जनसंख्या वृद्धि पर निबंध | जनसंख्या वृद्धिः अभिशाप या वरदान | जनसंख्या विस्फोट : समस्या एवं समाधान 

जनसंख्या वृद्धि पर निबंध

जनसंख्या वृद्धिः अभिशाप या वरदान (Population Explosion : Curse or Boon) अथवा जनसंख्या विस्फोट : समस्या एवं समाधान (यूपी लोअर सबॉर्डिनेट मुख्य परीक्षा, 2002)  अथवा जनसंख्या वृद्धि पर निबंध 

भारत में बढ़ती जनसंख्या की स्थिति चिंताजनक है। जनसंख्या वृद्धि एक ऐसी समस्या है, जो अनेक समस्याओं की जननी है। मसलन, बढ़ती गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी एवं रोटी-कपड़ा और मकान जैसी समस्याएं भी जनसंख्या वृद्धि का ही परिणाम हैं। जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण न पाने का ही यह नतीजा है कि भारत हर साल आस्ट्रेलिया की कुल आबादी के बराबर अपनी आबादी बढ़ा लेता है। जनसंख्या विस्फोट से अभिप्राय उस स्थिति से होता है, जिसमें प्रभावी आर्थिक विकास के अभाव में प्रजननता दर में तो कमी नहीं आती, किंतु मृत्यु दर में तीव्र गिरावट के कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि होती है। इस स्थिति में मौजूदा आर्थिक संसाधन बढ़ती हुई आबादी के लिए पर्याप्त नहीं हो पाते तथा अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। 

भारत में जनसंख्या विस्फोट जैसी स्थिति सामने है। विश्व में चीन के बाद भारत दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है। हम 1.30 अरब का आंकड़ा पार कर चुके हैं। विश्व जनसंख्या पूर्वानुमान रिपोर्ट, 2019 (World Population Prospects, 2019) के अनुसार भारत वर्ष 2027 तक चीन को पीछे छोड़कर विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास बहत प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं। देश की जनसंख्या में वार्षिक शतांकी वृद्धि दर औसतन 1.64% है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में हम चीन को पछाड़ कर पहले पायदान पर आ जाएंगे। इसकी पुष्टि वर्ल्ड पापुलेशन प्रास्पेक्ट्स के रिवीजन में भी हुई है, जिसमें बताया गया है कि वर्ष 2028 तक भारत, विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। यहां पर उन कारणों पर दृष्टिपात कर लेना उचित रहेगा, जो भारत में जनसंख्या वृद्धि के लिए उत्तरदायी हैं। रूढ़िवादी मान्यताओं के चलते जहां पुत्र-प्राप्ति की कामना निरंतर बच्चों को जन्म देने के लिए उत्तरदायी है, वहीं अशिक्षित लोग अधिक संतान उत्पत्ति को ईश्वर की देन मानते हैं और इस पर नियंत्रण नहीं करते। जल्द संतान प्राप्ति की कामना तथा संतानों के मध्य पर्याप्त अंतर न रखने के कारण भी जनसंख्या में तीव्र वृद्धि होती है। हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, दूरदर्शिता एवं धन के अभाव के चलते लोग संतान उत्पत्ति में बाधक साधनों को नहीं अपना पाते और जनसंख्या वृद्धि के माध्यम बने रहते हैं। देश में प्रजनक आयु वर्ग का प्रतिशत अधिक होना, गर्भ निरोधक सुविधाओं का सर्वत्र उपलब्ध न होना, अशिक्षा एवं जागरूकता की कमी आदि भी जनसंख्या वृद्धि के कारण हैं। इन सब के अलावा जनसंख्या वृद्धि का सर्वप्रमुख कारण है भारत की उच्च प्रजनन दर। 

“भारत जैसे देश में बढ़ती आबादी अभिशाप जैसी ही है, क्योंकि इससे जुड़ी तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए हम तैयार नहीं हैं।” 

