मुक्त शिक्षा पर निबंध | Essay on Open Education in Hindi

मुक्त शिक्षा पर निबंध

मुक्त शिक्षा (ओपेन एजुकेशन) पर निबंध | Essay on Open Education in Hindi

आधुनिक काल में ज्यों-ज्यों शिक्षा का विस्तार होता गया और जनतंत्र के विकास के साथ शिक्षा अधिकाधिक लोगों को उपलब्ध होती गई त्यों-त्यों शिक्षा के लिए उपलब्ध संस्थाएं कम पड़ती गईं। दूसरे, विद्यालयों के नियम-कानून और अनुशासन का पालन करने में सब समर्थ नहीं होते। इसीलिए शिक्षा के दूसरे रूपों का आविष्कार होता गया-जैसे डाक द्वारा शिक्षा, (Postal education) दूरस्थ शिक्षा (Distant education) और मुक्त शिक्षा (open education) | ये तीनों ही पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से भिन्न हैं और इनमें शिक्षक शिक्षार्थी को निकट से नहीं पढ़ाता। 

यहां हम मुख्य रूप से मुक्त शिक्षा की बात करेंगे। मुक्त शिक्षा की अवधारणा इस बात पर आधारित है कि पारम्परिक शिक्षा बहुत अधिक नियमबद्ध है। शिक्षार्थी को हर साल एक परीक्षा देकर एक नियमित पाठ्यक्रम के अनुसार ही सफल या असफल होना होता है। इसमें 15-16 वर्ष लग जाते हैं स्नातकोत्तर परीक्षा पास करने में और बीच में हर साल कहीं-कहीं अधिकांश ‘फेल होकर पीछे छूट (drop out) जाते हैं। इसके अलावा बिना पांचवीं पास किए छठी में और बिना बारहवीं पास किए स्नातक कोर्स में प्रवेश नहीं मिल सकता। विभिन्न कारणों से बहुत लोगों की शिक्षा बीच में छूट जाती है और वे उसे फिर नहीं शुरू कर पाते। 

“मुक्त शिक्षा की अवधारणा इस बात पर आधारित है कि पारम्परिक क्षिा बहुत अधिक नियमबद्ध है।” 

इस प्रकार से तमाम बंधनों से मुक्ति के लिए वर्ष 1969 में । इंग्लैंड में पहला मुक्त विश्वविद्यालय खोला गया। भारत में वर्ष 1985 में संसद के कानून द्वारा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। आज तो करीब-करीब हर राज्य में उसकी शाखाएं हैं और बहुत से विश्वविद्यालयों में भी उसकी शाखा मौजूद है। इस प्रणाली से कुछ निश्चित फायदे हैं :

1. पारंपरिक शिक्षण संस्थाओं पर दबाव कम हुआ है।

2. इन्टर का सर्टिफिकेट न प्राप्त कर पाने वाले और बीच में जिनकी शिक्षा छूट गई है वे भी स्नातक परीक्षा के लिए तैयार किए जाते हैं।

3. यह शिक्षा सभी को उपलब्ध है और वे अपने मन माफिक परीक्षा का समय और स्थान चुन सकते हैं।

4. यह शिक्षा घर में बैठे कम खर्च में प्राप्त की जा सकती है। नौकरी और व्यवसाय करने वाले तथा गृहस्थी के बंधन में बंधे लोग भी इसका लाभ उठा सकते हैं।

5. दुर्गम क्षेत्रों में जहां शिक्षा की उच्च संस्थाएं नहीं हैं वहां के लोग भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं।

6. बहुत सी तकनीकी शिक्षा, जैसे लाइब्रेरी साइंस, बहुत कम संस्थाओं में उपलब्ध है। यह भी मुक्त विश्वविद्यालय में उपलब्ध है।

7. प्रौढ़ तथा वृद्धजन भी मुक्त शिक्षा के माध्यम से अपनी जिज्ञासाएं और शौक पूरा कर सकते हैं।

8. दलित और ऐसे गरीब लोग जो समय पर उच्च शिक्षा नहीं प्राप्त कर सके बाद में प्राप्त कर अपने जीवन को उच्चतर स्तर पर ले जा सकते हैं, आदि। 

