प्रसाद योजना पर निबंध |Essay on Prasad Scheme

प्रसाद योजना पर निबंध

प्रसाद योजना पर निबंध |Essay on Prasad Scheme  |प्रसाद योजना (Prasad Scheme) 

भारत विविध धर्मों का देश है। यही भारत की सांस्कृतिक विशिष्टता भी है। इस पावन भूमि पर विविध धर्मों के तीर्थस्थल हैं, जो कि आस्था के केन्द्र हैं। विविध धर्मों के धार्मिक स्थलों से लोगों का विश्वास और आस्था तो जुड़ी ही है, इनसे उनका भावनात्मक जुड़ाव भी है। मथुरा का कृष्ण जन्मभूमि मंदिर हो या अजमेर की ख्वाजा साहब की दरगाह. सभी आस्था और अटट विश्वास के केन्द्र हैं। आस्थावानों का यहाँ तांता लगा रहता है। ऐसे ही चुनिंदा धर्मस्थलों और अधिक दिव्य एवं दर्शनीय स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से इनके कायाकल्प का निर्णय केन्द्र सरकार द्वारा ‘प्रसाद योजना’ के रूप में लिया गया है। 

भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा वर्ष 2014-15 में ‘तीर्थ यात्रा कायाकल्प और आध्यात्मिक उन्नयन अभियान’ (Pilgrimage Rejuvenation and Spiritual Agumentation Drive : PRASAD) का शुभारंभ किया गया तथा 100 करोड़ रुपए का कुल बजट आवंटित किया गया। इस योजना का प्रबंधन पर्यटन मंत्रालय के जिम्मे हैं। 

जैसा कि नाम से ही विदित होता है, यह योजना जहाँ तीर्थस्थलों का कायाकल्प कर तीर्थयात्रा को सुगम और सुविधाजनक बनाएगी, वहीं इस प्रकार आध्यात्मिक उन्नयन का पथ भी प्रशस्त करगी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य सभी धर्मों के तीर्थ स्थलों पर सुविधाओं और अधोसंरचना में सुधार कर आध्यात्मिकता का संवर्धन करना है। यह योजना धार्मिक समरसता को बढ़ाने वाली भी है, क्योंकि इससे सभी धों के तीर्थस्थलों को जोडा गया है। इसके तहत पर्यटन का तो विकास किया ही जाना है, तीर्थस्थलों को आध्यात्मिक केन्द्रों का स्वरूप भी प्रदान किया जाना है। 

प्रसाद योजना के तहत विकास और अधोसंरचना में सुधार के लिए पहले 12 तीर्थस्थलों की पहचान की गई थी, जिन्हें बाद में बढ़ाकर 25 कर दिया गया। वर्ष 2018 की अद्यतन स्थिति के अनुसार चिन्हित किए गए तीर्थस्थल हैं–पटना (बिहार), गया (बिहार), द्वारका (गुजरात), अमृतसर (पंजाब), अजमेर (राजस्थान), कांचीपुरम तमिलनाडु), वेल्लंकनी (तमिलनाडु), पुरी (ओडिशा), वाराणसी (उत्तर प्रदेश), मथुरा (उत्तर प्रदेश), केदारनाथ (उत्तराखण्ड), कामाख्या (असम), अमरावती (आंध्र प्रदेश), बद्रीनाथ (उत्तराखण्ड), अयोध्या (उत्तरप्रदेश), सोमनाथ (गुजरात), त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र), श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश), तिरुपति (आंध्र प्रदेश), हजरतबल (जम्मू-कश्मीर), कटरा (जम्मू कश्मीर), देवघर (झारखण्ड), गुरुवायूर (केरल), ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश) तथा वेलूर (कर्नाटक)। इन सभी तीर्थस्थलों का समग्र विकास प्रसाद योजना के तहत किया जाना है। 

‘प्रसाद’ एक सुचिंतित योजना है। इस योजना को कार्यान्वित | करने के लिए पर्यटन मंत्रालय में एक मिशन निदेशालय की स्थापना की गई है, जबकि योजना की निगरानी समीक्षा और समग्र मार्गदर्शन की जिम्मेदारी के साथ अध्यक्ष के रूप में पर्यटन मंत्रालय के प्रभारी मंत्री के साथ एन एस सी (राष्ट्रीय संचालन समिति) का गठन किया गया है। इस योजना के तहत चुने गए तीर्थस्थलों का एकीकृत विकास इस प्रकार किया जाना है कि तीर्थयात्री को यहाँ आने पर संतुष्टि प्रदान | करने वाला पूर्ण धार्मिक अनुभव प्राप्त हो तथा उसकी धार्मिक चेतना का संवर्धन हो। योजना के तहत तीर्थस्थलों के विकास में जहाँ समुदाय आधारित विकास को वरीयता दी गई है, वहीं उस पर्यटन अवधारणा को बल प्रदान किया गया है, जो गरीबों के हित में हों। इसके तहत पहचाने गए क्षेत्रों में आजीविका के अधिकाधिक अवसर सृजित किए जाने के लिए स्थानीय कला, संस्कृति, हस्तशिल्प तथा खान-पान को प्रोत्साहन प्रदान किया जाना है। योजना को रोजगारोन्मुख बनाते हुए तीर्थस्थलों का विकास किया जाना है। इसके तहत धार्मिक स्थलों में विश्वस्तरीय अधोसंरचना के विकास के जरिए एक स्थायी तरीके से पर्यटकों का आकर्षण बढ़ाया जाना है। तीर्थस्थलों या विरासत गंतव्यों के आधारभत ढांचे का विकास करते हए इसमें गंतव्य प्रवेश बिन्दुओं का विकास एवं उन्नयन करना शामिल है। 

