हमारे पड़ोसी पर निबंध |Essay on our neighbor in Hindi

Essay on our neighbor in Hindi

हमारे पड़ोसी पर निबंध |Essay on our neighbor in Hindi

 यद्यपि मैं अपने पड़ोसियों के साथ जल में कमल की तरह निलिप्त रहन का आदर्श अपनाना चाहता है, किंतु क्या ऐसा संभव है? जल और कमल का कितना अविनाभावसंबंध है, इसे भी हम जानते हैं। जल के बिना न कमल का अस्तित्व है और न उसका विकास ही। अतः, अपने पड़ोसियों से दूर रहने का संकल्प रखकर भी उनसे अपने को दूर रखना संभव नहीं। जिस प्रकार जल में आया हुआ हलका-सा कंपन भी कमल को कंपायमान कर देता है, उसी प्रकार हमारे पड़ोसियों द्वारा किए गए आचरण का एक हलका झोंका भी हमारे मानस-सरोवर में हिलकोर उठा जाता है। 

हमारे पास-पड़ोस में दो प्रकार के मकानों की कतारें हैं। एक ओर छोटे-छोटे मिट्टी और नोनियाई ईंटों के खोभारनुमा मकानें हैं, तो दूसरी ओर विशाल भवनों की श्रृंखला है। इन वैज्ञानिक वरदानों से समृद्धिशालिनी राजधानी में भी ये बिन-पुताई, बिन-रोशनीवाले ऊँघते मकान अब भी पुराकालीन अविकसित समाज का ही रेखाचित्र प्रस्तुत करते हैं। इन छोटे-छोटे मकानों में तथाकथित छोटे लोग रहते हैं, हालाँकि मैं इन्हें बड़ा आदमी मानने के पक्ष में हूँ। मेरी दृष्टि में मनुष्य के बड़प्पन का एक ही मापदंड है, वह यह कि जो दूसरों की उन्नति में आनंद का अनुभव करता हो, वह बड़ा आदमी है। जो दूसरों की उन्नति में दुःख का अनुभव करता है, ईर्ष्या से सुलगता रहता है, वह छोटा आदमी है। 

तो, सचमुच इन बौने मकानों में ये रहनेवाले अकिंचन महान पड़ोसी हैं। इनके पास साधन का अभाव है। ये दीनता-दानवी के जबड़े के नीचे कराहते रहते हैं। ये अभावों का वृश्चिक-दंश झेलते रहते हैं। ये पीड़ाओं की सूइयों की चुभन सहते रहते है, फिर भी हमारे लिए ये बड़े ही सदय एवं सहायक हैं। जब मैं बरामदे पर बैठा होता हूँ, तब ये सलाम बजाते हैं, आदाब करते हैं, नमस्कार करते हैं। मेरे परिवार की मरुभूमि में, जब कभी आनंद का फुहारा पड़ता है, ये प्रफुल्लमुख होते हैं। ये जब मझसे मिलते हैं, तब मुझे वही सुख होता है, जो सज्जन से सज्जन के मिलन का सुख होता है 

चार मिले चौंसठ खिले, बीस रहे कर जोड़ि। 

सज्जन सों सज्जन मिले, बिकसे सात करोड़ि॥

ये हमारे लिए वैसे ही पड़ोसी हैं, जैसे हमारे देश के पड़ोसी बँगलादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका हैं। ये छोटे-छोटे देश अभावों की पहाड़ियों से घिरे विपदाओं की जलराशि से घिरे हैं, फिर भी हमारे देश के प्रति ये पूरी सहानुभूति रखते हैं। मनसा, वाचा, कर्मणा भारत के प्रसन्न वर्तमान एवं संपन्न भविष्य की कामना करते हैं। इनके पास चाहे थोड़ा ही क्यों न हो, किंतु हमारी झोली में कुछ-न-कुछ डालने को सदा तैयार रहते हैं।

किंतु, दूसरी ओर जो ये आकाश की ओर सीना ताने बड़े-बड़े कर्पूरी और दुग्धवर्णी भवन हैं, उनमें रहनेवाले बिलकुल इंद्रसखा और अपनी उच्चता का मिथ्या दंभ करनेवाले लोग हैं। ये सचमुच ऊँच निवास, नीच करतूती, देखि न सकहिं पराइ बिभूति को उदाहृत करनेवाले लोग हैं। ये हमारी प्रगति से उसी तरह म्लान होते हैं, जिस प्रकार ज्वर से गजराज। ये अब हमारे सामने से गुजरते हैं. तब बिलकल गंभीर, नतमुख। ये हमेशा हमारा छिद्रान्वेषण करते हैं। ये हमारे गण में भी दोष देखते हैं। 

