गैर-सरकारी संगठन पर निबंध-Essay on NGO

गैर-सरकारी संगठन पर निबंध

गैर-सरकारी संगठन पर निबंध अथवा गैर-सरकारी संगठन और उनकी उपादेयता (NGOs) अथवा लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ – स्वैच्छिक क्षेत्र –NGO (Non-Governmental Organization)

वस्तुतः गैरसरकारी संगठनों से आशय उन स्वैच्छिक संगठनों से है, जिनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता है। सामाजिक कार्य और मानव सेवा इनके पुनीत उद्देश्य होते हैं और इन कार्यों को करते हुए एक तरह से ये सरकार के लिए मददगार साबित होते हैं। यही कारण है कि सरकारें इन्हें वित्त पोषित करती हैं। ये वे संगठन होते हैं, जिनका गठन वैधानिक रूप से किया जाता है। इनकी विशिष्टता यह होती है कि ये सरकारी वित्त पोषण के बावजूद अपने स्वरूप को गैरसरकारी बनाए रखते हैं।

एनजीओ यानी गैरसरकारी संगठन की परिभाषा विश्व बैंक ने कुछ इस प्रकार दी है— “एनजीओ एक निजी संगठन होता है, जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएं प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिए गतिविधियां चलाता है।” विश्व बैंक ने गैरसरकारी संगठनों को दो वर्ग में बांटा है। पहले वर्ग को क्रियात्मक (ऑपरेशनल) स्वैच्छिक संगठन नाम दिया है, जबकि दूसरे वर्ग को पैरोकार (एडवोकेसी) स्वैच्छिक संगठन। पहले वर्ग में आने वाले संगठन विकास से जुड़ी योजनाओं की रूपरेखा निर्धारित कर उन्हें क्रियान्वित करते हैं, जबकि दूसरे वर्ग में आने वाले संगठन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की नीतियों और कार्यपद्धतियों की पैरोकारी करते हैं। इस तरह देखें तो वैश्विक संदर्भो में भी गैरसरकारी संगठनों का विशेष महत्त्व है। 

“एनजीओ एक निजी संगठन होता है, जो लोगों का दुख-दर्द दूर करने, निर्धनों के हितों का संवर्धन करने, पर्यावरण की रक्षा करने, बुनियादी सामाजिक सेवाएं प्रदान करने अथवा सामुदायिक विकास के लिए गतिविधियां चलाता है।” 

भारत में 1860 में सोसायटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट अस्तित्व में आया और इसके बाद मान्य गैरसरकारी संगठनों का संगठित स्वरूप सामने आया। इसमें गति आई स्वाधीनता आंदोलन के समय। आजादी की ललक ने हमारी राजनीतिक एवं सामाजिक चेतना को बढ़ाया और हमारे देशवासियों ने जहां सेवा को माध्यम बनाकर एक परिष्कृत और उन्नत समाज के निर्माण की पुरजोर कोशिश की, वहीं | इस रास्ते पर चल कर राष्ट्रीय चेतना एवं राष्ट्रवाद की अलख जगाने  का काम बड़ी शिद्दत से किया। सत्यशोधन समाज, प्रार्थना समाज, फ्रेंड इन नीड सोसायटी, दि इंडियन नेशनल कांफ्रेंस तथा आर्य | समाज जैसे संगठनों ने उल्लेखनीय काम किया। 

जिस समय देश को आजादी मिली, उस समय हमारे सामने । अनेक चुनौतियां थीं। हम अनेक प्रकार की समस्याओं के मकड़जाल में फंसे थे। इन समस्याओं से छुटकारा दिला पाना अकेले सरकार के बूते की बात नहीं थी। विषम परिस्थितियों एवं समस्याओं से देश को उबारने के लिए एक बार फिर स्वैच्छिक संगठनों ने कमर कसी तथा सेवा कार्यों के जरिए तत्कालीन समस्याओं से जूझना शुरू किया। यह उस वक्त की जरूरत भी थी, क्योंकि बापू स्वयं कह चुके थे कि जो आजादी हमें मिली है, वह महज राजनीतिक आजादी है, भूख, गरीबी और वंचना से आजादी पाना शेष है। इसी बात को ध्यान में रखकर बापू ने देश के नौजवानों को बढ़-चढ़ कर समाज सेवा के लिए प्रेरित भी किया था। उनके इस प्रयास ने रंग दिखाना शुरू किया। बापू भले हमारे बीच नहीं रहे, किन्तु उनके आदर्शों को सामने रखकर काम करने वाले स्वैच्छिक संगठनों ने सेवा कार्यों को व्यापक विस्तार देकर राजकीय सहायता के अभाव को दूर किया। 

