सिंगल यूज प्लास्टिक पर निबंध | प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध | Essay on Single Use Plastic

सिंगल यूज प्लास्टिक पर निबंध

सिंगल यूज प्लास्टिक पर निबंध | प्लास्टिक प्रदूषण पर निबंध | Essay on Single Use Plastic

प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिये जाने वाले भाषण का ऐतिहासिक महत्त्व होता है। इस भाषण में प्रधानमंत्री जनता को सरकार की आगामी पहलों एवं योजनाओं की झांकी प्रस्तुत करने के साथ-साथ सामाजिक पहलों के माध्यम से जनसामान्य को जागरूक करते हैं। भारत के 73वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2019) के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश को प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने की अपील की है। ध्यातव्य है कि सिंगल यूज प्लास्टिक से भारत को मुक्त करने के अभियान की शुरुआत महात्मा गांधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर, 2019 से की जाएगी। सिंगल यूज प्लास्टिक से अभिप्राय ऐसे प्लास्टिक से है, जिसका इस्तेमाल केवल एक बार किया जा सकता है। 

अपनी उपादेयता के कारण प्लास्टिक जहां हमारी रोजमर्रा के जिंदगी में इस हद तक सम्मिलित हो चुका है कि इसे अब जीवन से बाहर निकाल पाना संभव नहीं रह गया है, वहीं इसने प्रदूषण की समस्या को भी बढ़ाया है, जो कि एक नये प्रकार का प्रदूषण है तथा जिसे हम ‘प्लास्टिक प्रदूषण’ की समस्या कहते हैं। प्लास्टिक में तमाम खूबियां होती हैं। मसलन, यह हल्का होता है, जलावरोधी होता है, इसमें जंग प्रतिरोधक शक्ति तो होती ही है, यह सर्द-गर्म को सहन करने की भी क्षमता रखता है। अपनी इन्हीं खूबियों के कारण प्लास्टिक ने देखते ही देखते मानव जीवन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया और जीवन के हर क्षेत्र में इसका दखल बढ़ा। इन सारी खूबियों के बावजूद प्लास्टिक ने खतरनाक हद तक प्रदूषण की समस्या को बढ़ाया भी है। प्लास्टिक की तमाम खूबियों पर इसका एक अवगुण भारी पड़ता है वह यह है कि प्लास्टिक प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं हो पाता है। दीर्घ अवधि तक अपना अस्तित्व बनाए रखने के कारण यह पर्यावरण और प्रकृति को व्यापक पैमाने पर क्षति पहुंचाता है। 

भारत के 73वें स्वतंत्रता दिवस ( 15 अगस्त, 2019) के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश को प्लास्टिक कचरे से मुक्त करने की अपील की है। ध्यातव्य है कि सिंगल यूज प्लास्टिक से भारत को मुक्त करने के अभियान की शुरुआत महात्मा गांधी के जन्मदिवस 2 अक्टूबर, 2019 से की जाएगी। 

आज प्लास्टिक प्रदूषण की एक भयावह तस्वीर हमारे सामने है। यह एक वैश्विक समस्या है। समूचे विश्व में हर साल अरबों की संख्या में खाली प्लास्टिक के थैले फेंक दिए जाते हैं। नाले-नालियों में जाकर ये उनके प्रवाह को अवरुद्ध कर देते हैं। इनकी सफाई तो खर्चीली पड़ती ही है, जल के साथ बहकर ये अंततः नदियों व समुद्रों में पहुंच जाते हैं। चूंकि ये प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं होते, इसलिए नदियों, समुद्रों आदि के जीवन व पर्यावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण के कारण आए दिन वैश्विक स्तर पर लाखों की संख्या में पक्षियों आदि की मौत की खबरें तो मिलती ही हैं, ये प्रदूषण व्हेल, सील तथा कछुओं आदि की मौत का भी कारण बनता है। ये प्लास्टिक के अंशों को निगलने के कारण काल का ग्रास बनते हैं। आज विश्व का लगभग प्रत्येक देश प्लास्टिक से उत्पन्न प्रदूषण की विनाशकारी समस्या को झेल रहा है। भारत में तो स्थितियां कछ ज्यादा ही बदतर हैं। यहां प्लास्टिक की थैलियों को खाने से गायों और आवारा पशुओं के मरने के समाचार रोज मिला करते हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक इस समय समूचे विश्व में लगभग 1500000000 टन प्लास्टिक का उपयोग किया जा रहा है, जो कि हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता ही जा रहा है। वैसे तो प्लास्टिक के उत्पादों एवं उपयोग क्षेत्र की फेहरिस्त बहुत लंबी-चौड़ी है, तथापि इसकी व्यापकता को समझने के लिए यहां संक्षेप में इसके कुछ प्रमुख उपयोगों के बारे में बताया जा रहा है- 

