नक्सलवाद पर निबंध – Naxalism In India Essay In Hindi

नक्सलवाद पर निबंध

नक्सलवाद पर निबंध – Naxalism In India Essay In Hindi अथवा  नक्सली हिंसा और भारत (Naxal Violence and India) अथवा भारत में नक्सल आंदोलन एवं आतंकवाद : पड़ोसी देशों की भूमिका यूडीए/एलडीए (स्पेशल, मुख्य परीक्षा), 2010

मई, 2019 में नक्सलियों द्वारा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पुलिस बल के 16 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस हमले के बाद नक्सल समस्या संबंधित बहस फलक पर आ गई। ध्यातव्य है कि बढ़ती नक्सली हिंसा ने हमारी आंतरिक सुरक्षा को प्रश्नगत कर दिया है। लाल गलियारे का विस्तार दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है और नक्सलियों का संजाल मजबूत हो रहा है। कल तक किसी भी अराजक किस्म के उग्र व्यक्ति अथवा समूह को मिथकीय अंदाज में कह दिया जाता था कि फलां व्यक्ति/समूह नक्सली हो गया है। जैसे उसके अतिरेक की तरफ इशारा करने वाला यह एक मुहावरा हो। लेकिन आज वही नक्सली आंदोलन एक गंभीर वास्तविकता बन गया है। नक्सली गतिविधियां देश के बीस राज्यों के 223 जिलों के दो हजार थाना क्षेत्रों में फैली हुई हैं। प्रमुख राज्य हैं : आंध्र प्रदेश, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। बारीकी से गौर करें तो यह नक्सली अथवा माओवादी आंदोलन असम, पंजाब अथवा जम्मू-कश्मीर की तरह पृथकतावादी चरित्र के अनुरूप नहीं है, जो भौगोलिक, नस्ली या भाषाई आधार पर अपनी अलग सत्ता की मांग कर रहे हों। इन दस राज्यों में कम से कम छह भाषाएं बोलने वाले लोग बसते हैं। फिर ऐसी क्या बात है कि यह लगभग देश व्यापी लहर है और वह भी देश को अंदरूनी तौर पर खतरे में डाल रहा है। देश के लगभग छठवें भाग पर नक्सली अपना मजबूत नियंत्रण जमा चुके हैं। ये धीरे-धीरे अपनी पैठ को और बढ़ा रहे हैं। सच तो यह है कि नक्सली आंदोलन ने अब आतंकवाद की शक्ल अख्तियार कर ली है, जिसे हवा देने में हमारे कुछ पड़ोसी देशों की भूमिका भी नकारात्मक है। 

भारत में नक्सली समस्या के पनपने की वैसे तो अनेक वजहें हैं, किंतु इनमें से मुख्य वजहें हैं, सामाजिक न्याय व समानता की कमी, समस्याओं की सरकारी स्तर पर उपेक्षा तथा हका पर डाका। नक्सलवाद से जुड़ा एक तल्ख सच यह है कि यह आदिवासी क्षेत्रों में ही अधिक पनपा। यह एक गंभीर पहल है, जिस पर प्रकाश डाला जाना जरूरी है। दरअसल यह आदिवासी बहुल विशाल भू-क्षेत्र भारी पैमाने पर खनिज संपदाओं से भरा हुआ है। आदिवासी वैसे भी हमारी राष्ट्रीय आबादी के सबसे अधिक हाशिये पर धकेले गये लोग और समुदाय हैं। निहायत पिछड़ी हुई स्थितियों में ये लोग वन संपदा के प्राकृतिक व पारम्परिक उपयोग पर जीवित हैं। औपनिवेशिक काल से इस भू-क्षेत्र और वन-संपदा पर उनकों कोई मालिकाना हक नहीं दिया गया है। लंबे इतिहास में इन समुदायों ने अपने अस्तित्व की रक्षा और सांस्कृतिक स्तर पर अपनी पहचान को बनाये रखने की अनगिनत लड़ाइयां लड़ी हैं। एक तो तमाम सरकारों ने उनके विकास और मुख्य राष्ट्रीय जीवनधारा में उन्हें शामिल करने के लिए समुचित प्रयास नहीं किये, दूसरे जो राहत के तौर पर थोड़े-बहुत प्रयास हुए भी वे कानूनी मिल्कियत के अभाव में उतने कारगर नहीं हुए। विकास के नाम पर सरकारें प्रायः उन्हें विस्थापित और वंचित ही करती चली गयीं। पिछले कुछेक वर्षों से उनके पक्ष में कुछ विधेयक लाये गये हैं और भूक्षेत्र व संपदा पर उन्हें मालिकाना हक दिलाने के लिए कानूनी पहल भी शुरू हुई है। लेकिन जमींदारों, ठेकेदारों और पूंजीपतियों जैसे निहित स्वार्थ वाले तत्वों की अड़गेबाजी से बहुत आशाजनक स्थिति अब भी नहीं है। जबकि इन आदिवासियों ने स्वयं उपेक्षित रहते हुए भी स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अनेक कुर्बानियां दीं। बिरसा मुण्डा जैसे नाम साम्राज्य-विरोधी लड़ाई के इतिहास में गौरवशाली स्थान रखते हैं। 

