राजनीति और जातिवाद पर निबंध |Essay on Politics and Casteism

राजनीति और जातिवाद पर निबंध

राजनीति और जातिवाद पर निबंध |Essay on Politics and Casteism

कलियुग में भारत का राजनीतिक विकास षड्यंत्रों का शिकार होकर आर्य संस्कृति से भटक रहा है। आज की राजनीति स्वार्थ सीमा से संचालित हो रही है। राजनेताओं में जन-कल्याण एवं राष्ट्र-प्रेम नाममात्र को भी दिखाई नहीं देता। चारों ओर जातिवाद अपना कहर बरपा कर रहा है। राजनेता सिंहासन की दौड़ में जातिवाद के जूते पहने हुए हैं। चारों ओर जातिवाद के नारे गूंज रहे हैं 

तिलक, तराजू और तलवार; इनको मारो जूते चार-बसपा।

तुम मुझे स्थायित्व दो, मैं तुम्हें समृद्धि दूंगा-कांग्रेस।

हिंदू गौरव वापस लाना है, जय श्रीराम-भाजपा। 

इसके अलावा ‘या अली’, ‘बजरंग बली’ आदि के नारों से भारत का आकाश आच्छादित है। सभी राजनेता जातिवाद का मुखौटा लगाए हुए हैं। कोई भी नेता भारतीय दृष्टिगोचर नहीं होता। यही राजनेता जातिवाद के सहारे सिंहासन प्राप्त करने के उपरांत जनता को असहाय छोड़ देते हैं। भारत में भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद एवं भ्रष्टाचार निरंतर उच्च शिखर की ओर बढ़ रहा है।

भारत के प्रत्येक गांव में अंबेडकर मंदिर की स्थापना करने की सलाह दी जा रही है। यहां अंबेडकर भक्ति नहीं, स्वार्थ शक्ति काम कर रही है। अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़कर ‘गौरव दिवस’ मनाया जा रहा है। आज के राजनेता नैतिकता की सेवा से राजनीति नहीं करते। वे जातिवाद के अस्त्र से सिंहासन प्राप्त करना चाहते हैं। जन्म के आधार पर जाति का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, जबकि भारत में जन्मानुसार जाति नहीं रही है-कर्मानुसार जातियां आज भी विद्यमान हैं। राजनेता दलितों को शूद्र बनाकर भड़का रहे हैं। भारत में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य-तीन ही वर्ण हैं। शूद्र तो दस्यु, चोर या जाट कहे जाते हैं। सनातन धर्म शूद्रों को भी उन्नति के अवसर दे रहा है तथा क्षमा प्रदान कर रहा है। वाल्मीकि इसके प्रमुख प्रमाण हैं। किंतु राजनेता जन भावनाएं भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। राष्ट्र की इन्हें कोई चिंता नहीं है। 

भारत में सभी दल जाति के अनुसार ही अपना प्रत्याशी निश्चित करते हैं। जातीय गणित आगे एवं कर्तव्य गणित पीछे चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी को ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों का दल कहा जाता है। समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी अपने को दलितों का ईश बताती हैं। समता पार्टी कुर्मियों का दल कही जाती है। मंडल कमीशन ने भारत में जातिवाद का चक्र चलाया। जातिवाद का उन्मूलन न करके जातिवाद को प्रश्रय दिया जा रहा है। ऋषियों की वर्ण व्यवस्था को समाप्त कर जातिगत आरक्षण दिया जा रहा है। 

जातिवाद भारतीय राजनीति का कोढ़ बन चुका है। यह भारत में इतना बढ़ गया है कि प्रत्येक नागरिक केवल अपनी जाति को ही महत्व देता है। वह राष्ट्र या समाज की भलाई के विषय में कुछ भी नहीं सोचता। विवाह समारोह भी जातिवाद पर खड़े हैं। सवर्णों, दलितों, अगड़ों और पिछड़ों के बीज बो दिए गए हैं। बिहार में जाति के आधार पर हिंसा का तांडव हो रहा है। आज के राजनेता ‘जाति डालो और राज करो’ की नीति अपनाए हुए हैं। 

कुछ समाज सुधारकों ने जाति-नाश का बीड़ा उठाया था, किंतु आज के राजनेता रोटी और बेटी के आधार पर वोट पाना चाहते हैं तथा देश का विभाजन करना चाहते हैं। राष्ट्रीयता के स्थान पर क्षेत्रीयता को बढ़ावा दिया जा रहा है। मनु की व्यवस्था को मनुवाद बताकर उसे दूर किया जा रहा है। इसी मनु ने व्यक्ति को मानव बनाया। इसी मनु ने मानवता को जन्म दिया। मनुवाद ने कभी जन्म के आधार पर जाति का समर्थन नहीं किया। मनुष्य कर्म से ब्राह्मण रहा है। ब्रह्मा के पुत्र ब्राह्मण हैं। अतः जन्म से सभी ब्राह्मण हैं। 

नीति के देव अनीति के दानव हैं। नीति मनु की माता विश्व को ब्रह्मा ने ही उत्पन्न किया है। वे ही सृष्टि के रचयिता हैं। भारत धर्म का देश है। सनातन धर्म जातिवाद को प्रश्रय नहीं देता। इसका प्रमाण शिवरात्रि पर बढ़ता जन समूह है, जिसमें कोई व्यक्ति जाति विशेष का न होकर ‘बम’ कहलाता है। सेवाकर्मी बिना किसी भेदभाव के सभी की सेवा करते हैं। अतः इस देश में जातिवाद नहीं चलेगा, जातिवादी नेता नहीं रहेंगे। देश रहेगा, जनता रहेगी। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

7 + 20 =