सहभागी लोकतंत्र पर निबंध | Essay on Participatory democracy

सहभागी लोकतंत्र पर निबंध

सहभागी लोकतंत्र पर निबंध  : लोकतंत्र का सर्वाधिक जनपक्षधर स्वरूप/वर्तमान की जरूरत एवं भविष्य की अनिवार्यता/अवधारणा एवं भारतीय अनुभव 

मानव समाज ने अपने राजनीतिक जीवन में जिन सबसे संभावनाशील और समकालीन विचार पद्धतियों एवं प्रक्रियाओं को जन्म दिया उनमें ‘लोकतंत्र’ सबसे अधिक प्रासंगिक और दीर्घकालिक है। विभिन्न समाजों में लोकतंत्र’ (Democracy) अपने अलग अलग नामों से इतिहास के प्रत्येक काल में मौजूद रहा। प्राचीन योपीय समाज एवं छठी शताब्दी ईसा पूर्व भारत में लोकतंत्र के विविध रूप विद्यमान थे। वास्तव में ‘लोकतंत्र’ अपनी मूल प्रकृति में ही सहभागी है। ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ जैसी अवधारणा ‘सहभागिता’ को प्रदर्शित करती है। आधुनिकता के विकास के साथ जब यूरोप में राजनीतिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन होना शुरू हुआ था तब वहीं पर उदारवादी लोकतंत्र का जन्म हुआ था। ब्रिटेन एवं फ्रांस की क्रांतियों के बाद उदारवादी लोकतंत्र कुछ हद तक स्थापित हुआ। हालांकि फ्रांस में जल्द ही तानाशाही व्याप्त हो गई। फिर भी उदारवादी लोकतंत्र को पुष्ट करने में पश्चिमी देशों का विशेष हाथ रहा। समय के साथ इसमें अभिजनवादी एवं कुलीन प्रवृत्तियां हावी होती गईं और इसमें जनता की भागीदारी कम होती गई। मिशेल्स, मिल्स, पैरेटो जैसे राजनीतिक विचारकों ने लोकतंत्र के अभिजनवादी होते जाने पर चिंता जाहिर की थी। बीसवीं सदी के मध्य में जब लोकतांत्रिक देशों के मध्य ही युद्ध छिड़ गया तो राजनीतिक चिंतकों ने लोकतंत्र के तात्कालिक स्वरूप पर सवाल खड़ा कर दिया। साठ एवं सत्तर के दशक में ‘सहभागी लोकतंत्र की अद्यतन अवधारणा विकसित हुई। 

‘लोकतंत्र’ अपनी मूल प्रकृति में ही सहभागी है। ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ जैसी अवधारणा ‘सहभागिता’ को प्रदर्शित करती है। 

सहभागी लोकतंत्र की सैद्धांतिक अवधारणा का सूत्रपात करने का कार्य वर्ष 1960 में जेन मैन्सब्रिज (Jane Mansbridge) नामक चिंतक ने किया। इसके बाद सहभागी लोकतंत्र का सैद्धांतिक पक्ष क्रमशः कैरोल पैटमैन के ‘पार्टीसिपेशन एंड डेमोक्रेटिक थियरी’ (1970) एवं सी.बी. मैक्फर्सन के ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ लिबरल डेमोक्रेसी’ (1977) में विकसित हुआ। यह अवधारणा यह विश्वास रखती है कि निर्णय निर्माण के प्रत्येक चरण में जनता की भागीदारी हो। यह प्रतिनिधि लोकतंत्र से इस मायने में भिन्न है कि यह अपने चुनाव के अधिकार का प्रयोग करने के बाद भी प्रतिनिधियों पर अंकुश लगा सकती है। साथ ही प्रतिनिधियों द्वारा प्रत्येक चरण में लिए जा रहे निर्णयों में जनता की भागीदारी होती है। स्कैंडिनेवियन देशों में प्रचलित प्रत्यक्ष लोकतंत्र (Direct Democracy) की व्यवस्था ‘सहभागी लोकतंत्र’ के करीब नजर आती है। शुरुआती ‘लोकतंत्र’ के विभिन्न उदाहरणों में यदि देखें या इसकी ग्रीक परिभाषा पर गौर करें तो यह प्रकृतस्थ ‘सहभागी’ नजर आएगी। क्योंकि इसमें शक्ति जनता के हाथ में होती है। इस व्यवस्था के निर्णय निर्माण में अर्थपूर्ण योगदान के लिए समाज के सभी सदस्यों के पास समान अवसर होते हैं, जिसका उपयोग करके लोग लोकतंत्र के दायरे को बढ़ाते जाते हैं।

