अंगदान पर निबंध | Essay On Organ Donation In Hindi

अंगदान पर निबंध

अंगदान पर निबंध | Essay On Organ Donation In Hindi अथवा  देहदान और अंगदान की महत्ता 

बाइबिल के अनुसार, ‘तीन सद्गुण हैं—आशा, विश्वास और दान। ‘दान’ इनमें सबसे बढ़कर है।’ दान की इस अवधारणा से जब देह और अंग जुड़ जाते हैं, तो ऐसे दान की महत्ता और बढ़ जाती है। निःसंदेह देहदान और अंगदान दान की समृद्ध परम्परा के उज्ज्वल और लोक कल्याणकारी स्वरूप हैं। देहदाता देहदान के रूप में सुमृत्यु को प्राप्त करते हैं और मृत्यु के बाद भी याद किए जाते हैं। इसी प्रकार अंगदान भी मानवता की दृष्टि से अन्य दानों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अंगदान से हम किसी को नवजीवन प्रदान करते हैं और इस प्रकार जीवन रूपी महानदी को जीवंतता का प्रवाह देते हैं। जब विश्व के अन्य देश सभ्यता का ‘क, ख, ग’ सीख रहे थे, तब भारत में देहदान की परम्परा विद्यमान थी। आचार्य दधीचि का उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने लोककल्याण के लिए अपनी देह का दान किया था। कहना असंगत न होगा कि दूसरे देशों को देहदान की प्रेरणा भारत की उदात्त संस्कृति से ही मिली। यहां हम पहले देहदान की बात करेंगे, फिर अंगदान की। 

“जब विश्व के अन्य देश सभ्यता का क, ख, ग’ सीख रहे थे, तब भारत में देहदान की परम्परा विद्यमान थी। आचार्य दधीचि का उदाहरण हमारे सामने है, जिन्होंने लोककल्याण के लिए अपनी देह का दान किया था। कहना असंगत न होगा कि दूसरे देशों को देहदान की प्रेरणा भारत की उदात्त संस्कृति से ही मिली। यहां हम पहले देहदान की बात करेंगे, फिर अंगदान की।” 

देहदान से अभिप्राय समूचे शरीर के दान से है, जिसकी घोषणा तो जीवनकाल में ही कर दी जाती है, किंतु यह प्रभावी होता है मृत्यु के बाद। देहदान में यह पवित्र भावना निहित होती है कि मृत्यु के बाद शरीर मानव कल्याण में काम आए। देहदान के लिए व्यक्ति को अपने जीवनकाल में ही इसका इच्छा-प्रपत्र (Will Form) भरना पड़ता है। इस इच्छा-प्रपत्र पर दो गवाहों के भी हस्ताक्षर होते हैं। यदि देहधारी ने कभी अपने जीवनकाल में देहदान की इच्छा व्यक्त की हो और वह इससे संबंधित ‘इच्छा प्रपत्र’ न भर पाया हो, तो इस स्थिति में उसके विधिक परिजन चाहें तो कुछ निश्चित औपचारिकताओं को पूरा कर मानव कल्याण का यह कार्य कर सकते हैं। देहदानी के परिजनों को उसके बाल और नाखून दे दिए जाते हैं, ताकि वे धार्मिक संस्कारों का निष्पादन कर सकें। देहदानी के शव को परिवार के सदस्य को तीन दिनों तक देखने की अनुमति दी जाती है। 

दान की गई देहों को चिकित्सा महाविद्यालयों के शरीर रचना विभाग (Anatomy Department) द्वारा स्वीकार किया जाता है। इनका इस्तेमाल चिकित्सा विद्यार्थियों (Medical Students) को मानव शरीर की संरचना समझाने तथा अनुसंधान आदि के लिए किया जाता है। चिकित्सकीय तकनीकों को विकसित करने तथा नई तकनीकों के सृजन के लिए भी इनका इस्तेमाल किया जाता है। 

