जैविक खेती पर निबंध | जैविक खेती : महत्त्व एवं लाभ अथवा जैविक कृषि और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

जैविक खेती पर निबंध

जैविक खेती पर निबंध |जैविक खेती : महत्त्व एवं लाभ अथवा जैविक कृषि और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार (यूपी आरओ/एआरओ मुख्य परीक्षा, 2015) 

आज न सिर्फ भारत में, अपितु समूचे विश्व में यदि जैविक खेती के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है, तो यह अकारण नहीं है। कुछ देर से ही सही, लोगों को अब यह समझ में आने लगा है कि जैविक खेती जहां पर्यावरण हितैषी है, वहीं यह अच्छे स्वास्थ्य की सौगात भी है। खेती की यह विधि जहां किफायती है, वहीं यह स्थायी रूप से भूमि की उर्वरता को बढ़ाती है। यह किसानों के लिए इसलिए भी लाभकारी है, क्योंकि जैविक खेती से तैयार फसल उत्पादों के स्वास्थ्य संबंधी लाभों के कारण इनकी मांग निरंतर बढ़ रही है। जैविक खेती ने सिर्फ फसलोत्पादन में लागत कम करने और उपज बढ़ाने में ही महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाई है, बल्कि मृदा, जल और समग्र रूप से पर्यावरण संरक्षण में भी उपयोगी सिद्ध हुई है। इन्हीं बातों ने जैविक खेती के महत्त्व और इसकी प्रासंगिकता को बढ़ाया है। 

जैविक खेती, आधुनिक खेती से भिन्न खेती की वह पद्धति है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशियों, व्याधिनाशियों एवं शाकनाशियों आदि का प्रयोग नहीं किया जाता है। यहां तक कि पशुओं के भोजन तक में भी किसी प्रकार के रसायन का प्रयोग नहीं किया जाता है। वस्तुतः खेती की इस पद्धति में प्रकृति के अनुरूप फसलोत्पादन किया जाता है। इसके तहत उचित फसल चक्र, फसल अवशेष, पशुओं का गोबर, फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश, हरी 

खाद एवं अन्य जैविक तरीकों का इस्तेमाल कर भूमि की उर्वरता को बढ़ा कर पौधों को पोषण प्रदान किया जाता है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि खेती की इस पद्धति में जैविक उर्वरकों एवं खादों, हरी खादों और फसल अवशेषों की विशेष उपयोगिता होती है। खास बात यह है कि जैविक खेती के तहत कीट-पतंगों एवं खरपतवारों को भी जैविक विधियों द्वारा ही नियंत्रित किया जाता है। इसके लिए रासायनिक कीटनाशियों एवं शाकनाशियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। 

जैविक खेती, खेती की एक लाभकारी पद्धति है। चूंकि खेती की इस पद्धति में प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन किया जाता है, अतएव यह एक सुरक्षित एवं पर्यावरण हितैषी पद्धति है। खेती की आधुनिक पद्धति में विभिन्न रूपों में कृषि रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाता है। रासायनिक उर्वरक वस्तुतः भूमि की उर्वरा-शक्ति नहीं बढ़ाते हैं, बल्कि भूमि में इस प्रकार की उत्तेजना का निर्माण करते हैं, जिससे कृषि उपज में कुछ समय के लिए तो वृद्धि होती है, उसके बाद इनके निरंतर प्रयोग से कृषि योग्य भूमि बंजर बन जाती है। यानी रासायनिक खादें बजाय भूमि की उर्वरा शक्ति को स्थायी रूप से पष्ट करने के उसे बर्बाद करती हैं। बड़ी मात्रा में इनके निरंतर इस्तेमाल से भूगर्भीय जल भी प्रदूषित होता है। इनके जरिए शरीर में विषैले पदार्थों का संचय बढ़ता है, जो अनेक प्रकार की घातक बीमारियों को जन्म देते हैं। जैविक खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें आधुनिक खेती के उक्त खतरे नहीं हैं। यह पद्धति जहां भूमि में दीर्घकालीन उर्वरता की स्थापना करती है, वहीं मृदा, जल एवं वायु प्रदूषण को नियंत्रित करती है। जैविक खेती द्वारा प्राप्त उत्पादों में जिंक व आयरन जैसे स्वास्थ्यवर्धक तत्व अच्छी मात्रा में होते हैं। यानी कृषि की यह पद्धति उच्च गुणवत्तायुक्त, स्वास्थ्यवर्धक एवं पौष्टिक खाद्य पदार्थों की उपलब्धता बढ़ाकर हमें अच्छे स्वास्थ्य की सौगात देती है। यही कारण है कि जैविक उत्पादों की मांग बराबर बढ़ रही है। 

