राजनीति और नैतिकता पर निबंध |Essay on Politics and Ethics

राजनीति और नैतिकता पर निबंध

राजनीति और नैतिकता पर निबंध  (Politics and Morality) अथवा वर्तमान राजनीति-मानवीय मूल्यों के संदर्भ में 

निःसंदेह नैतिकता से विहीन राजनीति के उच्छंखल एवं अराजक होने की पूरी संभावना रहती है। नैतिकता के अभाव में शुचिता की राजनीति संभव नहीं है। नैतिकता ही वह तत्व है, जो राजनीति को सुन्दरतम् स्वरूप प्रदान करता है और इसे लोकप्रिय भी बनाता है। 

नैतिकता की यह विशिष्टता होती है कि यदि इसका समावेश राजनीति में कर लिया जाए तो वह अन्यायी या दमनकारी नहीं हो सकती। नैतिकता का साथ मिलने पर राजनीति का स्वरूप कल्याणकारी एवं हितकारी हो जाता है। उसमें लोक कल्याण की भावना भर जाती है और ऐसी राजनीति से एक स्वच्छ और निर्मल समाज का निर्माण भी होता है। काम-काज में पारदर्शिता परिलक्षित होती है। नैतिकता का दृष्टिकोण राजनीति में बनाए रखने से न तो वह कलंकित होती है और न ही दूषित। 

वस्तुतः प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन नैतिकता से ओत प्रोत था। भारत में राजनीति में नैतिकता को बढ़ावा देने की दृष्टि से ही धर्म को राजनीति से जोड़ा गया था। सच तो यह है कि धर्म भारतीय राजनीति के चिंतन की आधारभूत संकल्पना है। धर्म वस्तुतः समाज के नैतिक मूल्यों (Moral values) का समुच्चय है, जिसमें व्यक्ति के मुख्य-मुख्य कर्त्तव्यों की चर्चा की जाती है। सामाजिक जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए इन कर्त्तव्यों का पालन जरूरी समझा जाता है। फिर इन कर्त्तव्यों का पालन करके व्यक्ति जो पुण्य अर्जित करता है, वह उसके आध्यात्मिक कल्याण को बढ़ावा देता है। यही बातें प्राचीन भारतीय राजनीति को नैतिकता के करीब लाईं और उसे निरंकुश होने से बचाया। 

महाभारत काल के राजनीतिक चिंतन में भी नैतिकता एवं धर्म । को प्रधानता दी गई है। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद पितामह भीष्म मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए प्राण त्यागने के लिए शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर रहे थे। सत्ता युधिष्ठिर को संभालनी थी। उन्होंने इसी दौरान पितामह से राजनीति की शिक्षा ग्रहण की। पितामह ने युधिष्ठिर को उच्च राजनीतिक मूल्यों से अवगत कराया। इसे ‘शांति पर्व’ के नाम से जाना जाता है। ‘शांति पर्व’ में ‘राजधर्मानुशासन’ अध्याय राजनीति में नैतिकता की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, जिसका यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। 

राजधर्म में राजा से यह अपेक्षा की गई है कि वह स्वयं तो नैतिकतापूर्ण आचरण करेगा ही, प्रजा को भी सच्चे रास्ते पर चलाएगा। उसे प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। उसे भयमुक्त रखना चाहिए, दुःख और अत्याचार से पीड़ित लोगों की सहायता करनी चाहिए, सभी प्राणियों के प्रति दया भाव रखना चाहिए तथा धर्म की रक्षा के लिए रणभूमि में प्राण त्याग देना चाहिए। ‘शांति पर्व’ में कहा गया है कि राजधर्म अन्य सभी धर्मों से श्रेष्ठ है, क्योंकि यह सबको दुराचार के मार्ग से हटाकर सदाचार की ओर प्रेरित करता है। इन बातों से पुष्टि होती है कि भारतीय राजनीतिक चिंतन में नैतिक मूल्यों का कितना अधिक बोलबाला रहा। 

भारतीय राजनीतिक दर्शन के अन्तर्गत जहां नैतिक दर्शन (Moral Philosophy) पर विशेष बल दिया गया है, वहीं सत्य के अनेक रूपों को भी स्थान दिया गया है। आचार्य मनु ने भी राजनीति को नैतिक व्यवस्था के सूत्रों में पिरोया एवं धर्म की प्रबलता को रेखांकित किया। मनु स्मृति में वह कहते हैं- 

