पुलिस पर निबंध |Essay on Police in Hindi

पुलिस पर निबंध

भारतीय पुलिस : प्रस्थिति एवं भूमिका (Indian Police : Status and Role) 

देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने अपराधों को रोकने एवं उनकी जाँच करने तथा अवैध आव्रजन, साम्प्रदायिक दंगों, अग्निकांड, चक्रवात, भूकम्प, महामारी आदि पर नियन्त्रण और साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाना, कमजोर वर्ग के लोगों की मदद करना आदि अनेक कार्यों का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन पुलिस का प्रमुख कार्य है.

Police (पुलिस) 

‘POLICE’ के प्रत्येक अक्षर का यह अर्थ लगाया जा सकता है

P= Polite = विनम्र

o= Obedience = आज्ञाकारी

L = Liability = जिम्मेदारी

I = Intelligent = बुद्धिमान 

C= Courageous = साहसी

E= Efficient = दक्ष 

अंग्रेजी शब्द ‘POLICE’ मूलतः सभ्य समाज या संगठित सरकार के भाव को व्यक्त करता है. प्रत्येक लोकतांत्रिक समाज में लोगों की शासन-पद्धति और उनके हितों की सुरक्षा के लिए पुलिस मूलतः कानून के एक अभिकरण के रूप में कार्य करती है. सामान्य नागरिकों की भाँति पुलिस को भी विधि के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करना पड़ता है.

ब्रिटिश शासकों से पूर्व पुलिस 

भारतीय धर्मशास्त्रों के ऐतिहासिक विवेचन से स्पष्ट होता है कि समुदाय का मुखिया सामाजिक एवं धार्मिक नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करता था. अपने हितों की रक्षा के लिए ग्रामीणजन मुखिया के माध्यम से कार्य करते थे. आधुनिक पुलिस बल की भाँति किसी विधिसम्मत व्यवस्था का सृजन नहीं किया गया था, लेकिन स्वनिर्मित सुरक्षा व्यवस्था अवश्य थी. परिवार के लिए पिता, गाँव के लिए मुखिया एवं धर्म गुरु तथा समाज के लिए राजा प्रधान संरक्षक का कार्य सम्पादित करता था. राजा का प्रमुख कार्य समाज में हिंसा की रोकथाम करना और हिंसा में लिप्त लोगों को सजा देना था. 

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित गुप्तचर व्यवस्था के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि व्यापारियों, उद्योगों, यात्रियों आदि के लिए अलग-अलग गुप्तचर समूह बनाए गए थे. मौर्य साम्राज्य में अवैतनिक पुलिस बल के स्थान पर वैतनिक पुलिस बल का गठन किया गया. 

मुगल शासन के प्रारम्भिक चरण में पुलिस का सबसे उत्तम प्रबन्ध शेरशाह सूरी के शासनकाल में मिलता है. शेरशाह का विश्वास था कि बड़े अपराध पुलिस की साँठ-गाँठ से ही किए जाते हैं. इसलिए उसने भारत की प्राचीन परम्पराओं को दृष्टिगत रखते हुए स्थानीय लोगों के द्वारा उस क्षेत्र के पुलिस प्रबन्ध का कार्य सुनिश्चित किया. इस व्यवस्था के अन्तर्गत प्रत्येक गाँव में मुकदम नियुक्त किया जाता था, जो अपने गाँव में होने वाले अपराधों की रोकथाम और अपराधियों का पता लगाने के लिए जिम्मेदार था. यदि किसी गाँव में चोरी हो जाए और उसका पता मुकदम न लगा सके तो उसे ही धन देना पड़ता था.

ब्रिटिश शासन में पुलिस 

वारेन हेस्टिंग्स ने 19 अप्रैल, 1774 को पुलिस के विषय में पहली बार एक व्यवस्थित संगठन का विचार व्यक्त किया. सन् 1775 में हेस्टिंग्स ने इस व्यवस्था की देखरेख नायब नाजिम मुहम्मद रजा खाँन को सौंपी. 26 फौजदारी थानों का गठन जनपद के बड़ों कस्बों में किया गया. प्रत्येक फौजदारी थानों में कई छोटे पुलिस स्टेशन और चौकी स्थापित की गई. 

सन् 1786 में लॉर्ड कॉर्नवालिस भारत आए और उन्होंने पुलिस प्रशासन को नए सिरे से संगठित करने का प्रयास किया. प्रथमतः उन्होंने नायब नाजिम व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया और दरोगा व्यवस्था लागू कर दी. दरोगा व्यवस्था के अन्तर्गत मजिस्ट्रेटों को यह आदेश दिया गया कि प्रत्येक जनपद को अलग-अलग थानों में बाँट दिया जाए और प्रत्येक थाने का अधिकार उचित व्यवस्था के साथ एक दरोगा को दिया जाए. दरोगा का कार्यक्षेत्र 20 से 30 वर्ग मील तक होता था. दरोगा की नियुक्ति मजिस्ट्रेटों द्वारा की जाती थी, लेकिन उन्हें गवर्नर जनरल द्वारा ही पद मुक्त किया जा सकता था. 

