राष्ट्रवाद पर निबंध |Essay on Nationalism

राष्ट्रवाद पर निबंध

राष्ट्रवाद पर निबंध |Essay on Nationalism

रह-रह कर हमारे देश में कुछ ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं, जिनके कारण राष्ट्रवाद का प्रश्न नए सिरे से बहस के केन्द्र में आ जाता है। राष्ट्रवाद का क्या मतलब है, इस पर गर्मागर्म बहस छिड़ जाती है। इस बहस के बीच एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या राष्ट्रवाद और लोकतंत्र का सह-अस्तित्व संभव है ? चूंकि भारत एक बहुभाषा-भाषी, सांस्कृतिक बहुलतावादी एवं भिन्न-भिन्न जातीयता वाला देश है, अतएव यहां के संदर्भो में राष्ट्रवाद की व्याख्या और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इस व्याख्या की तह में जाने से पूर्व परिभाषा एवं अवधारणा के स्तर पर राष्ट्रवाद को समझ लेना आवश्यक है। 

“वस्तुतः राष्ट्रवाद (Nationalism) ऐसे विचारों में विश्वास है, जिससे राष्ट्र की एकता और राष्ट्रहित को बल मिलता है। कुछ समान आधारों के अनुसार लोगों में एकता की भावना का विकास राष्ट्रत्व और राष्ट्रीयता को पैदा करता है।” 

राष्ट्रवाद का सर्वप्रथम उद्गम यूरोप में 18वीं शताब्दी में हुआ था। यूरोपीय राष्ट्रवाद की उत्पत्ति चर्च के तानाशाही रवैये के खिलाफ और औपनिवेशिक शक्तियों को उखाड़ फेंकने की प्रक्रिया के रूप में हुई थी। 

वस्तुतः राष्ट्रवाद (Nationalism) ऐसे विचारों में विश्वास है, जिससे राष्ट्र की एकता और राष्ट्रहित को बल मिलता है। कुछ समान आधारों के अनुसार लोगों में एकता की भावना का विकास राष्ट्रत्व और राष्ट्रीयता को पैदा करता है। प्रायः ये आधार होते हैं- धर्म, अर्थव्यवस्था, राजनीति, भाषा एवं संस्कृति आदि। राष्ट्रवाद के अनेक रूप हो सकते हैं तथा अलग-अलग देशों के लिए इसके अलग अलग मायने भी हो सकते हैं। चूंकि यहां संदर्भ भारत का है, अतएव यह रेखांकित करना आवश्यक है कि स्वतंत्रता से पूर्व भारत में राष्ट्रवाद का अभिप्राय विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करना था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में राष्ट्रवाद के मायने बदल गए। भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राष्ट्रवाद का अभिप्राय राष्ट्रीय एकता में निष्ठा रखना तथा जाति, धर्म, प्रांत आदि के संकीर्ण दायरों से ऊपर उठकर देश की चतुर्मुखी आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उन्नति करने का प्रयास हो गया है। 