अकादमिक हलकों में सहभागी लोकतंत्र को लेकर जो बहस राजनीतिक विचारकों ने छेड़ी थी, उसका व्यावहारिक धरातल पर प्रयोग बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक देखने को मिलने लगा। ‘सहभागी लोकतंत्र’ के प्रचलित और एक राजनीतिक मांग के रूप में दुनिया भर में प्रचारित होने के पीछे वर्ष 1990 के बाद की परिस्थितियां जिम्मेदार थी। यह वह समय था जब दशकों से जारी शीत युद्ध अपने अवसान की ओर था। अमेरिका का सैनिक और आर्थिक रूप से दुनिया पर वर्चस्व स्थापित हो चुका था। विचारधारा से लेकर इतिहास के अंत तक की घोषणाएं हो चुकी थीं और दुनिया लगभग एकध्रुवीय हो गई थी। इसी बीच उदारवादी लोकतंत्र के विजय की घोषणा की गई तथा शासन पद्धति के रूप में एक मात्र सार्विक विचार की तरह इसे प्रचारित किया गया। दूसरी तरफ विकासशील देशों में विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की मदद से विश्व व्यापार संगठन (पूर्व में गैट) के नियमों के तहत संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम लागू किया गया तथा नवउदारीकरण एवं भूमंडलीकरण की नीतियों से लोकतंत्र संचालित होने लगा। 

दूसरी तरफ भारत में नई आर्थिक नीतियों के ठीक समानान्तर विकेंद्रीकरण की परियोजना चलाई गई। इस राजनीतिक विकेंद्रीकरण के बीज भारत की प्राचीन प्रशासनिक व्यवस्था में निहित हैं। ‘ग्राम पंचायत’ और सभा एवं समिति जैसी अवधारणाएं प्राचीन भारत में विद्यमान थीं, जो जनता की शासन-प्रशासन में भागीदारी की सूचक थी। गांधी के पहले ये संस्थाएं किसी न किसी रूप में भारतीय राजनीतिक प्रणाली में मौजूद थीं, चाहे वह सल्तनतकाल रहा हो, मुगलकाल या ब्रिटिश। लेकिन गांधी ने ग्राम पंचायत को एक महत्त्वपूर्ण एवं प्राथमिक इकाई बनाया। उनके स्वराज एवं लोकतंत्र की अवधारणा में ‘ग्राम पंचायत’ एक महत्त्वपूर्ण धुरी थी। इसलिए भारतीय संविधान के निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायत को जगह दी थी जिसे बकायदा नब्बे के दशक में संविधान संशोधन (73वें) के जरिए मुकम्मल किया गया। यह वास्तव में ‘सहभागी लोकतंत्र’ की अवधारणा को चरितार्थ करना था। इसके जरिए शक्ति एवं निर्णय निर्माण के संकेंद्रण को एक जगह ही सीमित न करके कई छोटी-छोटी इकाईयों में बांटा गया। इससे शासन व्यवस्था की निचली इकाई ‘ग्राम’ बन गई और गांव का प्रत्येक व्यक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया से संवैधानिक रूप से जुड़ गया। इस दौरान नई आर्थिक नीति के माध्यम ‘विकास का पश्चिमी मॉडल’ विकासशील देशों के समक्ष एकमात्र विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसे दो तरह से ग्राम पंचायतों द्वारा स्वीकार किया गया। जहां पर ‘विकास’ उनके स्थानीय हितों के मताबिक था वहां इस मॉडल का स्वागत किया गया तथा जहां पर ‘विकास’ केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाला था वहां इसका प्रतिरोध किया गया। इससे ‘सहभागी लोकतंत्र’ की अवधारणा को विकासशील देशों के अनुरूप विकसित होने का अवसर मिला। यही तथ्य अकेले भारत पर ही नहीं | बल्कि दुनिया के अन्य विकासशील देशों पर भी लाग होता है। इन देशों में चल रहे विकास की विविध परियोजनाओं के जनता के हित | में रहने के लिए कई संगठन एवं समूह संघर्षरत हैं। ‘सहभागी | लोकतंत्र’ वास्तव में ऐसे ही प्रयासों से स्थापित हो सकता है। जब | लोकतंत्र में शासित लघु से लघुतम अस्मिताओं को भी यह महसूस | होगा कि राष्ट्र निर्माण में उनका भी योगदान है या राष्ट्र-राज्य उनको | अलगावग्रस्त होने के लिए नहीं छोड़ सकता या जब कोई भी समुदाय | हाशिए पर न रह जाए तब वास्तव में ‘सहभागी लोकतंत्र’ की अवधारणा साकार होगी। 