“विश्व के दूसरे देशों की तुलना में भारत में ऐसे गैरसरकारी संगठनों की संख्या सर्वाधिक है, जिनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है।”

मौजूदा दौर में वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के  अनुसार देश की जनसंख्या 1.21 अरब हो चुकी है। जनसंख्या का | दबाव बढ़ा है और उसी के अनुरूप जन समस्याओं में भी इजाफा हुआ है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम समस्याओं को उस तरह | से नहीं सुलझा पाए हैं, जिस प्रकार सुलझा लेना चाहिए था। पुरानी समस्याएं जहां यथावत हैं, वहीं अनेकानेक नई समस्याएं भी अस्तित्व | में आई हैं। फिर यह भी एक कटु सत्य है कि इतने बड़े देश में सिर्फ सरकार से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि वह अपने दम पर एक समस्या विहीन समाज का निर्माण करे। उसे भी हाथ-पांव चाहिए। यह काम इस समय देश में स्वैच्छिक संगठन बखूबी कर रहे हैं। लोकतंत्र को समृद्ध बनाने में भी गैरसरकारी संगठन सराहनीय भूमिका निभा रहे हैं। यही कारण है कि स्वैच्छिक क्षेत्र को लोकतंत्र के पांचवें स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह क्षेत्र पूरी निष्ठा, निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं ईमानदारी से काम करे, तो देश की एक ऐसी बुलंद तस्वीर बन सकती है, जो दूसरे लोकतांत्रिक देशों के लिए प्रेरक साबित होगी। 

देश में सरकार का रवैया अधिकांशतः स्वयंसेवी संगठनों के प्रति सकारात्मक रहा है। स्वैच्छिक क्षेत्र के बारे में वर्ष 2007 में सरकार ने जो राष्ट्रीय नीति अनुमोदित की थी, उसमें एक सुदृढ़ एवं प्रभावपूर्ण स्वैच्छिक क्षेत्र विकसित किए जाने पर बल दिया गया। इस नीति में जहां स्वैच्छिक क्षेत्र के लिए एक ऐसे वातावरण के निर्माण पर जोर दिया गया जो उन्हें स्वायत्तता और सरक्षा प्रदान करे. वहीं सरकार और स्वैच्छिक संगठनों के मध्य परस्पर विश्वास बढाने पर भी बल दिया गया। इस तरह देखा जाए तो हमारे देश में स्वैच्छिक संगठनों के फूलने-फलने के लिए पर्याप्त सकारात्मक वातावरण उपलब्ध है। यही कारण है कि मौजूदा समय में भारत में पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन यानी गैरसरकारी संगठन जन कल्याण में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, वहीं विकास से जुड़ी गतिविधियों को बढ़ाने में भी अपना यथेष्ट योगदान दे रहे हैं। महानगरों से लेकर सुदूर अंचलों, दुर्गम क्षेत्रों एवं गांवों-कस्बों में ये अपने काम को अंजाम देकर राष्ट्र निर्माण में सहायक बन रहे हैं। जनसेवा के साथ-साथ ये संगठन लोगों के हकों की भी पैरोकारी करते हैं और जनकल्याणकारी सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं का लाभ जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास भी करते हैं। इनकी भूमिका निरंतर बढ़ रही है। भारतीय गैरसरकारी संगठनों की प्रतिष्ठा विदेशों में भी बढ़ी है, यही कारण है कि दूसरे देशों से कुछ स्वयं सेवी संगठनों को अच्छा अनुदान भी मिल रहा है। स्वैच्छिक संगठनों की बढ़ती संख्या से यह भी पता चलता है कि लोगों के बीच जागरूकता बढ़ रही है। वे नये अवसरों को गंवाना नहीं चाहते। वे सेवा प्रदाता की भूमिका में सामने आकर जनता जो कि लोकतंत्र में जनार्दन है, को सहूलियत प्रदान कर रहे हैं। 

