पंचायती राज पर निबंध |Essay on Panchayati Raj in India

पंचायती राज पर निबंध

पंचायती राज पर निबंध |Essay on Panchayati Raj in India

पंचायत की भावना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है. पंच, पंचायत और पंचपरमेश्वर भारतीय समाज की व्यवस्था के मूल में स्थित है. गाँवों में पंचायतें शासन करती आई हैं, वहाँ तो अब भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जब पंचायत के निर्णय के अनुसार तथाकथित अपराधी अथवा दोषी व्यक्ति को मृत्युदण्ड तक दे दिया जाता है. हमारे गाँवों में पंचों को परमेश्वर का स्वरूप माना जाता रहा है. हुक्का-पानी बन्द करके जाति-बहिष्कृत कर देना पंचायत के लिए एक बहुत मामूली-सी बात है. शहरों में भी अनेक बिरादरियों की पंचायतें आज भी काम करती हुई देखी जा सकती हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि पंचायतों पर आधारित शासन-व्यवस्था, जिसे आजकल लोकतंत्र कहा जाता है, भारत के लिए कोई नई वस्तु नहीं है. गोस्वामी तुलसीदास के राजा राम अपने प्रजाजन से यह कहते हुए देखे सुने जा सकते हैं- 

जो कछु अनुचित भाखौं भाई । तो तुम बरजेहु भय बिसराई ॥

इसे हम इंगलैंड की शासन पद्धति की हेतु संवैधानिक राजतंत्र (Constitutional Monarchy) भी कह सकते हैं.

पंचायती राज : स्वरूप-विश्लेषण 

पंचायती राज लोकतंत्र का प्रथम सोपान अथवा प्रथम पाठशाला है. लोकतंत्र वस्तुतः विकेन्द्रीकरण पर आधारित शासन-व्यवस्था होती है, और पंचायत इसकी पहली सीढ़ी होती है. लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था में पंचायती राज वह माध्यम है जो शासन के साथ सामान्य जन का सीधा सम्पर्क स्थापित करता है. इस व्यवस्था में शासन-प्रशासन के प्रति जनता की रुचि बराबर बनी रहती है, क्योंकि वे अपनी स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर करने में समर्थ हो सकते हैं. यदि पंचायती राज की व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रहे तो सामान्य जन विकास के कार्यों में सरकार की सहायता कर सकते हैं. अतः इस अर्थ में पंचायती राज संस्थाएँ स्थानीय जनसामान्य को शासन कार्य में भागीदार एवं सहयोगी बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान करती हैं और इसी भागीदारी की प्रक्रिया के माध्यम से लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप में शासन एवं प्रशासन का प्रशिक्षण स्वतः प्राप्त होता रहता है. इस प्रकार प्रशिक्षित व्यक्ति जन जन प्रतिनिधि के रूप में विधान सभा एवं संसद में पहुंचते हैं, तो वहाँ वे सकारात्मक उपयोगी भूमिका अदा कर सकते हैं. इस प्रकार पंचायतें राष्ट्र को उपयोगी नेतृत्व प्रदान करने में भी सहायक सिद्ध हो सकती हैं और होती हुई देखी गई हैं.

परिचय एवं संवैधानिक प्रावधान 

ब्रिटिश शासनकाल में जमींदारी और रैयतवाड़ी जैसी प्रथाओं के कारण यह व्यवस्था प्रायः नष्ट हो गई थी, यद्यपि सन् 1882 में लॉर्ड रिपन ने इसके पुनरुत्थान का प्रयास अवश्य किया था. स्वतन्त्रता आन्दोलन के मध्य नेताओं ने, विशेषकर महात्मा गांधी ने यह अनुभव किया था कि पंचायती राज के अभाव में देश में कृषि एवं कृषकों का विकास अर्थात् ग्रामोत्थान नहीं हो सकेगा. इस चिन्तन के परिणामस्परूप स्वतन्त्रता की प्राप्ति के उपरान्त इस दिशा में विभिन्न प्रयत्न किये गये—सामुदायिक विकास कार्यक्रम, राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम आदि. इसी श्रृंखला में विकेन्द्रित शासन व विकास में लोगों की समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने सन् 1957 में बलवन्त राय मेहता समिति तथा सन् 1979 में अशोक मेहता समिति का गठन किया. इन समितियों की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने प्रायः सभी राज्यों में पंचायती राज समितियों की स्थापना की. इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं था. इस कारण इन्हें राज्य सरकारों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था. सन् 1986 में गठित लक्ष्मीमल सिंघवी समिति ने पंचायती राज संस्थाओं के रूप में विकसित करने के लिए उनका संवैधानीकरण करने की सिफारिश की. इन समस्त प्रयासों के फलस्वरूप 24 अप्रैल, 1993 को संविधान के 73वें संशोधन विधेयक को लागू कर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक महत्व प्रदान कर दिया गया. 

