भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण पर निबंध | Essay on polarization in Indian politics

भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण पर निबंध

भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण (Polarisation in Indian Politics) 

दलीय व्यवस्था लोकतन्त्र की आधारशिला है. भारत में विभिन्न विचार-धाराओं को लेकर अनेक राजनीतिक दल चुनाव लड़ते हैं, परन्तु विडम्बना यह है कि भारत में राजनीतिक दल क्षेत्रीयता, वर्गवाद, साम्प्रदायिकता, जातीयता को बढ़ावा देते हुए अपनी-अपनी ढपली लेकर अलग-अलग राग आलापते हैं, यद्यपि प्रत्येक राजनीतिक दल अपना घोषणापत्र प्रकाशित करता है तथापि देश की बहुतांश निरक्षर जनता राजनीतिक विचारधारा को दृष्टि में रखकर मत नहीं देती है—वह जातिवाद, साम्प्रदायिकता तथा व्यक्तिगत लगाव के आधार पर मतदान करती है. इतना ही नहीं, वह व्यक्ति और पार्टी के कार्यों की चिन्ता किये बिना चुनाव चिन्हों को वोट देती है.

नेहरू युग तक राजनीतिक स्थिति 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व भारत में सबका लक्ष्य एक ही था कि किसी न किसी प्रकार देश को विदेशी शासन से मुक्त किया जाए. स्वतन्त्रता के पूर्व हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे सम्प्रदायवादी दल भी थे, साम्यवादी दल भी थे, परन्तु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) अन्य सभी राजनीतिक दलों पर हावी भी रही और जनता में लोकप्रिय भी रही, क्योंकि वह अंग्रेजी शासन की शत-प्रतिशत विरोधी थी. उसमें दक्षिणपंथी और वामपंथी विचारों की अलग-अलग धाराएँ भी रहीं, परन्तु देश की स्वतन्त्रता के नाम पर समस्त कांग्रेसजन पारस्परिक मतभेदों को भुलाकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में कार्य करने को तत्पर हो जाया करते थे. हाँ, इतना अवश्य है कि सन् 1935 में समाजवादी विचारधारा के कांग्रेसजन, कांग्रेस से अलग हो गये तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के कुछ वर्ष पूर्व अनेक कांग्रेसजन, स्वतन्त्र भारत के भावी राजनीतिक स्वरूप और राजनीतिक दलों के स्वरूप के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोचने लगे थे.

सन् 1947 में स्वतन्त्रता के उपरान्त पंडित जवाहरलाल नेहरू के व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण कांग्रेस के वामपंथी और दक्षिणपंथी तत्त्व परस्पर मिले रहे और कांग्रेस मध्य मार्ग का अनुसरण करती रही. कांग्रेस वस्तुतः एक फोर्स बन गई जो प्रगतिशील तो थी ही, परन्तु साथ ही पूँजीवाद को भी प्रश्रय प्रदान करने को प्रस्तुत थी. हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धान्त को लेकर भारतीय जनसंघ का यत्र-तत्र प्रभाव रहा तथा बंगाल और केरल में साम्यवादी दल की जड़ें गहरी होती गईं, परन्तु कांग्रेस सबसे बड़े और सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक दल के रूप में अक्षुण्ण बनी रही. कतिपय राज्यों में छुटपुट रूप में अन्य दलों की भी सरकारें बनीं, परन्तु समग्र रूप में भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कांग्रेस ही छाई रही. यदा-कदा राजनीतिक ध्रुवीकरण की बात होती रही, परन्तु अनेक कारणोंवश, विशेषकर नेहरूजी के व्यक्तित्व के प्रभाव के कारण, ध्रुवीकरण की प्रक्रिया सम्पन्न न हो सकी.