विश्व के दूसरे देशों की तुलना में भारत में ऐसे गैरसरकारी संगठनों की संख्या सर्वाधिक है, जिनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं है। नये गैरसरकारी संगठनों की संख्या देश में तेज गति से बढ़ रही है। आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि औसतन लगभग 400 भारतीयों के पीछे एक स्वैच्छिक संगठन है। इस स्थिति में तो देश की काया पलट जानी चाहिए। पर ऐसा हो नहीं रहा है। यही वजह है कि अब गैरसरकारी संगठनों पर अंगुलियां भी उठने लगी हैं तथा इन्हें प्रभावशाली लोगों के औजार के रूप में देखा जाने लगा है। फर्जीवाड़े की शिकायतें भी बढ़ी हैं। 

गैरसरकारी संगठनों की कार्य पद्धति में जहां अपारदर्शिता की शिकायतें बढ़ी हैं, वहीं इनके सांपत्तिक आधार पर भी सवाल उठते रहते हैं। इन बातों ने जहां गैरसरकारी संगठनों की उपादेयता को संदिग्ध बनाया है, वहीं सरकार की निष्क्रियता को भी प्रश्नगत किया है। धन के दुरुपयोग और उसका उचित हिसाब-किताब न दे पाने के आरोप बराबर एनजीओ पर लगते रहे हैं। भ्रष्टाचार ने उस स्वैच्छिक क्षेत्र में भी अपनी गहरी पैठ बना ली है, जिसे लोकतंत्र के पांचवें स्तंभ की संज्ञा दी जा रही है। पूरा परिदृश्य बड़ा ही संदिग्ध बन चुका है। शिकायतें पाई जाने पर एनजीओ ‘ब्लैक लिस्टेड’ भी किए जा रहे हैं। इसी के तहत पिछले 5 वर्षों में केंद्र सरकार लगभग 20,000 गैरसरकारी संगठनों का लाइसेंस निरस्त कर चुकी है।

जहां कुछ एनजीओ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, वहीं कुछ निष्क्रिय हैं। कछ ऐसे हैं जो सिर्फ कागजों पर चल रहे हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे गैरसरकारी संगठनों के बारे में आम आदमी की बहुत ही नकारात्मक धारणा बनती जा रही है। जो स्वैच्छिक संगठन कभी सेवा और समर्पण के पर्याय माने जाते थे, उन्हें अब खाने-कमाने का जरिया माना जाने लगा है। इन स्थितियों के मद्देनजर यह जरूरी हो गया है कि गैरसरकारी संगठनों के यथेष्ट मूल्यांकन और इनकी सूक्ष्म निगरानी के लिए एक प्रभावी और पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाए। तभी इनकी उपादेयता को भी बढ़ाया जा सकेगा। 

वैसे ऐसा नहीं है कि लोकतंत्र के पांचवें स्तंभ के रूप में देखा जा रहा स्वैच्छिक क्षेत्र पूरे तौर पर भ्रष्टाचार एवं अपारदर्शिता से आच्छादित है। लोकतंत्र में ‘लोक’ को प्रभावी बनाने की दिशा में कुछ एनजीओ सराहनीय काम कर रहे हैं। इनकी विश्वसनीयता पर कोई आंच नहीं आई है। इनकी उपयोगिता को समझने के लिए ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’, ‘फिफ्थ पिलर इंडिया’ तथा ‘आवाज’ जैसे गैरसरकारी संगठनों की उपलब्धियों को सामने रखा जा सकता है, जिन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुहिम छेड़ कर सरकार को हिला कर रख दिया। इस काम में इन्हें जिस तरह से वर्गविहीन जनता का अपार जन समर्थन मिला उससे यही ध्वनित होता है कि देश में न सिर्फ स्वैच्छिक संगठनों की विशेष उपादेयता है, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए भी ये जरूरी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सक्रिय एवं कर्मठ संगठनों को हम पहचाने व उन्हें प्रोत्साहित करें तथा स्वैच्छिक क्षेत्र को बदनाम करने वाले फर्जी एवं भ्रष्ट संगठनों पर नकेल कसें। 

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