इस संविधान संशोधन ने संविधान में एक नया भाग 9 जोड़ा जिसका शीर्षक पंचायत है. इसके द्वारा अनुच्छेद 243 में पंचायतों से सम्बन्धित प्रावधान किए गए हैं जिसमें 15 उप अनुच्छेद है. इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नलिखित हैं –

(1) ग्रामसभा एक ऐसा निकाय होगा जिसमें ग्राम स्तर पर पंचायत क्षेत्र में मतदाताओं के रूप में पंजीकृत सभी व्यक्ति शामिल होंगे. ग्रामसभा राज्य विधानमण्डल द्वारा निर्धारित शक्तियों का प्रयोग तथा कार्यों को सम्पन्न करेगी. 

(2) प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती एवं जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा. 

(3) प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें आरक्षित होंगी. ये सीटें एक पंचायत में चक्रानुक्रम (Rotation) से विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षित की जाएंगी. 

(4) प्रत्येक पंचायत की कार्यावधि 5 वर्ष होगी. यदि पंचायत को 5 वर्ष पूर्व ही भंग कर दिया जाता है, तो 6 माह की अवधि समाप्त होने के पूर्व चुनाव कराए जाएंगे. 

(5) राज्य विधानमण्डल विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्तियाँ प्रदान करेंगे जो उन्हें स्वशासन की संस्था के रूप में कार्यरत बना सकें तथा जिनमें पंचायतें आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय के लिए योजनायें तैयार कर सकें एवं 11वीं अनुसूची में समाहित विषयों सहित आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय की योजनाओं को कार्यान्वित कर सकें. 

(6) राज्य विधानमण्डल कानून द्वारा पंचायतों द्वारा खातों के लेखा परीक्षा सम्बन्धी प्रावधानों का निर्माण करेगा. 

(7) यह अधिनियम संविधान में अनुच्छेद 243 (जी) द्वारा एक नयी 11वीं सूची जोड़ता है. इसमें 29 विषय हैं, यथा—(i) कृषि प्रसार सहित कृषि, (ii) भू-सुधार एवं मृदा संरक्षण, (iii) लघु सिंचाई, जल प्रबन्ध एवं जल संभर विकास, (iv) पशुपालन, मुर्गीपालन एवं दुग्धशाला, (v) मत्स्यपालन, (vi) सामाजिक वानकी एवं फार्मवानिकी, (vii) लघुवन उत्पाद, (viii) खाद्य संसाधन उपयोगों सहित लघु उद्योग, (ix) खादी ग्राम एवं कुटीर उद्योग, (x) प्राचीन आवास, (xi) पेयजल, (xii) ईंधन, (xiii) सड़कें, पुलिया, सेतु, घाट, जलमार्ग एवं संचार के अन्य साधन, (xiv) विद्युत वितरण सहित ग्रामीण विद्युतीकरण, (xv) ऊर्जा के 

गैर परम्परागत स्रोत, (xvi) गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, (xvii) प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों सहित शिक्षा, (xviii) तकनीकी प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा, (xix) प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा, (xx) पुस्तकालय, (xxi) बाजार एवं मेले, (xxii) सांस्कृतिक क्रिया कलाप, (xxiii) प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, (xxiv) परिवार कल्याण, (xxv) महिला एवं बाल विकास, (xxvi) सामाजिक कल्याण, (xxvii) जल वितरण व्यवस्था तथा (xxviii) सामुदायिक सम्पत्ति का अनुरक्षण. 

73वें संविधान संशोधन में निहित उक्त विशेषताओं को स्थूल रूप से दो वर्गों में रखा जा सकता है –

(1) अनिवार्य विशेषताएँ तथा

(II) ऐच्छिक विशेषताएँ. 

(1) अनिवार्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-(i) ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत का गठन, (ii) ग्रामसभाओं का गठन, (iii) गाँव, ब्लॉक तथा जिला स्तर पर त्रिस्तरीय व्यवस्था, ऐसे राज्य जिनकी जनसंख्या 20 लाख से कम है, (iv) सभी स्तरों पर सभी पदों के लिए सभी सदस्यों का सीधा चुनाव, (v) मध्यम व शीर्ष स्तरों पर अध्यक्ष का अप्रत्यक्ष चुनाव, (vi) अध्यक्ष व सदस्यों के लिए न्यूनतम अवस्था 21 वर्ष, (vii) अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में घूर्णात्मक आधार पर पंचायत के सदस्यों एवं अध्यक्ष के पदों पर आरक्षण, (viii) पंचायतों में एक-तिहाई पदों (सदस्य एवं अध्यक्ष) पर महिलाओं के लिए आरक्षण, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी एक-तिहाई आरक्षण है, (ix) पाँच वर्षीय अवधि, (x) भंग या बर्खास्त होने की स्थिति में 6 माह के अन्तर्गत नये चुनाव, (xi) इन संस्थाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने तथा इन्हें राज्य द्वारा वित्तीय संसाधनों के आवंटन की संस्कृति हेतु प्रत्येक पाँच वर्ष के लिए वित्त आयोग का गठन, (xii) राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना. 

