भारत में गरीबी की समस्या पर निबंध | Essay on Poverty Problem in India

भारत में गरीबी की समस्या पर निबंध

भारत में गरीबी की समस्या पर निबंध | Essay on Poverty Problem in India 

नहि दरिद्र सम दुःख जग माहीं” (गोस्वामी तुलसीदास)–निर्धनता लालसा है ऐसे बालक की, जो स्कूल के बाहर तो खेलता है परन्तु स्कूल में प्रवेश नहीं कर सकता, क्योंकि उसके माता-पिता के पास पुस्तकें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं. निर्धनता उन माता-पिता का रोग है जो अपने तीस वर्षीय बालक को मरते देख सकते हैं, परन्तु इलाज नहीं करा सकतें (लिस्टर आर. ब्राउन).

संघर्ष संकुल इस संसार में अति गरीबी मानवमात्र के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है, राष्ट्र के पवित्र भाल पर कलंक का काला धब्बा है. मानवता का उपहास करने वाली अति गरीबी से युक्त व्यक्ति अकिंचन होता है, आर्थिक समस्याओं से ग्रस्त रहता है तथा पराश्रयी हो जाता है. उसके कार्य करने की क्षमता में गिरावट आती है तथा वह आत्मोत्थान के सभी साधनों से रहित होता है. सामाजिक अवनति की पराकाष्ठा निर्धनों की इच्छाओं, आकांक्षाओं, स्वप्नों एवं मनोरथों को नाना रूपों में उत्पन्न करती है तथा क्षण-भर में उसी प्रकार निर्मूल कर देती है जैसे जलाशय में उत्पन्न बुलबुले क्षण-भर में विलीन हो जाते हैं- “उत्पद्यन्ते विलीयन्ते दरिद्रणां मनोरथाः,” अर्थात् दरिद्रों के मनोरथ उत्पन्न होने के साथ ही विलीन हो जाते हैं. 

अति गरीबी की समस्याएं-मानव जीवन नानाविध समस्याओं से आक्रान्त रहता है उन सबमें अति गरीबी की समस्या परमदुःखदायिनी, क्लेशकारिणी तथा शोचनीय है, क्योंकि यह एक ऐसी सामाजिक विकृति है जिससे अभिशप्त मनुष्य अपनी न्यूनतम मौलिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं कर पाता. यह समर्थ तथा सम्पन्न व्यक्तियों के जीवन की सुख-शान्ति को भी हड़प कर सकती है. इस प्रकार यह समस्या व्यष्टिगत के साथ ही साथ समष्टिगत भी है. इसकी कतिपय प्रमुख समस्याओं का विवेचन आगे किया जा रहा है 

(1) अतिनिर्धनता के दुष्चक्र का उत्पन्न होना-अति गरीबी समस्याओं के एक ऐसे चक्रव्यूह को उत्पन्न करती है, जिसका भेदन अगर असम्भव नहीं तो दुष्कर अवश्य है. इस कुचक्र में प्रत्येक समस्या दूसरी समस्याओं का कारण होती है तथा परिणाम भी. 

(क) बचत करने के लिए धन नहीं रहता. इससे विनियोग की क्षमता विनष्ट हो जाती है. फलतः उत्पादन में कमी होती है और गरीबी में वृद्धि होती रहती है. 

(ख) लोगों की ऋणग्रस्तता बढ़ती है और इस भँवरजाल में फँसकर लोग आजीवन गरीब बने रहते हैं. 

(ग) अशिक्षा की स्थिति उत्पन्न होती है. इससे अज्ञान का प्रादुर्भाव होता है. फलतः लोग जनसंख्या में वृद्धि करते हैं. इससे प्रति व्यक्ति आय में कमी आती है और अति गरीब फिर अति गरीब बनता जाता है. 

(2) बाल श्रम की समस्या– अति गरीबी बाल श्रम जैसी वीभत्स समस्या को जन्म देती है जो मानवता के नाम पर कलंक है. वस्तुतः अति गरीबी के कारण जब परिवार के लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था करना भी दुष्कर हो जाता है तब माता-पिता न चाहते हुए भी यह सोचने एवं कहने के लिए मजबूर होते है कि बच्चे भी कुछ कमा कर लाएं तथा उनकी आर्थिक सहायता करें. इस अभिवृत्ति के फलस्वरूप खेलने खाने की उम्र वाले छोटे-छोटे बच्चे कमाऊ पूत बन जाते हैं, परन्तु आर्थिक अभाव तथा कठोर परिश्रम के कारण लगभग एक तिहाई बाल मजदूर कुपोषण के शिकार हो जाते हैं. तन्मयता से कार्य करने के पश्चात् भी उन्हें समुचित मात्रा में पौष्टिक आहार प्राप्त नहीं होता. अति निर्धनता के कारण वे अमानवीय परिस्थितियों में, मानसिक तथा शारीरिक शोषण के पश्चात् भी काम करने को मजबूर होते हैं. वस्तुतः बाल मजदूरी की विवशता परिवार की दयनीय अवस्था में ही निहित है, क्योंकि अति-निर्धनता की स्थिति में जीवनयापन करने वाले परिवारों में परिवार के संसाधनों के लिए बच्चे की भागीदारी इतनी आवश्यक है कि अगर बच्चा उसमें योगदान न करे, तो निश्चित ही वह चरमरा जाएगी. 

इस प्रकार अभिभावकों की अति गरीबी बाल-श्रम को जन्म देती है और अनेक पुष्पों को खिलने के पूर्व ही मुरझा जाना पड़ता है. 

