भारत में आपदा प्रबंधन पर निबंध | प्राकृतिक आपदा प्रबंधन पर निबंध

भारत में आपदा प्रबंधन पर निबंध

भारत में आपदा प्रबंधन पर निबंध अथवा प्राकृतिक आपदा प्रबंधन पर निबंध अथवा भारत की पहली राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना अथवा अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाएं एवं सामाजिक राजनीतिक भूमिका (यूपी पीसीएस (मुख्य परीक्षा), 2017 )

प्रकृति जब कुपित होती है, तो फिर उसके आगे मनुष्य की एक नहीं चलती। महाविनाश का एक ऐसा तांडव शुरू होता है कि मानवता कराह उठती है। प्रकृति के कोप ‘खंड प्रलय’ जैसे होते हैं, जो कहर ढाते हैं। इनकी विनाशलीला के सामने हम बेबस हो जाते हैं। प्रकृति का प्रकोप किसी भी रूप में सामने आए, इसका परिणाम एक ही होता है-तबाही। यह सच है कि प्राकृतिक आपदाएं हमारे वश में नहीं हैं, अतएव इन्हें रोका नहीं जा सकता, किंतु आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर हम खुद को मजबूत बनाकर होने वाली तबाही को काफी कुछ कम कर सकते हैं। यदि हमारे पास पूरी तैयारी हो, तो हम प्राकृतिक आपदा से हीन वाल विनाश से खुद को बहुत हद तक बचा सकते हैं। 

भारत में आपदा प्रबंधन पर निबंध

यह कहते हुए हिचक नहीं होती है कि आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर हम बेहद कमजोर हैं। आपदा प्रबंधन की कोई ठोस प्रणाली व रणनीति विकसित न कर पाने के कारण हम प्राकृतिक आपदाओं के समय बेबस और असहाय नजर आते हैं। प्राकृतिक आपदा चाहे कहीं की हो, जब-जब हम इनसे प्रभावित होते हैं, तब-तब हमारे यहां आपदा प्रबंधन पर सवालिया निशान लगते हैं। हमें तो आपदा प्रबंधन के ऐसे ठोस उपाय करने चाहिए कि उनके माध्यम से हम भारत को आपदा मुक्त देश बना सकें। 

भारत प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील देश है। यहां प्राकृतिक आपदाएं आती भी खूब हैं। विदित हो कि भारत में सतपुड़ा तथा विन्ध्य पहाड़ियों के सहारे भ्रंश घाटी पायी जाती है। सतपडा के दक्षिण स्थित भ्रंश घाटी में ताप्ती नदी तथा सतपुड़ा के उत्तर एवं विन्ध्य पहाड़ियों के दक्षिण स्थित घाटी में नर्मदा नदी प्रवाहित होती है। इन भ्रंश घाटियों के स्थित होने के कारण गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में भूकंपीय घटनाएं घटित होती रहती हैं। हिमालय क्षेत्र भी भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। इसी प्रकार. भारत की तटीय क्षेत्र सीमा 7516 किमी. है, जिसमें से 5716 किमी. का क्षेत्र सघन चक्रवात से प्रभावित है। बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में लगभग 5-6 चक्रवात प्रतिवर्ष जन्म लेते हैं। पश्चिमी घाट की अपेक्षा पूर्वी घाट चक्रवात के प्रति काफी संवेदनशील है। पूर्वी घाट पर स्थित तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, पुदुचेरी चक्रवात के प्रति अति संवेदनशील हैं। देश के कुल क्षेत्रफल का लगभग 9% भाग चक्रवात प्रभावित है। एक अनुमान के अनुसार, 13 तटीय राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों की 32 करोड़ जनसंख्या चक्रवात संबंधी आपदा के प्रति संवेदनशील है। भारत में बाढ़ एक प्रमुख प्राकृतिक आपदा के रूप में प्रत्यक्ष होती 