सर्वतो धर्मषड् भागो राज्ञो भवति रक्षितः।

अपधर्मादपि षड्भागी भवत्यस्य रक्षितः॥ 

अर्थात् धर्म की रक्षा होने पर राजा सबके (धर्म के) छठे भाग का अधिकारी होता है। धर्म की रक्षा न होने पर वह अधर्म के छठे भाग के लिए भी उत्तराधिकारी होता है। 

भारत के आधुनिक राजनीतिक चिंतकों ने भी राजनीति में नैतिकता पर विशेष बल दिया। इनमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अहिंसा, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा तथा असहयोग नैतिकता से ही जुड़ी राजनीति के मुख्य अवयव हैं। गांधीजी नैतिक दार्शनिक थे। उन्होंने राजनीति और नैतिकता के बीच पुल का निर्माण करते हुए यह तर्क दिया कि राजनीति के क्षेत्र में साधन और साध्य दोनों समान रूप से पवित्र होने चाहिए। बापू का यह मानना था कि आध्यात्मिक आधार के बगैर राजनीति स्वच्छ नहीं रह सकती। 

“गांधीजी का मुख्य सरोकार मनुष्य के नैतिक जीवन से था, जो आज भी प्रासंगिक है। राजनीति को उन्होंने नैतिकता के साधन के रूप में देखा और अपनाया। भारत की स्वाधीनता के लिए चलाए गये आंदोलनों के पीछे भी उनका एक नैतिक दृष्टिकोण था। इस प्रकार वह देश को नैतिक पुनरुत्थान (Moral Regen eration) की ओर ले जाना चाहते थे।’ 

आध्यात्मिक (Spiritual), धार्मिक (Religious) तथा नैतिक (Moral or Ethical) ये तीनों अभिव्यक्तियां बापू के लिए एक ही अर्थ का संकेत देती थीं। धर्म का अर्थ उनके लिए बहुत व्यापक था। उनका यह मानना था कि प्रत्येक राजनीतिक कृत्य या संस्था को नैतिक कसौटी पर कसना आवश्यक है। अपनी बात को बाप ने बहुत मजबूती से लोगों के सामने रखते हुए कहा- ‘जो राजनीति धर्म से विहीन है, वह मृत्यु-जाल के तुल्य है और आत्मा को पतन के गर्त में धकेलती है। राजनीति वहीं तक वरेण्य है, जहां तक वह नैतिकता की कसौटी पर खरी उतरती हो, अन्यथा उससे किनारा कर लेना चाहिए।’ 

बापू राजनीति में नीतिशास्त्र को सर्वोपरि मानते थे। गीता के इस वचन- ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ (कर्म में कुशलता ही योग है) में उनका दृढ़ विश्वास था। उनका मानना था कि कर्मठ व्यक्ति ही धर्मनिष्ठ हो सकता है। राजनीति में धर्म और नैतिकता के महत्त्व को समझाते हुए ही उन्होंने कहा है- ‘मेरी सत्य-निष्ठा ही मुझे राजनीति के क्षेत्र में लाई है। मैं तनिक भी संकोच किए बिना, परंतु पूर्ण विनम्रता के साथ कह सकता हूं कि जो यह कहते हैं कि धर्म का राजनीति से काई सरोकार नहीं है, वे धर्म का अर्थ ही नहीं जानते।’ 

बापू ने राजनीतिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता को सदैव नैतिक जीवन की आवश्यक शर्तों के रूप में देखा। उन्होंने राजनीति और नैतिकता के परस्पर प्रगाढ़ संबंधों के लिए ही साधन और साध्य दोनों की शुचिता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने सदैव साधन को साध्य से पहले रखा और यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि जैसे साधन होंगे, वैसा ही साध्य होगा। साध्य की प्रकृति को साधन ही निर्धारित कर सकता है। उनका मानना था कि यदि साधन अनैतिक होंगे तो साध्य चाहे कितना ही नैतिक क्यों न हो, वह अवश्य ही भ्रष्ट हो जाएगा, । क्योंकि गलत रास्ता कभी सही मंजिल तक नहीं ले जा सकता। जो सत्ता भय और बल प्रयोग की नींव पर खड़ी की जाती है, उससे लोगों के मन में स्नेह और आदर की भावना पैदा नहीं की जा सकती। 