इसके अलावा मुक्त शिक्षा की कुछ विशिष्टताएं बहुत आकर्षक है। जैसेः

1. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम बहुत से 

पारम्परिक विश्वविद्यालयों से बेहतर है।

2. विद्यार्थी को उपलब्ध कराई जा रही पाठ्य सामग्री का स्तर 

प्रशंसनीय होता है।

3. शिक्षा का परिप्रेक्ष्य विस्तृत होता है और लगातार विशेषज्ञों 

की सलाह ली जाती है।

4. अधुनातन तकनीक का लगातार प्रयोग होता रहता है।

5. ऐसे लोग जिन्होंने बौद्धिक विकास की खिड़कियां बंद कर दी थीं उनकी खिड़कियां खुलने लगी हैं और उनमें नवजीवन का संचार हो रहा है।

6.इसमें शिक्षा के सर्वोत्तम ढंग स्वाध्याय को महत्व दिया गया है। आदि 

मुक्त शिक्षा प्रणाली में शिक्षक के संस्प] और उपस्थिति का अभाव एक ऐसी वंचना पैदा करता है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती। 

ऐसे बहुत से आकर्षणों के बावजूद मुक्त शिक्षा में कुछ सैद्धांतिक तो कुछ व्यवहारिक दोष मौजूद हैं। 

1.इस मुक्त प्रणाली में वैसी ही मुक्ति मिली है जैसी वर्ष 1935 के ऐक्ट के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारत को दी थी-सीमित मक्ति जो सारतः मुक्ति थी ही नहीं। मक्त शिक्षा में भी व्यक्ति सारतः डिग्री के लिए ही पढ़ता है-वह डिग्री जिसकी प्रायः कोई मान्यता नहीं होती और व्यक्ति को किसी छोटी से छोटी नौकरी के लिए भी अपनी योग्यता फिर से प्रमाणित करनी पड़ती है। बस यही कहा जा सकता है कि मानो खूटे से बंधे हुए जानवर का पगहा बढ़ा दिया जाता है।

2.प्राचीनकाल में ही शिक्षा के लिए शिक्षक को निर्णायक दर्जा दिया गया था। कहा तो यहां तक जाता था कि- 

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागू पायं बलिहारी गुरु चरण की जिन गोविंद दियो बताय। 

यानी गरु का महत्व गोविंद से बडा बताया गया था। यह प्रणाली किसी न किसी रूप में सारी दुनिया में चलती रही है और शिक्षकों ने ज्ञान-विज्ञान के नए-नए रास्ते ढूंढे हैं और संस्थान और ‘स्कूल’ बनाए हैं। भारत में तो संगीत-नृत्य के ‘घराने विकसित हुए जहां श्रेष्ठ विद्या उपलब्ध होती थी और उस कारण धन-सम्मान प्राप्त होता था। गुरु से निकटता के बाद ही ‘गुरुमंत्र’ मिलता था। यद्यपि न वैसी शिक्षा रही, न वैसे गुरु और आज का शिक्षक समाज के किसी भी अन्य पेशे की ही तरह अच्छा और बुरा है, फिर भी शिक्षा में शिक्षक की उपस्थिति शिक्षा को जीवन्त बनाती है, अधिक संवादात्मक तथा अंतरंग बना सकती है, बड़ी-बड़ी कक्षाओं के बावजूद । 

3. मुक्त शिक्षा प्रणाली में शिक्षक के संस्पर्श और उपस्थिति का अभाव एक ऐसी वंचना पैदा करता है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती।

4. यह शिक्षा प्रणाली एक उन्नत और नैतिक समाज में, जहां अधिकतर लोग जिम्मेदार होते हों, प्रभावी हो सकती है पर भारत जैसे देश में जहां अधिकांश लोग गैर जिम्मेदार हैं और होते जा रहे हैं इस प्रणाली से ऊपरी लाभ ही हो पा रहा है, यानी कुछ अधिक लोगों को डिग्रियां और नौकरियां मिल पा रही हैं। बस! 

अंत में यही कहा जा सकता है कि कुल मिलाकर इस प्रणाली का भरपूर फायदा नहीं मिल पा रहा है पर वस्तुस्थिति को समझने के लिए पहले दिए गए उदाहरण का विस्तार किया जा सकता है। वर्ष 1947 में भारत में आजादी तो आ गई पर ज्यादातर लोग तो यहां तक कहते हैं कि भारत अभी पूरी तरह आजाद नहीं हुआ। पर इसमें कहां संदेह है कि पूरी दासता । सारतः यह अधूरी आजादी भी बेहतर है। इसी तरह मुक्त का रुढ़िग्रस्त पारंपरिक शिक्षा से तो बेहतर है ही अपनी मा तमाम सीमाओं के बावजूद। 

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