जनसंख्या वृद्धि के कारण देश के समक्ष चुनौतियों का बढ़ना स्वाभाविक है। इसका एक पहलू यह भी है कि जनसंख्या जब बढ़ती है, तो उसी के अनुरूप प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी बढ़ता है, जिससे पर्यावरण एवं जैव विविधता भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है। खाद्यान्न संकट भी बढ़ता है। बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधन तेजी से घटने लगे हैं और आने वाले दिनों में स्थिति इस कदर भयावह हो जाएगी कि इनके अभाव में जीवन कठिन हो जाएगा। 

भारत जैसे देश में बढ़ती आबादी अभिशाप जैसी ही है, क्योंकि इससे जुड़ी तमाम चुनौतियों का सामना करने के लिए हम तैयार नहीं हैं। जिस तरह से भारत की जनसंख्या बढ़ रही है तथा जिस तेजी से रोजी-रोटी की तलाश में गांवों से लोगों का पलायन शहरों की तरफ बढ़ रहा है, उसे देखते हुए भारत की शहरी आबादी वर्ष 2030 तक 140.7 प्रतिशत हो जाएगी। देश में शहरों का मूलभूत ढांचा ऐसा नहीं । है कि इतनी अधिक आबादी के दबाव को बर्दाश्त कर सके। जब आबादी का बोझ उठाने की स्थिति में शहर नहीं रहेंगे, तो आने वाले समय में तमाम बुनियादी सुविधाओं जैसे-सड़क, बिजली, पानी, चिकित्सा और शिक्षा आदि पर अतिशय दबाव बढ़ेगा, जिससे त्रासद स्थितियां निर्मित होंगी। बढ़ती जनसंख्या के कारण आने वाले दिनों में आधारभूत सुविधाओं से जुड़ा भारतीय परिदृश्य खौफनाक हो जाएगा। देश की बढ़ती आबादी के साथ पेयजल की किल्लत भी बढ़ेगी। पानी की किल्लत का मौजूदा परिदृश्य ही काफी भयावह है, आने वाले दिनों में यह और भयावह एवं विकराल होगा क्योंकि पानी की मांग और अधिक बढ़ेगी। इन स्थितियों में देश की दो-तिहाई व 88 प्रतिशत शहरी आबादी शुद्ध पेयजल से वंचित रहेगी। 

बढ़ती आबादी के कारण रोजगार की समस्या भी सिर उठा रही है, जिससे युवा असतोष तो बड़ा ही है, भ्रष्टाचार एवं अपराध जैसी समस्याएं भी बढ़ी है। उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी जब युवक को नौकरी नहीं मिलती तो वह आक्रोशित हो उठता है। व्यवस्था के प्रति उसका आक्रोश बढ़ता है और यही आक्रोश अक्सर उसे अपराध की तरफ ले जाता है। वह चारित्रिक स्खलन का शिकार हो जाता है। भारत में रोजगार की स्थिति अच्छी नहीं है। इतना बड़ा देश होने के बावजूद यहां बेरोजगारों की फौज दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। 

तेज गति से बढ़ रही देश की जनसंख्या ने जहां विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर गतिरोध पैदा किया है, वहीं संसाधनों की उपलब्धता में भी कमी आई है और यह प्रतिव्यक्ति घटी है। जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण देश की जनसांख्यिकीय संरचना में भी विकृतियां आई हैं। लिंगानुपात में असंतुलन की मौजूदा स्थिति इसमें प्रमुख है। वृद्धों की जनसंख्या का बढ़ना भी विकास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है। तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या ने एक तरफ तो कृषि पर अत्यधिक दबाव डाला है, तो दूसरी तरफ कृषि भूमि को धीरे-धीरे आवासीय क्षेत्र में परिवर्तित किया जा रहा है, जिसके भविष्य में दूरगामी परिणाम होंगे। जनसंख्या विस्फोट के कारण देश में अक्सर खाद्यान्न संकट भी पैदा होता रहता है, जिससे निपटने के लिए हमें विदेशों से खाद्यान्न आयात करना पड़ता है और इसके लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। जनसंख्या विस्फोट के परिणाम स्वरूप लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्राकृतिक संसाधनों जैसे-जल, वायु, भूमि एवं खनिज संसाधन आदि के अनियंत्रित एवं अव्यवस्थित उपयोग ने जहां प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है, वहीं हमारी नदियां भी दृषित हुई हैं। 