 नेहरू के बाद जनता पार्टी के शासनकाल तक की राजनीतिक स्थिति 

पं. नेहरू के बाद श्री लालबहादुर शास्त्री का प्रधानमन्त्रित्व हुआ. वह अवधि अत्यन्त अल्प रही तथा इस कालावधि में देश का ध्यान भारत-पाक युद्ध की ओर ही रहा. ध्रुवीकरण का प्रश्न ही नहीं था. इसके बाद श्रीमती इन्दिरा गांधी का युग आया. समाजवादी दल विखर चुका था. भारतीय जनसंघ उत्तरी भारत में प्रभावशील हो रहा था. अपने स्वर्गीय पिता की भांति श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनसंघ को साम्प्रदायिक दल कह-कहकर उसका अवमूल्यन कर दिया. 

सन् 1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ और कांग्रेस (इन्दिरा) उभरकर आई. श्रीमती गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके अपने आपको प्रगतिशील और वामपंथी घोषित कर दिया. उधर संगठन कांग्रेस दक्षिण पंथी गुट होने का आरोप तो झेलती रही, परन्तु किसी भी दक्षिणपंथी दल का उसमें विलय नहीं हुआ. इसी समय भारत-पाक युद्ध में विजयी होकर इन्दिरा जी ने चुनाव करा दिए. परिणाम यह हुआ कि केन्द्र एवं प्रायः समस्त राज्यों में इन्दिरा जी की कांग्रेस को पूर्ण सफलता मिली. राजनीतिक दल बिखरे रह गए व ध्रुवीकरण नहीं हुआ. 

सन् 1972 के चुनावों के बाद समान विचारधारा वाले दलों के आपस में मिलने की बात उठी, परन्तु सफलता नहीं मिली. सबसे बड़ा कारण यह था कि कांग्रेस (इ) मध्य मार्ग का अनुसरण कर रही थी और उसमें दक्षिणपंथी और वामपंथी दोनों ही विचारधाराओं के लिए गुंजाइश बनी हुई थी. दल-बदल की नीति को अपनाते हुए संगठन कांग्रेस के कार्यकर्ता टूट-टूटकर पुनः इन्दिरा कांग्रेस में आते गये. साम्यवादी दल दो भागों में बँट चुका था. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी श्रीमती गांधी की प्रगतिशील नीतियों का समर्थन करती रही. स्वतन्त्र पार्टी कमजोर हो ही चुकी थी, समाजवादी दल एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में थे. भारतीय क्रान्ति दल का प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ पश्चिमी जिलों तक सीमित था. तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रही, पंजाब में अकाली दल जोर बाँधता रहा. भारतीय जनसंघ पर साम्प्रदायिकता का आरोप इतना प्रखर रूप धारण कर चुका था कि किसी दल के साथ उसका स्थायी गठबन्धन सम्भव नहीं हो सकता था. कहने का तात्पर्य यह है कि जितने भी दल थे वे आपस में मिलकर कोई सुदृढ़ एवं प्रभावशाली विरोधी दल नहीं बना सके. 

श्रीमती गांधी के चुनाव के विरुद्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय तथा बिहार में श्री जयप्रकाश नारायण के ‘सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन’ के परिप्रेक्ष्य में स्थिति बदलती हुई दिखाई दी, परन्तु इन्दिराजी द्वारा आपातकालीन स्थिति लागू करने के साथ सन्नाटा छा गया. जेल के भीतर विरोधी दलों के नेताओं ने समझौता किया. जनता पार्टी नाम से सशक्त विरोधी पार्टी खड़ी हो गई. श्रीमती गांधी ने अचानक चुनावों की घोषणा कर दी. चार विरोधी दल जनता पार्टी के झण्डे के नीचे आये. कांग्रेसी युवातुर्क चन्द्रशेखर, बाबू जगजीवन राम, श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा आदि कांग्रेस से इन्दिराजी को छोड़कर जनता पार्टी में आ गये. चुनावों में कांग्रेस की अप्रत्याशित रूप से करारी हार हुई. स्वयं इन्दिरा गांधी ही पराजित हो गयीं, केन्द्र में पहली बार, सन् 1977 में कांग्रेस की सत्ता समाप्त हुई और जनता पार्टी ने सत्ता की बागडोर सँभाली. सत्ता में आते ही विभिन्न राजनीतिक दल शक्ति की राजनीति में उलझ गये. चौधरी चरणसिंह के मन में प्रधानमंत्री बनने की साध थी. उसको पूरा करने के लिए चौधरी चरणसिंह और श्री राजनारायण ने सत्ता प्राप्ति का दाँव खेला; इन्दिराजी ने उन्हें चारों खाने चित्त कर दिया. ध्रुवीकरण की कौन कहे, जनता पार्टी का शीराजा ही बिखर गया, इन्दिरा कांग्रेस पुनः शासन सत्ता को प्राप्त हुई. अपनी-अपनी ढपली पर विभिन्न राजनीतिक दल फिर अपना-अपना राग अलापने लगे.