सन् 1806 में मद्रास के गवर्नर लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने लॉर्ड वेलेजली की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए एक समिति का गठन किया. इस समिति में लन्दन की पुलिस की भाँति बम्बई में पुलिस प्रशासन की स्थापना का सुझाव दिया. सन 1808 में कलकत्ता, ढाका, मुर्सिदाबाद के तीन प्रभागों की पुलिस के निर्देशन एवं पर्यवेक्षण के लिए पुलिस अधीक्षक की नियुक्ति की गई. इस व्यवस्था को आगे चलकर पटना, बनारस व बरेली में लागू किया गया. सन् 1820 तक यह व्यवस्था चलती रही. जनपद की पुलिस व्यवस्था से सम्बन्धित अधिकार के हस्तान्तरण एवं पुलिस अधीक्षक के हटने से सारी व्यवस्था दरोगा के आधिपत्य में आ गई.

स्वतन्त्र भारत में पुलिस 

भारतीय पुलिस संगठन का वर्तमान स्वरूप मूलतः सन् 1861 में सृजित किया गया जिसे सन् 1902 में पुनः संशोधित किया गया. यह संगठन 20वीं शताब्दी में हुए बहुआयामी प्रशासनिक एवं राजनीतिक रूपान्तरण से प्रभावित हुआ है. इस संगठन को अपने प्रारम्भिक चरण में उपनिवेशीय व्यवस्था को बनाए रखने और शासक वर्ग को जनता से दूर रखने की भूमिका का निर्वाह करना पड़ा था, जबकि स्वतंत्रता के बाद उपनिवेशीय पुलिस व्यवस्था को भंग करके नागरिक पुलिस का गठन किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया. 

संविधान के तहत् आम कानून व्यवस्था और पुलिस राज्य सरकार के विषय हैं. इसलिए पुलिस पर राज्य सरकार का नियंत्रण होता है और राज्य सरकार ही उसकी देखभाल करती है. राज्य में पुलिस बल का प्रमुख पुलिस महानिदेशक या पुलिस महानिरीक्षक होता है. राज्य को सुविधानुसार कई खण्डों में विभाजित किया जाता है, जिन्हें ‘क्षेत्र’ कहा जाता है और प्रत्येक पुलिस क्षेत्र उपमहानिरीक्षक के प्रशासनिक नियंत्रण में होता है. एक क्षेत्र में कई जिले होते हैं. जिला पुलिस का विभाजन पुलिस डिवीजनों, अंचलों और पुलिस थानों में किया गया है. राज्यों के पास नागरिक पुलिस के अलावा अपनी सशस्त्र पुलिस, अलग खुफिया शाखा, अपराध शाखा आदि होती हैं. दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई, बंगलौर, हैदराबाद, अहमदाबाद, नागपुर, पुणे आदि शहरों में पुलिस विभाग का नियंत्रण पुलिस आयुक्त के हाथों में है, जिनके पास मजिस्ट्रेट (दण्डाधिकारी) के अधिकार भी होते हैं. विभिन्न राज्यों में पुलिस के वरिष्ठ पदों पर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति होती है, जिनका चयन अखिल भारतीय स्तर पर होता है. सरदार बल्लभ भाई पटेल राष्ट्रीय पुलिस अकादमी देश की प्रमुख पुलिस प्रशिक्षण संस्था है, जो भारतीय पुलिस सेवा (आई.पी.एस.) के अधिकारियों को प्रारम्भिक और सेवाकालीन प्रशिक्षण प्रदान करती है, राजस्थान के माउण्ट आबू में सन् 1948 में स्थापित इस अकादमी को सन् 1975 में हैदराबाद ले जाया गया. पुलिस से सम्बन्धित विषयों पर अध्ययन पर शोध करने की भी व्यवस्था इस अकादमी में है. क्षेत्रीय स्तर पर प्रत्येक राज्य एवं केन्द्रशासित राज्यों में पुलिस के जवानों के प्रशिक्षण हेतु पुलिस ट्रेनिंग स्कूल की स्थापना की गई है. 

पुलिस की भूमिका 

किसी भी समाज में पुलिस की उपस्थिति सामाजिक व्यवस्था की प्रस्थापना और उसे बनाए रखने की प्राथमिक आवश्यकता है. विकासशील समाज की अपेक्षा विकसित समाज में नागरिक पुलिस को अधिक सशक्त एवं उत्तरदायी बनाया गया है. सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी नागरिक पुलिस पर है. भारत जैसे विकासशील राष्ट्र जहाँ राजनीतिक स्थिरता और विकास प्रशासन हेतु विधिसम्मत व्यवस्था की प्राथमिक आवश्यकता है वहाँ पुलिस प्रशासन अत्यधिक प्रभावी भूमिका में होना चाहिए. यह विधियों की स्थापना और तदनुरूप सामाजिक श्रेणीक्रम की वांछनीय व्यवस्था को बनाए रखने का विशेष अभिकरण है. 

