राजनीतिज्ञ पर निबंध-Essay on politician

राजनीतिज्ञ पर निबंध

राज नीतिज्ञ पर निबंध-Essay on politician in hindi

हम राजनीतिज्ञ जनतन्त्र की बगिया की असली महक हैं, इस चमन के हम ही माली और रहनुमा हैं. दहकती धरती की पिपासा शान्त करने वाले हम ही सावन के मेघ हैं. राजकाज की वीणा से उठने वाली, ‘सा, रे, ग, म’ हम ही हैं. राग-रागिनियों की स्वर लहरी के हम ही ‘मल्हार’ और ‘दीपकराग’ हैं नेताओं और उनके कारनामों’ को हम ही खाद-पानी देने वाले कृषक हैं. भ्रष्टाचार, जातिवाद, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा और प्रान्त हमारे भूषण और अलंकरण हैं. समाज में होने वाले दुराचरण महँगाई, दहेज, हत्याएं, बलात्कार, आगजनी, गोलीकाण्ड, डकैतियाँ और उत्पीड़न हमारे उर्वर मस्तिष्क से उपजने वाले नारों की खेती है-जिसके बल पर वोटों की फसल काटते हैं और सत्ता सिंहासन का सुख भोगते हैं. ऊपर से भले ही हम ‘मुलायम’ और ‘लालू’ लगते हों- पर सत्ता की राजनीति को ‘राबड़ी’ की तरह चटखारे लेकर हम चाटते रहते हैं. धरती के कमोबेश सभी घटनाचक्र हमारे इशारे पर उठते गिरते हैं. 

यह आरोप हमने बहुत बार सहा है कि ‘नेहरू खानदान’ देश पर पीढ़ियों से राज करता आ रहा है फिर क्या जगजीवन राम, चौधरी चरण सिंह, देवीलाल, भजनलाल, बंसीलाल ने अपनी पौध को पुष्पित-पल्लवित करने के लिए अपना खून-पसीना नहीं बहाया. जब राजा का बेटा राजा, मंत्री का पुत्र मंत्री, डॉक्टर, इंजीनियरों के यहाँ उन्हीं जैसी पौध तैयार होती है, तो भला हम राजनेता ही इस शाश्वत नियम से परहेज कैसे रख सकते हैं? हम भी अपनी ही भाँति की पौध अपने अंशों से तैयार करते हैं ताकि ‘खानदानी’ राज करने की परम्परा को सींचा, संवारा जा सके. 

हम राजनेताओं का वेश भी बेहद सादा होता है. धोती-कुर्ता, (खादी या मलमल/ रेशमी). कोट-टोपी, पगड़ी-साफा यह फिर जोधपुरी कोट-पेंट, लेकिन ‘सादावेश’ राजनीति में आने वाली पौध के लिए ‘फैशन’ का काम करती है. इतिहास गवाह है-गांधी टोपी, नेहरू जाकेट, राजीव शाल, इंदिरा साड़ी, नेताजी ब्रांड ‘सेनाओं और तिलक गोखले छाप मूंछ का भी प्रचलन राजनीति में ‘फैशन’ की तरह प्रचलित रहा है. हमारा वेश ही हमारी पहचान बना है और युवा पीढ़ी में उसका ‘क्रेज’ रहा है. “सांगानेरी’ और ‘बगरू प्रिंट’ की साड़ियों ने राजनीतिज्ञ महिलाओं को एक नई पहचान और लिबास दिये है. 

‘खादी’ जो कभी ‘मिशन’ था-हमारे प्रयत्नों से वह ‘कमीशन’ बन गया. हम राजनीतिज्ञों ने खादी को प्रचलन में न लाया होता तो देश में इसका इतना बड़ा कारोबार न होता, और न खादी युवापीढ़ी का क्रेज बनकर देश-विदेश और विश्व विद्यालयों की शोभा बनती. 

आपने पूछा-हमें क्या अच्छा लगता है? तो सुनिए बंगले की भीड़-भाड़ मिलने वालों की कतारें, शिष्टमण्डल और ज्ञापनों की सौगात, हमारा ‘मूड’ बनाने में बहुत सहायक होते हैं. खाली बंगला हमें काट खाने को दौड़ता है-भीड़ ही हमारी खुराक है, आसव है. 

हमें अच्छा लगता है जब दौरे के समय कारों का काफिला चलता है. जगह-जगह बने स्वागत हारों पर हमारा स्वागत होता है. ‘गनमैन’ या कमाण्डो हमारे साथ चलते हैं. मंच पर अगनित पुष्पहार हमारे गले में पहनाए जाते हैं. हमारे अभिनन्दन में अतिशयोक्ति खानदानी राज की अपनी ही भाँति राजनेता ही इस 

अलंकार में हमारी विशेषताओं और उपलब्धियों का गुणगान किया जाता है. हमारे अनुरंजन में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजित किया जाता है. प्रतिदिन हमारे भाषणों की रिपोर्ट और अखबारी सुर्खियाँ हमारी ताजगी को विशेष बढ़ा देती हैं. हमारी रातें ‘रंगीन’ हों इसका भी इन्तजाम हमसे लाभ की उम्मीदें रखने वाले लोग सहज रूप से कर देते हैं. 

