राष्ट्रीय सुरक्षा पर निबंध | Essay on National Security in hindi

राष्ट्रीय सुरक्षा पर निबंध ESSAY ON NATIONAL SECURITY IN HINDI

राष्ट्रीय सुरक्षा पर निबंध | Essay on National Security in hindi

भारत को आजाद हुए 50 वर्ष बीत जाने को हैं, परन्तु स्वतन्त्रता के बाद क्या हमने अपने राष्ट्र की सुरक्षा के बारे में चिन्तन किया है? क्या हमने अपने धर्म ग्रन्थों का, जो हमें राष्ट्रीय एकता के प्रति कटिबद्ध करते हैं, अध्ययन कर मनन किया है? शायद नहीं. अथर्ववेद में लिखा है “मैं अपनी मातृभूमि के लिए और उसके दुःख दूर करने के लिए सब प्रकार के कष्ट सहने को तैयार हूँ. वे कष्ट चाहे जिस ओर से तथा जिस समय आएं, इन्हें चिन्ता नहीं.” ये कथन हमारे धर्मग्रन्थों तक ही सीमित रह गए. उल्टे हमने इन पर जिल्द चढ़ाकर अलमारी में बन्द कर दिया. इसी के परिणामस्वरूप हमको भारत-पाक, भारत-चीन एवं भारत-पाक युद्धों को देखना पड़ा. उस समय चाँदी के चन्द टुकड़ों के लिए देशद्रोह करते हुए कुछ भारतीयों ने बिना संकोच के चीन एवं पाकिस्तान को भोजन सामग्री भेजी थी तथा जासूसी की थी. इसीलिए हमें सुनने को मिला था-भारत जयचन्द एवं मीरजाफरों का देश है, इन्हें गुलाम बनाना आसान है. 

ऐसी स्थिति में हमारे सामने प्रश्न आता है-‘राष्ट्र की सुरक्षा’ का. हमारा देश कैसे सुरक्षित रहे. भारत की सुरक्षा के लिए सर्वप्रथम उसकी सैन्य शक्ति सुदृढ़ एवं शत्रु-हृदय को दहलाने वाली होनी चाहिए. हमारी सरकार को चाहिए कि वह परमाणु शक्ति द्वारा भारत का विकास करे तथा उसके द्वारा चालित अनेकानेक हथियारों को सदैव तैयार रखे साथ ही सुरक्षा के नाम पर बजट में अधिकाधिक धनराशि का प्रावधान किया जाए. हमने प्रक्षेपास्त्र एवं अन्तरिक्ष विज्ञान में पर्याप्त प्रगति कर ली है. हमें अपने ज्ञान को कार्य रूप में परिणत करने के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए. 

क्या केवल सीमाओं की सुरक्षा को ही राष्ट्रीय सुरक्षा कहा जाएगा? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा का दायित्व हमारी सेनाओं का ही है? यदि हम इन दोनों प्रश्नों पर गहनता और गम्भीरता से विचार करें तो पायेंगे कि मात्र सीमाओं की सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा नहीं है, वरन देश में उपस्थित समस्त ऐसी वस्तुओं की सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के अन्तर्गत माना जाएगा, जो राष्ट्र के किसी भी पहलू से किसी भी स्तर पर जुड़ी हो. देश में निवास करने वाला प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उत्तरदायी है. खेतों में काम करने वाला किसान, उद्योगों में काम करने वाला श्रमिक, शासकीय और अशासकीय कार्यालयों में काम करने वाला क्लर्क सभी अपने-अपने स्थान पर सैनिक हैं. सीमा पर तैनात सैनिकों से अधिक उत्तरदायित्व देश के अन्दर काम करने वाले इन लोगों का है. शिक्षा आयोग (1964-66) के अनुसार “कोई भी राष्ट्र अपनी सुरक्षा को केवल पुलिस एवं सेना को नहीं सौंप सकता है. बहुत बड़ी सीमा तक राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार-“नागरिकों की शिक्षा, विभिन्न बातों का उनका ज्ञान, उनका चरित्र, उनकी अनुशासन की भावना और सुरक्षा के कार्यों में कुशलता से भाग लेने की उनकी योग्यता” इन लोगों के चरित्र से ही देश का भाग्य जुड़ा होता है. हम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए निम्नांकित बिन्दुओं पर चिन्तन कर सकते हैं 

