राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिकता पर निबंध |Essay on nationality and communalism

राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिकता पर निबंध |Essay on nationality and communalism

राष्ट्रीयता एवं साम्प्रदायिकता-Essay on nationality and communalism 

किसी भी राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को प्रभावित करने वाले तत्वों में साम्प्रदायिकता प्रमुख है. साम्प्रदायिकता के प्रवेश से राष्ट्रीयता उसी प्रकार प्रभावित होती है, जिस प्रकार रोगाणुओं के प्रवेश से स्वस्थ शरीर. इस प्रकार राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता दो परस्पर विरोधी शब्द है, जहाँ साम्प्रदायिकता विद्यमान है, वहाँ राष्ट्रीयता को चुनौती है और जहाँ राष्ट्रीयता प्रबल है, वहाँ साम्प्रदायिकता नहीं है. 

राष्ट्रीयता मन की वह अवस्था है, जिसमें व्यक्ति की सर्वोपरि कर्तव्यनिष्ठता राष्ट्र के प्रति अनुभव की जाती है. राष्ट्रीयता की भावना लोगों को आपसी भेदभाव भुलाकर राष्ट्रीय हित में मिलकर रहने की प्रेरणा देती है. राष्ट्रीयता में व्यक्ति राष्ट्र की भौगोलिक, जातीय, भाषायी, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं ऐतिहासिक एकता के प्रति व्यक्तिगत रूप से कर्तव्यनिष्ठ रहता हुआ आध्यात्मिकता की भाँति इसमें अलौकिक समर्पण भाव रखता है. 

साम्प्रदायिकता वह मनोभाव है जब व्यक्ति जाति, धर्म, क्षेत्र आदि को गौण एवं हीन भावना से ग्रहण कर राष्ट्रीयता को ताक में रखता हुआ एक दूसरे के खून का प्यासा बन जाता है, वह राष्ट्रीयता के साथ-साथ मानवता को भी भूल जाता है. साम्प्रदायिकता में धर्म का अनुचित शोषण किया जाता है. किसी धर्म अथवा धार्मिकता के प्रति प्रतिबद्धता साम्प्रदायिकता नहीं है, परन्तु धर्म अथवा धार्मिक व्यवस्था में निहित स्वार्थ के लिए दुरुपयोग साम्प्रदायिकता है. किसी विशेष धार्मिकता से लगाव साम्प्रदायिकता नहीं, अपितु एक धार्मिक सम्प्रदाय को अन्य धार्मिक सम्प्रदाय अथवा राष्ट्र के विरुद्ध प्रयोग करना साम्प्रदायिकता है. इस प्रकार साम्प्रदायिकता स्वार्थबद्ध हीन मानसिक भावों का प्रकटीकरण है. व्यवहार में साम्प्रदायिकता हिन्दुओं और मुसलमानों के मजहबी भेदभाव को कहा जाता 

साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीयता को किस प्रकार प्रभावित करती है, उसे हम निम्नलिखित बिन्दुओं पर विचार करके स्पष्ट करते हैं. 

एकता एवं अखण्डता को चुनौती– साम्प्रदायिकता एक विघटनकारी प्रवृत्ति है जो राष्ट्रीयता के तत्वों में सेंध लगाकर उसकी अट्टालिकाओं को डगमगा देती है. विश्व के कई राष्ट्र जैसे-कोरिया, रूस, भारत, जर्मनी आदि का विभाजन इस वृत्ति का दुष्परिणाम है. भारत में साम्प्रदायिकता से राष्ट्रीयता सदैव प्रभावित रही है. ब्रिटिश उपनिवेशवाद का मूलाधार ही ‘बाँटो एवं राज करो’ की धूर्ततापूर्ण नीति का रहा था. 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना करवा कर लॉर्ड कर्जन ने हिन्दू-मुसलमानों में पृथकता के बीज बो दिए गए. 1909 में मार्ले-मिन्टो अधिनियम में मुसलमानों के पृथक् निर्वाचन की माँग स्वीकार कर ली. साम्प्रदायिकता के इस बीज ने इतना विशाल एवं विनाशकारी वृक्ष का रूप ले लिया जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय अस्मिता एवं अखण्डता की जड़ें हिल गईं और राष्ट्र अपनी अखण्डता से हाथ धो बैठा. जब 14/15 अगस्त, 1947 को भारत से पाकिस्तान अलग हो गया. स्वतंत्रता के पश्चात भी राष्ट्र आज भी साम्प्रदायिकता से जूझ रहा है. आज भी चारों ओर से पृथक् राज्यों की आवाज उठ रही है. अगर साम्प्रदायिकता इसी तरह पैर फैलाती रही तो राष्ट्र टुकड़ों-टुकड़ों में बँट जाएगा. हिन्दू समाज का विरोध एवं मुस्लिमों का समर्थन ‘राष्ट्रवादी’ बन गया है. 