‘धक बारबारता असोम में पाई जाती है। क्योंकि बंगाल की मानसूनी शाखा असोम में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र एवं सूरमा घाटी के मध्य फंस जाती है तथा घाटियों की ढालों से टकरा-टकरा कर अपनी संपूर्ण आर्द्रता वर्षा के रूप में गिरा देती है। भारत के पूर्वी स्थित राज्यों में जिनकी समुद्र तल से ऊंचाई 100 मी. से कम हैं ऐसे क्षेत्रों में बाढ़ की संभावनाएं अधिक प्रबल होती हैं। इस क्षेत्र में पूर्वी उ. प्र., बिहार, प. बंगाल, उत्तर-पूर्वी उड़ीसा इत्यादि क्षेत्र शामिल ह। अरब सागर की मानसूनी शाखा से महाराष्ट्र के मुम्बई में बाढ़ का प्रकोप आता है। 

प्राकृतिक आपदाओं की होने वाली बार-बार की मार को देखते हुए भारत में आपदा प्रबंधन की आवश्यकता को महसूस तो किया गया है, किंतु जरा देर से अब इस दिशा में प्रयास शुरू हुए हैं। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहल केंद्र सरकार द्वारा जून, 2016 में देश की पहली ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना’ जारी कर की गई है। ध्यातव्य है कि इससे पूर्व देश में कोई भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना अस्तित्व में नहीं थी। इस योजना का उद्देश्य जहां देश को आपदाओं से निपटने, उन्हें सहने तथा जोखिमों को कम करने में सक्षम बनाना है, वहीं सरकार के साथ-साथ सामुदायिक स्तर पर आपदाओं से होने वाले जान-माल के नुकसान को कम-से-कम करना एवं आजीविकाओं को प्रभावित होने से बचाना है। खास बात यह है कि इस राष्ट्रीय योजना के प्रावधान आपदा जोखिम शमन पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय सेंडाई फ्रेमवर्क 2015-2030 के अनुरूप बनाए गए हैं। इस योजना में आपदाओं से निपटने के उपायों को मुख्य रूप से जिन 18 श्रेणियों में रखा गया है, उनमें सम्मिलित हैं-पूर्व चेतावनी, उपग्रह से मिले आंकड़ों का अध्ययन, जानकारी का प्रचार, लोगों व पशुधन को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना, चिकित्सा देखभाल, आपदा के बाद पेयजल एवं सफाई सुविधा उपलब्ध कराना, खाद्य एवं आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, संचार व्यवस्था की बहाली, प्रभावित लोगों के लिए अस्थायी आवास, बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना, परिवहन के साधन उपलब्ध कराना, राहत और आपूर्ति प्रबंधन, मृत पशुओं के अवशेषों का निपटान प्रभावित क्षेत्रों में पशुधन के लिए पशुधन को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना, चिकित्सा देखभाल, आपदा के बाद पेयजल एवं सफाई सुविधा उपलब्ध कराना, खाद्य एवं आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, संचार व्यवस्था की बहाली, प्रभावित लोगों के लिए अस्थायी आवास, बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना, परिवहन के साधन उपलब्ध कराना, राहत और आपूर्ति प्रबंधन, मृत पशुओं के अवशेषों का निपटान प्रभावित क्षेत्रों में पशुधन के लिए चारे की सुविधा, प्रभावित लोगों का पुनर्वास, राहत के तहत रोजगार, संबंधित आंकड़े जुटाना और मीडिया के माध्यम से जरूरी जानकारी का प्रचार-प्रसार करना। इन सब के अलावा इस नीति में विभिन्न सरकारी एजेंसियों एवं गैरसरकारी संगठनों के बीच बेहतर तालमेल पर भी जोर दिया गया है। 

