पुलिस सुधार पर निबंध |भारत में पुलिस सुधार | Essay on Police Reforms

पुलिस सुधार पर निबंध

पुलिस सुधार पर निबंध |भारत में पुलिस सुधारअथवा भारतीय पुलिस में सुधारों की त्वरितता की आवश्यकता अथवा भारत में पुलिस स्वायत्तता (Police Reforms and Autonomy) 

भारतीय पुलिस की मौजूदा छवि अत्यंत नकारात्मक है। दुख इस बात का है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हमारे देश की पुलिस न तो अपनी छवि को सुधार पाई है और न ही वह स्वयं को औपनिवेशिक काल की उस पुलिस की प्रेत-छाया से मुक्त ही कर पाई है, जिसकी बुनियाद अपराधमुक्त-भयमुक्त समाज के लिए नहीं, बल्कि हुकूमत-ए-बर्तानिया के सुचारु संचालन के लिए की गई थी। आज भी न तो हम ‘मित्र पुलिस की अवधारणा को सही अर्थों में साकार कर पाए हैं और न ही भारतीय पुलिस का वह क्रूर एवं अमानवीय चेहरा ही बदल पाए हैं, जिसके लिए वह आलोचना की शिकार होती आ रही है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि आज की पुलिस जनता की कम, सत्ता की ज्यादा है। शर्मसार करने वाला उसका अमानवीय चेहरा हमें रोज देखने को मिलता है। पुलिस राजनीतिक दबाव में सत्ताधीशों की एजेंसी के रूप में काम करती है। फलतः पुलिस कार्यवाहियों में निष्पक्षता एवं तटस्थता हाशिए पर चली जाती है। इन्हीं सब वजहों से जहां भारतीय पुलिस में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है, वहीं पुलिस को स्वायत्तता प्रदान किए जाने की मांग भी की जा रही है। 

विषय के संदर्भ में यह रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि वे कौन सी कमियां हैं, जिनकी वजह से भारतीय पुलिस में सुधार लाने एवं उसे स्वायत्त बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। यहां इन पर सिलसिलेवार गौर कर लेना समीचीन रहेगा। भारतीय पुलिस का सबसे बड़ा दोष यह है कि आजादी के बाद हमने वर्ष 1861 (पुलिस अधिनियम, 1861) में बनी अंग्रेजों के जमाने की पुलिस पर हिन्दुस्तानी मुलम्मा तो चढ़ा दिया, किंतु न तो सुधार की कोशिशें कीं और न ही ढांचागत बदलाव लाने की दिशा में ही कोई पहल की गई। नतीजतन आजाद भारत की पुलिस के चेहरे एवं चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया और सत्ता के इशारों पर नाचना उसकी फितरत बन गया। 

“आज भी न तो हम ‘मित्र पुलिस की अवधारणा को सही अर्थों में साकार कर पाए हैं और न ही भारतीय पुलिस का वह क्रूर एवं अमानवीय चेहरा ही बदल पाए हैं, जिसके लिए वह आलोचना की शिकार होती आ रही है।” 

भारतीय पुलिस का दूसरा सबसे बड़ा दोष यह है कि वह जबरदस्त राजनीतिक दबाव में काम करती है। राजनीति के अपराधरीकरण से स्थिति और बिगड़ी है। कुछ समय पहले आंतरिक मामलों की संसदीय स्थाई समिति को अकारण ही यह टिप्पणी नहीं करनी पड़ी थी— “आज हमारे पास जो पुलिस है, वह राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत है। इस तरह यह अपने मालिकों के लिए चोर की तरह हो गई है। बदले में पुलिसकर्मियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है, जो उनके अस्तित्व के लिए बहुत जरूरी है।” स्पष्ट है कि राजनीतिक दबाव एवं राजनीतिक संरक्षण यानी ‘नेता-पुलिस गठजोड़’ से भारतीय पुलिस में विसंगतियां पैदा हुई हैं। 

हमारी पुलिस का तीसरा सबसे बड़ा दोष यह है कि वह अधुनातन भी नहीं है। आज भी वह आधुनिकीकरण के उस पायदान तक नहीं पहुंच पाई है, जहां अन्य विकसित देशों की पुलिस पहुंच चुकी है। पर्याप्त संसाधनों एवं आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों के अभाव से तो भारतीय पुलिस जूझ ही रही है, कार्य शैली से जुड़ी विभागीय स्थितियां भी संतोषजनक नहीं हैं। यानी भारतीय पुलिस अच्छी सुविधाओं से वंचित है। पुलिसकर्मियों को न तो अच्छी आवासीय सुविधाएं ही दी जाती हैं और न ही उनकी ड्यूटी का कोई निर्धारित समय ही है। पर्याप्त पुलिस बल का भी अभाव है, जिसकी वजह से छुट्टियां आदि मिलने में भी कठिनाई होती है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार प्रति एक लाख की जनसंख्या पर लगभग 225 पुलिस कर्मियों की नियक्ति लाख का जनसंख्या पर लगभग 225 पुलिस कर्मियों की नियक्ति हानी चाहिये जबकि भारत में यह आंकड़ा लगभग 190 है। इन सब के अलावा अफसरों की गुटबाजी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, बड़े अफसरों की कार्यशैली में पारदर्शिता का अभाव एवं कर्त्तव्यनिष्ठा व ईमानदारी का अभाव आदि कारणों से भी भारतीय पुलिस पिछड़ी हुई है और  वह ‘प्रोफेशनल पुलिस’ का मुकाम हासिल नहीं कर पाई है। 