यह सर्वविदित है कि वर्तमान समय में हम भारत के राष्ट्रवाद के जिस स्वरूप को देख रहे हैं, वह स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का राष्ट्रवाद है, जिसमें राष्ट्रीय एकता में निष्ठा रखने का भाव सर्वोपरि है। इस भाव को बनाए रखने के लिए जो आवश्यक अवयव हैं, वे हैं देशभक्ति, लोकतंत्र एवं संविधान के प्रति अटूट आस्था, लोक मंगल की कामना एवं भिन्नता में एकता की भावना। इन बातों के अलावा भारत के राष्ट्रवाद का एक आधार ‘असहमति के सम्मान’ का भाव भी है, जो कि स्वस्थ लोकतांत्रिक सोच का हिस्सा है। ‘असहमति के सम्मान’ के भाव के संदर्भ में यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि विविधताओं से परिपूर्ण भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। स्वाभाविक है कि ऐसे देश में राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था पर सभी लोगों की सोच एक जैसी नहीं होगी। उसमें भिन्नता होगी। यह आज का चलन नहीं है, प्राचीनकाल से भारतीय शिक्षा और दर्शन में यह परंपरा रही है और इसी परंपरा ने भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत बनाया है और उसे ताकत प्रदान की है। इस देश में हर कोई अपनी रुचि एवं इच्छा जाहिर कर सकता है। यही एक गुणलोकतंत्र को निरंकुश शासन से अलग करता है। लोकतंत्र में जहां विचारों को व्यक्त करने की आजादी होती है, वहीं इसमें नागरिकों के मौलिक अधिकार भी संरक्षित रहते हैं। यही कारण है कि एक स्वस्थ एवं समृद्ध लोकतंत्र में असहमति के सम्मान को राष्ट्रवाद के अवयव के रूप में देखा जाता है। यही वह अवयव है, जो हमारे राष्ट्रवाद को उग्र राष्ट्रवाद से अलग कर उसे सौम्य और सच्चे राष्ट्रवाद का दर्जा दिलाता है। यहां विचारधाराओं के विस्तार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एवं विचारों को प्रोत्साहन देने के संदर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इसमें हिंसा एवं अराजकता तथा असंवैधानिक तौर-तरीकों का कोई स्थान नहीं है। यह याद रखना चाहिए कि एक लोकतांत्रिक देश का सबसे पवित्र ग्रंथ ‘संविधान’ है और संविधान से विमुखता राष्ट्रवाद से नाता तोड़ने जैसा है। 

हमारे देश में आम भारतीय नागरिक न सिर्फ राष्ट्रवाद के मतलब को बखूबी समझता है, बल्कि वह राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत भी है। यही कारण है कि वह राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए जहां सदैव देश की तरक्की के बारे में सोचता है, वहीं देश की तरक्की की कामना करता है। संकट की घड़ी में हर सच्चे हिन्दुस्तानी को यथासामर्थ्य राष्ट्र के लिए योगदान करते देखा जाता है। ऐसे मौकों पर वो भिन्नताएं भी प्रभावहीन हो जाती हैं, जो भाषाई, धार्मिक एवं साम्प्रदायिक स्तर पर हमारे देश में विद्यमान हैं। यह एकता इसलिए देखने को मिलती है, क्योंकि भारतीय राष्ट्रवाद का विकास प्रश्नों, प्रतिप्रश्नों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले दर्शन के साथ हुआ है। हमारा लोकतंत्र भारतीय राष्ट्रभाव की मौलिक प्राणचेतना है और इसमें लोकतंत्र की आत्मा निहित है। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि भारत का राष्ट्रवाद, पाकिस्तान के राष्ट्रवाद से भिन्न है। हमारा राष्ट्रवाद धार्मिक कट्टरता एवं असहिष्णुता पर आधारित नहीं है। यह तो सहिष्णुता, धर्मनिरपेक्षता, भाई-चारे, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं देशभक्ति पर आधारित है। इसीलिए भारतीय राष्ट्रवाद में असहमति को भी सम्मान दिया जाता है। यही कारण है कि हमारा राष्ट्रवाद विकार रहित है। दूसरी तरफ हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान का राष्ट्रवाद एक त्रुटिपूर्ण सिद्धांत पर कायम है। इसका प्रतिकूल प्रभाव भी सामने है। पाकिस्तान जहां कट्टरपंथी ताकतों का गढ़ बन गया है, वहीं वैश्विक आतंकवाद का एक ऐसा केन्द्र-बिंद बन गया है. जिससे दुनिया खतरा महसूस कर रही है। विश्व बंधुत्व एवं सभी के सुखी रहने की कामना के प्राचीन आदर्शों पर टिका भारत का राष्ट्रवाद विकार रहित है। यह जहां अतीत के गौरव को साझा करता है, वहीं वर्तमान में राष्ट्र के लिए अधिक से अधिक बेहतर करने की मंशा रखता है, जिसमें लोक मंगल एवं मानव कल्याण की भावना सम्मिलित रहती है। राष्ट्रवाद की सही दिशा भी यही है। 

“हमारे देश में आम भारतीय नागरिक न सिर्फ राष्ट्रवाद के मतलब को बखूबी समझता है, बल्कि वह राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत भी है। यही कारण है कि वह राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए जहां सदैव देश की तरक्की के बारे में सोचता है, वहीं देश की तरक्की की कामना करता है।” 