सभी प्रकार के कैरीबैग के निर्माण में। 

पानी की टंकियों, पाइपों तथा नल सम्बन्धी अन्य उपकरणों के निर्माण में।

मिनरल वाटर, पेय पदार्थों, दूध, बिस्किट, खाद्य तेल, अनाज आदि खाद्य सामग्री की पैकिंग में। 

दैनिक उपयोग की वस्तुओं जैसे टूथ ब्रश, टूथपेस्ट ट्यूब, शैम्पू बॉटल, चश्मे तथा कंघी आदि में।

दवाइयों तथा उनके डिब्बों, रक्त भंडारण थैलों, तरल ग्लूकोज आदि में।

विभिन्न आकार में ढाले गए फर्नीचरों जैसे मेज, कुर्सी, आलमारी, 

दरवाजे इत्यादि में।

वाहनों, हवाई जहाजों तथा अन्य उपकरणों के हिस्सों के निर्माण में।

इलेक्ट्रिक सामग्री, इलेक्ट्रानिक उपकरणों, टेलीविजन, रेडियो, कम्प्यूटर तथा टेलीफोन आदि के निर्माण में।

कृषि में उत्पादन की मात्रा को बढ़ाने के लिए मृदा से जल के वाष्पोत्सर्जन को रोकने हेतु आच्छादित की जाने वाली कृत्रिम घास आदि के निर्माण में।

खिलौनों, डायपर, क्रेडिट कार्ड आदि में। यहां यह जान लेना जरूरी होगा कि वैश्विक स्तर पर न्यूनतम प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का उपयोग जहां 18.0 किलोग्राम है, वहीं इसके रीसाइकिलिंग की दर 15.2% है। ठोस अपशिष्ट में वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक के अंश 7.0% तक पाए जाते हैं। 

प्लास्टिक जिस तरह से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका है, उसे देखते हुए इसे एकदम से तो जीवन से निकाला नहीं जा सकता, किंतु समझदारी भरे उपाय कर इस समस्या को एक सीमा तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए हमें तीन कदम मजबूती से बढ़ाने होंगे। पहला कदम यह होना चाहिए कि हम प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाएं और इसके उपभोग में कमी लाएं। दूसरा कदम हमें प्लास्टिक के सामानों के पुनः इस्तेमाल की ओर बढ़ना होगा। यानी इन्हें कचरे में फेंकने के बजाय घरेलू कामों में हम इनका पुनः उपयोग करें। तीसरा कदम है पुनश्चक्रण (Recycling) जिसके बारे में पहले ही काफी कुछ बताया जा चुका है। 

उक्त फेरहिस्त से प्लास्टिक की उपादेयता का तो पता चलता है, किंतु प्लास्टिक जनित क्या-क्या समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं, यह भी जान लेना जरूरी है। इन्हीं समस्याओं ने प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को बढ़ाया है। तो आइये इन पर नजर डालते हैं .

प्लास्टिक नैसर्गिक रूप से विघटित होने वाला पदार्थ नहीं है। एक बार निर्मित हो जाने के बाद यह प्रकृति में स्थाई तौर पर बना रहता है और प्रकृति में इसे नष्ट कर सकने में सक्षम किसी सूक्ष्म जीवाणु के अस्तित्व के अभाव में यह कभी भी नष्ट नहीं होता। अतः इसके कारण गंभीर पारिस्थितिकीय असंतुलन तथा पर्यावरण में प्रदूषण फैलता है।

इसके घुलनशील अथवा प्राकृतिक रूप से विघटित न हो सकने के कारण यह नालों एवं नदियों में जमा हो जाता है जिससे जलप्रवाह के अवरूद्ध होने के कारण जलभराव की समस्या उत्पन्न हो जाती है तथा साथ ही स्वास्थ्य सम्बन्धी सफाई आदि की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

जाम हो चुके सीवर के ठहरे हुए पानी में मच्छरों के पैदा होने से मच्छरजनित रोग जैसे मलेरिया, डेंगू आदि फैलना आरंभ हो जाता है।

समुद्री पर्यावरण में प्लास्टिक का कचरा फेंके जाने से सामुद्रिक पारिस्थितिकी को हानि पहुँचती है। समुद्री जीव इनका उपभोग कर लेते हैं जिसके परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हो जाती है।