वस्तुतः गांधीजी का मुख्य सरोकार मनुष्य के नैतिक जीवन से था, जो आज भी प्रासंगिक है। राजनीति को उन्होंने नैतिकता के साधन के रूप में देखा और अपनाया। भारत की स्वाधीनता के लिए चलाए गये आंदोलनों के पीछे भी उनका एक नैतिक दृष्टिकोण था। इस प्रकार वह देश को नैतिक पुनरुत्थान (Moral Regeneration) की ओर ले जाना चाहते थे। नैतिक उत्थान के लिए ही उन्होंने आत्मसंयम एवं त्याग भावना को अपनाने पर विशेष बल दिया। 

यह दुर्भाग्य का विषय है कि आज की राजनीति का नैतिकता से सामंजस्य कम होता जा रहा है और शायद इसीलिए शुचिता की राजनीति गूलर का फूल बन गई है। मौजूदा राजीनतिक परिदृश्य नितांत भयावह है, तो इसलिए कि इसमें नैतिकता और धर्म का कोई स्थान नहीं रह गया है। लोग राजनीति की व्याख्या ही गलत ढंग से करने लगे हैं और इसमें से उचित-अनुचित का फर्क ही गायब हो गया है। साधन के अनैतिक होने के परिणाम आज की राजनीति में साफ परिलक्षित हो रहे हैं। वर्तमान में जो तंत्र की विफलता (System Failure) की स्थिति दिख रही है, वह अराजक एवं पथभ्रष्ट राजनीति की ही देन है। यदि राजीनति को हमने नैतिकता और नीति के साधन के रूप में देखा और अपनाया होता, तो यह स्थिति कदापि न पैदा होती। 

आज हम लोकतंत्र के प्रति बढ़ते अविश्वास के जिस खतरे से जूझ रहे हैं, वह भी राजनीति पर नैतिकता की ढीली होती पकड़ का ही नतीजा है। न तो राजनीति में नैतिकता रही और न ही राजनेताओं में नैतिक साहस। यही कारण है कि जनप्रतिनिधियों के प्रति आमजन की आस्था घटती जा रही है। हमारे बीच से अब जननायक एवं महानायक निकल कर सामने नहीं आ रहे हैं। झूठ, फरेब और मक्कारी को राजनीति के पर्याय के रूप में देखा जाने लगा है। इन्हीं सब कारणों से जनता बेहाल है। 

“जब साधन भला होगा, तब फल भी भला होगा। यह तभी संभव है जब हम राजनीति को आध्यात्मिक आधार दें।” 

कमरतोड़ महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, बढ़ती हिंसा एवं अराजकता, आर्थिक असमानता, गरीबी, बेरोजगारी एवं आम जनजीवन से जुड़ी अनेकानेक समस्याएं नैतिकता विहीन राजनीति की ही देन है। नैतिकता से कोसों दूर पहुंच चुकी राजनीति के कारण न सिर्फ अनेक विद्रूपताएं एवं विसंगतियां पैर फैला रही हैं, बल्कि इस दंश को झेलने वालों में अवसाद एवं नैराश्य के भाव भी बढ़ रहे हैं। एक अजीब सी संवेदनहीनता का दायरा हमारे इर्द-गिर्द बढ़ता जा रहा है और सत्ता के प्रति आदर एवं सम्मान के भाव का लोप होता जा रहा है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राजनीति से नैतिकता के दूर होने के कारण संवैधानिक संकट की घड़ी सामने आ गई है। यह संकेत अच्छा नहीं है। om

सुबह का अखबार पढ़िये या टीवी पर समाचारों का प्रसारण देखिए, राजनीतिक अनैतिकता और भ्रष्ट व्यवहार के ढेरों समाचार मिल जाएंगे। इन बातों का हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जिस राजनीति से यह अपेक्षा की जाती थी कि वह अन्याय और अत्याचार से मुक्त करवाकर भयमुक्त वातावरण उपलब्ध करवाएगी, नैतिकता से विमुख वह राजनीति स्वयं भय, अन्याय और अत्याचार की पोषक बन गई है। राजनीति में बढ़ती विवेकशून्यता एवं संवेदनहीनता के बीच आम जनता पिस रही है। राजनीतिक अतिवादिता का दायरा बढ़ता जा रहा है और इसका नकारात्मक चेहरा लोकतंत्र में आस्था रखने वालों को डरा रहा है। 

राजनीतिक व्यक्तियों एवं संस्थाओं में किस हद तक गिरावट आ गई है, उसे समझने के लिए यह शेर काफी है- 

मसहलत आमेज होते हैं सियासत के कदम,

तू न समझेगा इसे, तू अभी इंसान है। 

ध्वनित होता है कि सियासत इंसानों की चीज ही नहीं रही। निहितार्थ को आप समझ सकते हैं। 

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