नव-संवत्सर पर निबंध

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नव-संवत्सर पर निबंध

जो नया है, नूतन है, वह सब हमारे लिाा स्वागत के योग्य है, ऐसी हमारे देश की परम्परा रही है। हम नये और नूतन का बांहें फैलाकर स्वागत करते आए हैं। ऐसे में नव-संवत्सर का तो हमारे लिए विशेष महत्त्व है, क्योंकि यह तो सृष्टि की जयंती के रूप में हमें यह याद दिलाता है कि हम इस सृष्टि रूपी ईश्वरीय कृति को अक्षुण्ण व संतुलित बनाये रखने का भरसक प्रयास करें। यह सृष्टि ही तो हमारे जीवन में नाना प्रकार के रंगों का समावेश करती है, जीवन को खुशरंग बनाती है तथा हमें उल्लास व आह्लाद से भरा-पूरा बनाए रखकर नीरसता से बचाती है। 

“किसी ऋतु से प्रारंभ करके ठीक उसी ऋतु के पुनः आने तक जितना समय लगता है, वह संवत्सर कहलाता है।” 

नव-संवत्सर का जुड़त्व हमारी सृष्टि से है, ऋतुओं से है, जीवों से है और जीवमंडल से है। ऋतु का अर्थ है, जो सदा चलती रहे। यह गति और लय का हमें संदेश देती है और साल की गति को रेखांकित करती है। गति का जीवन से गहरा संबंध होता है। यह गति जहां ऋतु से जुड़ी है, वहीं ऋतु का अभिन्न जुड़ाव नव-संवत्सर से है। पौराणिक उल्लेखों के अनुसार 

सर्वर्तुपरितस्तु स्मृतः संवत्सरौ बुधै। 

अर्थात् किसी ऋतु से प्रारंभ करके ठीक उसी ऋतु के पुनः आने तक जितना समय लगता है, वह संवत्सर कहलाता है। यानी यह संवत्सर एक तरह का वर्ष है और जब इसमें ‘नव’ जुड़ जाता है, तो यह नव-संवत्सर हो जाता है। यानी सृष्टि की वर्षगांठ का नया वर्ष। इसका सविस्तार वर्णन यजुर्वेद के 27वें व 30वें अध्याय के मंत्र क्रमांक 47 एवं 15 में किया गया है। भारतीय संस्कृति में नववर्ष का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से माना गया है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार इसी तिथि से ब्रह्माजी ने सृष्टि के सृजन की शुरुआत की थी। इसकी पुष्टि ब्रह्म पुराण के इस श्लोक स होती है 

चैत्र मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि।

शुक्ल पक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति॥ 

अर्थात् चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा परीवा तिथि के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि के निर्माण का कार्य शुरू किया था। अतएव चन्द्र संवत्सर का शुभारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। हम पहले ही बता चुके हैं कि ऋतुओं का अभिन्न जुड़ाव नव-संवत्सर से है और ऋग्वेद में ऋतुओं का निर्माता चन्द्रमा को माना गया है। 

इसीलिए हमारी संस्कृति में चन्द्र संवत्सर को विशेष महत्त्व दिया गया है। वैसे भी हमारे धर्म ग्रंथों में मन का स्वामी होने के कारण चन्द्रमा को विशेष महत्ता दी गई है। चैत्र का चन्द्र संवत्सर अगले वर्ष के चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है। इसके बाद चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नये संवत्सर की शुरुआत होती है। इस प्रकार काल का यह चक्र अनवरत चलता रह कर हमें सृष्टि से जोड़े रखता है तथा जीवन के तत्वों से परिचित करवाता है। नव-संवत्सर से जुड़ा एक प्राचीन अध्याय यह भी है कि काल के नियंत्रक कहे जाने वाले महाकाल (शिव) की नगरी अवंतिका (उज्जैन) में महाकाल के कृपापात्र सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्ति को चिरस्थायी बनाने के लिए चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से विक्रमीय संवत् का प्रवर्तन किया था। 

नव-संवत्सर हमें यह भी याद दिलाता है कि जल में जीवन के अमूल्य तत्व निहित हैं, अतएव हमें जल के संरक्षण एवं उसकी निर्मलता के प्रति विशेष ध्यान देना चाहिए, नहीं तो इस जीवन को ही खो बैठेंगे। पौराणिक आख्यानों के अनुसार सृष्टि निर्माण के समय सर्वप्रथम सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु ने अवतार लिया था। यह उनका मत्स्यावतार था, जो कि जल में हुआ था। यह बात जल की महत्ता को दर्शाती है। वैसे भी वैज्ञानिक निष्कर्षों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि जीवन के लिए जल न सिर्फ आवश्यक है, बल्कि इसमें जीवन के पनपने और उसे संरक्षित रखने के असीम गुण हैं। संभवतः इसीलिए मत्स्यावतार के रूप में सृष्टि का पहला जीव जल में ही पैदा हुआ। आज हमारे वैज्ञानिक अकारण ही मंगल जैसे ग्रहों पर जल की तलाश में नहीं जुटे हैं। जल का पाया जाना जीवन का संकेत है और इससे हमें दूसरे ग्रहों पर जीवन की मौजूदगी का पता चलता है। यह हमारे लिए एक बड़ा संदेश है कि हम जल रूपी परम तत्व को संरक्षित रखकर जीवन को बनाए रखें। 