कबीर ने कहा था कि निंदक को निकट रखना चाहिए। वे बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल करते हैं। हमारे अनचाहे भी ये हमारे पड़ोसी बन गए हैं, किंतु ये हमारे मलिन स्वभाव को निर्मल नहीं करते, वरन् स्वच्छ स्वभाव को ही मलयुक्त करने की चेष्टा करते रहते हैं। 

हम इनपर ध्यान भी रखते हैं, पर हमारे ध्यान रखने से होता ही क्या है? हम लाख सावधानी से गाड़ी चलाएँ, किंतु हमारे दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे से हमें कोई धक्का दे जाए, तो हमारी सद्बुद्धि, सूझ-बूझ, चातुरी क्या काम करेगी !

हमारे ये पड़ोसी जो सदा नतमुख अजनबी-से हमारी आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं, वहीं जरूरत पड़ने पर हमारे सामने अपनी बत्तीसी निकालकर, आँखों में आँखें डालकर. उदग्रीव होकर बातें करते हैं। जब संकट का ग्राह उन्हें पकड़ ले, तब आप उनके लिए उद्धारक विष्णु हैं; जब उनपर किसी अधिकारी का इंद्रकोप हो जाए, तब आप उनके लिए गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण हैं; जब उनके यहाँ अर्थाभाव हो, तब उनके लिए आप कुबेर हैं; जब आपको उनके बच्चों को पढ़ाना हो, तब आप उनके लिए बहस्पति हैं; जब उन्हें कोई आवश्यकता हो, तब आप उनके लिए कल्पतरु हैं: जब उनके स्वार्थ की पूर्ति का वातायन आपकी ओर से बंद हो जाए, तब फिर आप उनके लिए दुर्गुणों के कोष, लांछनों के भंडार, बिलकुल नकारा, उपेक्षणीय एवं अस्पृश्य हो जाते हैं। 

वे तेज वॉल्यूम करके रेडियो बजाएँगे, ताकि आपकी शांति खंडित हो जाए: उनके बाल-बच्चों की टीम आपकी छत पर फुटबॉल मैच खेलेगी; उनकी दाइयाँ आपके दरवाजे के आगे म्युनिसिपैलिटी का कूड़ाघर बनाएँगी; उनके बच्चे आपकी नालियों को रेलवे का संडास बनाएँगे; उनकी श्रीमतीजी आपकी फुलवारी के मासूम फूलों की गर्दन मोड़कर अपने पूजन का थाल रचेंगी; किंतु आप कभी उनके दरवाजे पर किसी काम के लिए जाएँ, तो फिर उनका तेवर देखिए, उनके चेहरे का रंग देखिए, उनका रोब देखिए, उनकी बेमुरौवती और बेरुखी का जायका लीजिए, उनके ठंडे व्यवहार की ऊष्मा सहिए, उनके ऐंठ का तनाव भोगिए, उनकी निष्पक्षता और सिद्धांतवादिता का हरिबोल सुनिए। 

गिरिधर कवि की एक कुंडलिया है- 

साँई बैर न कीजिए, गुरु पंडित कवि यार ।

बेटा बनिता पौरिया, यज्ञ करावनहार ।।

यज्ञ करावनहार, राजमंत्री जो होई।

विप्र पड़ोसी वैद्य, आपको तपैं रसोई ।। 

कह गिरिधर कविराय, युगन ते यह चलि आई।

इन तेरह सों तरह दिए बनि आवै साईं ।। 

गिरिधर कवि ने पड़ोसी से बैर न करने की सलाह दी है। यदि हम किसी से मैत्री नहीं कर सकते, तो वैर ही क्यों ठाने ? किंतु, भगवान बचाएँ ऐसे पड़ोसियों से। इनके साथ तो उदासीन रहने में ही हमें अपना कल्याण दीखता है। पता नहीं, आपके पड़ोसी कैसे हैं? अपनी परिस्थिति देखकर ही कोई सिद्धांत बनाइए, कोई निर्णय लीजिए, – मेरी तो आपको इतनी ही सलाह है। 

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