वर्तमान राजनीतिक स्थिति 

भारत की वर्तमान राजनीतिक स्थिति यह है कि प्रायः प्रत्येक राजनीतिक दल में अलग अलग विचारधारा वाले लोग एक साथ बैठे हुए हैं. प्रत्येक दल में कुछ दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक हैं और कुछ वामपंथी होने का दम भरते हैं. इतना ही नहीं, आवश्यकतानुसार वे दल-बदल करते समय यदि आवश्यक होता है तो अपनी विचारधारा को नया मोड़ देने में भी संकोच नहीं करते हैं, जनता पार्टी में विभिन्न विचारधाराओं वाले दल इकट्ठे हो गये थे. सामान्य नागरिक की दृष्टि में स्वतन्त्र पार्टी, भारतीय लोकदल और संगठन कांग्रेस के कुछ नेता दक्षिणपन्थी विचारधारा के समर्थक थे तथा जनता पार्टी के अध्यक्ष चन्द्रशेखर समाजवादी पार्टी के लोग तथा कांग्रेस से टूटकर आने वाले लोग वामपन्थी विचारधारा की ओर झुके हुए माने जाते थे. अब तक जनता पार्टी की जगह तीन नई जनता पार्टियाँ बन गयी हैं तथा कांग्रेस का भी विभाजन होकर तीन कांग्रेस बन गयी हैं. सर्वाधिक रोचक बात यह है कि प्रत्येक दल समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतन्त्र की दुहाई देता है. 

समाजवादी दल तीन टुकड़ों में और साम्यवादी दल दो टुकड़ों में विभाजित है. वे आवश्यकतानुसार चाहे जिस पार्टी के साथ गठबन्धन कर लेते हैं. सबका एक ही लक्ष्य है राजनीतिक सत्ता, शासन सत्ता की प्राप्ति. 

इन्दिराजी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, घटना चक्र इस प्रकार चला कि श्री वी. पी. सिंह और श्री चन्द्रशेखर थोड़े-थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने. श्री पी. वी. नरसिंह राव की अल्पमत सरकार ने पाँच वर्षों तक शासन चलाया. 

समग्र रूप में स्थिति यह है कि साम्यवादी दलों समेत सभी राजनीतिक दल अपने आपको गांधीवादी विचारधारा का पोषक मानते हैं और सत्ता की राजनीति के परिणामस्वरूप सुविधावादी राजनीति अपनाने को तैयार रहते हैं, यानी कोई भी राजनीतिक दल किसी भी राजनीतिक दल के साथ गठबन्धन कर लेता है. आर्थिक नीतियों के आधार पर ध्रुवीकरण के यद्यपि पूरे-पूरे अवसर मौजूद हैं तथापि शक्ति की राजनीति ने अनेक भटकाव उत्पन्न कर दिये हैं. सत्ता की राजनीति के परिणामस्वरूप हमारे राजनीतिक दल सामान्य कार्यक्रम के नाम पर पंचमेल खिचड़ी जैसी रूपरेखा वाले राजनीतिक दल को गठित करने के लिए प्रयत्नशील बने रहते हैं. मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी तथा कांशीराम की बहुजन समाजवादी पार्टी का गठबन्धन राजनीतिक छलावे का जबरदस्त उदाहरण है. 

स्पष्ट है कि बहुदलीय प्रणाली की पद्धति द्वारा स्थायी सरकार एक कठिन समस्या बन गई है. इतने अधिक आपसी स्वार्थ टकराते हैं कि सरकार 4 दिन भी बेफिक्री के साथ काम नहीं कर पाती है.