प्रसाद योजना के तहत सड़क, रेल, जल परिवहन, यात्री टर्मिनल, ए टी एम, मुद्रा विनिमय काउंटर, पर्यटन सूचना, व्याख्या केन्द्र सहित सभी प्रकार की मूलभूत सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी। खास बात यह है कि इस योजना के तहत उस परिवहन व्यवस्था पर ध्यान दिया गया है, जो कि पर्यावरण हितैषी हो। पर्यावरण हितेषी परिवहन के साथ-साथ ध्वनि प्रकाश शो, रोमांचकारी जल क्रीड़ाएँ, ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत, प्रतीक्षालय, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, मोबाइल सेवाएँ, वाई-फाई, हॉट-स्पॉट आदि का विकास भी इसमें शामिल है। 

‘प्रसाद योजना’ को अत्यंत लाभकारी माना जा रहा है। धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भारत अत्यंत समृद्ध है। यहाँ अनेक धर्मों के अनुयायी रहते हैं। हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख धर्मों और सूफी सम्प्रदाय आदि को मानने वालों की अच्छी संख्या भारत में तो है ही, इनके अनुयायी विदेशों में भी हैं। इस प्रकार इस योजना के माध्यम से देशी विदेशी पर्यटन को बल मिलेगा। घरेलू पर्यटन के लिए तो यह विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि धार्मिक भावनाओं द्वारा प्रेरित धार्मिक पर्यटन (तीर्थ पर्यटन) की भारत में एक समृद्ध परम्परा रही है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से पर्यटन उद्योग को बल मिलेगा, राजस्व बढ़ेगा और हमारी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। 

यह योजना गरीबों के हित में पर्यटन की अवधारणा का अनुसरण करती है तथा समुदाय आधारित विकास पर केन्द्रित है। इसका अपना अलग फायदा है। इससे गरीबों और स्थानीय समुदायों को फायदा पहुँचेगा। स्थानीय समुदायों के बीच आय के स्रोतों में वृद्धि होगी, तो आजीविका और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। स्थानीय समुदाय पर्यटन के महत्त्व को समझेंगे और इसके प्रति उनमें जागरूकता बढ़ेगी। इस योजना के जरिए स्थानीय कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं खान-पान आदि को भी प्रोत्साहन मिलेगा। विदेशी 

स्वदेशी पर्यटक अपने साथ इनसे जुड़े सुखद अनुभव लेकर जाएंगे। इस योजना में सभी धर्मों के तीर्थस्थलों का ध्यान रखा गया है, जिससे धार्मिक समरसता और साम्प्रदायिक सौहार्द को बल मिलेगा। 

‘प्रसाद योजना’ के सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ एहतियात भी बरतने होंगे। चूँकि यह योजना सम्पूर्ण भारत को आच्छादित करती है, अतएव इसके सुचारू क्रियान्वयन के लिए राज्यों का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। प्रायः राज्यों की अपनी अलग पर्यटन नीति होती है, जिसके चलते वे केन्द्र की किसी योजना को उस तरह से तरजीह नहीं देते हैं, जिस तरह देनी चाहिए। राज्यों और केन्द्र के बीच समन्वय का अभाव इस योजना में गतिरोधक बन सकता है, अतः इस दिशा में ध्यान दिया जाना जरूरी है। राज्यों एवं केन्द्र के बीच समन्वय के अभाव के कारण ही कुछ समय पहले परिवहन, पर्यटन और संस्कृति पर संसद की स्थायी समिति ने यह सिफारिश की, कि पर्यटन मंत्रालय इस योजना पर पुनर्विचार करे। यह इस योजना का नकारात्मक पक्ष है | 

राज्यों और केन्द्र के बेहतर समन्वय से यह योजना अच्छे परिणाम दे सकती है। यह संभावनाओं से भरी योजना है, जिसमें तीर्थस्थलों के कायाकल्प के साथ-साथ रोजगार और आर्थिक विकास की अवधारणा भी निहित है। इसमें गरीबों और स्थानीय समुदायों का भी ध्यान रखा गया है। आजीविका और रोजगार के नवीन अवसरों के सृजित होने से गरीबों और स्थानीय समुदायों की स्थिति सुधरेगी और उनका जीवन-स्तर अच्छा होगा। इससे जहाँ आतिथ्य संस्कृति विकसित होगी, वहीं हमारे तीर्थस्थलों की साज-सज्जा एवं सुविधाएं विश्वस्तरीय होंगी। 

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