(1) क्षेत्रवाद- यह विभिन्नताओं का उत्पाद है. राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के फलस्वरूप अनेक क्षेत्रों में अलगाव का मनोभाव बढ़ा हुआ है. महाराष्ट्र में एक विदर्भ या मराठवाड़ा, गुजरात में सौराष्ट्र, बिहार में एक झारखण्ड, म.प्र. में एक छत्तीसगढ़, उ. प्र. में एक उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल में एक गोरखालैण्ड तथा जम्मू-कश्मीर में एक लद्दाख की माँग इसी मनोवृत्ति का परिणाम है. क्या इन राज्यों के निर्माण पर देश की एकता और अखण्डता पर प्रश्नचिह्न नहीं लगेगा? क्या भारत की स्थिति रूस की भाँति नहीं हो जाएगी? एक समय था जब 1905 में बंगाल विभाजन के समय पूरा देश इसके विरोध में उठ खड़ा हुआ था, परन्तु आज इस प्रकार की दुर्घटनाएं हमारे मर्म को स्पर्श नहीं करती हैं. यह कैसी विडम्बना है कि अब हम ही पृथक राज्यों की मांग कर रहे हैं जो देश को दुर्बल बनाने की दिशा में एक कदम ही कहा जाएगा. 

(2) जातिवाद और साम्प्रदायिकता- भारत बहु जातीय एवं बहु धार्मिक लोगों की गौरवमयी स्थली है, लेकिन आज इसी धरती पर वोटों की राजनीति के नाम पर नित्य नए विभाजन की माँगें उठ रही हैं. इन्हें कभी धर्म के नाम पर सुरक्षित स्थल चाहिए तो कभी अल्पसंख्यकों के वोटों के लिए संविधान में प्रावधान. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इन्हीं राजनीतिज्ञों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए लोगों की आँखों में धूल झोंक कर जातीय विद्वेष भड़काए. कभी आरक्षण के नाम पर जातीय भेदभाव उत्पन्न किया तो कभी राम जन्म भूमि का विवादास्पद मुद्दा उठाकर साम्प्रदायिकता को न्यौता दिया तथा राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता को ठुकराना चाहा. आज इन्हीं जातीय एवं धार्मिक विद्वेष से ऊपर उठकर राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति चिन्तन करने की आवश्यकता है. 

(3) भाषावाद-यहाँ पर 1,652 के लगभग बोलियाँ बोली जाती हैं. ऐसे में एक सशक्त सम्पर्क भाषा तथा राष्ट्र-भाषा की आवश्यकता महसूस की जाने लगी जिससे लोगों में राष्ट्रीय एकता की भावना का संचार किया जा सके. इसके लिए हिन्दी एक सशक्त भाषा उभर कर सामने आयी, लेकिन दक्षिण भारतीयों की संकीर्ण मनोवृत्ति के फलस्वरूप इसका तीव्र विरोध किया गया. वास्तव में भाषा विवाद कोई समस्या नहीं, बल्कि राजनेताओं का एक शतरंजी खेल है, ताकि ये उनके क्षेत्र के लोगों को संकीर्ण विचारों तक रखकर वोट भुना सकें. हमें हिन्दी के प्रति स्वच्छ एवं समीचीन दृष्टिकोण रखकर उसे राष्ट्रभाषा बनाने में सहयोग देना चाहिए, ताकि राष्ट्र की सुरक्षा के संदेश को जन-जन सुन सके और समझ सके. 

(4) नेतृत्व का अभाव पिछले दशक से भारत के सम्मुख नेतृत्व संकट की समस्या उत्पन्न हो गई है. भारत के सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी ढपली पर अपना-अपना राग अलाप रहे हैं और प्रत्येक दल का सोच अपनी कुर्सी की रक्षा तक सीमित है. ऐसे देश में एक सफल विदेश नीति नहीं बन सकती है परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. इससे राष्ट्र के सम्मुख निवेश, विदेशी व्यापार, भुगतान सन्तुलन, रक्षा सामग्री के आदान-प्रदान की समस्याएं आ रही हैं. 

(5) आतंकवाद-वर्तमान में भारत में आतंकवाद एवं विघटनकारी प्रवृत्तियों में जिस तीव्रता से वृद्धि हुई है उस पर प्रशासन भी लगाम लगाने में असफल रहा है. अतः प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह आतंकवादियों से मुकाबला करे. आज आतंकवाद पंजाब एवं कश्मीर की समस्या मात्र न रहकर सम्पूर्ण भारत की समस्या बन गया है. पंजाब एवं कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में पाकिस्तानी हस्तक्षेप के स्पष्ट प्रमाण मिलने के बाद भी भारतीय शासन चुप्पी साधे बैठा है, जबकि उसे ऐसा मुँह तोड जवाब देना चाहिए जिससे वह भविष्य में भारत की ओर आँख न उठा सके. इससे दूसरे देशों को सबक मिलेगा. पिछले वर्ष पुरुलिया (पं. बंगाल) में गिराए गए हथियारों से राष्ट्रीय सुरक्षा पर उंगली उठी है. प्रत्येक भारतवासी को ऐसी गतिविधियों के प्रति चिंतित होना चाहिए. 