ध्रुवीकरण क्यों नहीं ? 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के 47 वर्ष बाद भी इस देश में राजनीतिक शक्तियों का ध्रुवीकरण होकर एक सशक्त विरोधी दल का गठन न हो पाना सचमुच आश्चर्य का विषय है. ध्रुवीकरण न हो सकने का कारण यह दिया जाता है कि भारत एक रूढ़िवाद राष्ट्र है तथा यहाँ व्यक्ति पूजा का बोलबाला है. ऐसी स्थिति में यहाँ अनुदारवादी दक्षिणपंथी दल पनपने चाहिए थे, परन्तु ऐसा नहीं हुआ है. हाँ, यह अवश्य हुआ है कि उदारवादियों और अनुदारवादियों के बीच की खिचड़ी पकती रही है. सुविधावादी राजनीति का पनपना एक अन्य कारण है. अधिकांश राजनीतिज्ञ सिद्धान्तहीन हैं. वे सत्ता के साथ दल-बदल करते रहते हैं. तीसरा कारण है-धर्माश्रित साम्प्रदायिकता. यहाँ वोट संकलन सम्प्रदाय एवं धर्म के नाम पर होता है. यहाँ चुनाव किसी कार्यक्रम के आधार पर नहीं, बल्कि साम्प्रदायिक भावनाओं को उभारकर जीते जाते हैं. इसी के साथ होती है क्षेत्रीयता की भावना. वह भी ध्रुवीकरण में बाधक है. मतदान करते समय राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा क्षेत्रीय एवं स्थानीय हितों को महत्त्व दिया जाता है, उनकी दुहाई दी जाती है, परिणाम यह हुआ है कि अनेक क्षेत्रीय और प्रान्तीय दल बनते-बिगड़ते रहते हैं. कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के अलावा अभी तक कोई राजनीतिक दल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि का निर्माण नहीं कर पाया है. इन सबके ऊपर सिरमौर है—जातीयता की भावना, जो हमारे माँस-मज्जा और रक्त में स्थायी रूप से बस गयी है. चुनाव के अवसर पर कांग्रेस जैसा समर्थ दल यह देखकर अपने प्रत्याशी का चयन करता है कि प्रमुख क्षेत्र में किसी जाति अथवा बिरादरी के कितने वोट हैं? जाति के नाम पर वोट माँगना तथा वोट देना, हमारे देश की राजनीति की एक मान्य रणनीति बन गयी है. अब आता है सर्वाधिक निन्दनीय कारण, वह है-धन के लोभ में वोट देना यानी वोट बेचना. लाखों वोट नकद धनराशि देकर, शराब पिलाकर तथा अन्य प्रकार के लोभ लालच देकर प्राप्त किये जाते हैं. गाँव, मोहल्ला आदि का चौधरी या सरदार राजनीतिक दल विशेष से सौदा कर लेता है और वह जिसको कहता है, उसी को पूरा क्षेत्र वोट दे देता है. इसे हम अंधानुकरण की प्रवृत्ति, भेड़ चाल आदि जो चाहें वह कह सकते हैं. ध्रुवीकरण के बाधक कारणों में दो अन्य कारण भी दिखाई देते हैं विभिन्न राज्यों का वातावरण भिन्न होना तथा विभिन्न क्षेत्रों में वर्ग संघर्ष का भिन्न रूप होना. इनके ऊपर है—शिक्षा का अभाव और निपट निर्धनता. अशिक्षित को चाहे कुछ समझाया जा सकता है और भूखे व्यक्ति से चाहे जो कुछ कराया जा सकता है. भारत की राजनीति की एक बहुत ही विचित्र बात यह है कि प्रत्येक दल अपने आपको गांधीवाद का उत्तराधिकारी कहता है—गांधीजी और गांधीवाद की दहाई देता है. इस प्रकार की भ्रामक नारेबाजियों में हमारा भोला उवं अपढ़ मतदाता किंकर्तव्यविमूढ़-सा होकर रह जाता है. कहने का तात्पर्य यह है कि राजनीति के क्षेत्र में व्याप्त स्वार्थपरता एवं सिद्धान्तहीनता राजनीतिक ध्रुवीकरण की बाधक शक्तियाँ हैं. 