प्लास्टिक उद्योग में कार्यरत् श्रमिकों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है और उनके फेफड़े, किडनी तथा स्नायुतंत्र दुष्प्रभावित होते हैं। निम्न गुणवत्तायुक्त प्लास्टिक पैकिंग सामग्री पैक किए जाने वाले भोजन एवं औषधियों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया करके उन्हें दूषित एवं खराब कर सकती है जिससे उपयोगकर्ताओं हेतु खतरा उत्पन्न हो जाता है।

प्लास्टिक को जलाए जाने से निकलने वाली विषाक्त गैसों के परिणामस्वरूप गंभीर वायु प्रदूषण की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। 

भारत में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन में निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं- 

फेंकी गई प्लास्टिक की रिसाइक्लिग की जानी चाहिए। 

प्रत्येक मनुष्य को पैकेजिंग के काम में लाई और फेंक दी जाने वाली प्लास्टिक के उपयोग में यथासंभव कमी लानी चाहिए। ऐसे उत्पादों को खरीदना चाहिए जिनकी पैकेजिंग में कम से कम प्लास्टिक का उपयोग किया गया हो तथा ग्राहकों को अपने निजी कपड़े के बैग आदि का उपयोग करना चाहिए। किसी भी प्रकार के प्लास्टिक के पदार्थ को सीवर, नदियों के किनारे अथवा समुद्र के आसपास नहीं फेंका जाना चाहिए। 

प्रत्येक शहर के नगर निगम अधिकारियों का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वे प्राकृतिक रूप से विघटित होने तथा न हो सकने योग्य कूड़े के लिए अलग-अलग कूड़ेदानों की व्यवस्था करें। इस प्रकार एकत्रित की गई समस्त प्लास्टिक को रिसाइक्लिग के लिए भेजा जाना चाहिए। 

जनसाधारण में प्लास्टिक से उत्पन्न खतरों के प्रति सघन जागरुकता अभियान चलाया जाना चाहिए जिसे स्कूल स्तर से प्रारंभ कर समस्त बाजारों एवं कार्यालयों में कार्यरत् जनता तक प्रचारित एवं प्रसारित किया जाना चाहिए। नागरिकों में अपने शहर एवं देश के पर्यावरण की रक्षा के उत्तरदायित्वों का प्रचार किया जाना चाहिए।

परिवार के प्रत्येक सदस्य को प्राकृतिक रूप से विघटित हो सकने योग्य तथा विघटित न हो सकने योग्य अलग-अलग कूड़ेदान के उपयोग के विषय में शिक्षित किया जाना चाहिए जिससे कचरे को सही तरीके से छाँटने में सहायता प्राप्त हो सके।

पेट्रोकेमिकल औद्योगिक इकाईयों तथा प्लास्टिक वस्तुओं के समस्त प्रमुख निर्माताओं को अपने उत्पादों में प्रयुक्त प्लास्टिक के रिसाइक्लिग के तरीकों को आम जनता को सूचित करने हेतु बाध्य किया जाना चाहिए।

समस्त प्रकार के रिसाइक्लिग एवं ठोस अपशिष्ट निस्तारण परियोजनाओं के सफल संचालन हेतु बैंकों तथा अन्य सरकारी संस्थाओं को आगे आकर अधिक से अधिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।

समयानुसार एवं निरंतर आधार पर तथा विशेष रूप से मानसून के मौसम के पहले सीवर तथा नालों की समुचित सफाई की जानी चाहिए। 

वस्तुतः प्लास्टिक जिस तरह से हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुका है, उसे देखते हुए इसे एकदम से तो जीवन से निकाला नहीं जा सकता, किंतु समझदारी भरे उपाय कर इस समस्या को एक सीमा तक नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए हमें तीन कदम मजबूती से बढ़ाने होंगे। पहला कदम यह होना चाहिए कि हम प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाएं और इसके उपभोग में कमी लाएं। दूसरा कदम हमें प्लास्टिक के सामानों के पुनः इस्तेमाल की ओर बढ़ना होगा। यानी इन्हें कचरे में फेंकने के बजाय घरेलू कामों में हम इनका पुनउँपयोग करें। तीसरा कदम है पुनश्चक्रण (Recycling) जिसके बारे में पहले ही काफी कुछ बताया जा चुका है। अंत में कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की दूर दृष्टि से यदि इस अभियान को कार्यान्वित किया गया तो आने वाला समय भारत के लिए प्रदूषण से मुक्ति हेतु बेहतर होगा। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

8 − 4 =