राष्ट्रभाषा बनाम संपर्क भाषा पर निबंध |Essay on national language vs contact language

Essay on national language vs contact language

राष्ट्रभाषा बनाम संपर्क भाषा पर निबंध

किसी राष्ट्र की पहचान उसकी राष्ट्रभाषा है। भारत जैसे विशाल देश में सैंकड़ों भाषाओं के प्रयोग हो रहे हैं। प्रयोग में आने वाली उन्हीं भाषाओं में से 22 भाषाओं को संविधान द्वारा स्वीकृति प्राप्त है। हिंदी इन्हीं अनुसूचित भाषाओं में से सर्वाधिक प्रचलित है। हिंदी को राष्ट्रभाषा और राजभाषा का सम्मान प्राप्त है। यहां शब्दों के अर्थ में थोड़ा अंतर है। अगर राष्ट्रभाषा की अवधारणा संपूर्ण राष्ट्र की घोषित भाषा है, तो राजभाषा की अवधारणा भारत के राज-काज में प्रयुक्त भाषा है। लेकिन सच्चाई यह है कि राष्ट्रभाषा के रूप में तो हिंदी दिख भी जाती है, परंतु राजभाषा के रूप में बाहरी तौर से दिखती भी नहीं है। 

वस्तुतः अंग्रेजियत हमारी मानसिकता पर हावी है कि हम हिंदी का प्रयोग करना अपना अपमान समझते हैं। हिंदी के प्रयोग पर जोर डालने वाले व्यक्ति को लोग पिछड़ा हुआ मानते हैं। हिंदीभाषी को हम प्रगतिशील नहीं मानते। उसे आधुनिक भी नहीं मानते, जबकि ऐसी सोच रखने वाले आदमी अंग्रेजी की वर्णमाला का भी सही ज्ञान नहीं रखते। एक विपर्यय है कि आजादी के बाद देश में हिंदी की प्रतिष्ठा बढ़नी चाहिए थी, जबकि स्थिति यह है कि आजादी के बाद भी समय बीतता जा रहा है और हिंदी उपेक्षित होती जा रही है। हिंदी से स्नेह रखने वाले गंवार, अशिक्षित, अल्प शिक्षित और पिछड़े हुए हैं। 

हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ का पद यों ही नहीं मिला है। हिंदी अपनी अन्य सभी बहनों में बड़ी तो है ही, अधिसंख्य आबादी द्वारा बोली और समझी भी जाती है। उत्तर भारत के 6 बड़े राज्य हिंदीभाषी हैं। यहां की शत प्रतिशत आबादी का संपूर्ण काम-काज हिंदी में होता है। शेष भारत के सभी राज्यों में हिंदी का प्रयोग संपर्क भाषा के रूप में होता है। यह स्थिति अन्य राज्यों की भाषा के साथ नहीं है। अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जिसे राष्ट्रभाषा कहा जाता है, उसकी कौन-कौन सी विशेषताएं होती हैं? 

सन 1950 में जब देश का अपना संविधान बनकर लागू हुआ, तो देश की भाषा ‘हिंदी’ को ही घोषित किया गया, लेकिन साथ में एक शर्त लगा दी गई कि अगले 15 वर्षों अर्थात सन 1965 तक अंग्रेजी ही राष्ट्रभाषा बनी रहेगी, उसके बाद हिंदी राष्ट्रभाषा हो जाएगी। यह किसी भी बुद्धिजीवी के लिए ग्राह्य नहीं है कि हमें आजादी प्राप्त करने की जल्दबाजी थी, लेकिन अपनी भाषा को अपनाने की जल्दबाजी नहीं थी। ऐसे में तर्क यह दिया गया कि इन 15 वर्षों में प्रायः सभी प्रांतों की सहमति हिंदी भाषा को प्राप्त हो जाएगी। 

सहमति प्राप्त करने में भले ही थोड़ा अधिक समय लग जाता, तो बुरा न होता, लेकिन यहां स्थिति यह उत्पन्न हुई कि 15 वर्षों के बाद उन सभी प्रांतों में हिंदी के प्रति अरुचि अधिक बढ़ गई। क्या ऐसा इसलिए हुआ कि उन प्रांतों का देश के प्रति अनुराग बढ़ गया? जो भी हो, इस मूर्खतापूर्ण निर्णय का परिणाम यह हुआ कि राजनीतिक स्वार्थों के कारण हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के हिमायती आज उसके विरोधी बन गए हैं। आजादी के 60 वर्ष बाद भी हिंदी संविधान के अनुसार और व्यवहार के स्तर पर सिर्फ कहने के लिए राष्ट्रभाषा है। वास्तव में हिंदी की आज दासी ही नहीं, परित्यक्ता जैसी स्थिति है। 

आज हालत यह है कि हिंदी के नाम पर धन अर्जित करने वाले व्यक्ति ही व्यवहार में उसका प्रयोग करना सामाजिक हीनता और अपमान समझते हैं। वैसे तो आज भी हिंदी वह भाषा है, जिससे देश के किसी भी कोने में जाकर इससे काम चलाया जा सकता है। आज हिंदी को संपूर्ण भारतवर्ष में कम से कम समझा तो जरूर जाता है। कहीं-कहीं लिखित रूप में इसका प्रयोग भी होता है। आज देश में कहीं भी हिंदी बोली और समझी जा सकती है। 

संविधान की दृष्टि में हिंदी राष्ट्रभाषा होते हुए भी वास्तविक अर्थों तथा व्यवहार में राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। इसके लिए पं. जवाहरलाल नेहरू की नीति को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए, जिसमें 15 वर्षों का समय जोड़ा गया। हिंदी की स्वच्छता, सुंदरता और सरलता के बाद भी अंग्रेजी को तरजीह देना हमारी गुलाम मानसिकता का प्रतीक है। हम हिंदीभाषी भी इसके लिए कम दोषी नहीं हैं। हम इसके नाम पर करोड़ों अर्जित करते हैं, लेकिन व्यवहार में अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ते तथा अंग्रेजियत से भी बाज नहीं आते। हिंदी के प्रयोग, हिंदी के विकास, राष्ट्रभाषा उत्थान आदि के नाम पर हम प्रपंच करते हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजन से राष्ट्रभाषा हिंदी का कितना भला हो सकता है, यद्यपि यह प्रयोग में वर्ण्य है। सभी प्रकार की उन्नति का मूल निज भाषा उन्नति है

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