वर्तमान में आपदा प्रबंधन (Disaster Management) के क्षेत्र में नवगठित आपदा प्रबंधन ढांचे के साथ आपदाओं के बारे में जागरूकता लाते हुए जन समुदाय को इससे निपटने के लिए तैयार | किया जा रहा है, जो कि इस क्षेत्र में आज नया उदाहरण प्रस्तुत करता । है। यह ढांचा सुरक्षित भारत का निर्माण करने के राष्ट्र के भावी स्वप्न | को साकार करने में, अन्य क्षेत्रों के साथ मिलकर, अग्रसर है। वस्तुतः | 26 दिसम्बर, 2004 को प्रशांत महासागर में आए सूनामी ने राष्ट्रीय । नेतृत्व के आपदा प्रबंधन विधेयक को पारित कराने में उत्प्रेरक का कार्य किया। इस दिशा में भारत सरकार ने 23 दिसंबर, 2005 को आपदा प्रबंधन अधिनियम (DMAct, 2005) पारित कर एक निर्णायक कदम उठाया। इस अधिनियम के तहत . प्रधानमंत्री के नेतृत्व में “राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण” (NDMA) का गठन किया गया है। मुख्यमंत्रियों के नेतृत्व में “राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों” (SDAAS) का गठन किया गया है, जिससे कि आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में पूर्णतावादी और एकीकृत दृष्टिकोण क्रियान्वित किया जा सके। सभी स्तरों पर आपदा नियंत्रण उपायों के फैलाव को सुनिश्चित करने के लिए समर्थ बनाने वाली इस व्यवस्था को जिलाधीशों के नेतृत्व में “जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों’ (DDMAS) के रूप में प्रस्तावित किया गया है। उल्लेखनीय है कि DDMA के सह-अध्यक्ष जिला परिषदों के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, जिससे कि समुदाय और प्रशासन के बीच समन्वय हो सके। 

उक्त प्रयासों के अलावा भी आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। जहां NDMA की निगरानी, दिशा निर्देश और प्रशासनिक नियंत्रण के अंतर्गत रखे गए विशिष्टीकत बल के रूप में 10 हजार जवानों वाले “नेशनल डिसास्टर रिस्पाँस फोसे” (NDRF) की 8 बटालियन का गठन किया गया है। वहीं भारत के पूर्वी तट पर स्थित तमिलनाडु तथा उड़ीसा में NDRF की एक-एक बटालियन को स्थापित किया गया है। इसी भांति पश्चिमी तट पर स्थित गुजरात और महाराष्ट्र में भी एक-एक बटालियन की स्थापना की गई है। इसी क्रम में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (NIDM) का सृजन क्षमता विकास के लिए किया गया है। यह संस्थान NDMA द्वारा निर्धारित विस्तृत सिद्धांतों और दिशा-निर्देशों के तहत कार्य करेगा। NDMA को सहायता प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक “राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति” (NEC) का गठन किया गया है। NEC में संबंधित 14 मंत्रालयों के सचिवों के अतिरिक्त “चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टॉफ’ भी शामिल है। यह राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण तालमेल को सुनिश्चित करता है। 

राज्य एवं जिला स्तर पर आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों का राज्य एवं जिला प्रशासनिक मशीनरी द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी। यद्यपि आपदा प्रबंधन का विषय राज्य सूची में बना रहेगा, तथापि प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ मानव निर्मित आपदाओं को भी इन संस्थाओं के अधीन रखा गया है। आपदा प्रबंधन की इसी तैयारी के क्रम में भारत ने आपदा प्रबंधन के “ह्यूगो फ्रेमवर्क” पर हस्ताक्षर किए हैं। इतना ही नहीं, भारत द्वारा आपदा जोखिम शमन (Disas ter Risk Reduction) पर सेंडाई फ्रेमवर्क (Sendai Framework) का पूर्णतः और समग्र रूप से क्रियान्वयन किए जाने का भी निर्णय लिया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि 14 से 18 मार्च, 2015 के दौरान जापान के मियागी प्रीफ्रैक्चर के सेंडाई में आपदा जोखिम शमन पर तृतीय संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन (Third UN World Confer ence on Disaster Risk Reduction) का आयोजन किया गया था, जिसमें ‘ह्यूगो रूपरेखा 2005-2015’ के क्रियान्वयन की समीक्षा की गई थी तथा ‘आपदा जोखिम शमन पर सेंडाई रूपरेखा 2015-2030’ को अपनाया गया था। सेंडाई रूपरेखा (Sendai Framework) 2015-2030 एक 15 वर्षीय गैर-बाध्यकारी अंतर्सरकारी समझौता है, जो आपदा जोखिम शमन हेतु राष्ट्रीय सरकारों की केंद्रीय एवं प्राथमिक भूमिका को स्वीकार करने के साथ अन्य हितधारकों यथा-स्थानीय सरकारों एवं निजी क्षेत्र के द्वारा उत्तरदायित्व की भागीदारी का आह्वान करता है। इसके तहत आपदा जोखिम शमन हेतु सात महत्त्वपूर्ण वैश्विक लक्ष्य तय किए गए हैं, जिनमें सर्वप्रमुख लक्ष्य है वर्ष 2030 तक वैश्विक आपदा मर्त्यता को सार्थक रूप से कम करना तथा वैश्विक रूप से प्रभावित लोगों की संख्या में सार्थक रूप से कमी लाना। 