हिन्दुओं से कटकर कांग्रेस को हानि उठानी पड़ी, वह अब हिन्दुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न करने लगी है. इस स्थिति में वामपंथी पार्टियाँ भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस के विरुद्ध एक तीसरा मोर्चा बनाने की बात करने लगी हैं, परन्तु चुनाव के अवसर पर कौनसे गठबंधन बन जाएँ, कोई नहीं कह सकता है. अतएव यही कहा जा सकता है कि भारत में राजनीतिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया अधूरी है. सम्भावना यह है कि भारतीय जनता पार्टी तथा उसके विरोधी दल ध्रुवीकरण के दो पक्ष बन जाएँ. 

उत्तर प्रदेश में चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी को सर्वाधिक सीटें प्राप्त हुईं. इस प्रकार तथाकथित साम्प्रदायिक भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने के लिए जातिवाद को समर्थन दिया गया है. फलतः सवर्ण और अनुसूचित वर्गों के मध्य खाई तैयार कर दी गई है और वर्ण-संघर्ष को बढ़ावा दिया जा रहा है और वह भी धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस तथा धर्मविरोधी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा. बहुत सम्भव है कि ध्रुवीकरण का आधार यह नवजातिवाद बन जाए. 

राजनीतिक ध्रुवीकरण के सन्दर्भ में प्रो. बलराज मधोक के ये विचार मनन करने योग्य हैं—“नेहरूवाद और पटेलवाद देश के गैर-मार्क्सवादी दलों और शक्तियों के ध्रुवीकरण का व्यावहारिक आधार बन सकते हैं और बनने चाहिए.” उनका कहना है कि गांधीजी उग्र वामपन्थियों से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक, सभी दलों की कामधेनु बन चुके हैं. अतः गांधीवाद वैचारिक आधार पर दलों को विभाजित करने का माध्यम नहीं बन सकता है. नेहरू और पटेल के चिन्तन में मौलिक अन्तर को लक्ष्य करके गांधीजी ने कांग्रेस को तोड़कर दो नये दल बनाने की बात कही थी. यदि उनकी यह बात मान ली गयी होती, तो सन् 1948 में ही देश को दो बड़े दल एक नेहरूवादी और दूसरा पटेलवादी मिल गये होते. 

भारत की राजनीति की माँग है कि यहाँ तीन राजनीतिक दल होने चाहिए—दक्षिणपन्थी विचारधारा को मानने वाला, वामपन्थी विचारधारा वाला दल तथा मध्यमार्ग का अनुसरण करने वाला दल. इसके साथ ही दल-बदल करने पर कठोर प्रतिबन्ध लगाये जायें जिससे “आया राम और गया राम’ की बिरादरी समाप्त हो जाए. राजनीतिक ध्रुवीकरण तभी सम्भव है जब राजनीतिक दलों का गठन केवल आर्थिक नीतियों के आधार पर हो और सम्प्रदाय, जाति-बिरादरी, क्षेत्रीयता जैसे संकुचित आधारों पर कोई दल गठित न किया जाये और न इन आधारों पर वोट ही माँगे जायें. 

इस समय सशक्त विरोधी दल की जितनी आवश्यकता है, वैसी कभी नहीं रही. एक दल विशेष के हाथों में पूर्ण शक्ति रहने के कारण भ्रष्टाचार पनपा है और तानाशाही प्रवृत्तियाँ अंकुरित हुई हैं. लोकतन्त्र की सुरक्षा के लिए इस समय ध्रुवीकरण अनिवार्य है. राजनीतिज्ञों को एक साथ बैठकर इस सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक विचार-विमर्श करना चाहिए कि सिद्धान्तहीनता की राजनीति किस प्रकार समाप्त हो तथा सिद्धान्तों के आधार पर राजनीति का संचालन सम्भव हो पाये, परन्तु प्रस्तुत स्थिति परिस्थिति को देखते हुए यह कहना कठिन है कि निकट भविष्य में राजनीतिक शक्तियों का ध्रुवीकरण सम्भव हो सकेगा. आशा की एक किरण सामने आयी है

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