(6) राष्ट्रीय चरित्र का अभावराष्ट्रीय सुरक्षा एवं राष्ट्रीय चरित्र दोनों ही एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं. राष्ट्रीय चरित्र की नींव पर ही राष्ट्रीय सुरक्षा की अट्टा लिका खड़ी होती है, जहाँ नींव में थोड़ी-सी भी कमजोरी आई वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा की अट्टालिका डगमगाने लगती है. 

हम स्वयं समझ सकते हैं कि व्यक्तिगत चरित्र द्वारा हमारा देश किस प्रकार निरादर का पात्र बन जाता है. साधु-सन्तों, ऋषि मुनियों, त्यागियों-तपस्वियों का यह देश चरित्रहीन और गद्दारों का देश बन गया है. राष्ट्रीय चरित्र के अभाव में न आज हमारा देश सुरक्षित है न समाज, यहाँ तक कि हमारे नगर और परिवार भी सुरक्षित नहीं है. मुम्बई, दिल्ली एवं कलकत्ता में हुए बम विस्फोट इस बात के प्रमाण हैं. राजनीतिज्ञों और प्रशासन का अपराधीकरण एवं उनका गिरा चरित्र वोहरा समिति की रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है. आज हमारे चारों ओर काला-बाजारी, तस्करी, चोर बाजारी, रिश्वत, भ्रष्टाचार आदि का बोलबाला है. हमें अपनी आँखें खोलकर इन्हें मिटाना होगा तभी राष्ट्र सुरक्षित रह सकता है. स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में हुए घोटालों को अंगुलियों पर गिनना कठिन है, लेकिन 1992 के बाद के प्रमुख घोटालों में प्रतिभूति, चीनी, चारा, आवासीय, हवाला, यूरिया, मेडिकल संयंत्र, दूरसंचार एवं झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्वत घोटाले प्रमुख हैं. इसमें लगभग 12,000 करोड़ रुपए राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक कर्मचारियों की जेब में गए हैं. क्या हमने इसके प्रति चिन्तन किया है अगर इतनी बड़ी राशि राष्ट्र की अर्थव्यवस्था के विकास पर लगाई गई होती तो भारत विकसित राष्ट्रों की पंक्ति में आ खड़ा होता? 

भारतीयों के गिरे चरित्र तब और उजागर हो जाते हैं जब वे अपने प्रधानमंत्रियों और राष्ट्र नेताओं की हत्या करते नहीं कतराते. महात्मा गांधी, इन्दिरा गांधी एवं राजीव गांधी की हत्याएं हमारे राष्ट्रीय चरित्र पर ऐसे दाग हैं जिन्हें हम कभी नहीं पोंछ पाएंगे. इस जानकारी से हमारा सिर और शर्म से झुक जाना चाहिए कि श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या तो उन्हीं के द्वारा की गई जिन पर उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी थी. 

(7) युवकों में निराशा की भावना– किसी भी देश की सुरक्षा का उत्तरदायित्व वहाँ के युवा वर्ग का है वे ही कलह, द्वेष, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीयता एवं जातीयता से मुक्त समाज की स्थापना कर उसमें व्याप्त आतंकवाद, हत्या, अपहरण, अनाचार, दुराचार, काला बाजारी, घूसखोरी, हड़ताल आदि असामाजिक तत्वों की जड़ों को काट सकते हैं, लेकिन हमारे देश का युवा वर्ग बहकावे में जल्दी आ जाता है. निराशा एवं कुंठा शीघ्र ही हमारे युवाओं के अहम् को आहत कर लेती है, जिससे वे अँधेरी गलियों में भटक जाते हैं. उन्हें चाहिए कि वे राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए उसकी सुरक्षा के प्रति सदैव कटिबद्ध रहें एवं चिन्तन करते रहें. 

उपर्युक्त अवलोकन के पश्चात् हम पातें हैं कि आज हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा अंधकार के अंक में चली गई है ओर उस पर काले बादल मँडरा रहे हैं. अतः आज आवश्यकता इस बात की है कि देश को सुरक्षित रखने वाले बिन्दुओं पर हम स्वविवेक से चिन्तन और मनन करते हुए उसकी सुरक्षा के प्रति सदैव तैयार रहें. हमें अपने राष्ट्रीय चरित्र को इस स्तर तक उठाना होगा कि हमारा राष्ट्र विश्व में आदर्श रूप ग्रहण कर सके अन्यथा इतिहास अपने को दोहराएगा और मीरजाफर एवं जयचन्द की परम्परा हमारी सुरक्षा एवं स्वतन्त्रता के सामने बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा देगी. 

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