आज हमारे देश को देहदान की सख्त जरूरत है। कारण, किताबों और कम्प्यूटर के सहारे न तो मानव शरीर की संरचना को भलीभांति समझा जा सकता है और न ही व्यावहारिक ज्ञान (Practi cal Knowledge) की अभिवृद्धि की जा सकती है। किताबें और कंप्यूटर मानव देह का विकल्प नहीं बन सकते हैं। मानव शरीर की संरचना को समझे बगैर तथा इसकी चीरफाड़ किए बगैर एक अच्छा चिकित्सक बनना संभव नहीं होता है। इसके लिए देह की उपलब्धता जरूरी है। दान में मिली देह का अध्ययन कर चिकित्सा छात्र शरीर विज्ञान और शल्य क्रिया में दक्षता प्राप्त करते हैं और इस प्रकार अच्छे चिकित्सक बनकर समाज का कल्याण करते हैं। ये चिकित्सक जहां लोगों को जीवनदान देते हैं, वहीं असाध्य रोगों को साध्य बनाने का भरसक प्रयास कर चिकित्सा जगत को समृद्ध बनाते हैं। सारतः हम यह कह सकते हैं कि चिकित्सकों की एक मजबूत पीढ़ी तैयार करने तथा चिकित्सा विज्ञान को उन्नत बनाने के लिए देह की उपलब्धता अपरिहार्य है। 

” दान  में मिली देह का अध्ययन कर चिकित्सा छात्र शरीर विज्ञान और शल्य क्रिया में दक्षता प्राप्त करते हैं और इस प्रकार अच्छे चिकित्सक बनकर समाज का कल्याण करते हैं।”

भले ही हमारे देश में देहदान की एक समृद्ध सनातनी परम्परा रही है. कित् वर्तमान में इससे जुड़ा परिदृश्य बहुत आशाजनक नहीं है। मांग के अनुरूप देहों की उपलब्धता बहुत कम है। इससे चिकित्सा छात्रों को असुविधा होती है। दान में पर्याप्त देहें न मिलने के पीछे कई कारण हैं। जहां मृत्यु के बाद किए जाने वाले धार्मिक कर्मकांडों के प्रति गहरी आस्था अवरोधक की भूमिका निभाती है, वहीं उत्साह की कमी और जागरूकता का अभाव भी आड़े आता है। लोग देहदान करने से कतराते हैं, जबकि देहदान तो अमरत्व और सुमृत्यु का जरिया है। देहदान को लेकर प्रचार-प्रसार भी कम है, जिससे इस सुकृत्य के बारे में लोगों को पर्याप्त जानकारी भी नहीं हो पाती है। 

देहदान को लेकर किए जाने वाले सरकारी प्रयास भी पर्याप्त नहीं हैं। जहां तक सरकारी पहलों का सवाल है, तो सरकार द्वारा ‘एनाटॉमी एक्ट (Anatomy Act) को अधिनियमित कर देहदान को कानूनी मान्यता तो प्रदान कर दी गई है, किंतु इस पहल को आगे बढ़ाने के वैसे प्रयास नहीं किए गए, जैसे किए जाने चाहिए थे। सरकारी तंत्र द्वारा प्रचार-प्रसार में भी कोताही बरती गई है, जिससे सकारात्मक वातावरण निर्मित नहीं हो पाया है। वैसे, देहदान के संदर्भ में गैर-सरकारी संगठन बहुत ही सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन ऐसे संगठनों की संख्या भी कम है, जो इस महादान में अग्रणी भूमिका निभाएं। हालांकि कुछ संगठनों ने अच्छी पहले की हैं, जिनमें से एक है दिल्ली की ‘दधीचि देहदान समिति’ । लगभग 20-22 वर्षों स कार्यरत यह समिति मानवता के कल्याण के लिए लोगों को संकल्प दिलवाती है और अपने माध्यम से देहदान करवाती है। यदि ऐसे ही समर्पित कुछ और गैर-सरकारी संगठन आगे आएं, तो सूरत काफी कुछ बदल सकती है। 

“देहदान में आड़े आने वाली धार्मिक कर्मकांड की अवधारणा और भ्रांतियों को प्रभावहीन बनाने के लिए हमें जन-जन तक यह संदेश पहुंचाना होगा कि देहदान वह महादान है, जिससे मानवता के कल्याण का पथ प्रशस्त होता है। एक नेक पहल यह भी हो सकती है कि हम देहदानियों को उनके जीवनकाल में ही सार्वजनिक रूप से सम्मानित करें, ताकि दूसरे भी इससे प्रेरणा प्राप्त कर सकें।” 