“भारत में नक्सली समस्या के पनपने की वैसे तो अनेक वजहें हैं, किंतु इनमें से मुख्य वजहें हैं, सामाजिक न्याय व समानता की कमी, समस्याओं की सरकारी स्तर पर उपेक्षा तथा हकों पर डाका।” 

भूमण्डलीकरण के इस सख्त दौर में कारपोरेट जगत की तमाम कंपनियां इस विशाल क्षेत्र की खनिज संपदा पर नजर गड़ाये हुए हैं और हमारी सरकार उदारीकरण और तत्संबंधी आर्थिक सुधारों के तहत पहले से ही संकटग्रस्त इस क्षेत्र व संपदा के अधिकतम दोहन का मन बना चुकी हैं। किसी भी कीमत पर इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों की पैठ के लिए मार्ग प्रशस्त करना उसका विवादास्पद लक्ष्य है जिस पर चर्चा का अवकाश यहां नहीं है। छोटी-बड़ी विकास परियोजनाओं के सिलसिले में बड़े पैमाने पर विस्थापन की समस्याएं हम देश के अन्य हिस्सों में भी झेलते रहे हैं जिनका समुचित निदान अभी तक नहीं हो पाया है। फिर यह तो बिना किसी राष्ट्रीय विकास परियोजना के इतने विशाल क्षेत्र में दोहन और विस्थापन की नयी चुनौतियां पेश करने वाला मंसूबा है। कारपोरेट जगत का दबाव निरंतर बढ़ रहा है। उन्हें तो आदिवासियों के जीवन से कुछ लेना-देना नहीं है, अकुशल (अनस्किल्ड) श्रम शक्ति के रूप में भी उनका कोई मोल उनकी नजर में नहीं हो सकता, लेकिन हमारी अपनी राष्ट्रीय सरकार को तो उनकी जिम्मेदारी उठानी ही पड़ेगी। ठीक यही वह बिन्दु है जहां माओवादियों का दखल शुरू होता है। इन आदिवासी इलाकों को उन्होंने अपना मुख्य जनाधार बनाया है। उनके भूमिगत सशस्त्र संघर्ष के लिए सबसे सुरक्षित अड्डे इन क्षेत्रों में पहले से रहे हैं। इस संकट की घड़ी में आदिवासी समुदायों को भी दूसरा कोई सहारा दिखायी नहीं देता। माओवादियों की लड़ाई में उनकी अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए उम्मीदें भी जुड़ गयी हैं। ऐसे में यह अस्वाभाविक नहीं है कि माओवादियों को आदिवासियों से न सिर्फ संरक्षण व समर्थन मिल रहा है, बल्कि उनके कैडर भी अधिकांश इन्हीं के बीच से आते हैं। सरकार के नीति-निर्धारकों को यह बात भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि आदिवासी विद्रोह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रही है और कारपोरेट जगत की घुसपैठ उनके संघर्ष को राजनीतिक रूप से खतरनाक मोड़ दे सकती है। फिर यह सिर्फ कानून व्यवस्था और देश का आतरिक सरक्षा का मामला नहीं रह जायेगा। 