भेदभाव की वृत्ति हेतु-स्वतंत्रता के पश्चात् यह आशा बँधी थी कि शायद अब साम्प्रदायिकता देश से विदा हो जाएगी, लेकिन राजनीति के रंगीले नेताओं ने इसे और पनपाने एवं वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने हेतु भरपूर सहयोग दिया. इन्हीं लोगों ने राष्ट्रीय अखण्डता को क्षति पहुँचाने वाली मुस्लिम लीग को गले लगाया. उन्हें विशेष आरक्षण सुविधाएं एवं संरक्षण प्रदान कर साम्प्रदायिकता का सम्बन्ध धर्म से कर लिया. वोटों की राजनीति से अब साम्प्रदायिकता हिन्दू-मुसलमानों के बीच ही नहीं, निम्न वर्ग, सवर्ण वर्ग, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक, आदिवासी-ग्रामवासी आदि में विस्तृत हो गई है, जिससे द्वेष भावना पनपी है. समकालीन भारत में साम्प्रदायिकता दो विशिष्ट कारणों से खतरनाक मोड़ ले चुकी है. एक कारण तो इसकी सीमा का शहरी क्षेत्रों को लाँघकर ग्रामीण इलाकों तक प्रसारित होना एवं दूसरा जनआन्दोलनकारी रूप लेना है. ये दोनों परिस्थितियाँ राष्ट्रीयता के लिए घातक हैं. 

राजनीतिक संरक्षण- वर्तमान भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने में राजनेताओं का प्रमुख हाथ है. धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, अल्पसंख्यक एवं भाषायी राज्य के शब्द आज राजनीतिक हस्तक्षेप से अलगाववादी एवं विघटनकारी शब्द बन चुके हैं. भाषायी साम्प्रदायिकता ने आन्ध्र प्रदेश, पंजाब और चण्डीगढ़ में अनेक लोगों के प्राणों को हर लिया. समाजवाद एवं पूँजीवाद ने देश में आर्थिक सम्प्रदायवाद को जन्म दिया. राजनीतिक पार्टियाँ देश निर्माण की बातों में नहीं वोट निर्माण की बातों में उलझ गईं. किसी ने अल्पसंख्यक के नाम पर लोगों को भड़काया तो किसी ने मन्दिर-मस्जिद के निर्माण का लालच दिखलाया. किसी ने समाजवाद का ढोंग बताया तो किसी ने भाषायी पृथकता की डुगडुगी बजाई. किसी ने हरिजनों को पक्ष में किया तो किसी ने पिछड़ों को, किसी भी पार्टी ने बेकारी, गरीबी, महँगाई, साम्प्रदायिकता, जातीय तथा भाषायी विद्वेष को मिटाकर राष्ट्र निर्माण की बात नहीं की. वी. पी. सिंह सरकार का पतन और अटल बिहारी वाजपेयी को समर्थन न देना साम्प्रदायिकता से प्रेरित था. अस्थिर सरकारों का जन्म साम्प्रदायिकता से ग्रसित है, इससे राष्ट्रीयता दूषित होती है. राम-जन्मभूमि, बाबरी मस्जिद का मुद्दा साम्प्रदायिक बनने का कारण राजनीतिक संरक्षण होना है.

1982 एवं 1987 में मेरठ के दंगों में मुस्लिम राजनेताओं ने हिन्दुओं को एवं हिन्दू राजनेताओं ने मुसलमानों को पक्ष में करने की भरपूर कोशिश की. शाहबानो के मामले में मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बदलकर संविधान में संशोधन तक कर लिया. इन्दिरा गांधी सरकार ने नशाबंदी कार्यक्रम में मुसलमानों को पृथक रखा था. साम्प्रदायिक दंगों में तलाशी के दौरान हथियार पाए जाने के बावजूद उन लोगों के नाम उजागर नहीं होते है जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है. इस प्रकार साम्प्रदायिकता राजनीति से प्रेरित है. राजनेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता के प्रति आकर्षण के परिणाम से ही राष्ट्रीय विभाजन हआ था. राजनेताओं को चाहिए कि राष्ट्रीयता के हितों को ध्यान में रखते हुए साम्प्रदायिकता को बढ़ावा न दे वरना इतिहास अपने को दोहराएगा और कलंक उन्हीं के सिर होगा. राजनेताओं द्वारा जो भारत बन्द, शहर बन्द का आयोजन किया जाता है वह राष्ट्रीय उत्पादन को तो घटाता ही है व्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. इससे राष्ट्र की आन्तरिक सुरक्षा प्रभावित होती है जो राष्ट्रीयता के विपरीत है. 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रभाव-भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सदैव-प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग एवं साम्प्रदायिक सदभाव प्रोफेसर मुहम्मद हबीब ने अपने लेख–’मध्य काल में हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध में इस बात की पुष्टि की है. अफगानी सिपाहियों का एक दस्ता तराइन की लड़ाई में राय पिथौरा के अधीन रहकर लड़ा था. मुसलमानों की एक पैदल सेना ने पानीपत की लड़ाई में मराठों की मदद की थी. रानी कर्णवती ने अपने सहयोग हेतु- हुमायूँ को राखी भेजी थी, अकबर का विवाह जोधाबाई के साथ कर दिया गया था. भारत-पाक युद्धों में एवं भारत-चीन युद्ध में हिन्दू-मुसलमानों ने आपसी भेद मिटाकर राष्ट्र की सुरक्षा एवं अखण्डता के लिए एक भारतीय के रूप में अदभुत परिचय दिया है, फिर क्यों इन साम्प्रदायिक दंगों में क्षणिक उन्माद के कारण हम पागल बन जाते हैं? वर्षों से अच्छे पड़ोसी की तरह, प्रायः भाई की तरह रह रहे हम लोग यकायक क्यों एक-दूसरे के जान-माल के ग्राहक बन जाते हैं? अगर हम अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को विस्मृत कर लड़ते रहे तो हमारा प्रेमपूर्ण इतिहास भी कलंकित होगा ही, राष्ट्रीयता भी खतरे में पड़ जाएगी. 