आज देहदान को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए सुचिंतित और सधी हुई पहलों की आवश्यकता। इसके लिए सरकार और समाज दोनों को आगे आना होगा। हमें लोगों के मन में यह भावना जागृत करनी होगी कि यह नश्वर देह यदि मृत्योपरांत देश और समाज के हित में काम आ सके, तो इससे अच्छी और क्या बात होगी। स्थानीय प्रशासन, अस्पतालों और चिकित्सा महाविद्यालयों को ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी, जिससे इच्छुक व्यक्ति सहजता से देहदान की औपचारिकताओं को पूरा कर सके। इस विषय पर गोष्ठियां आर परिचर्चाएं आदि आयोजित कर एक सकारात्मक वातावरण तैयार किया जा सकता है, तो सरकारी माध्यमों से प्रचार-प्रसार कर ला को इसके लिए प्रेरित किया जा सकता है। देहदान में आड़े आने वाली धार्मिक कर्मकांड की अवधारणा और भ्रांतियों को प्रभावहीन बनाने के लिए हमें जन-जन तक यह संदेश पहुंचाना होगा कि देहदान वह महादान है, जिससे मानवता के कल्याण का पथ प्रशस्त होता है। एक नेक पहल यह भी हो सकती है कि हम देहदानियों को उनके जीवनकाल में ही सार्वजनिक रूप से सम्मानित करें, ताकि दूसरे भी इससे प्रेरणा प्राप्त कर सकें। जननायक ज्योति बसु और प्रसिद्ध समाज सेवी नानाजी देशमुख ने मानवता के कल्याण हेतु देहदान कर देश और समाज के समक्ष प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। यदि ऐसे उदाहरण सामने आते रहे तो धीरे-धीरे हमारे देश में देहदान के प्रति लोगों का रुझान बढ़ना तय है। मा देहदान के बाद अब बात करते हैं अंगदान की। अंगदान किसी को जीवनदान देने वाला महादान है। अंगदान से अभिप्राय उन अंगों के दान से है, जो किसी और को जीवन प्रदान कर उसके जीवन को खुशियों से भर देता है। यह वह दान है जिसके द्वारा आप मृत्यु के बाद भी इस दुनिया और मानवजाति का भला कर सकते हैं। अंगदान कोई भी व्यक्ति कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति18 वर्ष से कम आयु का है, तो उसके माता-पिता अथवा उसके कानूनी संरक्षक से अंगदान की सहमति लेना अनिवार्य होता है। प्रत्येक वह व्यक्ति जो सामान्य मौत मरता है अथवा किसी दुर्घटना में उसके प्राण चले जाते हैं, अंगदान कर सकता है। अंगदान का इच्छुक व्यक्ति हृदय, फेफड़े, यकृत, पैंक्रियाज, गुर्दे, नेत्र, हृदय के वाल्व, त्वचा, अस्थियां, मज्जा, संयोजक ऊतक, मध्यकर्ण तथा रक्तवाहिकाओं आदि का दान कर सकता है। दान में मिले अंगों को शल्य क्रिया द्वारा प्रत्यारोपित किया जाता है। सफल प्रत्यारोपण के बाद व्यक्ति जल्द ही स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर लेता है और सामान्य जीवन व्यतीत करने लगता है। कुछ ही मामलों में ऐसा देखने को मिलता है कि दान में मिला अंग दानग्राही का शरीर स्वीकार नहीं करता है। इस स्थिति में दान में मिले अंग को हटाना पड़ता है। 

