे पहले आर्थिक विकास की गति को तीव्र करना होगा। आर्थिक विकास की गति तीव्र होने पर रोजगार की उपलब्धता स्वतः बढ़ती है, तो आर्थिक क्रिया-कलापों में लोगों की भागीदारी भी बढ़ती है। अतः आर्थिक क्षेत्र को मजबूत एवं गतिशील बनाकर हमें बेरोजगारी की समस्या का स्थायी हल निकालना होगा। बेरोजगारी की समस्या को दूर करने के लिए हमें बचत एवं निवेश को भी प्रोत्साहन प्रदान करना होगा। रोजगार के लिए पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है और पूंजी का संचय बचत से ही हो सकता है। इसके लिए हमें बचत की आदत को प्रोत्साहित करना होगा। 

बेरोजगारी की समस्या से उबरने के लिए हमें जनसंख्या को नियंत्रित करना होगा, क्योंकि जनसंख्या में तीव्र वृद्धि से आर्थिक विकास तो मंद पड़ता ही है, संसाधनों एवं रोजगार की कमी भी पैदा होती है। श्रम शक्ति तो बढ़ती जाती है, अवसर घटते जाते हैं। अतः जनसंख्या को नियोजित रखकर ही इस समस्या से उबरा जा सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाना होगा। हमारा देश कृषि प्रधान हे और लोगों की कृषि पा निर्भरता अधिक है। भूमि सीमित है, लोग ज्यादा हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र पर जनसंख्या के भार को कम करने के लिए हमें गैर-कृषि आर्थिक गतिविधियों पर ध्यान देना होगा। साथ ही आर्थिक क्रिया-कलाप में श्रम प्रधान युक्तियों को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि अधिक से अधिक लोग समायोजित हो सकें।

बेरोजगारी की समस्या के समाधान हेतु हमें स्वनियोजन को वरीयता देनी होगा। इसके तहत उद्यमी युवकों को जहां रोजगारपरक प्रशिक्षण दिया जाए, वहीं उन्हें वित्तीय सहायता, ऋण, कच्चे माल एवं विपणन आदि की समुचित सुविधाएं देकर स्वावलंबी बनाया जाए। साथ ही शिक्षा में भी बदलाव की आवश्यकता है। रोजगारों की उपलब्धता बढ़ाने एवं बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए हमें शिक्षा को व्यवसायोन्मुखी तो बनाना ही होगा, विद्यार्थियों को प्रारंभ से ही अपनी जीविका के लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करना होगा। इन उपायों के अलावा उच्च उत्पादकता को बनाए रखकर, आय वितरण में व्याप्त असमानताओं को कम कर एवं नियोजन कार्यालयों को विस्तार देकर हम बेरोजगारी की समस्या का स्थायी हल निकाल सकते हैं। 

बेरोजगारी हमारे देश के लिए अभिशाप है। यह कुंठा एव असंतोष को जन्म देकर अन्य अनेक प्रकार की समस्याएं भी पदा करती है। इस समस्या का समाधान हमें यथाशीघ्र करना होगा। इस लिए समग्र प्रयासों की आवश्यकता है। प्रयास होते दिख भी रहे है। भविष्य अच्छी संभावनाओं से भरा दिख रहा है। 

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