कुल मिलाकर, बढ़ती हुई जनसंख्या ने अनेक प्रकार की समस्याओं की सौगातें तो दी ही हैं, देश के विकास को भी बाधित किया है। अनेकानेक सामाजिक-आर्थिक समस्याएं बढ़ती जनसंख्या की ही देन हैं। इससे जीवन संघर्ष भी बढ़ा है। स्थिति बहुत कुछ रेल के उस सामान्य श्रेणी के दर्जे जैसी हो गई है, जिसमें जगह तो कम होती है, मगर मुसाफिर ज्यादा होते हैं। नतीजतन जगह को लेकर महासंग्राम जैसा दृश्य भारतीय रेल के इन डिब्बों में आप रोज देख सकत हैं। जनसंख्या के बढ़ते दबाव ने हर क्षेत्र में मारामारी को बढ़ाया है। ऐसे में जनसंख्या को नियंत्रित करना एवं जनसांख्यिकीय संतुलन का बनाए रखना निहायत जरूरी है, अन्यथा देश का भविष्य अभिशप्त होगा। जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी अंकुश लगाने के लिए सार्थक पहलों की आवश्यकता है। इसके लिए जहां जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है, वहीं सीमित परिवारों को प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। यदि परिवार को सीमित रखने वालों को सरकार कुछ रियायतें देकर प्रोत्साहित करे तो यह पहल दूसरों के लिए प्रेरक सिद्ध हो सकती है। मसलन, एक या दो बच्चे वाले परिवारों को हम शिक्षा में वरीयता दें, उन्हें छात्रवृत्तियां दें तथा ऐसी ही कुछ अन्य पहले कर प्रोत्साहन प्रदान करें। साथ ही बढ़ी हुई जनसंख्या के दबाव से उबरने के लिए हमें जनसंख्या नियोजन का हुनर भी सीखना होगा। 

जनसंख्या वृद्धि से जुड़ा एक कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह हमारे लिए वरदान भी साबित हो सकती है, बशर्ते हम इसका सकारात्मक इस्तेमाल करते हुए इसे विकास की दौड़ का हिल्सा बनाए। वस्तुतः जनसंख्या, खासतौर से युवकों की जनसंख्या को किसी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है। यही वह पूंजी है, जो किसी देश को उत्कर्ष पर पहुंचा सकती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनसंख्या के बड़े आकार और श्रेष्ठ गुणात्मक विशेषताओं के ऊपर ही किसी देश का बहुमुखी विकास निर्भर करता है। 

चीन का उदाहरण हमारे सामने है। अभी तक वह विश्व की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। उसकी आबादी उसके लिए वरदान साबित हो रही है। चीन की सबलता का एक बड़ा कारण उसकी आबादी इसलिए है, क्योंकि उसने अपनी बुनियादी सुविधाओं का विकास कर जनसंख्या को विकास की दौड़ में शामिल करने की योग्यता हासिल कर ली है। चीन ने विकास के क्षेत्र में ऊंची छलांग लगाई है, जिसे देखकर अमेरिका तक हैरतजदा है। अपनी राष्ट्रीय उत्पादकता को बढ़ाकर उसने विश्व मंच पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई है। इस सब के पीछे उसकी ‘मैन पॉवर’ का विशेष योगदान है। चीन ने अपने आधारभूत ढांचे को सुधार कर जनसंख्या के सही इस्तेमाल का हुनर सीख लिया है, जो भारत के पास नहीं है। भारत को भी इस हुनर को सीख कर जनसंख्या का रुख विकास की ओर करना होगा। 