पुलिस की आवश्यकता पूर्णतः न्याय, शान्ति और सामाजिक सुरक्षा के लिए है. यह शासक के विधिसम्मत मूल्यों का प्रतीक है. सत्ता और सरकार का प्रत्यक्ष स्वरूप है. सामान्यतः यह कहा जाता है कि पुलिस ही विधि के अनुरूप लोगों को व्यवहार करने के लिए बाध्य करती है. विधि के अनुरूप व्यवहार करने वाले सामान्य नागरिक भी किसी भी व्यक्ति या संस्था के असामान्य व्यवहार की स्थिति में पुलिस से सहायता की आशा रखते हैं. लोकतांत्रिक समाज में सरकार का अन्य कोई भी अभिकरण नागरिकों के इतने समीप नहीं होता है. 

पुलिस को जिन विशिष्ट परिस्थितियों में कार्य करना होता है, वह अत्यन्त असहयोगात्मक होती है. सामान्य लोगों द्वारा पुलिस के प्रति असहयोग, स्वार्थपरक दृष्टिकोण और अपने निहित स्वार्थों के कारण पुलिस बल को बदनाम करने की प्रवृत्ति जैसी स्थितियाँ ऐसे क्रियात्मक परिवेश का निर्माण करती हैं, जहाँ पुलिस और सामान्य समुदाय प्रतिरोधी इकाइयों के रूप में कार्य करने को बाध्य होते हैं. पुलिस नागरिकों के जीवन एवं स्वतंत्रता की सुरक्षा तथा शान्ति बनाए रखने के लिए सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करती है. 

लोकतांत्रिक समाज में सरकार और उसकी पुलिस व्यवस्था दोनों अपने नागरिकों के प्रति उत्तरदायी हैं. हमारे देश में पुलिस अपने कार्यों के लिए संवैधानिक रूप से संसद और राज्य विधानमण्डलों के प्रति उत्तरदायी होती है और अन्ततः वह अपने विधिसम्मत व्यवहार के लिए सामान्य नागरिकों से समर्थन प्राप्त करती है. प्रत्येक स्तर पर उनके द्वारा सम्पादित किए जाने वाला कार्य विधि प्रदत्त नियमों पर आश्रित होता है. न्यायायिक पुनरीक्षण के माध्यम से विधि के प्रति उनके उत्तरदायित्व को सुनिश्चित किया जाता है. साथ ही साथ उन्हें अपने विभागीय संगठन के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि समाज और पुलिस दोनों एक-दूसरे के अभिन्न अंग हैं. 

साम्प्रदायिक उन्माद के समय, डकैती, हत्या, अग्नेयास्त्रों के अवैध निर्माण, बलात्कार अपहरण आदि की घटनाएं बड़ी तेजी के साथ होती हैं. अफवाहों का बाजार गर्म हो जाता है, दो सम्प्रदाय के लोग, जो कल तक एक साथ उठते-बैठते, एक-दूसरे के घर आते-जाते, यहाँ तक कि एक थाली में खाते थे. सारी इन्सानियत को ताख पर रखकर एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. ऐसे में समूह में अपराध करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. एक-दूसरे के उपासना स्थलों, यातायात के साधन, सरकारी प्रतिष्ठानों आदि को क्षति पहुँचाना सामान्य घटना हो जाती है. सैकड़ों निर्दोष जानें भी जाती हैं, कप! के दौरान आर्थिक क्षति भी होती है. इन परिस्थितियों में रोज कमाने खाने वालों की हालत दयनीय हो जाती है. सोचने व कार्य करने की शक्ति व्यक्तिगत न होकर, सामूहिक हो जाती है. मस्तिष्क पर अहम् का आधिपत्य हो जाता है. ऐसी परिस्थिति में पुलिस की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, हालात को सामान्य बनाने में दोनों सम्प्रदायों के बीच समन्वय, अफवाहों को न फैलने देना, सर्वधर्म प्रार्थना, सामाजिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था सामान्य बनाने में सम्प्रदाय के दोनों वर्गों, धर्म गुरुओं, मौलवियों और मीडिया के सहयोग से पुलिस बड़ी तत्परता से करती है. 

निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है जन-प्रशासन के सभी अभिकरण जनता के लिए हैं, लेकिन उनकी व्यावहारिक स्थिति भिन्न है. पुलिस के दिन-प्रतिदिन के क्रियाकलाप या उसके नकारात्मक कार्यों का प्रभाव सभी नागरिकों के दैनिक जीवन पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता हो, यह आवश्यक नहीं है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति से नागरिकों की सुरक्षा और अस्तित्व को खतरा हो सकता है. सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि पुलिस केवल अपराधियों को रोकती है, लेकिन पुलिस को अपराधियों एवं गैर-अपराधियों के मध्य एक जटिल स्थिति का सामना करना पड़ता है और उसका मुख्य कार्य इनमें सन्तुलन बनाए रखना होता है. पुलिस का कार्य मूलतः अपराधों की रोकथाम और अपराधियों को सजा देने के लिए उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की भूमिका के माध्यम से समाज की सेवा और उसके नियमों के स्थायित्व से है. ठीक इसी प्रकार पुलिस को नागरिकों से सहायता एवं सहयोग भी वांछित होता है. 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

twelve + 7 =