जैविक खेती का एक लाभ यह भी है कि खेती की यह पद्धति कम खर्चीली है। इसमें खेतों से निकले कचरे, कृषि अवशेषों, मवेशियों के उत्सर्जन आदि का प्रयोग जहां खाद के तौर पर होता है, वहीं कीट-पतंगों एवं खरपतवार को भी जैविक विधियों से नियंत्रित किया जाता है। फलतः उस पैसे की बचत होती है, जो प्रतिवर्ष किसान रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों और शाकनाशियों पर खर्च करते हैं। जैविक खेती जहां मिट्टी के क्षय को नियंत्रित करती है, वहीं कृषि योग्य भूमि को लंबी अवधि तक संरक्षण प्रदान करती है। चूंकि कृषि की इस पद्धति में फसलों के लिए लाभदायक कीटों को सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान किया जाता है, अतएव इसका लाभ पारिस्थितिक चक्र को भी मिलता है और वह सुरक्षित रहता है। 

जैविक खेती से प्राप्त उत्पाद ही स्वास्थ्यवर्धक नहीं होते, बल्कि इससे प्राप्त पशुचारा भी पशुओं के लिए लाभप्रद होता है, जिसके सेवन से पशुओं का दूध तो बढ़ता ही है, उन्हें बीमारियां होने की संभावना भी कम रहती है। सारतः यह कहा जा सकता है कि जैविक खेती के अनेकानेक लाभ हैं। खेती-किसानी की यह पद्धति मिट्टी, पौधों, पशु, इंसान और पर्यावरण सभी के लिए लाभप्रद है। 

वस्तुतः जैविक खेती के लाभकारी स्वरूप के कारण ही इसका महत्त्व बढ़ा है और हम इसकी ओर अग्रसर हुए हैं। भारत में धीरे-धीरे जैविक कृषि का रकबा भी बढ़ रहा है। वर्ष 2003-04 में देश में जैविक खेती का रकबा मात्र 42,000 हेक्टेयर था, जो कि वर्ष 2018-19 में बढ़कर लगभग 10 लाख हेक्टेयर हो गया। 

जैविक खेती के लाभकारी स्वरूप को ध्यान में रखकर ही सरकार द्वारा इसके प्रोत्साहन की पहले की जा रही हैं। हाल ही में शुरू की गई ‘राष्ट्रीय कृषि विकास योजना’ में जहां जैविक कृषि पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है, वहीं खेती की इस पद्धति को प्रोत्साहन प्रदान करने के उद्देश्य से रांची में ‘भारतीय बायोटेक्नोलॉजी संस्थान’ की स्थापना की गई है। ‘नाबार्ड’ सहित अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठन देश में जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रहे हैं। केंद्रीय बजट 2015-16 में पूर्वोत्तर राज्यों में जैविक खेती को प्रोत्साहन प्रदान करने के उद्देश्य से अलग से 125 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। जैविक कृषि को अपनाने में सिक्किम ने महत्त्वपूर्ण प्रगति करते हुए प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। सिक्किम के 100% जैविक राज्य बनने की आधिकारिक घोषणा हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा की जा चुकी है। सिक्किम देश का वह पहला राज्य है, जहां राजकीय विधान के तहत जैविक कृषि को प्रोत्साहन प्रदान किया गया और इसके लिए सिक्किम विधान सभा द्वारा बाकायदा वर्ष 2003 में एक प्रस्ताव पारित कर राज्य के संपूर्ण कृषि क्षेत्र एवं पद्धति को जैविक तरीके में परिवर्तित करने के लिए ‘सिक्किम स्टेट आर्गेनिक बोर्ड का गठन किया गया। इसी विधान के तहत रासायनिक पोषकों, उर्वरकों और कीटनाशकों की बिक्री को पूर्णतः प्रतिबंधित करते हुए इन पर देय सब्सिडी को पूर्णतः खत्म कर दिया गया। इतना ही नहीं, वर्ष 2006 में राज्य सरकार द्वारा न सिर्फ केंद्र सरकार के रासायनिक खाद कोटे को उठाना बंद कर दिया गया, बल्कि राज्य के सभी सरकारी एवं निजी बिक्री केंद्रों को भी बंद कर दिया गया। सिक्किम के अलावा देश के जिन राज्यों में जैविक खेती के क्षेत्र में सराहनीय पहले हुई हैं, वे हैं-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड एवं राजस्थान। 

जैविक खेती के लाभकारी स्वरूप के कारण इसे जिस तरह से पूरे देश में प्रोत्साहन प्रदान किया जा रहा है, उससे ध्वनित होता है कि जैविक खेती का जमाना आ गया है और खेती की यह पद्धति वक्त की जरूरत बन चुकी है। यह खेती की सुरक्षित, किफायती एवं स्वास्थ्यवर्धक पद्धति है। इसे अपनाकर हम बेहतर भविष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं। 

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