“वर्तमान में प्रचलित उदारवादी लोकतंत्र उतना न्यायपूर्ण नहीं प्रतीत होता जितना सहभागी लोकतंत्र। इसलिए जो पिछले दो सौ वर्षों की लोकतंत्र की परियोजना में विकास की दौड़ से पीछे छूट गए हैं उन्हें अपने लिए ‘सहभागी लोकतंत्र’ में संभावना नजर आती है।” 

ऐसे ही कुछ आंदोलन दक्षिण अफ्रीका के लकड़हारों द्वारा किया गया। वेनेजुएला में बोलिवेरियन क्रांति सहभागी लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध क्रांति थी। स्पेन में वर्ष 2011 के मार्च में शुरू हुए ‘अब वास्तविक लोकतंत्र’ (Real Democracy Now!) नामक आंदोलन सहभागी लोकतंत्र की दिशा में बेहतर प्रयास था। ब्राजील में बेघर मजदूरों द्वारा किए गए आंदोलन, दक्षिण अफ्रीका में भूमिहीनों द्वारा किए गए आंदोलन, भारत में जल और जीविका के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन, वर्ष 2011 में अमेरिका में शुरू हुए ‘आक्यूपाई वालस्ट्रीट’ आंदोलन, अमेरिका में ही वर्ष 2006 में लोकतांत्रिक समाज के लिए छात्रों का आंदोलन, मेक्सिको के मूल निवासियों द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन आदि वास्तव में लोकतंत्र को और अधिक पारदर्शी, उत्तरदायित्वपूर्ण, सहभागी और गतिशील बनाने के लिए संघर्षरत हैं। वर्तमान में प्रचलित उदारवादी लोकतंत्र उतना न्यायपूर्ण नहीं प्रतीत होता जितना सहभागी लोकतंत्र। इसलिए जो पिछले दो सौ वर्षों की लोकतंत्र की परियोजना में विकास की दौड़ से पीछे छूट गए है। उन्हें अपने लिए ‘सहभागी लोकतंत्र’ में संभावना नजर आती है। 

सहभागी लोकतंत्र की अवधारणा वर्तमान सूचना बहुल समाज में ज्यादा प्रासंगिक प्रतीत होती है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से शहर से लेकर गांव तक जुड़ रहे हैं। सूचना प्रसार के इन माध्यमों के जरिए लोकतंत्र में ‘जनमत’ (Public Opinion) का निर्माण होता है। यह ‘जनमत’ नागरिकों का ‘लोकतांत्रिक शासन’ के साथ रिश्ता तय करता है। जिससे लोकतंत्र ‘सहभागी’ (Participatory) बनता है। ग्राम पंचायतों तक कम्प्यूटर और इंटरनेट अनिवार्य कर दिया गया है। ‘ई-पंचायत’ की अवधारणा साकार हो रही है। ई-पंचायत के माध्यम से गांव सीधे तौर पर सूचना तंत्र से जुड़ जाता है और अपने से ऊपर की इकाई से संपर्क स्थापित करने में आसानी व शीघ्रता होती है। इस तरह ‘सहभागी लोकतंत्र’ वर्तमान की अनिवार्यता प्रतीत होती है। क्योंकि सूचना बहुल समाज में लोगों के भीतर सामाजिक-राजनीतिक विषयों एवं तात्कालिक मुद्दों के प्रति जागरूकता पैदा होने लगी है। भारत में डिजिटल इंडिया के जरिए डिजिटल डिवाइड को कम करने में मदद मिल रही है जिससे भारत प्रतिनिधिक लोकतंत्र से सहभागी लोकतंत्र की तरफ बढ़ रहा है। 

अतःसहभागी लोकतंत्र की प्रकृति वास्तव में जनपक्षधर व जनता के हितों को साथ लेकर चलने वाली है। फिर भी देश-काल के अनुसार एक तरह की ही शासन पद्धति प्रासंगिक नहीं हो सकती है। इसके समक्ष कई तरह की चुनौतियां आ खड़ी होती हैं। प्रायः लोकतांत्रिक समाजों में व्यक्ति पूजा’ की अवधारणा देखी जाती है। इसलिए विकासशील एवं सहभागी लोकतंत्र की दिशा में बढ़ रहे देशों के समक्ष तो तानाशाही, सैन्यशासन व भ्रष्टाचार में लिप्त शासन प्रायः देखा जाता है। कभी-कभी व्यापक सहभागिता, अव्यवस्था व अराजकर. को जन्म देने वाली भी हो सकती है। इसके उदाहरण हमें इतिहास में मिल चुके हैं। अतः इतिहास के अनुभवों से सबक लेते हुए लोकतंत्र के वास्तविक रूप को चरितार्थ करते हुए ‘सहभागी लोकतंत्र’ की दिशा में शासन प्रणालियों के साथ ही जीवन प्रणाली को भी आगे बढ़ने पर जोर देने की आवश्यकता है। 

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