भारतीय पुलिस का चौथा दोष यह है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी वह मानवता का पाठ नहीं पढ़ पाई है। पुलिस की बदसुलूकी एवं अमानवीय व्यवहार की शिकायतें दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं। पुलिस का चरित्र आज भी एक तानाशाह जैसा है, जबकि लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप इसे होना ‘जन सेवक’ जैसा चाहिए। 

“भारत में चूंकि पुलिस राज्य सरकारों का विषय है, अतएव राज्य सरकारें पुलिस जैसे शक्तिशाली तंत्र पर अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहती हैं।” 

जिस देश की पुलिस अक्षम, भ्रष्ट, दोषपूर्ण एवं पिछड़ी हुई होती है, वहां इसके दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। यह बात भारत पर भी लागू होती है। यह कहना असंगत न होगा कि हमारे देश की पुलिस कानून-व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाए रखने में असफल है। प्रायः देखा यह जाता है कि आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होकर पुलिस वाले खुद ही कानन-व्यवस्था के लिए समस्या बन जाते हैं। यानी जो पहरुए हैं, वही लुटेरे बन गए हैं। ऐसे में कानून-व्यवस्था का हश्र क्या होगा, समझा जा सकता है। सुदृढ़ आंतरिक सुरक्षा, संरक्षा और शांति का सीधा संबंध विकास से होता है, क्योंकि शांति और सुरक्षा से जुड़ी आदर्श स्थितियां ही उस निवेश को आकर्षित करती हैं, जो विकास को मजबूत आधार प्रदान करता है। इस प्रकार पुलिस की अप्रभावी एवं दोषपूर्ण भूमिका के कारण अराजकता और अपराध बढ़ने से विकास भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है। 

हमारे देश में समय-समय पर पुलिस सुधार की पहलें होती रही हैं। वर्ष 1977 में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा पुलिस तंत्र में सुधार के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय पुलिस आयोग’ का गठन किया गया था। आयोग द्वारा पुलिस तंत्र के संगठन, दायित्व, कार्यशैली, जनता से संबंध, कार्यप्रणाली में राजनीतिक हस्तक्षेप, पुलिस शक्ति का दुरुपयोग, विभागीय जवाबदेही एवं प्रदर्शन आदि बिंदुओं पर व्यापक अध्ययन किया गया तथा सुधार संबंधी सिफारिशों की आठ रिपोर्ट सरकार को सौंपी। ये सिफारिशें लागू नहीं की गईं, तो दो पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग की गई। शीर्ष न्यायालय के निर्देश पर ‘रिबेरो कमेटी’ का गठन कर उसे राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशों को लागू कराने के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा करने का दायित्व सौंपा गया। अंततः रिबेरो कमेटी के सुझावों को ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया। लगभग यही हश्र ‘प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों का भी हुआ। 

पुलिस सुधार के उद्देश्य से गृह मंत्रालय द्वारा वर्ष 1999 में ‘पद्मनाभैया समिति का गठन किया गया था। इस समिति को पुलिस के समक्ष उपस्थित चुनौतियों के आकलन एवं ‘मित्र पुलिस की संकल्पना प्रस्तुत करने का दायित्व सौंपा गया था। समिति द्वारा महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए गए, जो कि अमल में नहीं लाए गए। वर्ष 2005 में कार्यदायित्वों में पुलिस की बदलती भूमिका एवं जिम्मेदारियों के आलोक में नया कानून तैयार करने के उद्देश्य से ‘पुलिस एक्ट डाफ्टिंग कमेटी का गठन किया गया, जिसने वर्ष 2006 में केंद्र सरकार के समक्ष एक मॉडल पुलिस कानून बनाकर पेश किया। यह भी अमल से दूर रहा। इतना ही नहीं, पुलिस सुधार के लिए देश की शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन भी राज्य स्तर पर नहीं हुआ। न ही इनके अनुपालन के लिए राज्यों पर कोई दबाव ही बनाया गया। भारत में चूंकि पुलिस राज्य सरकारों का विषय है, अतएव राज्य सरकारें पुलिस जैसे शक्तिशाली तंत्र पर अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहती हैं। यही कारण है कि कोर्ट के निर्देशों तथा आयोगों और समितियों की महत्त्वपूर्ण संस्तुतियों के बावजूद न तो पुलिस सुधारों को अमलीजामा पहनाया जा रहा है और न ही पुलिस को स्वायत्तता ही प्रदान की जा रही है। 