जनसंख्या अगर वरदान न होती, तो दुनिया के अनेक देश अपने यहा जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित न कर रहे होते। रूस, जापान, आस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, पोलैंड, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देश अपने यहां की घटती जनसंख्या दर से चिंतित हैं। इन देशों में लोगों को संतानोत्पत्ति के लिए विधिवत प्रोत्साहित किया जाता है। 

“यदि सभी अपनी रोटी के लिए श्रम करें, तो सभी के लिए पर्याप्त भोजन एवं आराम है तथा न तो जनाधिक्य है और न ही कोई बीमारी और कष्ट है।” 

वस्तुतः मानव संसाधन का किसी भी देश के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। जो देश इसकी कमी से जूझ रहे हैं, वे इसक महत्त्व को समझते हैं। आस्ट्रेलिया में अकारण ही वहां के निवासियों से यह राष्ट्रीय अपील नहीं की गई है कि हर महिला कम से कम तीन बच्चे पैदा करे, एक मम्मी के लिए, एक पापा के लिए और एक देश के लिए। जाहिर है, कि देश के उत्कर्ष के लिए जनशक्ति का होना जरूरी होता है। 

किसी भी देश के आर्थिक विकास के लिए यह आवश्यक होता है कि उसके पास पर्याप्त श्रम-शक्ति हो। श्रम-शक्ति तभी मिलती है, जब जनशक्ति हो। जनशक्ति के लिए जनाधिक्य जरूरी है। इसमें भी युवा जनसंख्या का विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि यही वह वर्ग है, जो अपनी ऊर्जा और मेहनत से देश की कायापलट देता है। भारत इस मामले में भाग्यशाली है। यदि वह अपनी युवा जनसंख्या का सही प्रयोग विकास की दिशा में करे, तो विश्व का अग्रणी राष्ट्र बन सकता है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों से यह पता चलता है कि एक ओर तो हमारे मानव संसाधन में कार्यशील आबादी की हिस्सेदारी बराबर बढ़ रही है (वर्ष 2001 की तुलना में वर्ष 2011 में यह 6096 से बढ़कर 63.4% हो गई), तो उन आश्रितों के अनुपात में भी कमी आई है, जो कार्यशील आबादी पर निर्भर हैं। यह एक अच्छा संकेत है। अच्छा संकेत इसलिए है, क्योंकि कार्यशील आबादी के ऊपर 0 से 14 वय के बच्चों एवं 65 से 100 वय के वृद्धों का अनुपात घटकर 0.55 ही रह गया है। स्पष्ट है कि कार्यशील आबादी का बढ़ता अनुपात श्रम उत्पादकता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा। इससे न सिर्फ घरेलू उत्पादन में वृद्धि हो सकती है, बल्कि सेवाओं से मिलने वाला राजस्व भी कई गुना बढ़ सकता है। दूसरी तरफ कार्यशील आबादी पर आश्रित बुजुर्गों एवं बच्चों का बोझ घटने से उनके ऊपर व्यय होने वाली राशि का अधिकांश हिस्सा अर्थव्यवस्था के सकारात्मक पक्षों में लग सकेगा। 

अधिक आबादी उन स्थितियों में वरदान है, जब इसे अधिक उत्पादक बनाने के प्रयास किए जाएं। इसके लिए यह जरूरी है कि आबादी को दक्ष बनाया जाए। वह शिक्षित और जागरूक हो, ताकि देश के विकास में अपना योगदान दे सके। आर्थिक तरक्की के लिए आबादी से बड़ी कोई पूंजी नहीं होती है। शायद यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर अधिक आबादी को अभिशाप मानने की अवधारणा बदलने लगी है। अब यह माना जाने लगा है कि तरक्की एवं विकास के लिए जनबल का होना जरूरी है। 