सरकार आदिवासी क्षेत्र के विकास के जो वायदे कर रही है उनमें सबसे कम सुचिंतित पहलू यह है कि सबसे बड़ी जरूरत भूमि अधिकारों की रक्षा की है क्योंकि भूमि छिन जाने पर आदिवासी कल्याण की योजनाओं का कोई खास महत्त्व नहीं रह जाता। दूसरी तरफ सरकारी रिकार्ड में दर्ज न होने के कारण आदिवासियों की जमीन छिनने की आशंका बढ़ जाती है। मनमाने तौर पर मिट्टी संरक्षण आदि के जो कार्य सरकार की तरफ से किए जाते हैं, उनकी कीमत भी आदिवासियों को ही चुकानी पड़ती है। उनकी ‘झूम कृषि’ पर भी प्रतिबंध लगाए जाने से उनकी समस्याएं बढ़ती हैं। 

“नक्सली हिंसा का दमन पुलिस और सुरक्षा बलों के जरिये नहीं किया जा सकता।” 

पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से नक्सली हिंसा एवं मारकाट बढ़ी है, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि नक्सल आंदोलन अब आतंकवाद का स्वरूप लेता जा रहा है। नक्सलियों ने जहां देश में सक्रिय अनेक आतंकवादी संगठनों से गठजोड़ कर रखा है, वहीं इस समस्या से जुड़ा एक चिंतनीय पहलू यह भी है कि हमारे कुछ पड़ोसी देश भी भारत में इस समस्या को और भयावह बनाने में नकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। चीन, नेपाल एवं पाकिस्तान वे पड़ोसी देश हैं, जिनके द्वारा नक्सलियों को मदद पहुंचाए जाने की पुष्ट खबरें भारत की सुरक्षा एजेंसियों के पास हैं। यह दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे पड़ोसी देश ही हमारी पीठ में छुरा भोंक रहे हैं। 

माओवादी पार्टी की गुरिल्ला आर्मी पंजाब, कश्मीर के आतंकवादी संगठनों अथवा श्रीलंका के लिट्टे की तरह भले उतनी संगठित न हो, लेकिन विशाल क्षेत्र में उनका फैलाव अपने आप में बडी चनौती है। नयी गौरतलब बात यह है कि पहले जहां उनके निशाने पर जमींदारों, सूदखोरों, पुलिस मुखबिरों और घोर-दक्षिणपंथी समूहों के चुनिंदा प्रतिनिधि हआ करते थे, अब उनकी हिंसा सीधे-सीधे राज्य-मशीनरी के प्रतिनिधियों के खिलाफ केंद्रित हो रही है। पुलिस थानों पर हमले हो रहे हैं, जिलों के शास्त्रागार लूटे जा रहे हैं, जेल तोड़े जा रहे हैं, ट्रेनें रोकी जा रही हैं और बड़े खूखार तरीके से राज्य मशीनरी के प्रतिनिधियों पर हमले हो रहे हैं। माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो की यह रणनीति है कि एक तरफ नये-नये क्षेत्रों में गुरिल्ला युद्ध का विस्तार करके शत्रु ताकतों (राज्य मशीनरी) की मुश्किलें बढ़ायी जायेंगी तो दूसरी तरफ पहले के बने आधार क्षेत्रों में सशस्त्र प्रतिरोध को और तेज किया जायेगा ताकि उन्हें वहां से बिखरने और हटने पर मजबूर किया जा सके। यहां तक कि मौजूदा दौर के गहरे आर्थिक संकट का लाभ उठाकर अपने कैडरों में बड़े पैमाने पर नयी भर्तियां करने का अभियान चलायेंगे। ऐसे में सैन्य दबावों के जरिये इस आंदोलन का मुकाबला करने के मंसूबे कोई अनुकूल परिणाम नहीं देने वाले हैं। हो सकता है दमन तेज करके कुछ समय के लिए आत्मरक्षात्मक स्थिति में डाल दिया जाय, किंतु यह कोई स्थायी हल नहीं होगा। ‘एक कदम आगे, दो कदम पीछे’ की रणनीति के कुशल खिलाड़ी होने का राजनीतिक प्रशिक्षण उन्हें पहले से प्राप्त है। अतः कोई शार्टकट नहीं चल सकता। दूसरे चूंकि उनका जनाधार इस देश के बड़े जन-समुदायों के बीच में ही है इसलिए अंधराष्ट्रवादी तरीके से भी उन्हें कतई अलगाव में नहीं डाला जा सकता। उनकी विचारधारा सर्वथा धर्म-निरपेक्षतावादी है। यही कारण है कि देश की विभाजनकारी अंधराष्ट्रवादी शक्तियां अपनी कुशल संगठन शक्ति के बावजूद इन आदिवासी इलाकों में अब तक अपनी पैठ नहीं बना सकी हैं। 