(3) कुपोषण की समस्या- अति निर्धनता की समस्या कुपोषण को जन्म देती है. इससे लोगों का स्वास्थ्य स्तर नीचे गिरता है तथा कार्यकुशलता में हास होता है. 

(4) अशिक्षा की समस्या- अति गरीबी से ग्रस्त परिवार पर अशिक्षा की काली छाया मंडराती रहती है. इस कोटि के अधिसंख्य लोगों के लिए यह उक्ति चरितार्थ होती है “काला अक्षर भैंस बराबर”. यही कारण है कि द. एशिया का क्षेत्र जहाँ इस कोटि के अधिसंख्य जन निवास करते हैं अपनी प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते, शिक्षा और प्रशिक्षण के अभाव में मानसिक विकास के अवसर घट जाते हैं. 

(5) शोषण की समस्या- अति निर्धनता का ही यह प्रतिफल है कि समाज के धनिक वर्ग द्वारा अति निर्धन वर्ग का शोषण किया जाता है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण ग्रामों में दृष्टिगत होता है. वस्तुतः अति निर्धन व्यक्ति का भूत, भविष्य तथा वर्तमान सब अंधकाराछन्न होता है. अति गरीब व्यक्ति निर्धनता में जन्म लेता है, फलता है और काल कवलित हो जाता है. आर्थिक शोषण के अलावा नारियों का शारीरिक शोषण भी होता है. वे अपनी आर्थिक विवशता के कारण मुँह भी नहीं खोल सकती हैं और अपमान के खून का यूंट पीकर रह जाती हैं. 

(6) न्यूनतम मौलिक आवश्यकताओं के उपभोग में कमी सम्बन्धी समस्या- अति निर्धन व्यक्ति भोजन, वस्त्र तथा आवास जैसी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहता है. वह तंग बस्तियों में आधे पेट भोजन तथा अर्द्धनग्न अवस्था में अपना जीवनयापन करता है. वह लाचार तथा विवश होता है. गदे वातावरण में रहने के कारण ये संक्रामक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं. पड़ोसी इनसे परहेज करने लगते हैं. 

(7) अव्यवस्था एवं अराजकता-अति गरीबी कभी-कभी जनाक्रोश एवं असन्तोष का वातावरण उत्पन्न कर देती है. आतंकवाद एवं नक्सलवाद जैसी समस्याओं के मूल में अति गरीबी ही है. ये स्थितियाँ समाज में अव्यवस्था एवं अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं. ऐसी स्थिति पूर्वोत्तर राज्यों, कश्मीर, बिहार के दक्षिणी भाग एवं मध्य भाग तथा तेलंगाना क्षेत्र में विशेष रूप से पाई जाती है. 

(8) सामाजिक तिरस्कार सम्बन्धी समस्या-अति गरीब व्यक्ति को सामाजिक तिरस्कार का भी सामना करना पड़ता है. उसे हीन भावना से देखा जाता है. अति निर्धनता के कारण बन्धु-बान्धव उसकी उपेक्षा करते हैं, घनिष्ट मित्र विमुख हो जाते हैं तथा विपत्तियाँ आत्मसात् कर लेती हैं. वह उपेक्षा एवं उपहास का पात्र बन जाता है. 

(9) बुराइयों की जड़-अति गरीबी समस्त सामाजिक बुराइयों का मूल है. भूखा मनुष्य कौनसा पाप नहीं करता-“बुभुक्षितः किं न करोति पापम्?” वस्तुतः इस स्थिति को प्राप्त मनुष्य विवेकहीन हो जाता है, उसे कर्त्तव्याकर्तव्य का ज्ञान नहीं रहता तथा वह पुण्यापुण्य के विवेक से रहित होता है. चोरी, डकैती, छीना-छपटी, लुट-खसोट तथा कत्ल के समाचार नित्य प्राप्त होते हैं. इन सभी के पीछे अति गरीबी की प्रेरणा रहती है. 

(10) सर्वनाश का कारण- अति निर्धनता सर्वनाश का कारण है. अति गरीबी से लज्जा विदा हो जाती है, लज्जाहीन मनुष्य तेजहीन हो जाता है, निस्तेज व्यक्ति लोक से तिरस्कृत होता है, तिरस्कृत मानव में आत्मग्लानि का प्रादुर्भाव होता है, उसकी बुद्धि क्षीण हो जाती है और बुद्धिहीनता उसके सर्वनाश का हेतु बनती है. 

निष्कर्ष-अति गरीबी की समस्या सुरसा की भाँति मुख विस्तार कर हमें भयाक्रान्त कर रही है. अति गरीबी बाल-मजदूरी का कारण, बाल-विवाह की प्रेरिका, कुपोषण की जन्मदाता, अशिक्षा को प्रकट करने वाली तथा सामाजिक तिरस्कार का कारण है. यह तंग बस्तियों में रहने को विवश करती है, शोषण का मार्ग प्रशस्त करती है, वर्तमान एवं भविष्य को अंधकारमय बनाती है, जीवन के थपेड़ों को सहने को मजबूर करती है तथा अराजकता की स्थिति उत्पन्न करती है. अति निर्धन व्यक्ति की निराशा घनीभूत हो जाती है, स्वप्न टूट जाते हैं एवं मनोरथ विफल हो जाते हैं. निर्धनता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अभिशाप है; शान्ति, सुख एवं सम्पन्नता का शत्रु है, तथा विद्रोह का पर्याय 

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