आबादी को वरदान मानने की पुष्टि प्राचीन भारतीय संस्कृति से भी होती है। ऋग्वैदिक अथवा पूर्व-वैदिक कालीन सभ्यता से यह पता चलता है कि विवाह का मुख्य उद्देश्य पुत्र की प्राप्ति करना था। पुत्रों की बहुलता के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती थी। एक मंत्र में करो ताकि इसका पति ग्यारहवां होवे। संस्कृत में यह प्रार्थना इस प्रकार है-‘दशास्यां पुत्रानाधेहि पतिमेकादशं कृधि।’ तत्कालीन संदर्भो में कई स्थानों पर संतानहीनता को दरिद्रता के समतुल्य बताया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि उस काल में भी आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए जनाधिक्य के महत्त्व को प्राथमिकता दी जाती थी। वैसे भी हमारे यहां ‘दूधो नहाओ, पूतों फलो’ की अवधारणा में विकास और समृद्धि का ही पहलू है। 

किसी भी देश की प्रगति में जनसंख्या का व्यावसायिक विभाजन महत्त्वपूर्ण होता है। आर्थिक विकास के महत्त्वपूर्ण पहलुओं में जनसंख्या के व्यावसायिक विभाजन एवं ढांचे का विशेष ध्यान होता है। आर्थिक विकास में कार्यशील जनसंख्या की विशेष उपयोगिता होती है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी का यह कथन ध्यान देने योग्य है—’यदि सभी अपनी रोटी के लिए श्रम करें, तो सभी के लिए पर्याप्त भोजन एवं आराम है तथा न तो जनाधिक्य है और न ही कोई बीमारी और कष्ट है।’ बापू के इस कथन में यह संदेश निहित है कि जनसंख्या को सही दिशा देकर, उसे विकास की दौड़ में शामिल कर तथा कार्यशील बनाकर एक बेहतर भविष्य और मजबूत राष्ट्र का निर्माण किया जा सकता है। 

जनसंख्या कभी भी बोझ या अभिशाप नहीं होती है। यह तो आर्थिक विकास एवं समृद्धि की हाथ-पांव जैसी होती है। यही हाथ किसी देश की तस्वीर को सुंदरता से गढ़ते हैं। जनबल के बिना कोई भी राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता है। भारत में भी जनसंख्या वृद्धि वरदान बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी नीतियों का निर्धारण बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप करें। पारदर्शिता एवं समयबद्धता के साथ वो ठोस नीतियां अपनाएं जो जनसंख्या की ताकत को नई दिशा दे सकें और विकास में उसकी मजबूत भागीदारी को सुनिश्चित करें। ऐसे प्रयास किए जाएं कि हमारे देश में साक्षरता का प्रतिशत बढ़े। देश की अर्थव्यवस्था में तीव्र वृद्धि के लिए साक्षरता को बढ़ाना जरूरी है। यदि देश की जनता शत प्रतिशत साक्षर होगी, तो वह दक्ष जनसंख्या कहलाएगी और देश के – आर्थिक विकास में केंद्रीय भूमिका निभाएगी। यही कार्यशील एवं दक्ष जनसंख्या हमारे लिए वरदान बनेगी। जनसंख्या की ताकत को विकास की धारा से जोड़ने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम अपने आधारभूत ढांचे को सुधारें। युवा जनसंख्या को काबिल बनाएं तथा उसे राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करें। हमें जनसंख्या रूपी वरदान का यथेष्ट लाभ उठाने के लिए उसमें श्रेष्ठ गुणात्मक विशेषताएं विकसित करनी होंगी। इसके लिए बुनियादी सुविधाओं का विकास आवश्यक है। शासन में पारदर्शिता एवं भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था भी इसके लिए उतनी ही जरूरी है। तो आइये यह सूरत बदलें और अभिशाप को वरदान में बदलने के गैरमामूली कारनामे को अंजाम देकर विश्व पटल पर भारत के उच्च आयाम दें। 

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