अब प्रश्न यह उठता है कि जिस राष्ट्र का राष्ट्रवाद इतना मूल्यपरक, उज्ज्वल एवं सौम्य हो, वहां इसके निहितार्थ को संकीर्ण या खतरनाक ठहराने की कवायदें क्यों शुरू होती हैं और क्यों देखते ही देखते राष्ट्रवाद का मतलब बहस तलब हो जाता है ? इस परिप्रेक्ष्य में यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि हमारे देश में कभी भी आम हिन्दुस्तानी द्वारा न तो राष्ट्रवाद के निहितार्थ को संकीर्ण या खतरनाक ठहराने की कवायदें शुरू की जाती हैं और न ही वह राष्ट्रवाद के मतलब पर लंबी-चौड़ी जिरहें करना पसंद करता है। वह तो जनतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखते हुए राष्ट्र निर्माण, राष्ट्र की सुरक्षा, एकता एवं अखंडता तथा राष्ट्रीय हितों के बारे में सोचता है तथा अपनी क्षमता के अनुरूप करता भी है। इस सब के बीच उसे राष्ट्रवाद का मतलब जानने की कोई फुरसत नहीं होती है। 

इसे विडंबना ही कहेंगे कि हमारे देश में कुछ बुद्धिजीवी एवं राजनीतिज्ञ उस समय राष्ट्रवाद को जेरे बहस बना देते हैं, जब एक आम हिन्दुस्तानी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों एवं राष्ट्र विरोधी बयानों से आहत होता है। इस पृष्ठिभूमि में आप जेएनयू की भारत विरोधी घटना का उदाहरण सामने रख सकते हैं, जहां एक आतंकवादी को फांसी दिए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया गया तथा ऐसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए, जो कि सरल सोच रखने वाले किसी भी भारतवासी को स्वीकार्य नहीं हो सकते। एक आम हिन्दुस्तानी के नजरिए से देखिए, तो जेएनयू की घटना लज्जाजनक कही जानी चाहिए। भारत के टुकड़े-टुकड़े करने के नारों की भला कौन अनदेखी कर सकता है? अब अगर ऐसी घटनाओं से आम भारतीय जनमानस आहत एवं उद्वेलित होता है, तो राष्ट्रवाद पर बहस छिड़ जाती है और भारतीय राष्ट्रवाद को ‘उग्र राष्ट्रवाद’ ठहराने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं। यह सब कुछ करेला और नीमचढ़ा की कहावत जैसा ही है। पहले तो लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को ठेंगा दिखाकर राष्ट्र प्रेमियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई जाती है, फिर ऐसी संकीर्ण सोच के पैरोकारों द्वारा राष्ट्रवाद को जेरेबहस बना दिया जाता है। 

यह सच है कि हमें अभिव्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, किंतु इस अधिकार की एक लक्ष्मण रेखा भी है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। लोकतांत्रिक समाज में हिंसा या गुंडागर्दी का कोई स्थान नहीं है। अपनी रुचि, इच्छा एवं भावों को व्यक्त करना बुरा नहीं है, किंतु इसके लिए हिंसा या अराजकता का सहारा लेना भी जायज नहीं है। यह सुखद है कि देश में ऐसी अप्रिय स्थितियाँ उत्पन्न होने पर आम हिन्दुस्तानी द्वारा सदैव उस सौम्य और सच्चे राष्ट्रवाद का परिचय दिया जाता रहा है, जिसमें देशभक्ति के साथ ‘असहमति के सम्मान’ का भाव भी निहित है। यही सही जवाब है उन सब के लिए जो अवसर की संवेदनशीलता को नजरअंदाज कर राष्ट्रवाद पर बहस छेड़ते हैं। इसमें उस प्रश्न का जवाब भी शामिल है, जिसमें पूछा जाता है कि क्या राष्ट्रवाद और लोकतंत्र का सह अस्तित्व संभव है? इस जवाब के मर्म को देश के राजनीतिक वर्ग को भी समझना होगा। उन बुद्धिजीवियों को भी समझना होगा, जो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर भी एक खास विचारधारा से उबर नहीं पाते हैं। 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

nine + 2 =