नव-संवत्सर के बहाने हिन्दू धर्म के दर्शन पर भी दृष्टिपात कर लेना आवश्यक होगा। हमारे धर्म में ब्रह्माजी की परिकल्पना स्रष्टा यानी सृष्टि के रचयिता के रूप में की गई है। विष्णु को पालनहार माना गया है तो शिव को संहारक यानी सृष्टि को नष्ट करने वाला। यह वर्गीकरण कितना वैज्ञानिक है। सृष्टि जरूरी है, तो यह भी जरूरी है कि उसका पालन भी हो। ठहराव को समाप्त कर नव व नूतन के लिए संहार भी आवश्यक है। यही सृष्टि का नियम है, जो कि शाश्वत हमारे देश में नव-संवत्सर की शुरुआत अत्यंत खुशनुमा मौसम में होती है। वसंत को ऋतुओं का राजा यानी ऋतुराज कहा गया है और हमारा संवत्सर इसी ऋतु में न सिर्फ शुरू होता है, बल्कि इसी ऋतु में समाप्त भी होता है। नव-संवत्सर की शुरुआत वसंत ऋतु में ही होती है। इसके बाद यह समस्त ऋतुओं की परिक्रमा करते हुए हमारे जीवन में रंग भरता है और इसी ऋतु में इसका समापन भी होता है। यानी आरंभ और अवसान दोनों के समय हमारी प्रकृति एक खास रंग में रंगी रहती है। 

“नव-संवत्सर के समय ग्रह-नक्षत्र अत्यंत शुभ दशा में होते हैं। चैत्र की नवरात्र का प्रारंभ इसी दिन से होता है, तो इसका समापन रामनवमी से होता है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामजी का राज्याभिषेक हुआ था।” 

नव-संवत्सर का हमारी प्रकृति से गहरा संबंध है। वसंत ऋत को ऋतुओं का राजा अकारण नहीं कहा गया है, जिसमें हमारे नव-संवत्सर की शुरुआत होती है। यह समय शीतकाल की शीतलता एवं ग्रीष्मकाल की उष्णता का मध्य बिन्दु होता है। इस कारण जलवायु समशीतोष्ण रहती है। यह समय कृषक के परिश्रम के परिणाम से भी जुड़ा होता है, क्योंकि यही वह समय है, जब फसलें पक कर तैयार रहती हैं। इस कारण वातावरण उल्लास से परिपूर्ण होता है। गदराई-पकी फसलें देखकर आह्लाद और उमंग का संचार हो उठना स्वाभाविक है। 

नव-संवत्सर का संबंध काल गणना से भी होता है। यह गणना पंच आयामी होती है और इसी के आधार पर पंचांग तैयार किया जाता है। भारतीय ज्योतिष में काल की गणना के पांच अवयव बताए गये हैं। ये हैं—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। करण से तात्पर्य तिथि के अर्धभाग से है। वस्तुतः हमारे देश में पंचांग के माध्यम से प्रकृति का जितना सूक्ष्म व गहन विश्लेषण किया गया है, उतना अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता है। यह इन शुभ मुहूर्तों को भी बताता है, जिनमें नये व शुभ कामों की शुरुआत करनी चाहिए। 

नव-संवत्सर के समय ग्रह-नक्षत्र अत्यंत शुभ दशा में होते है। चैत्र की नवरात्र का प्रारंभ इसी दिन से होता है, तो इसका समापन रामनवमी से होता है। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामजी का राज्याभिषेक हुआ था। इसका उल्लास देश के सभी भागों में देखने को मिलता है भले ही पर्व के नाम अलग-अलग हो। आंध प्रदेश में इसे दीपावली की तरह ‘उगादी’ नाम से मनाया जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है— “युग का प्रारंभ’। महाराष्ट्र में जहां इसे गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है, तो जम्मू-कश्मीर में । ‘नवरेह’ के नाम से। सिंध प्रांत में इसे चेती चंद्र (चैत्र का चांद) नाम से मनाया जाता है, जो कि सिंधियों का मुख्य पर्व है। 

नव-संवत्सर सृष्टि के निर्माण से जुड़ा एक आदि पर्व है, जिसे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने की परंपरा रही है। इस अवसर पर हम दुर्गुणों को त्यागकर सद्गुणों को अपनाने का संकल्प लेते हैं तथा सुख, समृद्धि व शांति की कामना करते हैं। हमारे धर्मग्रंथों में इसे ‘नवसंवत्सरोत्सव’ के रूप में मनाए जाने की बात कही गई है। काल पुरुष के सभी अवयवों के साथ इस दिन मुख्य रूप से स्रष्टा ब्रह्माजी के पूजन का विधान है अथर्ववेद में यह उल्लेख मिलता है कि इसे वैदिककाल से एक महापर्व के रूप में मनाया जाता रहा है। इससे इसकी प्राचीनता एवं भव्यता का पता चलता है। सचमुच यह पर्व नई कल्पना का है, नई ज्योत्स्ना का है, नव आराधना व नवशक्ति का है। यह वह पावन पर्व है, जिस पर हमें हमारी सृष्टि व जीवमंडल के सभी जीवधारियों के लिए मंगल कामना करनी चाहिए। 

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