आपदा प्रबंधन की दिशा में प्रभावी उपाय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ही भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पर्वानुमान और समय रहते चेतावनी प्रणाली के बड़े हिस्से का पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा पुनर्गठन किया गया है। केन्द्रीय जल आयोग के साथ समय रहते चेतावनी प्रणाली की क्षमताओं के स्तर के उन्नयन का काम राष्ट्रीय बाढ़ न्यूनीकरण परियोजना के अंतर्गत किया गया है। सूनामी चेतावनी के लिए हैदराबाद के इंडियन नेशनल सेंटर फॉर ओशन इन्फार्मेशन सर्विसेज (INCOIS) में सूनामी चेतावनी प्रणाली की स्थापना की जा चुकी है। आपदा प्रबंधन की दृष्टि से ही देश में ‘राष्ट्रीय भूकंप जोखिम न्यूनीकरण परियोजना’ (NERMP) का सूत्रपात किया गया है, जिसका उद्देश्य भूकंप के प्रति व्यापक पैमाने पर लोगों को प्रशिक्षित करना है।

वैसे, देश में आपदाओं से निपटने की मुख्य जिम्मेदारी प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ की है, जो कि आपदा से सुरक्षा और भारत निर्माण का दावा भी करता है। इस प्राधिकरण के जिम्मेदार लोगों का यह कहना है कि समग्र, सक्रिय और विभिन्न आपदाओं को समाहित करनेवाली प्रौद्योगिकी आधारित रणनीति बनाई है, जो सरकारी एजेंसियों और गैरसरकारी संगठनों के सामूहिक प्रयासों के जरिये आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालती है, किंतु आपदाओं के समय ये दावे धरे के धरे रह जाते हैं, जैसा कि उत्तराखंड में भी देखने को मिला। ऐसा लगता है कि यह प्राधिकरण अब तक कोई ठोस कार्य योजना तैयार नहीं कर पाया है और थोथे दावों तक ही इसकी भूमिका सीमित रह गई है। देश में आज भी आपदाग्रस्त लोगों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया जाता है। 

आपदा प्रबंधन की ठोस कार्ययोजना कितनी जरूरी है, यह जानने के लिए कुछ समय पूर्व जारी ‘डिजास्टर मैनेजमेंट इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट पर गौर करना आवश्यक है। रिपोर्ट के अनुसार भारत का 85% भाग एक या अधिक आपदाओं के दायरे में आता है। 40  मिलियन हेक्टेयर जमीन बाढ़ के दायरे में आती है तथा भारत के कुल भू-क्षेत्र का 8 प्रतिशत चक्रवात और 68 प्रतिशत सूखे के दायरे में आता है। पिछले एक सौ वर्षों में भारत में बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूस्खलन, भूकंप, तूफान तथा सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं की  संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इससे न केवल जीवन को भारी क्षति हो रही है बल्कि पुनर्वास तथा पुनर्निर्माण के लिए अथाह धन व्यय । करना पड़ रहा है। रिपोर्ट में इसका कारण भौगोलिक परिस्थितियां, | संसाधनों की कमी, आपदाओं के पूर्व प्रबंधन की कमी तथा आपदाओं | के पश्चात् सक्रियता में विलम्ब आदि को बताया गया है। ऐसे में यह | आवश्यक है कि हम ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ को ‘सफेद हाथी’ न बनने दें और इसे इस प्रकार सक्रिय करें कि आपदाओं से | तबाही को कम से कम किया जा सके। सरकारी स्तर पर तो ठोस प्रयास आवश्यक ही हैं, जनता को भी इस संबंध में प्रशिक्षित व जागरूक बनाना होगा। इसके लिए कितना अच्छा होता कि शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से उच्च स्तर तक आपदा प्रबंधन को अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए।

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC  

वर्तमान विषयों पर हिंदी में निबंध

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

13 − 9 =