हम राजनीतिज्ञ ‘वाग्वीर’ होते हैं- ठीक उसी तरह-जैसे युद्धवीर, दानवीर, दयावीर होते हैं. हम किसी भी विषय पर लम्बी ‘तकरीर’ कर सकने के विशेषज्ञ माने जाते हैं. अपने भाषणों में हम आसमान के तारे तोड़ने, स्वर्ग को सीढ़ी लगाने और स्वर्ण में सुगन्ध पैदा करने को तथा गरीबी हटाने, महँगाई रोकने, अभावों की पूर्ति करने, हत्यारों, तस्करों, डकैतों, अपराधियों को किसी कीमत पर न बख्शने की लुभावनी बातें करते हैं. कवियों, लेखकों, समाज सेवियों को शाल उढ़ाकर सम्मान देते हैं, ताकि वे बंदीजनों की तरह हमारी विरुदावली गाते रहते हैं और हमारे साथ खिंचवाए गए फोटों को आने वाली पीढ़ियों के लिए दस्तावेज की तरह पेश करते रहते हैं. 

हम यदि विरोध में होते हैं. तो सत्ता के दुर्गुण, मन्त्रियों के कर्मकाण्ड, अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार के कारनामों का भंडाफोड़ करते रहते हैं. सत्ता-सुख भोगने वालों का चरित्र हनन करते हैं. उनके काले-कारनामों के दस्तावेजों, रंगीन रातों की तस्वीरों और उडती मिलने वाली खबरों को ‘प्रेस’ को परोसते हैं तथा उनकी ‘भद्रछवि’ को ‘भद्दी’ में बदलने की हर सम्भव कोशिश करते हैं. 

हथियारों-तोप-पनडुब्बी सौदों की दलाली, ‘सुटकेश’ और ‘अटैची कांडों की तीखी चर्चाएं कर आगामी चुनावों में हम सत्ता की प्राप्ति का ‘यथार्थ’ देखने लगते हैं. ‘राम मन्दिर’, ‘बाबरी मस्जिद’ के मसले उठाकर जन-भावना भड़काते हैं. ‘रामराज्य’ और ‘अभियान रथों’ की श्रृंखला चलाकर जनता की भावुकता को चरम बिन्दु तक पहुँचाते हैं. जनता में दंगा, आगजनी, दहशत फैलाकर शहरों कस्बों में कफ्यूं की स्थितियाँ जितनी कारगर ढंग से हम उत्पन्न कर सकने की क्षमता और सामर्थ्य रखते हैं-समझ लो हम उतने ही सत्ता-सुख के नजदीक पहुँचते हैं. 

कहा जाता है कि-“एवरी थिंग इज फेयर इन वार एण्ड लव.” यानी प्यार और युद्ध में सब जायज होता है. इसलिए हम चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक नीचे जा सकते हैं. नीति-अनीति, रुपया-पैसा, शराब और नशा, भोग और आस्वाद-सत्ता पाने के लिए हम किसी को भी अपनाने में संकोच नहीं करते.

भले लोगों की छवि धूमिल करने में हम कोई पाखण्ड रचने से नहीं चूकते और यदि हत्या से भी रास्ते के काँटे दूर होते हैं, तो इसमें भी हम कोई ‘गुरेज’ नहीं करते. हमें बीमारियाँ भी कुछ अलग किस्म की होती हैं-विदेशों में होने वाली ‘बाई पास सर्जरी’ एक ऐसी अहम् बीमारी होती है, जो राजनेताओं को अक्सर होती है. इसके जरिए विदेश भ्रमण अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ सरकारी खर्चों पर आनन्द प्राप्त करने का यह सर्वथा निर्दोष नुस्खा माना जाता है. हम राजनेताओं का दिल दहाड़ते-दहाड़ते बेहद कमजोर हो जाता है- इसलिए ‘दिल की बीमारी’ बेहद परेशान करती है. 

हम राजनीतिज्ञ यदि बेहद किसी से डरते हैं तो आयकर और ‘सी. बी. आई. के छापों से हमारे विरोधी हम पर बेहद उल्टे-सीधे आरोप लगाकर न केवल हमारा सिंहासन छीन लेते हैं, अपितु हमारे विरुद्ध ‘जाँच आयोग’ बिठाकर हमें ‘जेल यात्राएं’ कराने में भी प्राण-पण से लगे रहते हैं. ‘चारा-काण्ड’, ‘गुड़ घोटाले’, ‘नमक-काण्ड’, ‘जीरा हींग-काण्ड’, ‘बलात्कार’ आदि ऐसे संगीन आरोप हम पर लगाए जाते हैं कि हमारी रातों की नींद और दिन का चैन हराम हो जाता है. इन चर्चाओं से भी हमारा दिलेर मन ‘पीपर पात सरिस’ डोलने लगता है. हम राजनीतिज्ञ सफेदपोश होकर समाज और देश के लिए ‘सफेद हाथी’ माने जाते हैं. ‘तबादलों की राजनीति’ हमें रास आती हैं महिला कर्मचारी तो इस ‘तबादला’ नाम से ही इतनी आतंकित रहती हैं कि वे ‘बिछौना’ बनने तक को राजी हो जाती हैं. हमारी ‘कथनी और करनी’ में जमीन-आसमान-सा अन्तर रहता है. 

देश-विदेश के सारे राजनेताओं, राजनीतिज्ञों की दिशा-दशा प्रायः एकसी होती है-उनके हथकंडे और हरकतें प्रायः समान होती हैं. हममें अपना घर भरने की बेहद बुरी आदत है-इस काम में हम सत्ता में आते ही शुरू हो जाते हैं. इसके इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि जब तक कोई ‘धकियाकर’ हटा न दे हमारा कुर्सी से हटने का कतई मन नहीं होता है. ‘सत्ता-सुन्दरी’ के लिए हमारी ‘उम्र’ कतई बाधक नहीं बनती, हमारी अन्तिम इच्छा देश के ध्वज में लिपटकर जाने की होती है. 

यह है हम और हमारे जीवन-चरित की थोड़ी-सी बानगी. बस यहीं अपनी वाणी को विराम देते हैं. || जय हिन्द ||

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