पोटा कानून पर निबंध(आतंकवाद निरोधी अधिनियम पर निबंध) | Essay on POTA Law

पोटा कानून पर निबंध

पोटा कानून पर निबंध(आतंकवाद निरोधी अधिनियम)

भारत में आतंकवाद का प्रसार धीरे-धीरे चरम सीमा की ओर हो रहा है। यहां तक कि देश की राजधानी नई दिल्ली का सबसे सुरक्षित क्षेत्र संसद भवन भी आतंकवादी गतिविधियों की चपेट में आने से अछूता नहीं रहा। ऐसी हालत में भारत के उत्तरवर्ती सीमांत प्रांत जम्मू-कश्मीर की बात चौंकाने वाली नहीं लगती। आतंकवादियों ने उस स्थान को भी अपना निशाना बनाने से परहेज नहीं किया, जहां देश के शीर्षस्थ नेता एकमुश्त आतंकवादियों को उपलब्ध हो चुके थे। वह तो संसद भवन में कड़े सुरक्षा प्रबंध तथा चौकसी का सुपरिणाम था कि देश में सबसे बड़ा हादसा होते-होते टल गया। 

ऐसी स्थिति में तत्कालीन सरकार द्वारा आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए सख्त कानून बनाना गैर-मुनासिब नहीं था। लेकिन पोटा कानून बनने के बाद भी आतंकवाद पर अंकुश नहीं लग सका, बल्कि आलोचकों की दृष्टि में आतंकवादी गतिविधियां काफी बढ़ गईं। कुछ समय पहले पोटा कानून लगने के लिए काफी चर्चित रहा है। पोटा कानून 16 अक्टूबर, 2001 को लागू हुआ, परंतु इसे संसद के संयुक्त अधिवेशन में 26 मार्च, 2002 को पेश किया गया। पोटा कानून लागू होने के कुछ बिंदु निम्नलिखित हैं- 

ऐसी कोई कार्रवाई जिसमें हथियारों या विस्फोटकों का इस्तेमाल हुआ हो अथवा किसी व्यक्ति की मौत हो गई हो या वह घायल हो गया हो, तो इसे आतंकवादी कार्रवाई मानी जा सकती है। 

किसी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा हो या सरकारी काम काज बाधित हुआ हो और देश की एकता एवं अखंडता को खतरा हो।। 

पोटा के तहत सिर्फ शंका के आधार पर गिरफ्तारी हो सकती है। । बिना वारंट के पुलिस कहीं भी तलाशी ले सकती है। 

आरोपी को तीन माह तक अदालत में आरोप पत्र दाखिल किए बिना हिरासत में रखा जा सकता है। आरोपी की संपत्ति जब्त भी की जा सकती है। आरोपी का पासपोर्ट एवं यात्रा संबंधी कागजात रद्द किए जा सकते हैं। 

पोटा कानून का साया किसी भी व्यक्ति के सिर पर पड़ सकता है। यह भी हो सकता है कि आरोपी व्यर्थ ही संदेह में फंस गया हो। तब उसे पोटा से मुक्ति पाने हेतु उतने ही पापड़ बेलने पड़ेंगे, जितने कि वास्तविक आरोपी को बेलने पड़ते हैं। इस तरह पोटा नि:संदेह कड़ा कानून होने के बाद भी पारदर्शी नहीं है। आतंकवाद के दमन के लिए कड़े से कड़े कानून की आवश्यकता है। लेकिन यदि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण कोई व्यक्ति पोटा की चपेट में आ जाता है, तो उसके साथ न्याय के बजाय अन्याय ही होगा। 

इस कठोर कानून का साया एम.डी.एम.के. नेता वाइको और उत्तर प्रदेश के निर्दलीय विधायक राजा भैया पर पड़ा था। वाइको को इसकी गिरफ्त में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने डाला और राजा भैया को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने। इस कानून में एक अन्य बात है कि अदालत केंद्र और राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना किसी मामले में संज्ञान नहीं लेगी। 

इतना ही नहीं, इस मामले में जांच-पड़ताल का अधिकार पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी से नीचे वालों को नहीं होगा। आरोपी द्वारा इकबालिया बयान को सबूत तभी माना जाएगा, जब वह बयान पुलिस अधीक्षक द्वारा दर्ज किया जाए। यदि इस कानून की चपेट में आ जाने पर आरोप सिद्ध नहीं हुआ, तो सरकार द्वारा मुआवजा देने का प्रावधान है। 

विपक्षी दलों द्वारा आपत्ति किए जाने पर केंद्र सरकार ने इस विधेयक में कुछ बदलाव किया है, जो इस प्रकार है- 

पोटा कानून के तहत सजा की अवधि पांच साल से कम करके तीन साल कर दी गई है। 

पत्रकारों से संबंधित प्रावधानों में ढील दी गई है। 

अपराध साबित होने पर कम से कम तीन साल की सजा और अधिक से अधिक मौत की सजा दी जा सकती है।

अगर पोटा के विषय में निष्पक्ष बातें की जाएं, तो यह कहा जाएगा कि पोटा इतना कड़ा कानून है, जिसमें फंस जाने का भय फंस जाने के बाद के भय से ज्यादा है। इसलिए यह कानून आतंकवादी गतिविधियों को स्वत: नियंत्रित करता है। अनियंत्रण की अवस्था में पोटा लागू होता ही है। 

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