भारत में अंगदान की आज सख्त जरूरत है। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर देश में वर्ष 1994 में ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम’ (Transplantation of Human OrganAct) पारित कर अंगदान की राह को आसान बनाया गया। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य था, आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को जीवित रहते हुए अपने गुर्दे बेचने से रोकना तथा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) के दिशा-निर्देशों का पालन करना। इस अधिनियम की खास बात यह है कि इसके तहत दिमागी रूप से मृत व्यक्ति भी अंगदान कर सकता है। अंग प्रत्यारोपण अधिनियम के अंतर्गत मानव अंगों और ऊतकों को बेचा जाना प्रतिबंधित है। अंग विक्रेता और खरीदार दोनों ही सजा के हकदार होते हैं। ‘अंग प्रत्यारोपण (संशोधन) अधिनियम के जरिए वर्ष 2011 में इस कानून में कुछ बदलाव किए गए। इस संशोधन अधिनियम के जरिए दादा-दादी व पोता-पोती को नजदीकी रिश्तेदारों के दायरे में लाकर नजदीकी रिश्तेदार की परिभाषा को व्यापक बनाया गया। इसके तहत जहां मानव अंग प्रत्यारोपण कराने वालों की एक राष्ट्रीय पंजिका तैयार कराने का प्रावधान किया गया, वहीं चिकित्सकीय कर्मचारी के लिए यह अनिवार्य किया गया कि वे ‘ब्रिन डेड’ (Brain Dead) रोगियों के परिजनों से अंगदान के लिए तथा कार्निया निकालने की अनुमति देने के लिए अनुरोध करें। वर्ष 2011 में किए गए बदलावों से निकट संबंधियों के अंगदान की गुंजाइश बढ़ी है। ‘राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संस्थान’ (नोट्टो) जहां अंगदान के लिए लोगों को प्रोत्साहित करता है, वहीं अंगों का सही और समान वितरण भी सुनिश्चित करता है। अंगदान और अंग प्रत्यारोपण को प्रोत्साहित करने के लिए देश में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम भी शुरू किया गया है, जिसके अंतर्गत दान के जरिए अंगों की प्राप्ति हेतु एक देशव्यापी प्रणाली स्थापित की गई है। इस राष्ट्रीय कार्यक्रम का एक उद्देश्य राष्ट्रव्यापी अंगदान कार्ड बनाना भी है। हाल ही में केन्द्रीय परिवहन मंत्रालय द्वारा सभी राज्यों को यह निर्देशित किया गया है कि वे ड्राइविंग लाइसेंस के फॉर्म में एक कॉलम अंगदान के चयन का भी रखें। इसके पीछे सोच यह है कि यदि किसी व्यक्ति ने अंगदान की स्वीकृति दी है और किसी सड़क हादसे में उसकी मृत्यु हो जाती है, तो उसके अंग निकाले जा सकें। गौरतलब है कि भारत में हर साल लगभग 5 लाख सड़क हादसे होते हैं, जिनमें लगभग 1,48,000 लोग मौत का ग्रास बन जाते हैं। ‘मोहन फाउंडेशन’ जैसे कुछ गैर-सरकारी संगठन (NGO) भी अंगदान के क्षेत्र में अच्छा काम कर रहे हैं। 

सरकारी और गैर-सरकारी प्रयासों के बावजूद भारत में अंगदान की स्थिति संतोषजनक नहीं है। अमेरिका और स्पेन में जहां प्रति 10 लाख की आबादी पर क्रमशः 26 और 36 अंगदान होते हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा एक से भी नीचे (0.86) है। वर्ष 2005 से अब तक 30 लाख लोग अंग प्रत्यारोपण के अभाव में प्राण गंवा चके हैं। दान में मिले अंगों की उपलब्धता बहुत कम है, जबकि मांग बहुत ज्यादा है। 