पुलिस की पारदर्शी एवं दबाव-मुक्त कार्यशैली के लिए स्वायत्तता (Autonomy) को आवश्यक माना गया है तथा पुलिस सुधार के लिए गठित आयोग एवं समितियां इसकी सिफारिश भी कर चुकी हैं। वस्तुतः ऑटोनॉमी (स्वायत्तता) शब्द यूनानी शब्द ‘ऑटोनोमिया’ से निकला है, जिसका अर्थ है-स्वशासन का अधिकार या शक्ति।’ ‘स्वशासन’ के अधिकार से ही ‘सुशासन’ की अवधारणा निकलती है। स्वायत्तता में दबाव आड़े नहीं आते तथा इससे अधिक जवाबदेह कार्यशैली विकसित होती है। भारतीय पुलिस को राजनीतिक दबावों से उबारने तथा ‘पुलिस-नेता गठजोड़’ को निष्प्रभावी बनाने के लिए स्वायत्त पुलिस की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है।

स्वायत्तता के साथ-साथ पुलिस सुधार की दृष्टि से हमें कुछ और भी उपाय करने होंगे। सबसे पहली आवश्यकता तो यह है कि हम यथाशीघ्र भारतीय पुलिस को औपनिवेशिक पुलिस की प्रेत-छाया से मुक्त कराएं और बदली हुई परिस्थितियों में इसका लोकतांत्रिक चेहरा गढ़ने के उपाय सुनिश्चित करें। यानी हमें नए चाल-चरित्र की स्वतंत्र भारत की जनतांत्रिक पुलिस की बुनियाद रखनी होगी और इसके लिए 1861 के पुलिस अधिनियम को बदलना होगा और ऐसा करते हुए पुलिस स्वायत्तता को सर्वोच्च वरीयता देनी होगी। यह भी आवश्यक है कि पुलिसकर्मियों के स्थानान्तरण, पदोन्नति एवं नियुक्तियों आदि में पारदर्शिता लाने के लिए ‘स्वायत्त पुलिस स्थापना परिषद’ का गठन किया जाए। राजनीतिज्ञ पुलिस सुधारों के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छा-शक्ति का परिचय दें तथा पुलिस तंत्र को स्वतंत्र, स्वच्छ और निष्पक्ष बनाने की दिशा में तत्परता दिखाएं। पुलिस को | लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवता का पाठ पढ़ाया जाए तथा अफसरों की विभागीय गुटबाजी, कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी, क्षेत्रवाद, जातिवाद तथा अनुशासनहीनता को दूर किया जाए। जहां पुलिस कर्मियों में कर्त्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी जैसे गुणों को विकसित किए जाने की आवश्यकता है, वहीं पुलिस को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र भी विकसित किए जाने की आवश्यकता है। पुलिस को स्वायत्तता प्रदान किए जाने की स्थिति में इस तरह का निगरानी तंत्र और भी आवश्यक है, ताकि स्वायत्तता को निरंकुशता में बदलने से रोका जा सके। पुलिस को अधिक कार्यकुशल, सक्षम, दक्ष एवं सक्रिय बनाने के लिए जहां पुलिसकर्मियों की विभागीय समस्याओं एवं व्यावहारिक परेशानियों के निवारण की दिशा में सुचिंतित पहलें होनी चाहिए, वहीं पुलिस के आधुनिकीकरण की दिशा में उचित प्रयास होने चाहिए, ताकि वह अपराधियों और आतंकवादियों की ओर से मिल रही नित नई चुनौतियों का मुकाबला भली-भांति कर सके। 

देश की आंतरिक सुरक्षा की मजबूती, भयमुक्त-अपराधमुक्त समाज की स्थापना, शांति, सुरक्षा एवं संरक्षा तथा विकास के लिए पुलिस की भूमिका को अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस महत्त्वपूर्ण भूमिका के निर्वहन हेतु जिस ‘प्रोफेशनल पुलिस’ की आवश्यकता है, वह हमारे देश में नहीं है। देश की पुलिस को ‘प्रोफेशनल पुलिस बनाने के लिए जहां पुलिस व्यवस्था में ढांचागत सुधारों एवं बदलावों की आवश्यकता है, वहीं उसे राजनीतिक दबावों एवं हस्तक्षेप से मुक्त कराया जाना भी उतना ही जरूरी है। 

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