(II) ऐच्छिक विशेषताएँ राज्य की इच्छा पर छोड़ दी गई हैं. वे इस प्रकार हैं-(1) सांसदों एवं विधायकों को मध्यम व शीर्ष स्तरों पर मतदान करने का अधिकार, (2) पिछड़े वर्ग को आरक्षण प्रदान करने का अधिकार, (3) कर, अनुदान, लेवी तथा शुल्कों द्वारा सशक्त वित्तीय प्रबन्ध तथा (4) पंचायतों को स्वायत्त संस्थाएँ बनाने का अधिकार आदि कमियाँ एवं बाधाएँ 

उपर्युक्त सकारात्मक विशेषताएँ होने पर भी इस संविधान संशोधन (अधिनियम) में कतिपय कमियाँ अथवा न्यूनताएँ दिखाई देती हैं— 

(1) प्रायः समस्त प्रावधानों के कार्यान्वयन को राज्य सरकारों की सदाशयता पर छोड़ दिया गया है. वस्तुतः राज्य सरकारें ही पंचायतों को धन, शक्ति, उत्तरदायित्व प्रदान करने के लिए अधिकृत हैं. उनकी इच्छा के विरुद्ध पंचायतें मृतप्राय समझी जानी चाहिए. अतएव संविधान की सफलता इस तथ्य पर निर्भर रहेगी कि केन्द्र तथा राज्य सरकारें किस सीमा तक संविधान की भावना के अनुरूप कार्य करती हैं और जनचेतना का आदर करती हैं. 

(2) यह समझना भूल होगी कि उक्त संशोधन के आधारभूत वास्तविक रूप में उपेक्षित महिलाओं को स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व प्राप्त हो जाएगा. महिलाओं की अशिक्षा एवं उनके पिछड़ेपन के कारण सम्बन्धित प्रावधान के दुरुपयोग की पूरी आशंका विद्यमान है. 

(3) राज्यों के सीमित संसाधनों के परिप्रेक्ष्य में यह कहना कठिन है कि पंचायतों को पर्याप्त धन उपलब्ध हो सकेगा. 

(4) ग्रामीण न्यायालयों की स्थापना एवं उनके क्षेत्राधिकार के प्रावधान को स्पष्ट करने की आवश्यकता है. 

(5) योजनाओं का निर्माण केन्द्र व राज्य सरकारों के स्तर पर रखा गया है. आवश्यकता इस बात की है कि योजनाओं के निर्माण का आरम्भ स्थानीय स्तर से हो, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके. पंचायतों का आर्थिक विकास की संवाहक बनाने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है. 

पंचायतों को अधिकारों का हस्तान्तरण और उनकी लोकतांत्रिक संरचना हमारे संविधान का महत्वपूर्ण अंग बन गई है. इस व्यवस्था से ग्रामीण क्षेत्रों का विकास करना अब अपेक्षाकृत सरल हो गया है. गाँवों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विकास का दायित्व अब पंचायतों पर आ गया है. 

पंचायतें ग्रामवासियों को विभिन्न प्रकार के शोषण से सुरक्षा कवच प्रदान कर सकेंगी. इससे देश में समानता एवं सद्भावना के प्रसार में सहायता मिलनी चाहिए. यह हमारे ग्रामवासियों एवं उनके द्वारा निर्वाचित पंचों पर निर्भर है कि वे इन अधिकारों एवं सुविधाओं का किस प्रकार उपयोग करते हैं. अब अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों तथा महिलाओं को आत्मनिर्णय करने में तथा अपना पक्ष प्रस्तुत करने में सुविधा होगी. यदि पंचायतें ग्राम स्तर पर राजनीतिक प्रक्रिया में ईमानदारी से कार्य कर सकें, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीति को प्रभावित कर सकेंगी और इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकेंगी. 

गांधीवाद की राजनीति की दृष्टि विकेन्द्रीकरण की है और पंचायती राज उसकी इकाई है. इस संशोधन द्वारा पूज्य बापू के उस स्वप्न को साकार करने में सहायता प्राप्त होगी जिसकी परिकल्पना करते हुए उन्होंने हरिजन अंक 18 जनवरी सन् 1948 में लिखा था कि सच्चे लोकतन्त्र का परिपालन केन्द्र में बैठे बीस व्यक्तियों द्वारा नहीं कराया जा सकता. इसका कार्यान्वयन प्रत्येक गाँव के निवासियों के माध्यम से ही होना चाहिए. मेरे विचार में जन समर्थन प्राप्त पंचायत को कोई भी कानून कार्य करने से नहीं रोक सकता. गाँवों का प्रत्येक समूह अथवा उस समूह के सदस्य अपनी पंचायत बना सकते हैं. पंचायत लोगों की सेवा करने के लिए है. भारत के सच्चे लोकतन्त्र की इकाई गाँव ही है. अन्तर केवल यह है कि गांधीजी के स्वप्न की कल्पना स्वनिर्मित पंचायत थी, जबकि प्रस्तुत पंचायत सरकारीकरण की देन है. इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए राजनेताओं की इच्छाशक्ति परम आवश्यक है. इसके अभाव में पंचायती राज केवल संविधान में ही सुरक्षित बना रहेगा. पंचायतों द्वारा पूरी ईमानदारी के साथ कार्य करने पर ही बापू के रामराज्य अथवा सुराज्य का स्वप्न साकार हो सकेगा.

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