अंगदान से जुड़ी कुछ अन्य समस्याएं भी हैं। अंगदान के संदर्भ में अंग निकालने और प्रत्यारोपण करने वाले सर्जनों की कमी, प्रशिक्षित लोगों का अभाव तथा पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव आदि भी वे मददे हैं, जो राह के अवरोधक की भमिका निभाते हैं। अंग प्रत्यारोपण खर्चीला भी अधिक है। हर व्यक्ति इसे वहन नहीं कर सकता है। अंगदान से जुड़े कुछ विवाद भी समय-समय पर सिर उठाते रहते हैं। तमिलनाडु का उदाहरण सामने है, जहां प्रतिवर्ष 20 से 25 प्रतिशत विदेशी हृदय या फेफड़े का प्रत्यारोपण करवा रहे हैं। विदेशियों को अंग प्रत्यारोपित किए जाने के अधिकांश मामले ‘कार्पोरेट अस्पतालों में देखने को मिलते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जो अंगदान भारतीय मरीजों के लिए हुआ, उसका लाभ विदेशियों को कैसे पहुंचाया जा रहा है? जाहिर है कि यह चिकित्सकीय प्रक्रिया में अनैतिकता और लालच का सूचक है। चिकित्सकीय प्रक्रिया में अनैतिक अंगदान और चोरी-चुपके अंगों की खरीद फरोख्त भी शामिल हैं। विवाद आए दिन सामने आते रहते हैं। जाहिर है कि जब अंगदान और प्रत्यारोपण प्रक्रिया पर संदेह गहराएगा, तो इसके प्रति उत्साह भी घटेगा। 

भारत में अंगदान का दायरा बढ़ाने के लिए अभी विशेष प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है। जहां अंगदान और प्रत्यारोपण से जडी एक ठोस अधोसंरचना विकसित किए जाने की आवश्यकता है, वहीं प्रशिक्षित कर्मचारियों और सर्जनों की संख्या बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। सरकार को ऐसे उपाय सुनिश्चित करने होंगे, जिनसे अंग प्रत्यारोपण के खर्च में कमी लाई जा सके, ताकि अधिक-से-अधिक लोग इससे लाभान्वित हों। यह भी जरूरी है कि अंगों को प्राप्त करने और उनके प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी बनाया जाए। 

ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, कि दान किए गए अंगों पर पहला अधिकार देशवासियों का हो। अभी देश में अंगदान और अंग आवंटन की प्रक्रियाओं को अधिक भरोसेमंद बनाए जाने की जरूरत है। राज्य ज्यादा-से-ज्यादा सहयोग करें, यह व्यवस्था भी बनानी होगी। देश में समान राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम तो हैं, लेकिन स्वास्थ्य के विषय पर नीतियां बनाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और ये राज्य नीतियों को बनाने और उनके पालन को लेकर पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाते हैं। 

हालांकि अंगदान के संबंध में अभी भारत को बहत लंबा सफर तय करना है, तथापि धीरे-धीरे स्थितियों में सुधार होता दिख रहा है। अंगदान में वृद्धि होती दिख रही है। वर्ष 2014 में जहां कुल 1,149 अंगों का दान हुआ था, वहीं वर्ष 2019 में यह संख्या बढ़कर 3500 हो गई। इसमें किडनी और लीवर के दान में आई ढाई गुना बढ़त के साथ हृदय के दान में साढ़े छह गुना बढ़त भी शामिल है। अंगदान में हो रही उत्तरोत्तर वृद्धि आशा का संचार कर रही है। 

सारतः यह कहा जा सकता है कि देश और समाज के लिए देहदान और अंगदान की विशेष महत्ता है। चिकित्सा विज्ञान के उन्नयन, अनुसंधान कार्यों, चिकित्सकों की एक मजबूत पीढ़ी के विकास तथा चिकित्सा तकनीकों के विकास के लिए यह आवश्यक है कि हमें दान में पर्याप्त देहें मिलती रहें और हम मानवता का कल्याण करते रहें। इसी प्रकार अंगदान तो जीवनदान है। इसके माध्यम से हम दूसरे को नया जीवन प्रदान करते हैं। हमारा शरीर तो नष्ट हो जाता है, किंतु हमारे अंग किसी के जीवन में खुशियों का आधार बने रहते हैं। जहां हम दान की गई आंखों से मरने के बाद भी दुनिया देख सकते हैं, वहीं हमारा दिल भी हमारी मृत्यु के बाद किसी और के सीने में धड़क सकता है। यानी हम मरने के बाद भी किसी अन्य के माध्यम से जीवित बने रह सकते हैं। यह सुखद है कि देश के उदारमना धीरे धीरे देहदान और अंगदान के लिए प्रेरित हो रहे हैं, जिससे दान की हमारी सनातनी संस्कृति की श्रीवृद्धि हो रही है। 

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