नक्सली हिंसा का दमन पुलिस और सुरक्षा बलों के जरिये नहीं | किया जा सकता। इस मर्ज की एक ही दवा है और वह है ऐसा विकास, जिसमें आदिवासियों, पिछड़ों और वंचितों की समुचित | भागीदारी सुनिश्चित हो और इन्हें यह कहीं से न लगे कि इनके हकों | पर डाका डाला जा रहा है। अब केंद्र सरकार ने इस दिशा में ध्यान | देना भी शुरू किया है। केंद्र व नक्सलवाद से प्रभावित राज्य सरकारों को यह पता चल चुका है कि नक्सली हिंसा की चुनौती से निपटने के लिए नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को धार देकर गतिरोध को दूर किया जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखकर ही एक समन्वित कार्ययोजना (Integrated Action Plan-IAP) चुने हुए 83 आदिवासी और पिछड़े जिलों में विकासात्मक कार्यों हेतु शुरू की जा चुकी है। इसे प्रभावी बनाने के लिए स्कूलों के लिए भवन निर्माण, आंगनबाड़ी केंद्र, पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराना, ग्रामीण सड़कों, पंचायत भवनों, सामुदायिक केंद्रों, गोदामों का निर्माण, आजीविका हेतु विभिन्न गतिविधियां, कौशल निर्माण हेतु प्रशिक्षण, लघु सिंचाई कार्य, ग्रामीण विद्युतीकरण, स्वास्थ्य केंद्रों एवं सुविधाओं का निर्माण एवं संचालन आदि गतिविधियां चलाई जा रही हैं। आश्रम स्कूल, शौचालयों का निर्माण, बहुउद्देश्यीय चबूतरे का निर्माण, यात्री प्रतीक्षालयों का निर्माण, विद्यार्थियों के लिए विशेष कोचिंग कक्षाएं चलाना, खेल के मैदानों का निर्माण आदि गतिविधियां भी इसमें शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़कों द्वारा संपर्क की दशा अत्यंत खराब होती है। इस वास्तविकता को समझते हुए केंद्रीय ग्रामीण मंत्रालय ने योजना में सम्मिलित सभी जिलों के सभी क्षेत्रों को सड़कों से जोड़ने का लक्ष्य बनाया है। 

रोजगार, निर्धनता और नक्सलवाद से लड़ने का सबसे बड़ा हथियार है। इसे ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (National Rural Livelihood Mission-NRLM) के अंतर्गत 3,00,000 युवकों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया है। इसी प्रकार महिला स्वसहायता समूहों (SHGs) के मध्य से लघ वन उत्पादों के मूल्यवर्द्धन हेतु सार्वजनिक-निजी सहभागिता (PPP) पहल की भी शुरुआत की गई है। 

नक्सलियों को विकास के माध्यम से हिंसा के रास्ते से हटाने की जो पहले की जा रही हैं, उनमें इस समस्या से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों के स्वामित्व, नियोजन तथा कार्यान्वयन के अधिकार पर विशष बल दिया जा रहा है। यह भी आवश्यक है कि नक्सल प्रभावित क्षत्रा में काम कर रही विभिन्न एजेंसियों में परस्पर सहयोग व समन्वय बढ़ तथा इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान दिया जाए, ताकि सरकार द्वारा लागू योजनाओं और नवीन पहलों का सर्वोत्तम परिणाम मिल सके। ध्यान देना होगा कि नक्सलवाद से लड़ने में सबसे कारगर होगा कि इन लोगों का विकास स्थानीय लोगों को विकासात्मक कार्यों में शामिल करके किया जाए। 

निश्चय ही ये विकासात्मक कार्य इन क्षेत्रों के पिछड़ेपन को दूर करने में सहायक होंगे। इसके साथ इन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास तथा उनके प्रति लोगों की विश्वास बहाली का भी प्रयास होना चाहिए। इसके साथ ही उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल होने तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से अपनी बात रखने के लिए प्रेरित करने वाले प्रयास होने चाहिए। ऐसा करके ही हम नक्सलवाद की समस्या को निष्प्रभावी बना सकते हैं। 

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