जन-धन एवं राष्ट्रीय सम्पत्ति की हानि -साम्प्रदायिकता से जन-धन एवं राष्ट्रीय परिसम्पत्ति की व्यापक रूप से हानि होती है. पाक-भारत विभाजन के समय हजारों की संख्या में लोग मारे गए थे. खुशवन्त सिंह कृत-Train to Pakistan’ में इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं. स्वतंत्रता के पश्चात् भी देश में हुए व्यापक साम्प्रदायिक दंगों से लाखों करोड़ों के जान-माल एवं जन-धन की क्षति होती है. आज साम्प्रदायिक दंगों के परिणाम स्वरूप देश के किसी-न-किसी शहर में कफ्यूँ या धारा-144 लागू ही रहती है. हाल ही में कोयम्बटूर में हुए बम विस्फोट एवं रेल बम विस्फोट में राष्ट्रीय सम्पत्ति की बहुत हानि हुई है. जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पण्डितों की हत्या साम्प्रदायिकता का ही परिणाम है. 

साम्प्रदायिकता के परिणामस्वरूप ही राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर को हानि पहुँचती है. विभिन्न प्रकार की स्थापत्य कला, चित्र-कला एवं प्राचीन धरोहरों को साम्प्रदायिकता के कारण नष्ट होना पड़ा है. इस प्रकार यह दंगे पर्यटन व्यापार की दृष्टि से राष्ट्र विरोधी हैं. 

विदेशों से प्रतिकूल सम्बन्ध-साम्प्रदायिकता से न केवल राष्ट्रीय सम्पत्ति एवं सम्बन्ध प्रभावित होते हैं, अपितु इससे विदेशी सम्बन्धों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. जो राष्ट्रीय विकास में बाधक है. बाबरी ढाँचा गिराने के समय देश को विभिन्न इस्लामी राष्ट्रों से विपरीत प्रतिक्रिया झेलनी पड़ी थी. भारत-पाकिस्तान में सम्बन्धों के तनाव का प्रमुख कारण साम्प्रदायिकता या इससे सम्बन्धित आतंकवाद ही रहा है. इस प्रकार के विदेशी सम्बन्धों में टकराव से राष्ट्रीय छवि प्रभावित होती है… 

साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता– भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ-सर्व धर्म सम्मान, अर्थात किसी भी धर्म को बाँटे बिना सभी धर्मों का सम्मान करना है, न कि किसी धर्म विशेष या धर्म के प्रति उदासीनता, लेकिन यह शब्द बड़ा विवादास्पद बन गया. इसने सम्पूर्ण धार्मिक पृष्ठभूमि को कलंकित किया है. जब भी साम्प्रदायिक दंगे होते हैं तो धर्म के नाम पर होते हैं. लेकिन वास्तविक दृष्टि से देखें तो कोई भी धर्म या धर्मग्रन्थ हमें-द्वेष, विद्रोह एवं असहिष्णुता का उपदेश नहीं देता. साम्प्रदायिक उन्माद में पागल हुए लोग हमारे धर्मग्रन्थों एवं महापुरुषों को कलंकित करते हैं, जबकि ये हमें सहिष्णुता की शिक्षा देते हुए राष्ट्रीयता के निर्वाहन के प्रति कटिबद्ध करते हैं. 

उपर्युक्त विवेचन द्वारा हम पाते हैं कि साम्प्रदायिकता के मूल में लोगों की भावनाएं कम हैं, लेकिन उनको अपने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने हेतु भड़काने वालों का हाथ प्रमुख है. साम्प्रदायिक दंगों के कारण जन, धन, राष्ट्रीय सम्पत्ति आदि को जो क्षति पहुँचती है एवं उसके फलस्वरूप प्रगति में जो राष्ट्रीय अवरोध उत्पन्न होते हैं उसके लिए प्रत्येक भारतीय दोषी एवं उत्तरदायी है. अगर हम यूँ ही धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर या मन्दिर-मस्जिद के नाम पर लड़ते-झगड़ते रहे तो न देश रहेगा न हिन्दू रहेंगे, न मुसलमान रहेंगे, केवल मन्दिर-मस्जिदों के खण्डहर शेष रह जाएंगे. अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी राष्ट्रीय धारा से जुड़कर साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करें, ताकि राष्ट्र का अविराम विकास हो सके. सम्प्रदायों को राजनीति के वोट बैंक बनाने की प्रक्रिया तत्काल समाप्त की जानी चाहिए. 

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